हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

स्याम सरूप है ब्रह्म

श्री जी साहेब जी मेहरबान
इन विध साथजी जागिए, बताए देऊं रे जीवन। स्याम स्यामाजी साथजी, जित बैठे चौक वतन।।१
याद करो सोई साइत, जो हंसने मांग्या खेल। सो खेल खुसाली लेय के, उठो कीजिए केल।।२
सुरत एकै राखियो, मूल मिलावे मांहिं। स्याम स्यामाजी साथजी, तले भोम बैठे हैं जांहिं।।३
प्रकरण ७ सागर महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

हे सुन्दरसाथजी ! स्याम श्रीराज श्यामाजीके स्वरूप एवं शृगारको हृदयमें धारण कर इस प्रकार जागृत हो जाएँ. मैं आपको अपने प्राणाधार धामधनीकी पहचान करवाता हूँ. स्याम श्रीराजजी, श्यामाजी एवं समस्त ब्रह्मात्माएँ परमधाम रङ्ग भवनकी प्रथम भूमिकाके पाँचवें चौक मूलमिलावामें विराजमान हैं.अपनी सुरता (ध्यान)को इसी मूलमिलावामें केन्द्रित करें. रङ्गभवनकी इस प्रथम भूमिकामें स्याम श्रीराजजी एवं श्यामाजी ब्रह्मात्माओं सहित विराजमान हैं. आप उस घडी को याद करें जब हमने इसी मूलमिलावामें बैठकर संसारका यह (हाँसीका) खेल देखनेकी माँग की. अब इस खेलके आनन्दको हृदयमें धारण कर यहीं पर (मूलमिलावामें) जागृत होकर अपने धामधनीके साथ आनन्द विहार करें.

निजानंद संप्रदाय श्री कृष्ण प्रणामी धर्मं ही महंमद दीन इस्लाम है। महामति प्राणनाथ जी ने तारतम सागर में सुन्दरसाथ को आत्मा को पहेले पहचान कर परमात्मा को प्राप्त करने को कहा है पूजा बन्दना उपासना सभी आतंरिक रूहानी आत्मा से अपने साहेब श्री कृष्ण स्याम सरूप है ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर को याद करने को कहा है।

स्याम स्यामाजी सुन्दर, देखो करके उलास।
मनके मनोरथ पूरने, तुम रंग भर कीजो विलास।।५

अपने हृदयमें प्रेम और उल्लास भरकर अपने प्राणाधार श्याम-श्यामाजीके सुन्दर स्वरूपके दर्शन करो और अपने मनोरथोंको पूर्ण करनेके लिए उनके साथ आनन्द-विलास करो.

इसक आयो पीउ को, प्रेम सनेही सुध।
विविध विलास जो देखिए, आई जागनी बुध।।६

अब हमारे हृदयमें धामधनीका प्रेम प्रकट हुआ है, उसीसे हमें परमधामके प्रेमकी सुधि हुई. अब परमधामके विभिन्न प्रकारके प्रेम विलासको देखो, क्योंकि तारतम ज्ञाानरूपी जागृत बुद्धि प्रकट हो गई है.

आनंद वतनी आइयो, लीजो उमंग कर।
हंसते खेलते चलिए, देखिए अपनों घर।।7

परमधामका आनन्द प्रकट हो गया है, उसे उत्साह पूर्वक ग्रहण करो. हँसते-खेलते चलो और अखण्ड परमधामको देखो.

सुख अखंड जो धाम को, सो तो अपनों अलेखें।
निपट आयो निकट, जो आंखा खोलके देखे।।८

परमधामके अखण्ड सुख तो असीम हैं. अब वे हमारे निकट आ चुके हैं. तुम उन्हें अन्तर्दृष्टिसे देखो एवं अन्तरात्मामें उनका अनुभव करो.

अंग अनभवी असल के, सुखकारी सनेह।
अरस परस सबमें भया, कछू प्रेमें पलटी देह।।९

तुम्हारी आत्मा तो परमधामके वास्तविक प्रेमका अनुभव कर रही है जो अखण्ड सुख देनेवाला है. वह प्रेम तुम सबमें आत्मा-परात्माके सम्बन्ध द्वारा जागृत हो चुका है. इसके कारण तुम्हारे शरीरका व्यवहार ही बदल गया है.

मंगल गाइए दुलहे के, आयो समे स्यामा वर स्याम।
नैनों भर भर निरखिए, विलसिए रंग रस काम।।१०

इसलिए अब प्रियतम परमात्माके शुभगुणोंका गायन करो, क्योंकि सुन्दरवर श्याम-श्यामाको मिलनेका समय आ गया है. अब नयन भरकर युगल स्वरूपके दर्शन करो और प्रेमानन्द लेते हुए उनके साथ विलास करो.

धामके मोहोलों सामग्री, माहें सुखकारी कै विध।
अंदर आंखें खोलिए, आई है निज निध।।११

परमधामके महल और मन्दिर विभिन्न प्रकारकी आनन्ददायी सामग्रियोंसे परिपूर्ण हैं. इसलिए अन्तःदृष्टिको खोलकर देखो, वह अखण्ड निधि स्वरूप तारतम ज्ञाान यहाँ आ पहुँचा है.

विलास विसेखें उपज्या, अंदर कियो विचार।
अनभव अंगे आइया, याद आए आधार।।१२

इस प्रकार अन्तर हृदयसे विचार करो, प्रियतम धनीके साथ विशेष आनन्द-विलास करनेकी कामना उत्पन्न हुई है. अब धामधनीका स्मरण होते ही परमधामके अखण्ड सुखोंका अनुभव होने लगा.

दरदी विरहा के भीगल, जानों दूरथें आए विदेसी।
घर उठ बैठे पलमें, रामत देखाई ऐसी।।१३

इस संसारमें आकर हम सबके हृदय धनीजीके प्रेम और विरहके कारण रो रहे हैं. मानों हम दूर आकर विदेशी बन गए हैं. परन्तु धनीजीने ऐसा खेल दिखाया कि हम क्षणभरमें ही जागृत होकर परमधाममें बैठ जाएँगे.

उठके नहाइए जमुनाजी, कीजे सकल सिनगार।
साथ सनमंधी मिलके, खेलिए संग भरतार।।१४

इसलिए अब भ्रमकी निद्राको छोड.कर जागृत हो जाओ तथा यमुनाजीके शीतल जलमें स्नान करो. तत्पश्चात् परमधामके सम्पूर्ण शृङ्गार धारण कर सभी ब्रह्मात्माएँ एक साथ मिलकर प्रियतम धनीके साथ रमण करो.

महामत कहें मलपतियां, आओ निज वतन।
विलास करो विध विध के, जागो अपने तन।।१५

महामति कहते हैं, प्रेममें मस्त रहने वाली हे आत्माओ ! तुम सब साथ मिलकर परमधाम आओ और परात्मामें जागृत होकर प्रियतम धनीके साथ विभिन्न प्रकारके आनन्द-विलास करो.
प्रकरण ८० श्री किरन्तन

पेहेलें भाई दोऊ अवतरे, एक स्याम दूजा हलधर।
स्याम सरूप है ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर।।२७ प्रकरण १३ खुलासा

श्रीमद्बागवतके अनुसार व्रज मण्डलमें दो भाई अवतरित हुए. उनमें एक श्याम श्रीकृष्ण हैं और दूसरा हलधर बलभद्र हैं. उन दोनोंमें से श्याम ब्रह्मके स्वरूप हैं जिन्होंने रासलीला रचाई.
श्याम ब्रज में ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्रह्म का स्वरुप किसी पञ्च तत्व का तन नहीं है|

गिरो बचाई साहेब ने, तले कोहतूर हूद तोफान ।
बेर दूजी किस्ती पर, चढाए उबारी सुभान।।१२ प्रकरण १ छोटा क़यामतनामा

इसी व्रज मण्डलमें इन्द्रकोपके समय श्रीकृष्णजीने ब्रह्मात्माओंको गोवर्धन पर्वतके नीचे सुरक्षित रखा था. इस प्रसङ्गको कुरानमें हूद तूफान कहा गया है. उस समय हूद पैगम्बरने अपने समुदायके लोगोंको कोहतूर पर्वतके नीचे सुरक्षित रखा था. दूसरी बार नूह तूफानके समय भी उन्होंने ही योगमायाकी नावमें चढ़ा कर उन्हें पार किया था.

छिपके साहेब कीजे याद, खासलखास नजीकी स्वाद ।
बडी द्वा माहें छिपके ल्याए, सब गिरोहसों करे छिपाए ।।१ प्रकरण १५ बड़ा क़यामतनामा
परमात्माकी उपासना गुप्त रूपसे करनी चाहिए. श्रेष्ठ आत्माएँ इस प्रकारकी उपासनासे उनकी निकटताका आनन्द प्राप्त करतीं हैं. सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजीने परब्रह्म परमात्मासे जो प्रार्थना की थी उसे उन्होंने ब्रह्मात्माओंके समुदायसे भी गुप्त रखा था.

बंदगी रूहानी और छिपी, जो कही साहेदी हजूर।
ए दोऊ बंदगी मारफत की, बीच तजल्ला नूर।।४२ प्रकरण ४ श्री मारफत सागर

आत्मभावसे तथा गुप्तभावसे की जानेवाली उपासना परब्रह्म परमात्माके सान्निध्यकी कही जाती है. ये दोनों प्रकारकी उपासना आत्म-अनुभव अथवा परमधामकी पूर्ण पहचानकी है.

सिर बदले जो पाइए, महंमद दीन इसलाम।
और क्या चाहिए रूहन को, जो मिले आखर गिरोह स्याम।।२५ प्रकरण ३ खुलासा
अपना सिर देने पर भी यदि सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी द्वारा निर्दिष्ट सत्य (धर्म) मार्ग एवं अपने धामधनी श्याम (श्रीकृष्ण) प्राप्त हो जाएँ तो इन आत्माओंको और क्या चाहिए ?

कलमा निमाज दोऊ दिल से, और दिलसों रोजा रमजान।
दे जगात हिसा उन्तालीसमा, हज करे रसूल मकान।।४० प्रकरण ४ खुलासा

ऐसे लोग कलमा, नमाज तथा रमजान महीनेमें व्रत रखना आदि कार्य हृदयपूर्वक करते हैं और अपनी आयका उनतालीसवाँ भाग दानमें देकर रसूलके घर की यात्रा करते हैं.

इसक बंदगी अल्लाह की, सो होत है हजूर।
फरज बंदगी जाहेरी, सो लिखी हक से दूर।।५८ प्रकरण १० खुलासा

यह स्पष्ट कहा है कि प्रेमपूर्वक की गई पूर्णब्रह्मकी वन्दना उनके निकट पहुँचाती है और मात्र औपचारिकता समझ कर की गई बाह्य उपासना (फर्जबन्दगी) परमधामसे दूर ही रह जाती है.
महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

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