हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

dhamdhaniparichay braj raas jaagani

मेरे मीठे बोले साथ जी, हुआ तुमारा काम।
प्रेमैं में मगन होइयो, खुल्या दरवाजा धाम।।१
सखी री धाम जैये ।। टेक ।।

हे सुन्दरसाथजी ! मेरे (सद्गुरुके) मीठे वचनोंके द्वारा तुम्हारे सब कार्य (मनोरथ) पूर्ण हो गए हैं. तुम अपने धनीके प्रेममें मग्न रहो. तुम्हारे लिए परमधामके द्वार खुल गए हैं. इसलिए हे सुन्दरसाथजी ! अब परमधाम चलें.

दौड सको सो दौडियो, आए पोहोंच्या अवसर।
फुरमानमें फुरमाइया, आया सो आखर।।२

जागनीके लिए अन्तिम समय आ पहुँचा है, इसलिए जितना दौड. सकते हो उतना दौड.ो (अज्ञाानको छोड.कर जागृत हो जाओ). आत्म-जागृतिका शास्त्रोक्त समय आ गया है.

वरनन करते जिनको, धनी केहेते सोई धाम।
सेवा सुरत संभारियो, करना एही काम।।३

सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजी महाराज जिस मूलघरका वर्णन करते थे, वही अपना परमधाम है. इसलिए तुम धनीजीकी सेवा करते हुए अपनी सुरताको परमधामकी ओर केन्द्रित करो, क्योंकि हमें यही कार्य करना है.

वन विसेखे देखिए, माहें खेलन के कै ठाम।
पसु पंखी खेलें बोलें सुन्दर, सो मैं केते लेऊं नाम ।।४

परमधामके विभिन्न वन-उपवनकी शोभाको देखो. वहाँ पर अनेक क्रीड.ास्थल हैं. उनमें असंख्य पशु-पक्षी विभिन्न प्रकारके खेल करते हुए सुन्दर कलरव करते हैं. मैं उनमेंसे कितनोंका नाम लूँ ?

स्याम स्यामाजी सुन्दर, देखो करके उलास।
मनके मनोरथ पूरने, तुम रंग भर कीजो विलास।।५

अपने हृदयमें प्रेम और उल्लास भरकर अपने प्राणाधार श्याम-श्यामाजीके सुन्दर स्वरूपके दर्शन करो और अपने मनोरथोंको पूर्ण करनेके लिए उनके साथ आनन्द-विलास करो.

इसक आयो पीउ को, प्रेम सनेही सुध।
विविध विलास जो देखिए, आई जागनी बुध।।६

अब हमारे हृदयमें धामधनीका प्रेम प्रकट हुआ है, उसीसे हमें परमधामके प्रेमकी सुधि हुई. अब परमधामके विभिन्न प्रकारके प्रेम विलासको देखो, क्योंकि तारतम ज्ञाानरूपी जागृत बुद्धि प्रकट हो गई है.

आनंद वतनी आइयो, लीजो उमंग कर।
हंसते खेलते चलिए, देखिए अपनों घर।।7

परमधामका आनन्द प्रकट हो गया है, उसे उत्साह पूर्वक ग्रहण करो. हँसते-खेलते चलो और अखण्ड परमधामको देखो.

सुख अखंड जो धाम को, सो तो अपनों अलेखें।
निपट आयो निकट, जो आंखा खोलके देखे।।८

परमधामके अखण्ड सुख तो असीम हैं. अब वे हमारे निकट आ चुके हैं. तुम उन्हें अन्तर्दृष्टिसे देखो एवं अन्तरात्मामें उनका अनुभव करो.

अंग अनभवी असल के, सुखकारी सनेह।
अरस परस सबमें भया, कछू प्रेमें पलटी देह।।९

तुम्हारी आत्मा तो परमधामके वास्तविक प्रेमका अनुभव कर रही है जो अखण्ड सुख देनेवाला है. वह प्रेम तुम सबमें आत्मा-परात्माके सम्बन्ध द्वारा जागृत हो चुका है. इसके कारण तुम्हारे शरीरका व्यवहार ही बदल गया है.

मंगल गाइए दुलहे के, आयो समे स्यामा वर स्याम।
नैनों भर भर निरखिए, विलसिए रंग रस काम।।१०

इसलिए अब प्रियतम परमात्माके शुभगुणोंका गायन करो, क्योंकि सुन्दरवर श्याम-श्यामाको मिलनेका समय आ गया है. अब नयन भरकर युगल स्वरूपके दर्शन करो और प्रेमानन्द लेते हुए उनके साथ विलास करो.

धामके मोहोलों सामग्री, माहें सुखकारी कै विध।
अंदर आंखें खोलिए, आई है निज निध।।११

परमधामके महल और मन्दिर विभिन्न प्रकारकी आनन्ददायी सामग्रियोंसे परिपूर्ण हैं. इसलिए अन्तःदृष्टिको खोलकर देखो, वह अखण्ड निधि स्वरूप तारतम ज्ञाान यहाँ आ पहुँचा है.

विलास विसेखें उपज्या, अंदर कियो विचार।
अनभव अंगे आइया, याद आए आधार।।१२

इस प्रकार अन्तर हृदयसे विचार करो, प्रियतम धनीके साथ विशेष आनन्द-विलास करनेकी कामना उत्पन्न हुई है. अब धामधनीका स्मरण होते ही परमधामके अखण्ड सुखोंका अनुभव होने लगा.

दरदी विरहा के भीगल, जानों दूरथें आए विदेसी।
घर उठ बैठे पलमें, रामत देखाई ऐसी।।१३

इस संसारमें आकर हम सबके हृदय धनीजीके प्रेम और विरहके कारण रो रहे हैं. मानों हम दूर आकर विदेशी बन गए हैं. परन्तु धनीजीने ऐसा खेल दिखाया कि हम क्षणभरमें ही जागृत होकर परमधाममें बैठ जाएँगे.

उठके नहाइए जमुनाजी, कीजे सकल सिनगार।
साथ सनमंधी मिलके, खेलिए संग भरतार।।१४

इसलिए अब भ्रमकी निद्राको छोड.कर जागृत हो जाओ तथा यमुनाजीके शीतल जलमें स्नान करो. तत्पश्चात् परमधामके सम्पूर्ण शृङ्गार धारण कर सभी ब्रह्मात्माएँ एक साथ मिलकर प्रियतम धनीके साथ रमण करो.

महामत कहें मलपतियां, आओ निज वतन।
विलास करो विध विध के, जागो अपने तन।।१५

महामति कहते हैं, प्रेममें मस्त रहने वाली हे आत्माओ ! तुम सब साथ मिलकर परमधाम आओ और परात्मामें जागृत होकर प्रियतम धनीके साथ विभिन्न प्रकारके आनन्द-विलास करो.
प्रकरण ८० श्री किरन्तन
सखी जोइए आपण वनमां, एम रे थैयो तमे कांय।
जेनुं नाम श्री क्रस्नजी, ते बेठा छे आपण मांय।।२३

हे सखियो ! चलो हम सब मिलकर उन्हें वनमें ढूँढंे.. तुम सब इस प्रकार निराश क्यों हो रही हो ? जिनका नाम श्रीकृष्ण है वे तो हमारे बीच (हृदय) में ही विराजमान हैं.

O dear sakhi, let us find Him in this forest, why are you so sad. The one whose name is Shri Krishna, is residing within us.
O Dear sakhi, lets first search Him in the forest(without) Why you feel so empty? The one with the name Shri Krishna lives in our heart (within). Seek the one whose name is Krishna within the self. (Remember Nijnaam). The realization that Lord is residing within is called full awakening. How can one find a body within?
श्री रास प्रकरण ३२

They were looking everywhere externally in the forest first and realized the truth(the purpose of becoming antardhyan).
They knew how exactly they were behaving in Braj and were close to the Lord so they enacted the whole braj leela in which Radha became the Shri Krishna.
We contemplate on His leela with Gopis at Braj(kalmaya uninverse) and Raas (Yogmaya universe).

Photos: