हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

श्री कृष्ण के क्षर, अक्षर और अक्षरातीत स्वरुप

श्री कृष्ण के क्षर, अक्षर और अक्षरातीत स्वरुप
श्री कृष्ण अक्षरातीत परमधाम में आनंद स्वरुप श्यामा और १२,००० ब्रह्मात्माओं के साथ प्रेम लीला करतें हैं। श्री कृष्ण परब्रह्म हैं और श्यामा और सखियाँ और पचीस पक्ष परमधाम और सत स्वरुप अक्षर भगवान सभी इन्ही के अंश हैं। ब्रह्मधाम की यह लीला को स्वलीला द्वैत कहते हैं। सभी एक ब्रह्म के अंश हैं और ब्रह्म सिर्फ एक ही है सिर्फ लीला में भिन्न दिखाई देते हैं।
प्रेम पुंज धाम में श्यामा सखियाँ और श्री कृष्ण राज से किसका प्रेम अधिक है इस बात पर बहस हो गयी। अक्षर को अक्षरातीत श्री कृष्ण की सखियों से लीला देखने की इच्छा हो गयी। चिंतामणि परमधाम में हर इच्छा पूर्ण होती है। सखियों ने भी पहेली बार अक्षर को देखा और उसके खेल देखने की मांग की।
तब मथुरा में अक्षर के सुरता में अक्षरातीत श्री कृष्ण की चेतना, उनके जोश और आवेश लेकर कारागार में वासुदेव के यहाँ प्रगट हुए। चतुर्भुजी श्री विष्णु ने वासुदेव को दर्शन दे कर श्याम श्री कृष्ण के ब्रह्मस्वरूप का परिचय देकर, नन्द बाबा के घर ले जाने का आदेश दिया और वैकुण्ठ में वापस चले गए।
परमधाम की ब्रह्मात्मायों की सुरता ने गोपियों में प्रवेश किया और श्यामा महारानी ने वृषभान की पुत्री राधा में।
११ वर्ष और ५२ दिन ब्रज में अक्षरातीत श्री कृष्ण के साथ राधा और गोपियों ने लीला की। यहाँ पर राधा और गोपियों को अपने आप के विषय में कोई जानकारी नहीं थी पर इनका अपने धनि श्री कृष्ण के प्रति इश्क प्रेम मूल संमंध का था।
हम सच में कौन हैं? हमारा श्री कृष्ण के साथ क्या संमंध है? हमें श्री कृष्ण क्यों बहूत भाते हैं इसकी गोपियों में चेतना नहीं होने से पूर्ण नींद की यह लीला कही गयी है।
फिर श्री कृष्ण ने गोपियों को बुलाने वंशी बजायी। वंशी की आवाज सुनते ही गोपियों के शारीर का संमंध छुट गया और उनको माया का संसार बांध नहीं सका। उन्होंने संसार त्याग कर कृष्ण शरण ली। तब योगमाया ने उनको दूसरा शरिर दिया। यहां पर सखियाँ इतना जान गयी थी की उनके आत्मा के मालिक श्री कृष्ण हैं। श्री कृष्ण सभी चेतना के स्वामी हैं, जैसे वृक्ष के जड़ पर पानी डालने से पात पात लह लहां उठते हैं उसी तरह श्री कृष्ण की सेवा से सभी चेतन आत्मा की सेवा होती है। यहाँ पर अक्षर भगवान की इच्छा पूर्ति उनको अक्षरातीत श्री कृष्ण की श्यामा और सखियाँ की लीला दिखाने के लिए रास लीला की। अक्षर की सुरता नहीं बल्कि अक्षर की इच्छा पूर्ण करनी थी और सखियाँ को दुःख का खेल दिखाना था इसलिए श्री कृष्ण अंतर्ध्यान हुए। सखियों ने बहूत ढूंडा पर कहीं नहीं मिले। फिर उनको श्री कृष्ण बाहर नहीं अपने आत्मा के हृदये में हैं यह ज्ञात हुआ
बाद में अक्षर की जागृत बुद्धि और सखियों का आत्मा भाव हो जाने पर फिर से श्री कृष्ण ने रासलीला खेला। यहाँ जागृत बुद्धि और आत्माभाव होने के कारण रास लीला को अर्ध नींद की लीला कही गयी है।
यह ब्रज और रास की लीला अक्षर के अंतःकरण में अंकित हुयी और इस तरह से यह नित्य या अखंड हुयी।
रास के बाद श्री कृष्ण ने सखियों को फिर परमधाम में जगाया तब तामसी सखियान श्री कृष्ण को दिल में धरे रहने से माया की तरफ ध्यान न जाने के कारण उन्होंने ने अक्षर के दुःख का खेल देखा ही नहीं कहा।
तब फिर से पहेले जैसा कालमाया का ब्रह्माण्ड बनाने की आज्ञा हुयी और श्री कृष्ण लीला आगे बढ़ी। इस समाये श्री कृष्ण में अक्षरातीत श्री कृष्ण का जोश आवेश न था बल्कि गोलोक धाम के श्री कृष्ण का था। गोलोक धाम की सखियाँ की सुरता अब गोपियों में था। यहाँ पर इस धरा धाम में गोलोकी नाथ श्री कृष्ण और गोलोकी सुरता धरी गोपियों ने रास लीला खेला और वापस अपने घर आयी।
श्री कृष्ण को अक्रूर मथुरा ले जाने के लिये आये। मथुरा में चाणूर मुष्टिक, किवाल्यापिढ हाथी और कंस का वध करके वासुदेव देवकी को मुक्त किया और उग्रसेन को राजतिलक दिया और फिर अपना ग्वाल वेश उतारा और राज वेश धारण किया। ग्वाल वेश के कपडे नन्द बाबा को दिया। तब गोलोकी धाम श्री कृष्ण का बल भी चला गया।
अब मथुरा के श्री कृष्ण नाम श्री कृष्ण होते हुए भी वैकुण्ठ धाम के श्री विष्णु का संपूर्ण शक्ति रथ चक्र आदि सभी आयी। यहाँ से श्री कृष्ण विष्णु के अवतार हो गए।
तभी उद्धव निराकार ब्रह्म का ज्ञान लेकर आया तब श्री विष्णु कृष्ण ने उसे ब्रज गोकुल में श्री राधा और गोपियों से मिलने को कहा! वहाँ पर उसने निराकार ब्रह्म की शिक्षा इनको कही तब राधा ने गोलोकी श्री कृष्ण को अपने हृदये से प्रगट किया। फिर विरह में राधा और गोपियों से उनकी सुरता गोलोक धाम चली गयी।
अक्षरातीत श्री कृष्ण का नाम अज्ञान बश भी कोई जीव ले तब उसको सिर्फ लाभ होता है। श्री कृष्ण नाम का महत्व श्री महामति प्राणनाथ जी ने कुलजम स्वरुप तारतम सागर में प्रगट किया है। जिस तरह बीमार होने पर रोगी डॉक्टर के दिए दवाई से ठीक होता है, उसको दवाई की पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक नहीं रहता असर तो एक ही होता है, उसी तरह कृष्ण नाम की महिमा है। परह्ब्रह्म परमात्मा सर्व चेंतना के मूल हैं, सुख, प्रेम और आनंद के दाता हैं और सम भाव वाले हैं। सभी के सुख के लिए श्री कृष्ण नाम इस धरा धाम पर आया है।
लेकिन अक्षरातीत की लीला किसी को खबर नहीं थी, इसीलिए ब्रज-रास के श्री कृष्ण को लोग जान नहीं पाए और अवतारी कहा। धनि देव चन्द्र जी को अक्षरातीत श्री कृष्ण ने दर्शन दिया और ब्रज, रास और जागनी ब्रह्माण्ड की यथार्थ समझाया, वोह श्यामा महारानी और सुन्दरबाई सखी की सुरता हैं कह कर उनका परिचय दिया और तारतम मंत्र कुंजी प्रदान किया और उनके हृदये में अक्षरातीत श्री कृष्ण श्याम जा बसे। अब श्री कृष्ण अंतर आतम में बस कर जागनी लीला किये!
जागनी ब्रह्माण्ड पूर्ण जागृति का खेल है। यहाँ पर मृत शारीर से चेतन आतमा को अनुभव कर फिर इसके हृदये में अक्षरातीत श्री कृष्ण को पाना है। पूर्ण ब्रह्म परमात्मा बाहर नहीं चेतन आत्मा के हृदये में बसे हैं! इसका अनुभव होना पूर्ण जागृत होना है।