हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

सबको सार कह्यो ए जो रास, ए जो इन्द्रावती मुख हुओ प्रकास ।।

अब सुकजीके केती कहूं बान, सार काढने ग्रह्यो पुरान ।
सबको सार कह्यो ए जो रास, ए जो इन्द्रावती मुख हुओ प्रकास ।।२५

शुकदेवजीकी वाणीकी अब मैं कितनी चर्चा करूँ ? उसका सार निकालनेके लिए ही मैंने श्रीमद्बागवतकी चर्चा की है और पूरे भागवत ग्रन्थका सार यह रासलीला है जिसका प्रकाश (विस्तरण) इन्द्रावतीके मुखसे (श्रीरासग्रन्थके माध्यमसे) हुआ.

अब कहूं इन रासको सार, जो तारतम बचन है निरधार ।
तारतम सार जागनी बिचार, सबको अरथ करसी निरवार ।।२६

अब मैं सार स्वरूप इस रास ग्रन्थका भी सार बता रही हूँ निश्चय ही वह सार तारतम ज्ञाानके वचन हैं. तारतम ज्ञाानका सार आत्म-जागृति है. यही ज्ञाान सारे धर्मग्रन्थोंके गूढ.ार्थको स्पष्ट कर देगा.

निराकार के पार के पार, तारतम को जागनी भयो सार ।
अक्षर पार घर अक्षरातीत, धामके यामें सबे चरित ।।२7

क्षर जगतके पार शून्य निराकार आदिसे परे अक्षर ब्रह्म और उससे भी परे परमधाममें जागृत होना यही तारतम ज्ञाानका सार है. अक्षरधामके भी पार अक्षरातीत धामकी सभी लीलाएँ इसी तारतम ज्ञाानमें निहित हैं.

इत ब्रह्मलीला को बडो विस्तार, या मुखथें कहा कहूं प्रकार ।
ए तारतम को बडो उजास, धनी आएके कियो प्रकास ।।२८

परमधाममें होनेवाली ब्रह्मलीलाका विस्तार बहुत बड.ा है, इस मुखसे उसका किस प्रकार वर्णन करूँ ? तारतम ज्ञाानका तेज बहुत बड.ा है, जिसको सद्गुरुने यहाँ आकर प्रकाशित किया है.

संसे काहूं ना रेहेवे कोए, ए उजाला त्रैलोकी में होए ।
प्रगट भई पर आतमा, सो सबको साख देवे आतमा ।।२९

तीनों लोकों (स्वर्गादि, मृत्यु, पाताल) में तारतमका प्रकाश फैल जानेसे किसीके भी मनमें कोई संशय शेष नहीं रहेंगे. ब्रह्मधाममें विराजमान ब्रह्मात्माओंका परात्मस्वरूप प्रकट होगा जिनकी साक्षी (सुरता स्वरूप) आत्माएँ देंगी (कि यही हमारा मूल स्वरूप है).

उड्यो अंधेर काढयो बिकार, निरमल सब होसी संसार ।
ए प्रकास ले धनी आए इत, साथ लीजो तुम मांहें चित ।।३०

तारतमके तेजके कारण अज्ञाानान्धकार उड. गया और सबके मनके विकार दूर हो गए. अब इससे समस्त संसार (के लोगोंका हृदय) निर्मल हो जाएगा. ऐसा ज्ञाानरूपी प्रकाश लेकर सद्गुरु धनी यहाँ आए हैं. हे सुन्दरसाथजी ! तुम इसे चित्तमें ग्रहण करो.

इन घर बुलावें ए धनी, ब्रह्मसृष्टि जो हैं अपनी।
खेल किया सो तुम कारन, ए बिचार देखो प्रकास बचन ।।३१

ऐसे धामधनी अपनी आत्माओंको अखण्ड परमधाममें बुला रहे हैं. तुम्हारे लिए ही इस नश्वर खेलकी रचना की है, देखो, प्रकाशके वचनों पर विचार कर यह बात समझो.

देख्यो खेल मिल्यो सब साथ, जागनी रास बडो विलास ।
खेलते हंसते चले वतन, धनी साथ सब होए परसन ।।३२

जगतके नश्वर खेल देखकर सब सुन्दरसाथ एकत्र हुए हैं. जागनी रासमें बड.ा आनन्द (विलास) प्राप्त होगा. सब सुन्दरसाथ हँसते खेलते हुए परमधाम चलेंगे (अपनी सुरताको परमधाममें लौटाएँगे) जिससे धामधनी एवं ब्रह्मात्माएँ सब आनन्दित (प्रसन्न) होंगी.

इतहीं बैठे जागे घर धाम, पूरन मनोरथ हुए सब काम ।
उडयो अग्यान सबों खुली नजर, उठ बैठे सब घर के घर ।।३३

यहीं (इसी संसारमें) बैठे हुए ही हमें अपने मूल घर परमधाममें (अपने परात्म स्वरूपमें) जागृत होना है. सबकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगीं. अज्ञाानके मिट जानेसे सब ब्रह्मात्माओंकी आत्मदृष्टि खुल गई. सब अपने मूलघर-परमधाममें ही उठकर बैठ गए, अर्थात् सब परमधाममें ही थे मात्र उनकी सुरता इस दुनियाँमें आई थी. अब सद्गुरुके ज्ञाानसे जागृत होकर सब परमधाममें ही बैठ गए.

हांसी ना रहे पकरी, धनिएं जो साथ पर करी ।
हंसते ताली देकर उठे, धनी महामत साथ एकठे।।३४

धामधनीने सुन्दरसाथके साथ (उन्हें सुरता रूपसे खेलमें भेजकर) जो हँसी की उसका कोई पारावार नहीं होगा. महामति कहते हैं, सभी सुन्दरसाथ हँसते हुए ताली देकर धनीके चरणोंमें एक साथ जागृत होंगे.
प्रकरण ३३
prakash hindustani
O Sundarsath, you are my leaders, ponder over this example. I am bringing into light the enlightened words the proof/witnesses provided by Sukhdevji, bring complete faith in it. Trust it as truth.
Indrawati enlightened soul of Paramdham, is requesting to have complete faith in the words of Sukhdev muni.
तुम साथ मेरे सिरदार, एह द्रष्टांत लीजो बिचार।
रोसन बचन करूं प्रकास, सुकजीकी साख लीजो विस्वास ।।
११/pr.29 prakash hindi

तुम मेरे शिरोमणि सुन्दरसाथ हो, इसलिए इस दृष्टान्त पर विचार करो. मैं श्रीशुकदेव मुनि द्वारा कहे हुए श्रीमद्बागवतके वचनोंको प्रकाशित (स्पष्ट) कर रही हूँ. तुम सब उन पर विश्वास करो.

ए जो प्रेम लीला श्रीकृष्णजीएं करी, सो गोपन में गोपियों चित धरी।।
ए ब्रह्मलीला भै जो दोए, व्रजलीला रासलीला सोए।

तारतम ज्ञान श्री प्रकास (गुजराती) महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन कोमल चित करी वचन रुदे धरी, जो जो ते सरव संभारी जी। खरा जीवने वचन कह्या छे, माया जीवने थासे अति भारी जी।।४५ प्रकरण ३० एहना पात्र हसे ए जोग, आ लीलानो ते लेसे भोग।केसरी दूध न रहे रज मात्र, उतम कनक विना जेम पात्र।।१५ हवे सुकजीनां वचन हुं केटलां कहुं, में सार काढवा भागवत ग्रह्युं। सघलानो सार आ ते रास, जे इन्द्रावती मुख थयो प्रकास।।२१ हवे रास तणो सार तमने कहुं, ते तां आपणुं तारतम थयुं। तारतम सार आ छे निरधार, जिहां वसे छे आपणां आधार।।२२ घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम। तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३ मन जीवने पूछे रही, त्यारे जीव फल देखाडे सही। ए अजवालुं कीधुं प्रकास, तारतमनां वचन मांहें रास।।२४ ए अजवालुं जीवने करे, जे जीव घर भणी पगलां भरे। पोते पोतानी पूरे साख, ए तारतमतणो अजवास।।२५ ते लई धणी आव्या आंहे, साथ संभारी जुओ जीव मांह। एणे घरे तेडे आ वल्लभ, बीजाने ए घणुं दुर्लभ।।२६ बीजा कहुं छुं एटला माट, जे माया भारे करो छो साथ। तारतम पख बीजो कोय नथी, एक आव्या छो तमे घर थकी।।२७ आ माया कीधी ते तम माट, तारतम मांहें पाडी वाट। एणी वाटे चालीए सही, श्री वालाजीनां चरण ज ग्रही।।२८ एह चरण छे प्रमाण,इन्द्रावती कहे थाओ जाण। तमे वचन तणां लेजो अरथ,आपणा जीवनो ए छे ग्रथ।।२९ प्रकरण ३३ ए वचन पाधरां प्रगट कहे, जाण होय ते जोइने लहे। पख पचवीस ए उपर जेह, तारतमनां वचन छे तेह।।१२ एह वचनो मांहें श्री धाम, धणी आपणा ने साथ सर्व स्थान।ए तारतमतणो अजवास, धणी बेठा मांहें लई साथ।।१३ हवे कां नव ओलखो रे साथ सुजाण, घणुं तेहने कहिए जे होय अजाण।वचिखिण छो तमे परवीण, गलजो जेम अगिनसुं मीण।।१४ सनेहसुं सेवा करजो धणी, गलित चित थई अति घणी।तमे सेवाए पामसो पार, धणीतणां वचन निरधार।।१५ पाछला साथे छे ते आवसे केम, ते जोसे रासतणां वचन।चरणे छे ते तो आव्या सही, पण हवे आवसे वचन प्रकासनां ग्रही।।१६ धणीतणां वचन ग्रह्यां मांहें रास, पाछला पार उतारवा साथ।आवसे साथ एणे प्रकास, अंधकारनो कीधो नास।।१७ आवसे साथ सकल परवरी, रासतणां वचन चित धरी।एह वचन हवे केटलां कहुं, आ लीलानो पार नव लहुं।।१८ ए वचन आहीं छे अपार, पण साथ केटलो करसे विचार।ते माटे कांई घणुं न कहेवाय, आ तां पूरतणो दरियाय।।१९ एनुं एक वचन विचारसे रही, ते ततखिण घर ओलखसे सही।घरनी जे होसे वासना, नहीं मूके ते वचन रासना।।२० खरी वस्त जे थासे सही, ते रहेसे वचन रासना ग्रही।जेम कह्युं छे करसे तेम, ते लेसे फलतणो तारतम।।२१ इन्द्रावती कहे सुणजो साथ, वचन विचारे थासे प्रकास। प्रकास करीने लेजो धन, जे में तमने कह्यां वचन।।२२ प्रकरण ३४
तारतम ज्ञान महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन
घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम २९ प्रकरण ३३ श्री प्रकास (गुजराती)
श्रीसुन्दरबाईके चरन पसाए, मूल बचन हिरदें चढि आए । चरन फले निध आई एह, अब ना छोडूं चित चरन सनेह ।।१८
चरन तले कियो निवास, इन्द्रावती गावे प्रकास। भानके भरम कियो उजास, पावें फल कारन विस्वास ।।१९
विस्वास करके दौडे जे, तारतमको फल सोई ले। तिन कारन करूं प्रकास, ब्रह्मसृष्टि पूरन करूं आस।।२०
इन्द्रावती धनीके पास, रासको कियो प्रकास। धनिएं दई मोहे जागृत बुध, तो प्रकास करूं तारतमकी निध ।।२१
प्रकरण १९ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)

श्रीसुन्दरबाईके चरन पसाए, मूल बचन हिरदें चढि आए। चरन फले निध आई एह, अब ना छोडूं चित चरन सनेह।। १८
सद्गुरु (सुन्दरबाई) के चरणोंके प्रतापसे परमधामके मूल वचन मेरे हृदयमें प्रकट हुए. जिन चरणोंकी कृपाके फल स्वरूप यह निधि मुझे प्राप्त हुई है, उनका स्नेह अब मैं नहीं छोड. सकती हूँ.
चरन तले कियो निवास, इन्द्रावती गावे प्रकास। भानके भरम कियो उजास, पावें फल कारन विस्वास।। १९
ऐसे सद्गुरुके चरणोंमें रह कर इन्द्रावती प्रकाशके वचनोंको इस प्रकार गा रही है. सद्गुरुने मेरी सभी भ्रान्तियोंको मिटाकर मेरे हृदयको प्रकाशित किया है. उनके चरणोंमें विश्वास करनेसे मुझे यह फल प्राप्त हुआ.
विस्वास करके दौडे जे, तारतमको फल सोई ले। तिन कारन करूं प्रकास, ब्रह्मसृष्टि पूरन करूं आस।। २०
जो पूर्ण विश्वासके साथ आगे बढ.गे, उन्हें ही तारतम ज्ञानका फल प्राप्त होगा. इस प्रकार प्रकाश ग्रन्थके इन वचनोंको प्रकाशित कर ब्रह्मात्माओंकी आशा पूर्ण करूँगी.
इन्द्रावती धनीके पास, रासको कियो प्रकास। धनिएं दई मोहे जागृत बुध, तो प्रकास करूं तारतमकी निध ।।२१
इन्द्रावतीने सद्गुरुके चरणोंमें रहकर रासके रहस्योंको इस प्रकार (प्रकाश ग्रन्थके द्वारा) प्रकट किया. सद्गुरु धनीने मुझे जागृत बुद्धि प्रदान की है. इसलिए उसके बल पर ही मैं तारतम ज्ञानरूपी अखण्ड निधिको प्रकट करती हूँ. प्रकरण १९ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)

हवे सुकजीनां वचन हुं केटलां कहुं, में सार काढवा भागवत ग्रह्युं।
सघलानो सार आ ते रास, जे इन्द्रावती मुख थयो प्रकास।।२१

हे सुन्दरसाथजी ! शुकदेवमुनिके वचनोंके विषयमें मैं कहाँ तक कहूँ. सार बतानेके लिए श्रीमद्बागवत ग्रहण कर रहा हूँ. सबका सार रास ग्रन्थ है जो इन्द्रावतीके मुखसे प्रकाशित हुआ है.
How much can I praise Sukhdev Muni's words. I have accepted the Srimad Bhagavat to reveal the gist of it. The most important extract in Bhagavat is the Raas and that is Indrawati(the celestial soul of Paramdham) is saying it.
Why here it is Indrawati?
Because it is the experience of Indrawati, it is the paratam who witnessed the Raas is speaking now. This is not spoken from the Cosmic Intelligence but the experience of the celestial soul.
These words are from Brahmatma Indrawati of Paramdham revealing the Raas from Shrimad Bhagavad.

हवे रास तणो सार तमने कहुं, ते तां आपणुं तारतम थयुं।
तारतम सार आ छे निरधार, जिहां वसे छे आपणां आधार।।२२

अब मैं रास ग्रन्थका सार तुम सबको कह रही हूँ. वह तो हमारे अखण्ड घरका तारतम है. तारतमका सार निश्चय ही यह है कि जहाँ हमारी आत्माओंके आधार धामधनी निवास करते हैं.
This Raas that Brahm(Supreme) and the souls played in the jogmaya universe. I will reveal the extract of whole Raas and that will become your emancipator of all the ignorance (tartam). The extract of the Tartam is that where resides our Lord(on whom our soul relies upon).
Remember the Lord resides in the heart of the celestial souls along with His abode.

घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३

हमारा घर अखण्ड परमधाम तथा हमारे धनी श्रीकृष्ण यही तारतमका सार फल है. इस तारतम ज्ञाान द्वारा अत्यन्त प्रकाश फैलता
है. जिससे मनमें किसी भी प्रकारकी शंका नहीं रहती है.

Our real home is Paramdham and Shri Krishna, this is the extract of the fruit of Tartam. The light of this Tartam is so much not a doubt should you have in mind. One must believe this without creating confusion and doubts in the mind.

मन जीवने पूछे रही, त्यारे जीव फल देखाडे सही।
ए अजवालुं कीधुं प्रकास, तारतमनां वचन मांहें रास।।२४

यदि मन जीवको शान्त भावसे पूछे तो जीव उसे अखण्ड फल दिखाएगा. इस ज्ञाानका प्रकाश, 'प्रकाश' ग्रन्थमें किया गया है. तारतम ज्ञाानके वचनोंमें रासकी लीलाएँ समायी हुई हैं.

When your mind turns within and seeks the truth from the Jeev(the conscious life force within) then the Jeev can show the fruit that is truth(sahi). (Changelessnes, eternally present are the attributes of truth) . In the words of Tartam(the knowledge that emancipates all the darkness of ignorance) is within the Raas this fact I am bringing into the light. (Within the raas one can find the key to end the ignorance, this fact I have revealed)

ए अजवालुं जीवने करे, जे जीव घर भणी पगलां भरे।
पोते पोतानी पूरे साख, ए तारतमतणो अजवास।।२५

यह तारतम ज्ञाान जीवके हृदयको प्रकाशित कर भ्रम और अज्ञाानको दूर करता है. इसके कारण यह जीव अपने घर परमधामके मार्ग पर दृढ. विश्वासके साथ अग्रसर होता है. तत्पश्चात् जब आत्मा जागृत होकर स्वयं अपनी साक्षी देने लगे तो समझ लेना कि वही तारतम ज्ञाानका प्रकाश है.
This Tartam gyaan this knowledge will enlighten your Jeev(life force within) and thus this jeev will step steadfastly towards the abode. After that when the soul gets awakened then it will provide the witnesses, understanding, that is due to the light of the tartam gyaan.

ते लई धणी आव्या आंहे, साथ संभारी जुओ जीव मांह।
एणे घरे तेडे आ वल्लभ, बीजाने ए घणुं दुर्लभ।।२६

इस तारतम ज्ञाानको लेकर धामधनी इस संसारमें आए हैं. हे सुन्दरसाथजी! इस तथ्यको याद करके अपनी अन्तरात्मामें देखो. धामधनी हमें इसी घर-परमधाममें बुला रहे हैं. दूसरे जीवोंके लिए इसकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है.
Lord Himself came over here to grant this knowledge (Remember, Lord answered to Devachandraji Maharaj's prayer and gave the Tartam mantra). O my celestial friends go within and seek the truth within the soul. Our beloved Lord is calling us back into Paramdham but not all can attain it.
So the souls those who have come from Paramdham, seek within your soul and witness the above truth. Only those celestial soul who came here to see this world, that jeev can experience it, for other's it is very rare!

बीजा कहुं छुं एटला माट, जे माया भारे करो छो साथ।
तारतम पख बीजो कोय नथी, एक आव्या छो तमे घर थकी।।२7

तुम सब सुन्दरसाथ मायाको अधिक महत्त्व दे बैठे हो. इसलिए मैं तुम्हें अन्य कहती हूँ. यदि तारतमके आधार पर देखें तो सुन्दरसाथ, ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है. मात्र तुम ही परमधामसे आए हो.
I have to say this because you sundarsath has paid too much attention this world of illusion, there is nothing real other than this tartam and the celestial souls. This world of dream will come to end when all the souls get awakened in the Paramdham.

आ माया कीधी ते तम माट, तारतम मांहें पाडी वाट।
एणी वाटे चालीए सही, श्री वालाजीनां चरण ज ग्रही।।२८

तुम्हारे लिए ही इस मायाकी रचना की गई है और तारतम ज्ञाानके द्वारा घर-परमधामका मार्ग प्रशस्त हुआ है. इसलिए हम सब सद्गुरुके चरण ग्रहण कर इसी मार्गसे चलें.
This world of illusion (dream of the Creator Akshar bhagwan) is created for the sport of celestial souls of Paramdham, by the knowledge of Tartam find your way home. Following the road of this Truth we will reach the abode where we will find the feet of Lord to surrender. The celestial soul from Paramdham must follow this path to reach Paramdham!

एह चरण छे प्रमाण, इन्द्रावती कहे थाओ जाण।
तमे वचन तणां लेजो अरथ, आपणा जीवनो ए छे ग्रथ।।२९

सद्गुरुके ये चरणकमल हमारे लिए यथार्थ आधार (प्रमाण) हैं. इन्द्रावती कहती है, हे सुन्दरसाथजी ! इस वास्तविकताको समझ लो. तारतमके इन वचनोंके मर्म (अर्थ) ग्रहण करो. यही हमारे जीवके लिए अमूल्य धन है.

Indrawati is showing the feet of the Lord as the proof as she is sitting in the Paramdham, understand this reality. Kindly take the true meaning of these words this is our life's greatest treasure(scriptures).
The Feet of the Lord Shri Krishna is the evidence knowing the reality, Indrawati says to accept these words with true meaning as the treasure of life to the celestial soul from Paramdham!
श्री प्रकास
(गुजराती)
These are the words of Indrawati a celestial soul who is united with the Supreme.
आंखां खोल तूं आप अपनी, निरख धनी श्री धाम।
ले खुसवास याद कर, बांध गोली प्रेम काम ।।१
हे मेरी आत्मा ! तू स्वयं अपनी अन्तर्दृष्टि खोलकर परमधामके धनीको निहार. परमधामको याद कर वहाँकी सुगन्धि ग्रहण कर अपनी कामनाओंको प्रेमपूर्वक धनीके चरणोंमें लगा.
प्रेम प्याला भर भर पीऊं, त्रैलोकी छाक छकाऊं।
चौदे भवनमें करूं उजाला, फोड ब्रह्मांड पीउ पास जाऊं ।।२
मेरी इच्छा है कि मैं धनीके प्रेमके प्याले भर-भर कर पी लूँ और फिर उस प्रेमामृतसे तीनों लोकोंकी तृषाको शान्तकर दूँ. चौदह लोकोंमें इस प्रेमको प्रकाशित कर ब्रह्माण्डको भी फोड.कर मैं अपने प्रियतमके पास पहुँच जाऊँ.
वाचा मुख बोले तूं वानी, कीजो हांस विलास।
श्रवना तूं संभार आपनी, सुन धनीको प्रकास।।३
हे वाचा ! तू अपनी वाणीसे धनीजीके गुणोंका उच्चारण कर और उनसे हास-परिहास कर. हे श्रवण ! तुम स्वयंको सम्हालकर धामधनीके प्रकाश स्वरूप तारतम ज्ञाानको सुन.
कहे विचार जीवके अंग, तुम धनी देखाया जेह।
जो कदी ब्रह्मांड प्रले होवे, तो भी ना छोडूं पीउ नेह ।।४
जीवके सभी अंग विचार कर कहते हैं कि तुमने हमें धनीकी पहचान करवाई है. यदि कभी ब्रह्माण्डका प्रलय भी हो जाए तो भी हम धाम धनीका स्नेह नहीं छोड.ेंगे.
खोल आंखां तूं हो सावचेत, पेहेचान पीउ चित ल्याए ।
ले गुन तूं हो सनमुख, देख परदा उडाए।।५
मेरे जीव ! तू आँखें खोलकर सावचेत हो जा और दिलसे अपने धनीको पहचान ले. तू उनके सम्मुख रहकर उनके गुणोंको ग्रहण कर और अज्ञाानके पर्देको उड.ाकर उनकी ओर निहार.
एते दिन वृथा गमाए, किया अधमका काम।
करम चंडालन हुई मैं ऐसी, ना पेहेचाने धनी श्री धाम ।।६
इतने दिनोंको व्यर्थ ही गँवाकर तूने बड.ी नीचताका काम किया है, जिसके कारण मैं चण्डालकर्म करनेवाली हो गई और मैंने अपने परमधामके धनीको भी नहीं पहचाना.
भट परो मेरे जीव अभागी, भट परो चतुराई।
भट परो मेरे गुन प्रकृती, जिन बूझी ना मूल सगाई ।।७
हे मेरे अभागे जीव ! तुझे धिक्कार है. मेरी चतुराईको भी धिक्कार है. मेरे सारे गुण और स्वभावको भी धिक्कार है जिन्होंने धामधनीके मूल सम्बन्धको नहीं पहचाना.
I condemn my life force(jeev) which is unfortunate, and also condemn the cunningness, I condemn the physical nature, which never understood the primordial relationship with the beloved Lord!
आग परो तिन तेज बलको, आग परो रूप रंग।
धिक धिक परो तिन ग्यानको, जिन पाया नहीं प्रसंग ।।८
उस तेज, बल, रूप और रंग सबको आग लग जाए. उस ज्ञाानको भी धिक्कार है, जो धामधनीका सङ्ग नहीं कर सका.
धिक धिक मेरी पांचो इन्द्री, धिक धिक परो मेरी देह ।
श्री स्याम सुन्दर वर छोडके, संसारसों कियो सनेह ।।९
मेरी पाँचों इन्द्रियोंको धिक्कार है, मेरे शरीरको भी धिक्कार है क्योंकि श्याम सुन्दर जैसे सर्वगुण सम्पन्न वर (धनी) को छोड.कर इन्होंने इस कुटिल संसारसे स्नेह किया.
धिक धिक परो मेरे सब अंगों, जो न आए धनीके काम ।
बिना पेहेचाने डारे उलटे, ना पाए धनी श्री धाम।।१०
मेरे सभी अंगोंको धिक्कार है जो धनीजीके काम कभी नहीं आए. पहचाने बिना ही प्रतिकूल मार्ग पर चलनेसे धामधनीको पानेसे वे वञ्चित रह गए.
तुम तुमारे गुन ना छोडे, मैं बोहोत करी दुष्टाई।
मैं तो करम किए अति नीचे, पर तुम राखी मूल सगाई ।।११
हे सद्गुरु धनी ! आपने अपने गुणों (उपकार) को कभी नहीं छोड.ा, मैंने तो (आपको न पहचानकर) बहुत दुष्टता की है. मैंने नीच कार्य किए हैं फिर भी आपने अपने मूल सम्बन्धको बनाए रखा.
प्रकरण २२ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)

आंखां खोल तूं आप अपनी, निरख धनी श्री धाम ।
ले खुसवास याद कर, बांध गोली प्रेम काम ।।१
प्रेम प्याला भर भर पीऊं, त्रैलोकी छाक छकाऊं ।
चौदे भवनमें करूं उजाला, फोड ब्रह्मांड पीउ पास जाऊं ।।२ वाचा मुख बोले तूं वानी, कीजो हांस विलास ।
श्रवना तूं संभार आपनी, सुन धनीको प्रकास ।।३
कहे विचार जीवके अंग, तुम धनी देखाया जेह ।
जो कदी ब्रह्मांड प्रले होवे, तो भी ना छोडूं पीउ नेह ।।४
खोल आंखां तूं हो सावचेत, पेहेचान पीउ चित ल्याए ।
ले गुन तूं हो सनमुख, देख परदा उडाए ।।५
एते दिन वृथा गमाए, किया अधमका काम ।
करम चंडालन हुई मैं ऐसी, ना पेहेचाने धनी श्री धाम ।।६
भट परो मेरे जीव अभागी, भट परो चतुराई ।
भट परो मेरे गुन प्रकृती, जिन बूझी ना मूल सगाई ।।७
आग परो तिन तेज बलको, आग परो रूप रंग ।
धिक धिक परो तिन ग्यानको, जिन पाया नहीं प्रसंग ।।८
धिक धिक मेरी पांचो इन्द्री, धिक धिक परो मेरी देह ।
श्री स्याम सुन्दर वर छोडके, संसारसों कियो सनेह ।।९
धिक धिक परो मेरे सब अंगों,जो न आए धनीके काम । बिना पेहेचाने डारे उलटे, ना पाए धनी श्री धाम ।।१०
तुम तुमारे गुन ना छोडे, मैं बोहोत करी दुष्टाई ।
मैं तो करम किए अति नीचे, पर तुम राखी मूल सगाई ।।११
प्रकरण २२ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी

जीव जगाए देत निध निरमल, करत आतम रोसन।
सो जीव बुध लेकर करे उजाला, सब में चौदे भवन ।।१८
इन जुबां क्यों कहूं बडाई, तुमे सबद ना पोहोंचे कोए ।
जो कछू कहूं सो उरे रहे, ताथें दुख लागत है मोहे ।।१९
दाझ बूझत है एक सबद में, जब कहूं धनी श्री धाम ।
इन वचने आतम सुख पायो, भागी हैडे की हाम ।।२०
कहे इन्द्रावती अति उछरंगे, फोड ब्रह्मांड करूं रोसन ।
सीधी राह देखाऊं जाहेर, ज्यों साथ सुखे आवे वतन ।।२१
प्रकरण २३ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)
महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

जीव जगाए देत निध निरमल, करत आतम रोसन।
सो जीव बुध लेकर करे उजाला, सब में चौदे भवन ।।१८
आप ऐसे जीवको जगाकर निर्मल ज्ञाानरूपी निधि देते हैं और आत्मामें ज्ञानका प्रकाश भर देते हैं. वह जीव जागृत होकर आपसे प्राप्त बुद्धिके बल पर चौदह लोकोंमें तारतम ज्ञाानका प्रकाश फैला देता है.
इन जुबां क्यों कहूं बडाई, तुमे सबद ना पोहोंचे कोए ।
जो कछू कहूं सो उरे रहे, ताथें दुख लागत है मोहे ।।१९
मैं इस नश्वर जिह्वासे आपकी क्या महिमा गाऊँ ? महिमाके कोई भी शब्द आप तक नहीं पहुँचते. जो कुछ भी (स्तुति वचन) कहती हूँ वह सब इधर ही रह जाता है. इसलिए अपनी असमर्थता पर मुझे दुःख होता है.
दाझ बूझत है एक सबद में, जब कहूं धनी श्री धाम ।
इन वचने आतम सुख पायो, भागी हैडे की हाम ।।२०
जब मैं एक ही शब्द 'धामधनी' कहती हूँ तब इतना कह देने मात्रसे मेरे हृदयकी दाह (चाहना) शान्त हो जाती है. इतना कहने मात्रसे आत्माको अखण्ड सुख मिला और मेरे हृदयकी आकांक्षाएँ पूर्ण हुईं.
कहे इन्द्रावती अति उछरंगे, फोड ब्रह्मांड करूं रोसन ।
सीधी राह देखाऊं जाहेर, ज्यों साथ सुखे आवे वतन ।।२१
इन्द्रावती अति उमङ्गमें आकर कहती है, सद्गुरुकी कृपासे मैं ब्रह्माण्डको फोड.कर (अन्धकार मिटाकर) सर्वत्र तारतम ज्ञाानका प्रकाश फैला दूँ. परमधामका ऐसा सीधा (सरल) मार्ग दिखा दूँ कि जिससे समस्त सुन्दरसाथ सुख पूर्वक अपने परमधाममें आ जाए.
प्रकरण २३ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी

हम कारन तुम आए देह धर, तुम कै विध दया करी हम पर ।
तुम धनी आए कारन हम, देखाई बाट ल्याए तारतम ।।१७
साथें माया मांगी सो भई अति जोर, तुम सबद कहे कै कर कर सोर ।
पर तिन समे नींद क्योंए न जाए, तब धनी सरूप भए अंतराए ।।१८
तो भी ना भई हमको खबर, तब फेर आए दूजा देह धर ।
ततछिन मिले हमको आए, सागर वतनी नूर बरसाए ।।१९
कहे इन्द्रावती सुन्दरबाई चरने, सेवा पीउकी प्यार अति घने ।
और कछू ना इन सेवा समान, जो दिल सनकूल करे पेहेचान ।।२५
प्रकरण २४ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी

हम कारन तुम आए देह धर, तुम कै विध दया करी हम पर ।
तुम धनी आए कारन हम, देखाई बाट ल्याए तारतम ।।१७
हमारे लिए ही आप शरीर धारण कर आए हैं. आपने हम पर अनेक प्रकारके अनुग्रह किए हैं. हे सद्गुरु धनी ! वस्तुतः आप हमारे लिए ही आए हैं और आपने तारतमका प्रकाश दिखाकर हमारा मार्ग प्रशस्त किया है.
साथें माया मांगी सो भई अति जोर, तुम सबद कहे कै कर कर सोर ।
पर तिन समे नींद क्योंए न जाए, तब धनी सरूप भए अंतराए ।।१८
सुन्दरसाथने माया देखनेकी माँग की थी, किन्तु यह उनके लिए कठिन हो गई है. आपने पुकार-पुकार कर हमें उपदेश दिया, परन्तु उस समय किसी भी तरह हमारी नींद नहीं मिटी. तब धामधनी स्वरूप आप हममेंसे अन्तर्धान हो गए.
तो भी ना भई हमको खबर, तब फेर आए दूजा देह धर ।
ततछिन मिले हमको आए, सागर वतनी नूर बरसाए ।।१९
फिर भी हमें सुधि न हुई, तब आप पुनः दूसरा शरीर धारण कर (मेरे हृदयमें) प्रकट हुए. आप तत्काल आकर हमसे मिले और तारतम सागरके रूपमें परमधामका नूर बरसाने लगे.
मैं साथ को कह्या सो कहिए क्योंकर, यों तो कहिए जो दूर किये होवें घर ।
एता तो मैं जानूं जीव मांहें, जो ए अरज धनीसों करिए नाहें ।।२०
हे धनी ! मैंने सुन्दरसाथको जो कुछ कहा है वह आपसे कैसे कहा जाए? यह सब तो तब कहा जाए, जब आपने हमें अपने घर-परमधामसे दूर किया हो. इतना तो मैं अन्तरसे जानती हूँ कि ऐसी विनती धनीसे नहीं करनी चाहिए.
कहे इन्द्रावती सुन्दरबाई चरने, सेवा पीउकी प्यार अति घने ।
और कछू ना इन सेवा समान, जो दिल सनकूल करे पेहेचान ।।२५
इन्द्रावती कहती है कि सुन्दरबाईके चरणोंकी सेवा करनेसे प्रियतम धनीका अत्यधिक प्रेम प्राप्त होता है. धामधनीको पहचान कर प्रसन्न दिलसे उनकी सेवा करनेके समान अन्य कुछ भी सुख नहीं है.
प्रकरण २४

श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी

व्रजतणी लीला कही, वली विसेखे रास। श्री धामतणां सुख वरणवे, दिए निध प्राणनाथ।।
४९ प्रकरण १ श्री रास महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

प्राणनाथ सद्गुरुने सर्व प्रथम व्रजकी लीलाका, फिर विशेष रूपसे रास और परमधामके अनन्त सुखोंका वर्णन कर हमें अखण्ड निधि प्रदान की है.

I have told you the leela(sport) of Braj and that of Raas. Prannath have described the infinite joy of Abode and has given you the path to reach Him (The technique to awaken is given in Braj and Raas, this is revealed by our beloved Lord the Supreme Godhead Shri Krishna along with the bliss of abode so the celestial souls get the cue and awaken herself in Paramdham

श्री प्रकाश ग्रन्थ किसके लिए है?
सुनियो साथ कहूं बिचार, फल वस्त जो अपनों सार । सोए देखके आओ वतन, माया अमल से राखो जतन ।।१
हे सुन्दरसाथजी ! मैं विचार पूर्वक मूल सम्बन्धकी बात कह रही हूँ, समस्त शास्त्रोंके फल स्वरूप सार वस्तु श्रीमद्बागवतके अन्तर्गत श्रीकृष्णजीकी ब्राह्मी लीला है. इस सारको देख (समझ) कर परमधामकी ओर आओ. मायाके नशीले प्रभावसे स्वयंको यत्न पूर्वक बचाओ.
इन घर बुलावें ए धनी, ब्रह्मसृष्टि जो हैं अपनी। खेल किया सो तुम कारन, ए बिचार देखो प्रकास बचन ।।३१
ऐसे धामधनी अपनी आत्माओंको अखण्ड परमधाममें बुला रहे हैं. तुम्हारे लिए ही इस नश्वर खेलकी रचना की है, देखो, प्रकाशके वचनों पर विचार कर यह बात समझो.
प्रकरण ३३ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन
सनमंधी साथकों कहे बचन, जीवको एता कौन कहे जी।
ए बानी सुन ढील करे क्यों वासना, सो ए विषम भोम क्यों रहे जी ।।२८
निरमल हिरदेंमें लीजो बचन, ज्यों निकसे फूट बान जी ।
ए कह्या ब्रह्मसृष्ट ईस्वरी को, ए क्यों लेवे जीव अग्यान जी ।।४६
माया जीव हममें रेहे ना सके, सो ले ना सके एह बचन जी ।
ना तो सबद घने लागसी मीठे, पर रेहेने ना देवे झूठा मन जी ।।४7
अपने सम्बन्धी सुन्दरसाथको ही इतने वचन कहे जा रहे हैं, अन्यथा साधारण जीवको इतना कौन कहता है ? इन वचनोंको सुनकर ब्रह्म आत्माएँ ढील क्यों करेंगीं ? इस विषमय भूमिकामें वे कैसे रह सकतीं हैं ?सद्गुरुके इन वचनोंको अपने निर्मल हृदयमें धारण करो, जिससे यह वाणी अङ्कुरित हो सके. ब्रह्मसृष्टि और ईश्वरीय सृष्टिके लिए ही यह सब कहा गया है. अज्ञानी जीव इसे कैसे धारण (ग्रहण) कर सकते हैं? मायासे उत्पन्न जीव हमारे साथ नहीं रह पाएँगे. वे इन वचनोंको ग्रहण नहीं कर सकते. अन्यथा इस वाणीके शब्द उन्हें भी अत्यधिक मधुर लगते, परन्तु यह झूठा मन उन्हें अन्तरमें टिकने नहीं देगा.
प्रकरण ३० श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

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