हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

निजसुख

यह सृस्टि के सभी लोक (१४ लोक ) उनके स्वामी आदि नारायण की उत्पत्ति से आगे सात सुन्य निराकार निरंजन सारे क्षर ब्रह्माण्ड यानि हद भूमि जिनका कालांतर में क्षय होता हैं उसके पार बेहद (सत स्वरुप अक्षर ब्रह्म के अंतःकरण) यह अक्षय हैं और इनके पार के चेतन चित्त अनुपम स्वरुप हैं यह पूर्ण ब्रह्म हैं, वे सभी चेतना के श्रोत हैं और घट घट में विराजे हैं यह प्रेम रूप हैं इसीलिए ह्रदय में प्रेम उत्पन्न होने से प्राप्त होते हैं और आनंद स्वरुप श्यामा और अंगना सभी इनके साथ ही होते हैं और जब ऐसा होता है तब अपना ह्रदय ही परम धाम हो जाता है। देखिये यह अंतर की बात है बाह्य दृष्टि से यह समझ नहीं आयेगा।
बाहर आप देखिये हरेक वस्तु अलग अलग है, जो आप अपना कह कर सरीर कहते हो मैं यही हूँ समझते हो पर जब इसके एक अंग में कैंसर हो जाए तब इसको अलग कर देते हो। यहाँ मेरा कहने को कुछ भी नहीं होता फिर भी सारा जीवन तेरा मेरा में बीत जाता है। यहाँ पर हर कोई एक सरीर है और दुसरे की पीड़ा महसूस ही नहीं होती, यदि अपना छोटा बच्चा रो रहा हो तब यह पता नहीं लगता क्यों रो रहा है, डॉक्टर के पास जाने पर कभी उसको भी पता नहीं लगता ऐसी यह दुनिया है। सबका अपना अपना रोना होता है।
आप बाहर की दुनिया देखेंगे यहाँ कहीं भी सरसता नहीं होगी, आप को विध्वंश, युद्ध, चालाकी, चपलता, झूठ, बनावट, ढोंग ही दिखेगा और जब तक आप स्वयं को नहीं जगाएंगे आप भी यही करेंगे। सारे काम दुसरे से आगे जाने के लिए , दुसरे को निचा दिखाने के लिए, दूसरों में अपनी वर्चस्व रखने के लिए, दूसरों में धाक जमाने के लिए और सारा चिंतन दूसरा मेरे विषये में क्या सोच रहा है बस यही होगा और जो आप नहीं हो वह आप हो दिखाने की चेस्टा अब दूसरा जो है वह भी इसी चेस्टा में है और जो आप उसके लिए सोच रहे हो वह आप के लिए सोच रहा है। इससे बात जमती नहीं है और अनबन हो जाती है। एक चीज़ की कमी रहती है प्रेम की , जो कोई कहे की मैं प्रेम करता/करती हूँ वह भी झूठ ही बोल रहे होते हैं, बाह्य दृष्टि रखने वाले में सिर्फ अहंकार होता है और प्रेम बिलकुल नहीं होता, माता पिता भी मोह के कारण अपने बच्चों से अच्छा व्यहार करते हैं इसीलिए अपने बच्चों में भेद करते हैं हम लोग को कौन पालेगा इसपर हमेशा चिंता करते रहते हैं।
हरेक जन, गाउँ, सहर, देश हर जगह पर खुद का मतलब (वेस्टेड इंटरेस्ट) होता है , कंडीशन होता है और यह एक व्यापार ही होता है, दूसरों की ख़ुशी के लिए ख़ास कोई काम नहीं करता, हम ऐसा करते हैं यह जताने के लिए कुछ करते हैं यथार्थ में यहाँ भी प्रेम नहीं होता इसीलिए देश विदेश और घर परिवार में भी मदभेद होता है।
लेकिन जब अंतर में मन दौड़ाएंगे तब आपको अपने आप की ख़ुशी की तरफ ध्यान जायेगा, मुझे किस वस्तु से सुख मिलता है, कौन से कार्य में मेरा मन रमता है, मेरे अपने सपने क्या हैं ? क्या सोने के ढेर में मेरा परम सुख निहित है ? क्या अपने सुख के लिए दुसरे के जीवन को उलझाना ठीक है? जब आप अपने आप के लिए जीने लगोगे तब आप थोडा और सुखी होगे और आपका ध्यान दूसरों से हठकर अपने आप में आ जायेगा। जब आपको अपने आप से सुख मिलने लगेगा तब आप का ह्रदय भी निर्मल होने लगेगा और फिर आप शांति की तलाश करने लगोगे और जो भी सत्य नहीं आपको वह नहीं भायेगा। सत्य के खोजी की जिज्ञासा, कल्पना, एकाग्रता, विचारशीलता यह सब बढ़ जाती है। आत्मा निर्भरता भी आ जाती है, अपने सुख के लिए खुद को मात्र उपयोग करना ऐसा आचरण हो जाता है, यदि दूसरो से कोई काम हो तो भी उनके भलाई के लिये मात्र निज के लिए नहीं। यह गुण सभी में होते हैं लेकिन फोकस नहीं होने से यह फैले हुए होते हैं। जब आपने अपना ध्यान अपने ऊपर दिया महामति प्राणनाथ जी इसी को निजसुख कहते हैं यह अगर आपको मिले तब अपने मन के पार चित में झाँक सकोगे और यहाँ पर ब्रह्म तत्व को पावोगे और अपने अंतर में ही ब्रह्मधाम। यह होते ही आप अपने निजघर निजधाम मूल वतन नेहचल अखंड परमधाम पहुँच जाओगे और परम सुख का अनुभव करोगे। मूल में हम मिले हुयें हैं इसीलिए मूल मिलावा में पहुँच जायेंगे अब वहाँ पर हम एक ही चेतना की किरणे हैं, ब्रह्म से कोई भी अलग नहीं हैं एक ही रस सभी में है और प्रेम ही यहाँ का खून हैं जो सभी के रग में दौड़ता है। यहाँ पर हमने अपने आप को भूलने का खेल खेला है। अब जब तक खेल में मन लगा रहेगा जाग्रति नहीं होगी तब घर का पता मिल भी जाए इससे कुछ नहीं होगा, इसीलिए ज्ञान द्वारा आत्मा नहीं जागती लेकिन जब खेल से मन उठ जाए तब ज्ञान (पता) अवश्य घर पहुँचायेगा। खेल में ब्रह्म के किरणो को याद दिलाने ब्रह्म प्रगट हुए और अपनी अर्धांग्नी को हकीकत कही और यही हमने ग्रहण की है।

श्यामा के वर सत्य हैं श्यामा वर सुन्दर श्याम हैं और श्यामा ने हमें मूल वचन में कहा है कि उनके वर ने प्रगट होकर निज का नाम श्री कृष्ण कहा और मूल वतन अनादि है और अक्षर के पार अक्षरातीत परमधाम है कहा। तुम सुंदरबाई आत्मा और ब्रह्मानंद श्यामा की अंग हो जो तुम्हारे संग आयी हैं कहा। श्यामा मेरी ही अंग हैं और १२,००० ब्रह्मात्माएं उनके अंग यानि सभी एक ही अंग हैं मानो श्री कृष्ण हाथ हुए श्यामा कलाई और ब्रह्मात्माएं उंगलियां अगर ऊँगली को दर्द हो तो सभी को दर्द होगा और एक ऊँगली में कुछ आनंद प्राप्त हो तो सभी को सुख मिलता है और अक्षर ब्रह्म भी ब्रह्म के अंग ही हैं उनका मन हैं।
घर
निज वतन
निज धाम
निज घर
मूल वतन
परमधाम
ब्रह्म वतन
ब्रह्मपुर धाम
अक्षरातीत निवास
अक्षरातीत घर
अखंड धाम
अरश
नेहचल धाम
प्रेमपुर धाम
जो रूहल्लाह आखर इमाम होकर आयेंगे इनका यकीन करेंगे और इनके कहे पर चलेंगे वही मोहम्मद दीन में होगा और मोहम्मद श्री कृष्ण श्याम और रूहल्लाह श्री ठकुरानी श्यामा हैं यानि आत्मा को श्री कृष्ण पर समर्पित होने वाला सत्य धर्म में होगा। इस श्री कृष्ण प्रणामी धर्म में शंका शक जरा भी नहीं हक़ खुद परवरदिगार ब्रह्म प्रगट होकर अपना इलम निज का ज्ञान दिया है।

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