हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

महामति प्राणनाथ वाणी के कुछ सार

परम ज्ञानी सतगुरु सदा सर्वदा नित्य अखंड निज नेहेचल अविचल प्रियतम अनादी अक्षरातीत किशोरंगम धामधनी श्री कृष्ण श्याम सुन्दर सच्चिदानंद पारब्रह्म पूर्ण परमात्मा पुरोषत्तम प्रेम पुंज कृपा सिन्धु दया सागर सत्य हैं और ब्रह्मानंद के दाता हैं। कोटि ब्रह्मांडों के सृष्टि करता कार्य ब्रह्म, सतपुरुष, अक्षर ब्रह्म इनके सत अंग हैं। यह आनंदस्वरुप श्यामा के स्वामी हैं। श्री कृष्ण सर्व चेतना के केंद्र बिंदु हैं और सभी आत्मायों के हृदये में रहते हैं। यह प्रेम के स्वरुप हैं। ऐसे श्री कृष्ण को आत्मा के आँखों से ही देखा जा सकता है। धामधनी श्री कृष्ण का जोश और आवेश इस धराधाम में ब्रजरासचन्द्र श्री कृष्ण में आकर ब्रज और रास लीला की। परमात्मा का जोश में भी उनकी चेतना, ज्ञान और प्रेम होता है। जब हम ब्रजरासचन्द्र श्री कृष्ण को प्रणाम करते हैं तब हम अक्षरातीत परमधाम के श्री कृष्ण लीला ही समझते हैं। यह तारतम ज्ञान का प्रताप है। श्री कृष्ण, लीला प्रेमी हैं और उनकी लीला में रमने पर हमारे भीतर प्रेम उत्पन्न होता है। गोपियाँ आत्मा बोधि थीं और श्री कृष्ण को हर घडी हर पल याद करती रहती थीं। शरीर बोधि होने पर श्री कृष्ण का अनुभव नहीं हो सकता वो अंतर्ध्यान हो जाते हैं । शरीर के आँख से उन्हें देखा नहीं जा सकता, ना ही इन कानो से सुना जा सकता है। शरीर का हृदये भी मांस का टुकड़ा ही है। पहेले हमें अपने आत्मा को जानना पड़ेगा लेकिन यह कैसे करें? बुद्धि तो ब्रह्मा है चार वेद का ज्ञान से भरा है उन्हें कहा मिले भरतार? ध्यान से शिव जी ने दर्शन पाया पर गोपियों ने मन में ही उनको समाया और खूब नाच नचाया। इसलिए मन की सहायता लेनी पड़ेगी। लेकिन पता लगा मन तो नारद है कभी स्थिर नहीं। बन्दर जैसे इधर उधर उछलता है। यह मन कभी भूत काल में जाता है कभी भविष्य की चिंता करता है। हम इसके इशारे में नाचते हैं यह हमारा कहाँ सुनता है? परब्रह्म बहूत दयालु हैं, सदा सुख के दाता हैं उन्होंने इस मन को नियंत्रण में लाने के लिए दिया है एक सरल कुंजी तारतम महा मंत्र। मंत्र मन का ही यन्त्र है। मंत्र का जाप मन से है। न मुख से न ही बुद्धि से पूर्णतया मन से।यह मन ही है जो आत्मा साक्षात्कार कराता है। मन ही सत्य साहेब श्री कृष्ण से मिलाता है और मन ही फजीती कराता है। इसीलिए ब्रह्म मुनि ब्रह्मात्मा हमारे सुन्दरसाथ ने "स्वास स्वास निजनाम जपो बृथा स्वास मत खोये" कहा है। जीवन क्षण भंगुर है कभी भी धोखा दे सकता है। अब स्वास चल रही है जाप कर ले, पता नहीं अगले क्षण यह स्वास चले न चले। तन मन वचन और आत्मा से एक बार पूर्ण सरनागत होकर कहते हैं श्री कृष्ण सच्चिदानंद पारब्रह्म पूर्णपरमात्मा इसी नाम को भज भज के सदा सुख लेवो हे आत्मा। यह अखंड अविनाशी धाम धनी श्री कृष्ण नाम स्मरण से प्रेम की कोई तुलना नहीं है। सभी सुन्दरसाथ के चरण कमल में कोटि प्रेम प्रणाम।

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