हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

निज नेहेचल नाम श्रीक्रस्न स्याम

धिक धिक पडो मेरी बुध को।
मेरी सुधको, मेरे तन को, मेरे मन को, याद न किया धनी धाम ।
जेहेर जिमीसों लग रही, भूली आठों जाम।।१

मेरे मन, बुद्धि, चित्त तथा इस शरीरको धिक्कार है, जिन्होंने धामधनीको याद नहीं किया एवं संसारके विषतुल्य विषयोंमें रत होकर आठों प्रहर अपने धनीको भूलती रही.

मूल वतन धनिएं बताइया, जित साथ स्यामाजी स्याम ।
पीठ दई इन घर को, खोया अखंड आराम।।२

धामधनी सद्गुरुने वह मूलघर (परमधाम) बताया, जहाँ श्याम-श्यामाजी तथा सुन्दरसाथ हैं. ऐसे अखण्ड घरको पीठ देकर हमने अखण्ड सुखोंको गँवा दिया.

सनमंध मेरा तासों किया, जाको निज नेहेचल नाम।
अखंड सुख ऐसा दिया, सो मैं छोडया बिसराम।।३

सद्गुरुने मेरा सम्बन्ध उन अनादि अक्षरातीत श्रीकृष्णजीके साथ जोड. दिया जिनका नाम ही अखण्ड है. उन्होंने तो मुझे ऐसा अखण्ड सुख प्रदान किया, किन्तु मैंने मायावी सुखोंमें रत होकर उन अखण्ड सुखोंको छोड. दिया.

खिताब दिया ऐसा खसमें, इत आए इमाम।
कुंजी दई हाथ भिस्त की, साखी अल्ला कलाम।।४

सद्गुरुने यहाँ आकर मुझे निष्कलङ्क बुद्ध (इमाम महदी) की उपाधि प्रदान की. उन्होंने कतेब ग्रन्थोंकी साक्षी देकर जीवोंके मुक्तिस्थलों (बहिस्तों) के द्वारकी कुञ्जी मेरे हाथ सौंप दी.

अखंड सुख छोडया अपना, जो मेरा मूल मुकाम।
इसक न आया धनीय का, जाए लगी हराम।।५

तथापि मैंने परमधामके उन अखण्ड सुखोंको छोड. दिया, जो अपना मूल स्थान है. मुझे धामधनीके प्रति प्रेम भी उत्पन्न नहीं हुआ एवं मैं झूठे विषयसुखोंकी ओर लग गया.

खोल खजाना धनिएं सब दिया, अंग मेरे पूरा न ईमान ।
सोए खोया मैं नींद में, करके संग सैतान।।६

धामधनीने अखण्ड निधिका भण्डार खोलकर मुझे लुटा दिया, तथापि मेरे हृदयमें पूर्ण श्रद्धा उत्पन्न नहीं हुई. मैंने दुष्ट मायाका सङ्गकर उस अखण्ड निधिको अज्ञाानरूपी नींदमें गँवा दिया.

उमर खोई अमोलक, मोह मद क्रोध ने काम।
विषया विषे रस भेदिया, गल गया लोहू मांस चाम ।।७

मैंने अपना अमूल्य जीवन काम, क्रोध, मद एवं मोहकी ओर लगकर गँवा दिया. विषयोंके विषमय रसने मेरे शरीरको इतना प्रभावित किया कि रक्त, माँस, चमड.ी सब गल गए.

अब अंग मेरे अपंग भए, बल बुध फिरी तमाम।
गए अवसर कहा रोइए, छूट गई वह ताम।।८

अब मेरे सभी अङ्ग शिथिल हो गए हैं तथा मेरा सम्पूर्ण बल एवं बुद्धि भी मायाकी ओर लग गई. अवसर बीत जाने पर रोनेसे क्या लाभ ? सद्गुरुके धामगमनके साथ-साथ अब तो आत्माका आहार ही छूट गया.

पार द्वार सब खोल के, कर दई मूल पेहेचान।
संसे मेरे कोई ना रह्या, ऐसे धनी मेहेरबान।।९

ऐसे कृपालु सद्गुरु धनीने पार (बेहद) के सभी द्वार खोल कर मुझे अपने मूल (पर-आत्मा) की पहचान करवाई, जिसके कारण अब मेरा कोई भी संशय शेष नहीं रहा.

बोहोत कह्या घर चलते, वचन न लागे अंग।
इन्द्रावती हिरदे कठिन भई, चली ना पीउजी के संग ।।१०

सद्गुरुने परमधाम जाते समय मुझे बहुत समझाया, किन्तु उनका एक भी वचन मेरे हृदयमें नहीं चुभा. इन्द्रावती ऐसी कठोरहृदया हो गई कि वह सद्गुरुधनीके साथ परमधाम नहीं जा सकी.

तब हारके धनिएं विचारिया, क्यों छोडूं अपनी अरधंग ।
फेर बैठे माहे आसन कर, महामति हिरदें अपंग।।११

तब हताश होकर धनीने विचार किया कि मैं अपनी अङ्गनाको अकेली कैसे छोड. दूँ ? पश्चात् वे महामतिके अपङ्ग हृदयमें विराजमान हो गए.
प्रकरण ९९ श्री किरन्तन

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