हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

श्रीकृस्नजीसों प्रेम करे बडी मत, सो पोंहचावे अखंड घर जित

ब्रह्मलीला प्रकट कर अपनी तथा आत्मा परमात्माकी पहचान कराई

ब्रह्मलीला ढांपी हती, अवतारों दरम्यान।
सो आए फेर अपनी, प्रगट करी पेहेचान।।२५ प्रकरण ५२ किरंतन

विभिन्न अवतारोंकी लीलाओंमें ब्रह्मलीलाका रहस्य छिपा हुआ था. बुद्धजीस्वरूप सद्गुरुने स्वयं प्रकट होकर अपनी तथा आत्मा परमात्माकी पहचान कराई.

कोटि जतन ब्रह्मा करि थाके, सो जूठन नहिं पाये ।
सो जूठन धनी सहज कृपासों, पंचम निशदिन पाये ॥३

श्री कृष्ण ब्रज रास में ब्रह्म स्वरुप हैं ! यह कोई चतुर्मुखी ब्रह्मा ने बनाया हुआ शारीर नहीं है , इनको तो चतुर्मुखी ब्रह्मा की बुद्धि पहचान ही नहीं पाई !

पेहेलें भाई दोऊ अवतरे, एक स्याम दूजा हलधर। स्याम सरूप है ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर।।२७ प्रकरण १३ खुलासा

श्रीमद्बागवतके अनुसार व्रज मण्डलमें दो भाई अवतरित हुए. उनमें एक श्याम श्रीकृष्ण हैं और दूसरा हलधर बलभद्र हैं. उन दोनोंमें से श्याम ब्रह्मके स्वरूप हैं जिन्होंने रासलीला रचाई.
श्याम ब्रज में ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्रह्म का स्वरुप किसी पञ्च तत्व का तन नहीं है|

दो बेटे नूह नबीय के, एक स्याम दूजा हिसाम।
स्यामें समारी किस्ती मिने, दिया रूहों को आराम।।२8 प्रकरण १३ खुलासा

इसी प्रकार कुरानमें भी नूह पैगम्बरके दो पुत्रोंका उल्लेख है. उनमें-से एक शाम तथा दूसरा हिशाम है. उन दोनोंमें-से शामने तूफानके समय नौकाको सम्भाला और श्रेष्ठ आत्माओंको उसमें बैठाकर सुख (आराम) प्रदान किया.
यहाँ पर बात रूह को आराम देने की हो रही है क्या एक तन रूह देख सकता है ?

ए लीला अखंड थई, एहनो आगल थासे विस्तार।
ए प्रगटया पूरण पार ब्रह्म, महामति तणो आधार।।१० प्रकरण ५१ किरंतन

श्रीकृष्णजीकी यह लीला अक्षरब्रह्मके हृदयमें अङ्कित होकर अखण्ड बन गई. इस लीलाके रहस्यका आगे विस्तार होगा. अक्षरातीत पूर्णब्रह्म परमात्मा प्रकट हुए हैं, ये ही तो महामतिके प्राणाधार हैं.
The Lord who is absolute and Brahm of beyond appeared here.
This is eternal leela of the Lord and this will be elaborated more in future.
Here the Complete Pooran Brahma appeared who is aadhar(Supporter) Lord of Mahamati.

श्रीकृस्नजीसों प्रेम करे बडी मत, सो पोंहचावे अखंड घर जित ।
ताए आडो न आवे भवसागर, सो अखंड सुख पावे निज घर ।।८
प्रकरण २१ प्रकाश (हिंदुस्तानी)
श्रीकृष्णजीसे प्रेम करने वाली बुद्धि बड़ी मति (महामति) अखण्ड घरमें पहुँचा देती है. उसकी राहमें भवसागर बाधा नहीं बनता.वह अपने घरका अखण्ड सुख प्राप्त करती है.महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन
यह अखंड निज घर ब्रह्मात्माओं का धाम है। अखंड निज घर का मतलब है अखंड स्वयं का घर यह तो सिर्फ ब्रह्मात्माओं का है। जीव सृष्टि माया से उत्पन्न हुई है उनका अपना घर तो अखंड धाम नहीं है। इश्वरी सृष्टि का तन अक्षर धाम में नहीं है २४,००० इश्वरी सृष्टि अक्षर की सुरता हैं, यह धाम धनि श्री कृष्ण की उपासना करेंगी और अक्षर ब्रह्म से मिल जाएँगी। वैसे प्रेम तो इस दुनिया में है ही नहीं, सिर्फ ब्रह्मात्मा ही प्रेम करना जानती है और इनकी मति बड़ी ही होती है, ब्रह्मात्मा ही सिर्फ श्री कृष्ण से प्रेम कर सकती हैं और यह उन्ही के लिए कहा गया है। तारतम वचन भी उन्ही के लिए है।

The beings with higher intelligence will love Shri Krishna which will take them to the eternal home, there the world (ocean of emotions) will not obstruct, and they will get the bliss of eternal home of the self.
Nij means the self Nijghar means the abode of the self it is also called Nijdham or Paramdham. The one with higher intelligence can love Shri Krishna, which will take one to eternal imperishable abode, the ocean of world (ignorance) will not obstruct and that will attain the eternal, everlasting bliss of the abode of the Nij. Remember the name of the Nij (the soul the self) is Shri Krishna which is eternal and from Aksharateet! This is the revelation of tartam gyaan Do not waste even a single breath and accept the enlightening of the beloved of Nijghar (abode of the self), accept it this with your nature and the senses you will not get this opportunity again.These words must eliminate all the confusion, greater intelligence those who accept shall become praiseworthy. End this confusion and recognise the beloved better! My soul is very wise, has given the path of Aksharateet says Mahamati! Do not take this as a mere poem!
भिस्त दई सबन को, चढे अक्षर नूर की द्रष्ट।
कायम सुख सबन को, सुपन जीव जो सृष्ट।।१०९

बुद्धजीने संसारके सभी जीवोंको मुक्तिस्थलोंमें स्थान दिया जिससे वे अक्षरब्रह्मकी दृष्टिमें अखण्ड हो गए. इस प्रकार बुद्धजीके प्रतापसे स्वप्न जगतके जीवोंको भी अखण्ड सुख प्राप्त हुआ.

दूजी सृष्टि जो जबरूती, जो ईस्वरी कही।
अधिक सुख अक्षर में, दिल नूर चूभ रही।।११०

दूसरी अक्षरधामकी सृष्टि है जिसको ईश्वरीसृष्टि कहा गया है. अक्षरब्रह्मकी सुरता स्वरूप होनेसे उन्होंने अक्षरब्रह्मके हृदयमें स्थान प्राप्त कर अखण्ड सुख प्राप्त किया.

और उमत जो लाहूती, ब्रह्मसृष्टि घर धाम।
इन को सुख देखाए के, पूरन किए मन काम।।१११

इनके अतिरिक्त परमधामकी आत्माएँ ब्रह्मसृष्टि कहलाती हैं. इस क्षर जगतकी लीला दिखाकर बुद्धजीने इनके सभी मनोरथ पूर्ण किए.

मुक्त दई त्रैगुन फिरस्ते, जगाए नूर अक्षर।
रूहें ब्रह्मसृष्टि जागते, सुख पायो सचराचर।।११२

बुद्धजीने त्रिदेवों तथा अन्य फरिश्तोंको भी अखण्ड सुख (मुक्ति) प्रदान किया तथा अक्षरब्रह्मको भी जागृत किया. इस प्रकार ब्रह्मसृष्टियोंके परमधाममें जागृत होने पर जगतके सचराचर प्राणियोंको अखण्ड सुख प्राप्त हुआ.

करनी करम कछू ना रह्या, धनी बडे कृपाल।
सो बुधजीएं मारिया, जो त्रैलोकी का काल।।११३

धामधनी इतने बड.े कृपालु हैं कि उन्होंने किसीके भी कर्तव्य तथा कर्मबन्धनोंको शेष रहने नहीं दिया. इस प्रकार बुद्धजीने तीनों लोकों (स्वर्गादि, मृत्युलोक तथा पाताल) के जीवोंके कालचक्र (आवागमन चक्र) को मिटा दिया.
प्रकरण १३ श्री खुलासा

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