हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Philosophy of Nijanand

Understanding the philosophy of Nijananda Sampradaya, aka Shri Krishna Pranami Dharma through Shri Prannath Vani.
आनन्दस्य कुलं प्राप्तं नित्येधाम्नी प्रकिर्तितम । सम्प्रदायश्चिदानन्दो निजानंदै: प्रकाशित: ।। श्री माहे०तं०

अर्थात आत्मसाक्षातकार के द्वारा पूर्ण आनन्द मे रहने वाला निजानंद सम्प्रदाय भविष्य मे जाहेर होगा और फिर सभी को आत्मसाक्षात्कार होगा । देखो भगवान शिवजी ने श्री माहेश्वर तन्त्र के २८ पटल मे जिस सम्प्रदाय के जाहेर होने की बात कही थी |

महतः परमव्यक्तमव्यत्कात पुरुषः परः
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥
कठोपनिषद /१/३/११
महतः = उस जीवात्मा से (आदि नारायण से)
परम = बलवती है
अव्यक्तम = अक्षर ब्रह्म से भी
परः = परमपुरुष परब्रह्म परमात्मा
पुरुषात = परम्पुरुष परब्रह्म से
परम श्रेष्ठ और महिमामण्डित

किंचित न = कुछ भी नहीं है
सा काष्ठा = वही सब की परम अवधि (और)
सा परा गतिः = वही सब की परम गति है

सम्पूर्ण चौरासी लाख योनी के प्रमुख श्रोत जीवात्मा (आदि नारायण) से बलवान अक्षर ब्रह्म है क्योंकि इन के द्वारा नारायण की उत्पति हुइ है। अव्यक्त कूतस्थ अक्षर ब्रह्म से परे परमपुरुष परब्रह्म परमात्मा अक्षरातीत हैं । उन से परे कुछ भी नहिं है, वही सब की परम अवधि और परमगति भी है ॥


सतगुरु ब्रह्मानंद है,सुत्र है अक्षर रुप |
सिखा सदा तीनसे परे ,चैतन्य चित जो अनुप ||१||

श्री महामति प्राणनाथ द्वारा प्रचलित निजानन्द सम्प्रदाय (श्री कृष्ण प्रणामी धर्म) की पध्दति अर्थात शाखा, सूत्र, सेवन, गोत्र, इष्ट , जाप, साधन, मन्त्र, पुरी, देवी, शाल, क्षेत्र, सुख, विलास, ऋषि, देव, तीर्थ, शास्त्र, ज्ञान, कुल, फल, द्वार एवं निवास आदि मान्यताओं क उद्घोष निम्नलिखित पद में व्यक्त किया है।

सतगुरु की साक्षी:

ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वदा साक्षिरूपम्,
भावातीतं त्रिगुण रहितं सतगुरु तन्नमामि ॥
(स्कन्द्पुराणे गुरुगीतायम्)

अर्थ:= सच्चिदानंद ब्रह्म का आनन्द अन्ग, जिन्हे श्यामा कहा गया, वही सत्गुरु हैं। वे सर्वोत्तम ज्ञान एवं परम सुख के दाता हैं। वे द्वंद्व अर्थात माया, निरंजन निराकार एवं साकार ब्रह्मांड से परे हैं । आकाश जैसा उनका स्वभाव है, तत्वमसि में से असि पद ब्रह्म को कह गया है । तत पद ईश्वर से परे ब्रहं क लक्ष्य देते हैं। वह अचल रूप, सदा साक्षी स्वरूप हैं । स्वभाव अर्थात अध्यात्म अर्थात अक्षरब्रह्म से भी परे हैं । तीनों गुण सत-रज-तम के स्वरूप ब्रह्मा, विष्णु और महेश से परे हैं । ऐसे सतगुरु को सप्रेम नमस्कार है । पुरुषोत्तम श्री कृष्ण जी की अर्धांगिनी आनन्द अंग श्री श्यामा जी ने भारत में श्री देवचन्द्र जी के रूप में अवतार लीया । यही सतगुरु स्वरूप निजानन्द स्वामी हैं ।

यदक्षरं परंब्रह्म तत्सूत्रमिति धार्येत् ।
सूचनात्सूत्रमित्याहु: सूत्रं नाम परं पदं ॥
तत्सूत्रं विदितं येन स विप्रो वेदपारग:
(ब्रह्मोपनिषद)

अर्थ: सच्चिदानंद ब्रह्म के सत अंग अक्षर ब्रह्म से परे परब्रह्म उत्तम पुरुश ही समस्त सृष्टि के सूत्रधारी हैं । इस मूल सूत्र से परिचित ही यथार्थ में वेदज्ञ ब्रह्मज्ञानी हैं । परमहंस उसी अविनाशी सूत्र को धारण करते हैं ।

शिखा की साक्षी यथा:-

शिखा ज्ञान्मयी यस्य उपवितमं च तन्मयम् ।
ब्राह्मण्यं सकलं तस्य इति ब्रह्म विदो विदु:॥
चिदेवपंचभूतानि चिदेवभुवनत्रयम ।
(ब्रह्मोपनिषद)

अक्षरब्रह्म जो समस्त सृष्टि क सूत्रधार है, शिखा उससे परे है । वह ज्ञानमयी चिद् अर्थात चेतन स्वरूप है और आनन्द में तन्मय है। इसे ही परब्रह्म कहा है। यही चेतन अक्षरब्रह्म में समाविष्ट है, जहाँ से वह पांचो देवों, पन्च्भूतों अर्थात् जल पृथ्वी, तेज, वायु और आकाश तत्व तथा तीनों लोकों के देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश इस प्रकार समग्र सृष्टि में व्यापक हो गया है । ( अक्षर ब्रह्म से वह चेतन, अक्षर ब्रह्म की आनन्दोल्लसित निद्रा अवस्था में उसके स्वप्न में व्यापक है। यही स्वप्न ब्रह्मांड है, जो स्वप्न टूटने पर मिथ्या हो जयेगा) अत: व चित्घन अक्षरातीत ब्रह्म ही वह शिखा है, जिसके परे अन्य कोई नहिं है

सेवन है पुरोषोत्तम,गोत्र चिदानंद जान |
परमकिशोरी ईस्ट है ,पतिब्रता साधन मान ||२||

सेवन की साक्षी यथा:

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूट्स्थोऽक्षर उच्यते ॥
उत्तम: पुरुष्स्त्वन्य: परमात्मेतुदैहृत:॥
यो लोक त्रयमाविष्य विभर्त्यव्यय ईश्वर:॥
(गीता अध्याय १५/१६,१७)

इस लोक में दो पुरुष हैं, एक क्षर पुरुष, दूसरा अक्षर पुरुष । क्षर पुरुष अर्थात पंचदेव,पंचभूत, एवं त्रिगुण सहित विराट स्वरूप नाश्वान होने से अनात्मा है। अविनाशी अक्षर पुरुष ही आत्मा है । उसकी प्रतिष्ठा, सत्त के रूप में स्थित जो पुरुष त्रैलोकी का पालन कर्ता है, उसे ईश्वर कहा जाता है । यह ईश्वर महाविष्णु है, जो क्षर पुरुष रूपी विराट वृक्ष (जगत) का मूल है ।

गोत्र की साक्षी यथा:

अनदिमादिचिद्रूपं चिदानंदंपरंविभु:।
वृन्दावनेश्वरं ध्यायेत् त्रिगुणस्यैककारणम् ॥

अर्थ:
जो अनादि है, चिद्घन स्वरूप है । सबका स्वामी है । ब्रह्मा विष्णु महेश आदि सबका कारन रूप है । उस वृन्दावननाथ श्री कृष्ण क मैं ध्यान करता हूँ।

इष्ट की साक्षी, यथा:

सिद्ध रूपाऽसिचारध्या सा श्यामा जीवनं मम ।
य: स्मृत्वाभावयति त्वां तैरहं भावित: सदा ॥
तत्र में वास्तवं रूपं यत्र यत्र भवदृशी।
ममेष्टं च ममात्मा त्वं राधैबाराध्यते मव ।
(पुराण सहिंता)

अर्थ:
स्वयंसिद्ध स्वरूपा राधा देवी। आप ही मेरी आराध्या हैं ।
हे श्यामा आप ही मेरे जीवन का जीव हैं । जो लोग भक्ति भावना से आपको याद करते हैं मैं उनका भी अनुग्रहित हूं । जहाँ भी मुझे आपके दर्शन होते हैं, मैं आपके ही अपने वास्तविक स्वरूप का दर्शन करता हूं। आप ही मेरी इष्ट हैं, आत्मा हैं । अत: मैं सदा आपकी आराधना करता हूं।

साधन की साक्षी -

नाहं वेदैर्न तपसा ने दानेन न चेज्यया।
भक्त्या त्वनन्यया लभ्य अहंमेव विधोऽर्जुन ॥
(गीता)

श्री कृष्ण जी कहते हैं ’हे अर्जुन ! मैं ने तो वेदपाठ के द्वारा, न तपस्या से, न दान से, और न ही यज्ञ करने से प्राप्त होता हूँ । मैं तो केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त हो सकता हूँ । (इस प्रकार की अनन्य भक्ति पतिव्रता पत्नी के प्रति ही हुआ करती है । अत: परमात्मा को पति रूप में अनन्य भाव से प्रेम लक्षणा भक्ति द्वारा ही प्राप्त करना सम्भव है।)

श्री युगल किशोरको जाप है,मन्त्र तारतम सोहे |
ब्रह्मबिद्या देवी सही ,पुरी नौतन मम जोए ||३||

जाप की साक्षी -

राधया सह श्री कृष्णं युगलं सिंहासने स्थितम ।
पूर्वोक्तं रूपलावणं दिव्याभूषा श्रिगम्बरम् ॥
(बराह संहिता)

रूप और लावण्य से सम्पन्न तथा दिव्य वेष-भूषा से युक्त तथा सिंहासन पर विराजमान श्री राधा सहित श्री कृष्ण की किशोर जोडी का स्मरण करता हूँ ।

मंत्र ’तारतम’ की साक्षी, यथा:

स्वकृत विचित्रयोनिषु विशन्निव हेतुतया,
तरतमश्च कास्यनलवत् स्वकृतानुकृति: ।
अथ वितथस्वभूष्ववितथं तव धाम स मम् ।
विरज-धियोऽन्वयन्त्यभिविपण्यव एकरसम् ॥
(भागवत् १०-८७-१९)

अर्थ: हे भगवान्। आपने ही देवता, मनुष्य और पशु आदि विचित्र योनियाँ बनाई । सदा सर्वदा सब रूपों में आप ही हैं । इसलिये कारन रूप से प्रवेश न करने पर भी आप ऐसे जान पडते हैं, मानों उसमें प्रविष्ट हुए हों। साथ ही विभिन्न आकृतियों का अनुकरण कर्के कहीं उत्तम, तो कहीं अधम रूप से प्रतीत होते हैं, जैसे आग छोटी बडी लकडियों और कर्मों के अनुसार प्रचुर अथवा अल्प परिणाम में या उत्तम अधम रूप में प्रतीत होती है। संत पुरुष पारलौकिक कर्मों की निरासक्ति से उनके फलों से विरक्त हो जाते हैं, और अपनी निर्मल बुध्दि से सत्य-असत्य, अनात्मा को पहचान कर जगत के झूठे रूपों में नहीं फँसते । आपके सर्वत्र एक रस स्वभाव से स्थित सत्य स्वरूप का साक्षात्कार करते हैं -

अठोतर सौ पख शाखा सही,शाला है गोलोक |
सतगुरु चरण को क्षेत्र है,जहाँ जाए सब शोक ||४||

सुख विलास माहे नित्य ब्रिन्दाबन,ऋषि महाबिष्णु है जोय |
बेद हमारो स्वसम है ,तिर्थ जमुनाजी सोहे ||५||
सास्त्र श्रवण श्री भागवत,बुद्ध जागृतिको ज्ञान |
कुल मूल हमारो आनन्द है,फल नित्य बिहार प्रमाण ||६||
दिव्य ब्रह्मपुर धाम है,घर अक्षरातित निवास |
निजानंद है सम्प्रदाय,उत्तर प्रश्न प्रकाश ||७||
धनि श्री देवचन्द्रजी निजानंद,तिन प्रकट करी सम्प्रदाय येह |
तिनथे हम येह लखी है ,हम द्वार पावे अब तेह||८||

Meaning in English!

सतगुरु ब्रह्मानंद है,सुत्र है अक्षर रुप |

satguru brahmanand hai, sutra hai akshar roop

The absolute bliss (bliss of brahm) is our Satguru, Our relation in the world is through Akshar the imperishable.

सिखा सदा तीनसे परे ,चैतन्य चित जो अनुप ||१||Shikha sada unse pare Chetan chid jo anoop

But the Supreme is beyond Akshar and is amazing absolute consciousness (chit : the inner mind)

सेवन है पुरोषोत्तम,गोत्र चिदानंद जान |Sevan hai purushottam, gotra chidananda jaan

We serve this Supreme ultimate being 'Purush' , and know our gotra(classification of beings) as blissful consciousness
परमकिशोरी ईस्ट है ,पतिब्रता साधन मान ||२||Param kishori isht hai , pativatra sadhan maan

The Supreme and eternal youthful Shyama is our destination(we are part of her) and surrendering like a virtuous devoted wife is our means (total surrender)
श्री युगल किशोरको जाप है,मन्त्र तारतम सोहे |Shri jugal kishor ko jaap hai, mantra tartam hai sohe

We recite(jaap) ultimate eternal youthful duo ( Shyama Shyam Radha Krishna) and Tartam mantra illumines magnificiantly

Tartam means sails out of darkness
ब्रह्मबिद्या देवी सही ,पुरी नौतन मम जोए ||३||Brahmavidya devi sahi puri nautan mam joye

The knowledge of Brahm(Supreme wisdom of ultimate truth and reality) is the goddess and at Navtanpuri it is founded and one must see

अठोतर सौ पख शाखा सही,शाला है गोलोक |Athotar sau pakh shakha sahi shala hai goulok

There are 108 paksh shakha (kinds of branches), Gaulok is the depot

सतगुरु चरण को क्षेत्र है,जहाँ जाए सब शोक ||४||Satguru charan ko kshetra hai jahan jai sab shok
The feet of Satguru(the true spiritual guru is actually supreme residing within) is our domain where all the sorrows disappear (find no peace anywhere else).

सुख विलास माहे नित्य ब्रिन्दाबन,ऋषि महाबिष्णु है जोय |Sukh vilas nitya vrindavan rishi mahavishnu hai joye

The bliss we find in eternal Vrindavan(this is not the perishable Vrindavan of this earth) which Akshar (rishi MahaVishnu) also witnessed.

(Akshar is aka MahaVishnu the Creator. He is termed rishi as he was a seeker who wanted to understand the pastime of the Supreme Self.

Adi Narayan The one who rests on water was created first and his mental creation is Lord Vishnu of Vaikunth, Brahma and Mahesh who further created the world. )

बेद हमारो स्वसम है ,तिर्थ जमुनाजी सोहे ||५|| Ved hamaro swasam hai teerath yamuna sohe

Our Ved is swasam (knowledge of the self the Nij= Swa) and our pilgrimage is splendourous Jamunaji

सास्त्र श्रवण श्री भागवत,बुद्ध जागृतिको ज्ञान |Shastra shravan shri Bhagavat budhi jagrat ko gyan

The scriptures we listen is Bhagavat which is wisdom of awakened mind

We believe listening to Shri Bhagawat will awaken the mind,
कुल मूल हमारो आनन्द है,फल नित्य बिहार प्रमाण ||६||Kul mool hamaro anand hai phal nitya vihar praman

Our ancestry origin is bliss and the fruit eternal pasttime our evidence

(we will realise that our source is eternal joy and experiencing the bounties and abundance bliss is our proof) Witnessing the eternal joy from the source of the self which is our original state and we are the descendent of this bliss and experience is our direct proof.

दिव्य ब्रह्मपुर धाम है,घर अक्षरातीत निवास |Divya Brahm pur dham hai ghar aksharateet nivas

Divine full with splendour of Supreme- Brahm is our abode which is home of our soul Aksharateet (beyond Akshar)
निजानंद है सम्प्रदाय,उत्तर प्रश्न प्रकाश ||७||Nijanand hai samprada ye uttar prashna prakash

Nijanand The bliss of the soul is our tradition the enlightening is the answer of the query

धनि श्री देवचन्द्रजी निजानंद,तिन प्रकट करी सम्प्रदाय येह |dhani devchandraji nijanand jin prakat kari samprada yeh

Master Shri Devachandraki founded this tradition of Nijanand

तिनथे हम येह लखी है ,हम द्वार पावे अब तेह||८||tin thein ham yeh lakhi ham dvar pavain ab teh

From him we are able to propagate these words and thus now we attain the doors of Abode.

(मूर्ति पूजा विवेकपूर्ण साधन नहीं है)

यस्यात्मबुद्धि: कुणपे त्रिधातुके
स्वधी: कलत्रादिषु भौम इज्यधी: ।
यत्तीर्थ बुद्धि: सलिले न कर्हिचि ज्जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखर: ॥
भागवत १०/८४/१३
यस्य = जो मनुष्य
आत्मबुद्धि: = आत्मा समझता है
कुणपे = मुरदत तुल्य शरीर को
त्रिधतुके = तीन धातुओं से (कफ़, वात, पित्त) बने इस को
स्वधी: = अपना मानता है (तथा)
कलत्रादिषु = स्त्री पुत्रादि को
भौम = पत्थर आदि की मूर्तियों को
इज्यधी: = इष्ट देव मानता है
यत = जो
तीर्थ बुद्धि: = तीर्थ कहता है
सलिले = जल को
न कहिर्चित = कभी नहिं तीर्थ कहता
अभिज्ञेषु = विद्वान
जनेषु = पुरुषों को
स एव = वह ही
गोखर: = गधा के समान है
भावर्थ वसुदेवजीके यज्ञ महोत्सव में श्री कृष्णजी उपदेश देते हैं - हे महत्माओं एवं सभासदों । जो मनुष्य कफ़, वात, पित्त इस तीन धातुओं से बने हुए शव तुल्य शरीर को ही "आत्मा, मैं" स्त्री पुत्र आदि को ही अपना और मिट्टि, पत्थर, लकडी आदि पार्थिव विकारों को ही "इष्टदेव" मानता है तथा जो केवल जल को ही तिर्थ समझता है लेकिन ज्ञानी महापुरुषों (चल तीर्थ) को तीर्थ नहीं समझता है, वह मनुष्य होने पर भी पशुओं में नीच गधा के समान है!

खोजें कोई न पावहीं, वार ना पाइए पार।
ले बुत बैठावें देहुरे, कहें हमारा करतार।।

५/pr14/sanandh

यहाँ पर कई लोग परमात्माकी खोज करते हैं किन्तु उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते. वे इस भवसागरका ही ओर-छोर नहीं पा सके, इसलिए देवालयोंमें र्मूितको पधराकर कहने लगे कि यही हमारे परमात्मा (करतार) हैं.

Know the Master!

घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३

हमारा घर अखण्ड परमधाम तथा हमारे धनी श्रीकृष्ण यही तारतमका सार फल है. इस तारतम ज्ञाान द्वारा अत्यन्त प्रकाश फैलता है. जिससे मनमें किसी भी प्रकारकी शंका नहीं रहती है.
Our abode is Paramdham(akhand aksharateet) and Shree Krishna, this the fruit of Tartam sagar(dispeller of the ignorance brought by Satguru Devachandraji). The light of this will be so great that all the confusion from mind will be removed says Mahamati Prannathji.

The revelations of the Supreme Truth.

Nij the Self : name of the Self is Shri Krishna which has no beginning and is eternal and is from Aksharateet (imperishable, unbound, limitless, beyond creator the Akshar).

Shri Krishna is absolute Supreme (PurnBrahm) He is paramanand ultimate Bliss, is akhand indivisible, and Sat- Truth. He is the soverign ruler of the entire creation(universes) and also rules our heart hence is called Shri Raaj. He is extremely loving and adorable hence called Vallabh. He is our beloved hence Piyu. He is master (groom) of Shyama and He is the truth. He is the one who sustains the Brahmshristis hence Bhartaar!

The eternal,indivisible, permanent abode of Shri Krishna is called Paramdham (the ultimate abode) it is beyond the Creator Akshar hence called Aksharateet, it is situated in the heart of the soul (Nij-dham).
Thus the name of the Self (nijnaam) is Shri Krishna from Eternal and beyond imperishable creator Akshar , this is what is now revealed (jaher) along with the splendour of our original abode(vatan). The purnaBrahm (Whole Truth)reveals the name of the Self as Shri Krishna anadi(neither has beginning nor the end) and is from Aksharateet (beyond the creation, creator and is imperishable).

The groom(var) Lord of Shyama is the truth and is the source of everlasting bliss and hence grants the eternal (sada) bliss. The Shyamavar satya hain (Shyama's master is the truth) where as Shyama is the aanand bliss essence. Akshar the Creator of the universe is also part of truth aspect of Supreme. The Supreme Lord Shri Krishna is the source of all the consciousness (chetan). The eternal absolute Supreme Brahm of Aksharateet (beyond Akshar) , the epitomy of Love, dwells in the heart of the soul along with splendour of abode of the self is revealed as Shri Krishna to Sundarbai(celestial soul) and Shyama(consort of Shyam Shri Krishna).

This is a request of my Vallabha(is extremely lovable, adorable ) through this angana Indravati (Mahamati Prannath) -one who is one with the Lord or part of the Lord (ang means the complete being of the soul) to kindly accept these words in the heart.

That the words of my beloved Lord is not of this world, what is that is beyond formlessness(or black hole-the endless shunya niraakar niranjan which surrounds the entire universes) , these words are beyond that too.

This is generated from inspiration of Lord in my soul, please my dear sundarsathji think over it. These words of truth we must churn in our mind and get the saar(the real essence). We must contemplate all the time. In this "saar", there are lots and lots of true happiness and bliss, so this is what I have resolved (determined) to accept it and when I grant this to my other brahmshrishti I will consider myself as true consort of the Lord (angana naar). When this bliss comes in us all the bikaars are dissolved and we will benefit the joy of Aksharateet abode (The abode is indivisible, whole and real)and the presence of Supreme Master within!

Nij the self name Shri Krishna , aanand Shri Shyama ang : part of the Shyama the celestial souls Brahmatma.

Union with Shri Krishna and Shyama is Nijanand.

Those who accept it with full faith and follow will gain the fruit of Tartam that is Nijanand.

Thus name of our faith is Nijanand (Bliss of the Self name Shri Krishna)- aka Shri Krishna Pranami (one who surrenders to Shri Krishna).

Nijanand faith was founded 350 years ago by Satguru (one who eliminates darkness of ignorance by the light of truth) Shri Master Devachandraji, Gujarat, India and propagated by his disciple Shri Meharaj Thakkar who after enlightenment or united with the Supreme, he received the awakened cosmic intelligence (mind of the creator Akshar), Inspiration of the Lord (Gabriel), the bliss attribute of the Supreme Shyama, Will of the Lord Supreme and the wisdom of original abode(Tartam wisdom of abode of the Supreme) and the better known as Mahamati Prannath (Greater Intelligence, Lord of the soul).
The above gurus read scriptures of all religions (Ved, Upanishad,Bhagavat, Pooran of Hindus, Toret of Jews, Bible of Christians, Quran of Islam religion). They found the word of God differed in languages but not in the core truth. The people of all the religions are following rituals,traditions, customs, other habits and external clothes, food etcs and they are fighting among themselves over false perception of truth.
There is fighting in the name of God too because the people following the holy books have not got the understanding of the message of God. Torah or Toret is written in code, Bible is spoken in parables, Ved and Bhagavat also has maintained the truth hidden amongst the complicated verses. There is external differences and internal confusion(ego consciousness, lack God consciousness) thus there is chaos in the world. We the followers of Nijanand do not involve ourselves in any religious conflicts.
"By laying stress on the comparative study of the Holy Books of all the religions, Mahamati Prannath explained to the people that the fitting answer to the bigotry and religious fanaticism is the proper understanding of the true spirit of religion and the religious war. If God is one then He is prudent enough to send His message to all his people of different countries and at different times, then how can his messages be a cause of mutual conflicts and wars?" Kateb Vani (Semitic Wisdom) Dr. B. P .Bajpai
The first step to end this mad conflict is by understanding the messages of scriptures (word of God) through the light of Tartam wisdom and then experience the bliss of the self (the bliss is within) and when we experience this we will be able to make the whole world blissful and happy. But none are able to do so no matter how much people are trying.
All the religions are waiting for the last prophet who will do the awakening. Christians are waiting for second coming of Christ, Jews are waiting for messiah, Muslims for their Imam Mehedi and hindus Budh nishkalank avtaar (the intelligence which is untarnished and pure). Our founder gurus(Satguru and Mahamati Prannath) were the last prophets that world is waiting for, they have given all the signs, symbols, prophecies, indication of time of their arrival and proofs through all the scriptures.

Hence we have holy book Tartam sagar (it is ocean which eradicates darkness of ignorance and saves the soul) aka Kuljam Swaroop which is a absolute knowledge of the Supreme which reveals the secret of all above mentioned scriptures in layman terms of those days (350 years earlier hindustani language). Tartam wisdom is also scientific knowledge. (One can experience when one follows it).
Since there is revelation of so many scriptures, guidance by othe prophets and additional information, the book contains 18758 verses.
The truth about the world and 7 upper realms and 6 lower realms (14 planes of existence), the Creator, the purpose of creation is given.

Our faith does not believe in conversion as God is one and only one, one just needs raise one's consciousness and know who God is. God has name which is very loving and attractive and it is Shri Krishna - Shyam but He has infinite names too as there are infinite universes with infinite languages but the scriptures describing about the flood point towards Shri Krishna. God has form. Man is made in His image. God also has abode (imperishable,eternal, not bound by time,unchanging,conscious, blissful).
The tartam wisdom includes the purpose of creation and the core value(the truth) one must follow. This world is play of the God to entertain the divine souls. The souls are lost in the world and thus prophets came to gather the lost sheeps. Krishna is the name which is the core of the soul, It is attracting force of all the souls.
Krishna is also popular as Vishnu's avtaar but the Supreme Lord that is eternal and of imperishable abode is not the same.
There are three types of souls jeev (aam in islam)- natural, ishwari (khas in islam)- divine angels, brahm (khasal khas in Islam) celestial (chosen ones or meek ones who shall inherit the kingdom of heaven).

The three angels Michael is Brahma who is incharge of creation-birth who is also incharge of maintaining the words of God, angel Azazeel is Vishnu preservation and angel Israel is incharge of termination-death is Mahesh. Gabriel is the inspirational power of Lord 'Josh' who whispers the message of God to prophets. Israfil who blows the trumpet when the last prophet come is Budh-Cosmic Intelligence. The Satan Lucifer the fallen angel , Shaitan Iblish the mind of angel Azazeel and the cursed Narad the mind(mann) of Vishnu are not three but one. It is nothing but the desiring mind (mann) in different languages luring human beings away from the God. The natural being the Jeev following desires of mind eats the fruit of action which is forbidden and shares it with Aatam the witnesser within which also partly enjoys it and forgets it original divine self and thus falls from the bliss of the self(Nijanand) to world of misery. There is more in this topic.
Our goal is soul realization by raising our consciousness that we are aatma hence how to do it is given in plain spoken language. One has to practice what one learns to experience the truth. Path to God is only one that is love and it is practiced first by loving God's creation animals included thus we practice compassion towards animals and birds and eat vegetarian food and practice non-violence (speech, mind and action). Any substance that makes us less aware, makes us unconscious, creates habit which brings discomfort in its absence is forbidden(drugs, alchohol,tobacco etcs). We are suppose to bring more awareness of the self, be more conscious in our living(watch our speech, thoughts and actions- three must be correlated). All the hypocrisy, external rituals, celebration of festivals , wearing saintly dress, growing beard/hair or cutting it short all the outwardly show can fool some people but God cannot be deceived by such activities. We must not work to create an impression or an image but be true to ourselves.

We must know ourselves first and then we can know God, goes our first principle. The soul must be awakened and it cannot until we understand our mind, its pursuits,its desires and its activities. Thus understanding of the mind, the human pursuit and the world is given. You can cherish the way of the world or the kingdom of God. The teaching of Mahamati's wisdom is to surrender the ego and accept Lord and witness the world consciously and become soul conscious thus waking our soul from the deep slumber. When the soul awakens while present in the perishable body, that is the day of awakening, it is the soul waking up from the grave. Once this happens, the soul will witness the Supreme within along with abode, the soul will unite with super soul and will know the consequences of one's action (judgement). The infinite is handed over us to shine in the darkness, wake up from the slumber and thus ending the dream world and entering the supreme abode and attaining the Nijanand the bliss of the self within. Once we have achieved this everlasting bliss, united with the Supreme Lord then we experience the compassion for whole humanity and thus we will work to end the human misery.

The temples built by our original guru is our pilgrimage (Shri Navtanpuri Dham, Jamnagar,Gujarat, India, Mahamangalpuri Dham, Surat, Gujarat, India, Padmawatipuri Dham, Panna, India)
We have many temples and assemblies for the followers to meet and worship in Nepal, Bhutan, India, and two in USA.

Our current spiritual guru is Rev. Krishnamani Maharaj who will visit the temple at Tennessee on 4th July weekend.

Though we have temples but the Supreme God resides in the heart of the soul. One must find the Lord within, the religious center and spiritual guru is to help us but we must help ourselves first.The gurus work to enlighten the soul within us and making us equal to them. Guru is a candle which is already lit and it lights all the other unlit candles, after enlightening all are equal.

This is the same faith followed by Mahatma Gandhi's mother Putalibai which gave him the essence of unity in all religion.
This is a small and brief introduction of our faith.

पख पुष्ट मरजाद प्रवाह
अब कहूं सो हिरदे रख, अठोतर सौ जो है पख।
एह बिचार सुनियो परवान, याको सार काढूं निरवान ।।१
अब मैं भक्ति मार्ग (आत्म-सोपान) के एक सौ आठ पक्षोंको हृदयमें धारण कर उनका विवरण देती हूँ. इस प्रामाणिक विचारको सुनो और समझो, अब मैं निश्चित इनका सार निकालती हूँ.
माया जीव कोई है समरथ, दौड करत है कारन अरथ ।
निसंक आपोपा डारया जिन, निहकर्म पैंडा लिया तिन ।।२
मायामें ऐसे कई समर्थ जीव हैं जो अपने लक्ष्यकी प्राप्तिके लिए प्रयत्नशील रहते हैं. जिन्होंने निःसंकोच होकर स्वयंको सर्मिपत किया है, वे ही निष्काम कर्मयोगके पथ पर चल पाए हैं.
पुष्ट मरजाद जो प्रवाह पख, याको सार बताऊं लख ।
ताके हिसे किए नौ, चढे सीढी भगत जल भौ।।३
पुष्ट, प्रवाह और मर्यादा इन तीन भावोंको पक्ष कहा जाता है. इनका सार बता रही हूँ. नवधा भक्तिके द्वारा इन तीनोंके नौ-नौ भाग कर भक्तजन इस सीढ.ीसे भवसागरके पार हुए हैं.
भी ताके बांटे किए सताइस, चढे ऊंचे सुरत बांध जगदीस ।
सो बांटे किए असी और एक, पोहोंचे बैकुंठ चढे इन बिवेक ।।४
वे तीनों भाव नवधा भक्तिसे गुणा करने पर सत्ताईस हो जाते हैं. इन्हींके द्वारा भक्त जन अपने चिन्तनको जगतके ईश (जगदीश) तक पहुँचाते हैं. अब पुनः सत्व, रज, तम इन तीन गुणोंसे उन भावोंको गुणा करने पर एक्यासी भाव (पक्ष) होते हैं. इन सोपानों पर विवेकके साथ चढ. कर वैकुण्ठ तक पहुँचा जाता है.
चार विध की कही मुगत, करनी माफक पावे इत।
इतथें जो कोई आगे जाए, निराकार से ना निकसे पाए ।।५
वैकुण्ठ धाममें चार प्रकारकी मुक्ति (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सायुज्य) कही गई है जिन्हें भक्त जन अपनी करनी (अपने अपने कर्मोंकी उच्चता) के अनुसार प्राप्त करते हैं. इससे आगे जो कोई भी जाते हैं वे निराकारसे आगे निकल नहीं पाते.
पख बयासिमां जो कह्या, वल्लभाचारज तहां पोहोंचिया ।
स्यामा वल्लभी यों करी बडी दौर, ए भी आए रहे इन ठौर ।।६
बयासीवाँ पक्ष इससे भी आगे कहा गया है, श्रीवल्लभाचार्यजी (प्रेमभक्तिमार्गके कारण) वहाँ तक पहुँचे हैं. श्याम (राधा) वल्लभी भी अपने प्रयत्नोंसे यहाँ तक पहुँच पाए.
छेद इंड में कियो सही, पर अखंड द्रष्टे आया नहीं ।
आडी सुंन भई निराकार, पोहोंच ना सके ताके पार ।।7
कई आत्माएँ ब्रह्माण्डको भी भेदकर आगे निकलीं किन्तु उन्हें अखण्ड वस्तु दृष्टिगोचर नहीं हुई. शून्य और निराकारका व्यवधान आ जानेसे वे उससे आगे नहीं जा सकीं.
इनों की तो एह सनंध, पीछे फेर पकडया प्रतिबिम्ब ।
और साध अलेखे केते कहूं, निसंक दौड करी जिनहूं ।।८
इन लोगोंकी ऐसी स्थिति हुई जिससे पीछे मुड.कर उन्होंने (व्रजरासकी) प्रतिबिम्ब लीलाको ग्रहण किया. ऐसे अनेकों साधक हुए हैं जिन्होंने अपनी साधनाके द्वारा पार पहुँचनेका प्रयत्न किया.
ग्यानी अनेक कथें बहु ग्यान, ध्यानी कै विध धरें ध्यान ।
पर ए सबही सुंन के दरम्यान, छूट्या न काहूं संसे उनमान ।।९
ज्ञाानी जन ज्ञाानकी अनेक चर्चाएँ करते हैं. ध्यान करने वाले भी विभिन्न प्रकारसे ध्यान करते हैं, किन्तु वे सब शून्यके अन्तर्गत ही रह गए हैं. मात्र अनुमानके कारण उनमेंसे किसीके भी संशय नहीं छूटे.
उपासनी निरगुन या निरंजन, किन उलंघ्यो न जाए विस्नुको कारन ।
या सास्त्र या साधू जन, द्वैत सबे समानी सुन।।१०
निर्गुण या निरंजनकी उपासना करने वाले भी भगवान विष्णुके कारण स्वरूप (इच्छा शक्ति, सात शून्य) का उलंघन नहीं कर पाए. शास्त्रों या साधु जनोंके उपदेश भी द्वैतके कारण शून्यमें ही समा गए.
इन ऊपर पख है एक, सुनियो ताको कहूं बिवेक।
पुरुष प्रकृति उलंघ के गए, जाए अखंड सुख मांहें रहे ।।११
इनके ऊपर और एक पक्ष है,विवेक पूर्वक उनका विवरण सुनो. जो लोग प्रकृति और पुरुषका भी उलंघन कर आगे बढ.ते हैं, वे उस पक्षमें पहुँचकर अखण्ड सुख प्राप्त करते हैं.
त्रासिमा पख परवान, जो वासना पांचों लिया निरवान ।
ए पांचो कहूं अपनाइत कर, देखाऊं सबदातीत घर।।१२
यह वही तिरासीवाँ पक्ष है जिसे पञ्च वासनाओं (विष्णु भगवान, शिवजी, सनकादि, शुकदेव एवं सन्त कबीर) ने ग्रहण किया है. अब मैं तुम्हें अपना समझकर इन पाँचोंका विवरण देते हुए शब्दातीत अखण्ड घर (परमधाम) के दर्शन कराती हूँ.
ना तो प्रमोध काहे को कहूं, चरन पिया के प्रेमें ग्रहूं ।
पर साथ कारन कहूं फेर फेर, ए पांचों नाम लीजो चित धर ।। १३
अन्यथा मुझे उपदेश देनेकी आवश्यकता ही क्या है ? प्रेम पूर्वक धनीके चरणोंमें ही न रह जाऊँ, परन्तु सुन्दरसाथके लिए वारंवार कह रही हूँ. इन पाँचोंके नाम अपने हृदयमें याद रखो.
एक भगवानजी बैकुंठ को नाथ, महादेवजी भी इनके साथ ।
सुकजी और सनकादिक दोए, कबीर भी इत पोहोंचा सोए ।। १४
एक तो वैकुण्ठ नाथ भगवान विष्णु हैं. दूसरे उनके साथ महादेव (भगवान शिव) हैं. शुकदेवजी, सनकादि तथा सन्त कबीर भी इसी भूमिकामें पहुँचे हैं.
लखमीनारायन जुदे ना अंग, सो तो भेले विस्नु के संग ।
ए पांचो कहे मैं तिन कारन, चित ल्याए देखो याके बचन ।। १५
लक्ष्मी नारायण ये भगवान विष्णुसे भिन्न नहीं हैं. इन पाँचोंके नाम इसलिए लिए हैं कि इनके वचनों पर तुम्हंे ध्यान देना है.
देखो सबद इनोंकी रोसनी, पर जानेगा बडी मतका धनी ।
पख पचीस या ऊपर होए, तारतम के बचन हैं सोए ।।१६
इनके उपदेश (वचनों) का प्रकाश तो देखो (वह अपरम्पार है) किन्तु बड.ी मतके धनी (तारतम्य दृष्टि वाले) ही इसे समझ पाएँगे. इसके ऊपर पच्चीस पक्ष कहे गए हैं. वे तो तारतमके वचन द्वारा ही कहे जाएँगे.
इन बचनों में अक्षरातीत, श्री धामधनी साथ सहित ।
ए देखो तारतम को उजास, धनी ल्याए कारन साथ ।।१7
तारतमके इन वचनोंमें धामधनी (परब्रह्म परमात्मा) अक्षरातीतके साथ साथ ब्रह्मात्माओंका भी वर्णन है. तारतम ज्ञाानके इस प्रकाशको देखो जिसे सद्गुरु धनी सुन्दरसाथके लिए ले आए हैं.
तुम आपको ना करो पेहेचान, बोहोत ताए कहिए जो होए अजान ।
तुम जो हो इन घर के परवान, सुनते क्यों ना होत गलतान ।।१८
हे सुन्दरसाथजी ! तुम स्वयंको पहचानते नहीं हो. अज्ञाानी व्यक्तिको ही ज्यादा कहना पड.ता है. तुम तो निश्चय ही परमधामकी आत्माएँ हो, इन वचनोंको सुनकर क्यों द्रवित नहीं होते हो ?
सनेहसों सेवा कीजो धनी, घरकी पेहेचान देखो अपनी ।
तुम प्रेम सेवाए पाओगे पार, ए बचन धनीके कहे निरधार ।। १९
धामधनीको पहचानकर स्नेह पूर्वक उनकी सेवा करो और अपने घरको भी पहचानो. प्रेम और सेवाके द्वारा ही तुम भवसागरसे पार हो सकते हो. ये निश्चय ही सद्गुरु धनीके कहे हुए वचन हैं.
पीछला साथ आवेगा क्योंकर, प्रकास बचन हिरदे में धर ।
चरने हैं सो तो आए सही, पर पिछले कारन ए बानी कही ।। २०
(सद्गुरुके अन्तर्धान होनेके) बादमें आनेवाली आत्माएँ कैसे जागृत होंगी ? (यह शंका हो सकती है किन्तु) वे इस प्रकाश ग्रन्थके वचनोंको हृदयमें धारण कर जागृत होंगी. क्योंकि जो आत्माएँ सद्गुरुके चरणोंमें हैं वे तो आइंर् (जागृत) ही हैं परन्तु बादमें आने वाली आत्माओंके लिए यह वाणी कही गई है.
आवसी साथ ए देख प्रकास, अंधकार सब कियो नास ।
एह बचन अब केते कहूं, इन लीला को पार ना लहूं ।।२१
आत्माएँ इस प्रकाश वाणीको देखकर आएँगी. इस तारतम ज्ञाानने सब अन्धकारको मिटा दिया है. मैं इन वचनोंको कितना कहूँ ? इन लीलाओंका पार ही पाया नहीं जा सकता.
या बानी को नाहीं पार, साथ केता करसी बिचार ।
तिन कारन बोहोत कह्यो न जाए, ए तो पूर बहे दरियाए ।।२२
इस वाणीका कोई पारावार ही नहीं है किन्तु (यह देखना है कि) सुन्दरसाथ इस पर कितना विचार करते हैं. इसलिए बहुत कुछ कहा नहीं जाता परन्तु यह तो समुद्रके प्रवाहकी भाँति वाणी प्रवाहित हो रही है.
याको नेक विचारे जो एक बचन, ताए घर पेहेचान होवे मिने खिन ।
जो बासना होसी इन घर, सो एह बचन छोडे क्यों कर ।।२३
जो इनमेंसे एक वचनका भी थोड.ा-सा विचार कर ले तो उसे क्षण भरमें ही अपने मूलघर (परमधाम)की पहचान हो जाती है. जो परमधामकी आत्माएँ होंगीं वे इन वचनोंको कैसे छोड. सकेंगी ?
ए बचन सुनते बाढे बल, सोई लेसी तारतम को फल ।
तारतम फल जागिए इन घर, कहे महामति ए हिरदें धर ।।२४
इन वचनोंको सुनने मात्रसे जिनका बल बढ. जाता है, ऐसी आत्माएँ ही तारतमका फल प्राप्त करती हैं. परमधाममें जागृत हो जाना ही तारतमका फल है. महामति इन वचनोंको हृदयमें धारण कर विश्वासपूर्वक कहते हैं.
प्रकरण ३४
prakash hindustani

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