हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

श्री प्रकाश ग्रन्थ किसके लिए है?

सनमंधी साथकों कहे बचन, जीवको एता कौन कहे जी।
ए बानी सुन ढील करे क्यों वासना, सो ए विषम भोम क्यों रहे जी ।।२८

अपने सम्बन्धी सुन्दरसाथको ही इतने वचन कहे जा रहे हैं, अन्यथा साधारण जीवको इतना कौन कहता है ? इन वचनोंको सुनकर ब्रह्म आत्माएँ ढील क्यों करेंगीं ? इस विषमय भूमिकामें वे कैसे रह सकतीं हैं ?

एह विध कर कर आतम जगाई, तब होसी सब सुध जी ।
सुध हुए पूर चलसी प्रेमके, होसी जाग्रत हिरदें बुध जी ।।४५

यदि इस प्रकार अपनी आत्माको जगा लोगे तब तुम्हें घरकी तथा धामधनीकी सब सुधि हो जाएगी. इस प्रकार सुधि होने पर प्रेमका प्रवाह बहने लगेगा और हृदयमें जागृत बुद्धिका प्रकाश फैल जाएगा.

निरमल हिरदेंमें लीजो बचन, ज्यों निकसे फूट बान जी ।
ए कह्या ब्रह्मसृष्ट ईस्वरी को, ए क्यों लेवे जीव अग्यान जी ।।४६

सद्गुरुके इन वचनोंको अपने निर्मल हृदयमें धारण करो, जिससे यह वाणी अङ्कुरित हो सके. ब्रह्मसृष्टि और ईश्वरीय सृष्टिके लिए ही यह सब कहा गया है. अज्ञाानी जीव इसे कैसे धारण (ग्रहण) कर सकते हैं ?

माया जीव हममें रेहे ना सके, सो ले ना सके एह बचन जी ।
ना तो सबद घने लागसी मीठे, पर रेहेनंे ना देवे झूठा मन जी ।।४7

मायासे उत्पन्न जीव हमारे साथ नहीं रह पाएँगे. वे इन वचनोंको ग्रहण नहीं कर सकते. अन्यथा इस वाणीके शब्द उन्हें भी अत्यधिक मधुर लगते, परन्तु यह झूठा मन उन्हें अन्तरमें टिकने नहीं देगा.

जो कोई जीव होए मायाको, सो चलियो राह लोक सत जी ।
जो कोई होवे निराकार पार को, सो राह हमारी चलत जी ।।४८

जो मायासे उत्पन्न जीव हैं वे इसी ब्रह्माण्डमें सत लोक (वैकुण्ठ) की राह पर चलें. जो कोई निराकारके पार परमधामके होंगे, वे ही हमारी राह पर चल सकते हैं.
बासनाको तो जीव न कहिए, जीव कहिए तो दुख लागे जी ।
झूठेकी संगते झूठा केहेत हों, पर क्या करों जानों क्योंए जागे जी ।।४९

ब्रह्मवासनाको तो जीव नहीं कहना चाहिए. उन्हें जीव कहते हुए मुझे दुःख होता है. इस झूठी मायाके सङ्गतके कारण उन्हें भी झूठा (जीव) कहना पड. रहा है. परन्तु क्या करें ? किसी भी प्रकार वे जाग जाएँ, यही हमारा प्रयत्न है.

ए कठन बचन मैं तो केहेती हों, ना तो क्यों कहूं बासनाको जीव जी ।
जिन दुख देखे गुन्हेंगार होत है, आग्या ना मानो पीउ जी ।।५०

इसलिए मुझे ये कठिन वचन कहने पड. रहे हैं अन्यथा मैं ब्रह्मवासनाको जीव क्यों कहूँ ? दुःखोंको देखकर (उनमें रच-पच कर) वे गुन्हेगार बन रहे हैं और धनीकी आज्ञाा भी मान नहीं रहे हैं.

प्रकास बानी तुम नीके कर लीजो, जिन छोडो एक छिन जी ।
अंदर अरथ लीजो आतम के, बिचारियो अंतसकरन जी ।।५१

प्रकाश ग्रन्थकी वाणीको तुम भली भाँति ग्रहण करो, इसे एक क्षणके लिए भी मत छोड.ो. इसके द्वारा आत्माके गूढ. अर्थको ग्रहण करो और उसे अन्तर्मनमें भली प्रकार विचार करो.

अंदर का जब लिया अरथ, तब नेहेचे होसी प्रकास जी ।
जब इन अरथे जागी बासना, तब वृथा न जाए एक स्वांस जी ।।५२

जब तुम इस वाणीके द्वारा आन्तरिक अर्थ ग्रहण करोगे, तब निश्चय ही अन्तरात्मामें ज्ञाानका प्रकाश फैल जाएगा. जब इन अर्थोंके द्वारा आत्मा जागृत हो जाएगी, तब एक श्वास भी व्यर्थ नहीं जाएगा.

ए प्रगट बानी कही प्रकासकी, इन्द्रावती चरने लागे जी ।
सो लाभ लेवे दोनों ठौरको, जाकी बासना इत जागे जी ।।५३

इन्द्रावती सद्गुरु धनीके चरणोंमें लगकर प्रकाश ग्रन्थकी यह प्रकट वाणी प्रकाशित कर रही है. जिसकी आत्मा इसी संसारमें जागृत हो जाएगी, वही संसार और परमधाम दोनोें स्थानोंका लाभ प्राप्त करेगी.
प्रकरण ३०
श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

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