हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

उडाए दियो सबको अंधेर, काढयो सबको उलटो फेर

दूजा देह धरके सुन्दरबाई श्यामा (श्री राजजी ) फिर से मेहेराज परातम इन्द्रावती में आये और तारतम ज्ञान फिर से कही , पहेले बार सभी ने तारतम लिया धनि की सेवा भी की पर उनकी नींद पूर्ण तरह से गयी नहीं थी . धनि देव्चान्द्रजी इसा और महामति प्राणनाथजी मेहदी हैं ,यह ही आखरी इमाम हुए हैं , इन्ही के मार्फ़त प्राणनाथ श्री कृष्ण श्याम ने वाणी कही है वोह कुल्जम्स्वरूप आखरी किताब कह कर गए हैं . मंत्र का धनि इसा धनि देवाचान्द्रजी को कहा है . इसीलिए अगर कुछ बदला और शंका श्रीजन किया , साहेब के उन्मुख आत्मायों को धनि से बेमुख किया तब ऐसे लोगों को धाम धनि के सामने प्रतिष्ठा नहीं है भले ही ये अपने आप को सतगुर या परमेश्वर की उपाधि दे कर क्यों न अपनी ही पूजा कराएँ !

हम कारन तुम आए देह धर, तुम कै विध दया करी हम पर ।
तुम धनी आए कारन हम, देखाई बाट ल्याए तारतम ।।१७
हमारे लिए ही आप शरीर धारण कर आए हैं. आपने हम पर अनेक प्रकारके अनुग्रह किए हैं. हे सद्गुरु धनी ! वस्तुतः आप हमारे लिए ही आए हैं और आपने तारतमका प्रकाश दिखाकर हमारा मार्ग प्रशस्त किया है.
साथें माया मांगी सो भई अति जोर, तुम सबद कहे कै कर कर सोर ।
पर तिन समे नींद क्योंए न जाए, तब धनी सरूप भए अंतराए ।।१८
सुन्दरसाथने माया देखनेकी माँग की थी, किन्तु यह उनके लिए कठिन हो गई है. आपने पुकार-पुकार कर हमें उपदेश दिया, परन्तु उस समय किसी भी तरह हमारी नींद नहीं मिटी. तब धामधनी स्वरूप आप हममेंसे अन्तर्धान हो गए.
तो भी ना भई हमको खबर, तब फेर आए दूजा देह धर ।
ततछिन मिले हमको आए, सागर वतनी नूर बरसाए ।।१९
फिर भी हमें सुधि न हुई, तब आप पुनः दूसरा शरीर धारण कर (मेरे हृदयमें) प्रकट हुए. आप तत्काल आकर हमसे मिले और तारतम सागरके रूपमें परमधामका नूर बरसाने लगे.
मैं साथ को कह्या सो कहिए क्योंकर, यों तो कहिए जो दूर किये होवें घर ।
एता तो मैं जानूं जीव मांहें, जो ए अरज धनीसों करिए नाहें ।।२०
हे धनी ! मैंने सुन्दरसाथको जो कुछ कहा है वह आपसे कैसे कहा जाए? यह सब तो तब कहा जाए, जब आपने हमें अपने घर-परमधामसे दूर किया हो. इतना तो मैं अन्तरसे जानती हूँ कि ऐसी विनती धनीसे नहीं करनी चाहिए.
पर साथ वास्ते दाह उपजी मन, यों जाने न कह्या हम कारन ।
यों न कहूं तो समझे क्यों कोए, कै विध दया धनीकी होए ।।२१
किन्तु सुन्दरसाथके लिए मेरे मनमें यह चाह उत्पन्न हुई है. वे यह न सोचें कि इन्होंने हमारे लिए कुछ कहा ही नहीं. मैं इस प्रकार न कहूँ तो कोई कैसे समझ पाएगा कि धनीकी दया किस प्रकार हो रही है.
ए साथ की चिन्हार को कहे वचन, ना तो धनी दया जीव जाने मन ।
साथ चरने हैं सो तो बचिछिन बीर, ए भी वचन विचारे द्रढ धीर ।।२२
सुन्दरसाथको धनीकी पहचान करानेके लिए ही मैंने ये वचन कहे हैं, अन्यथा धनीकी दया तो मेरा जीव ही जानता है. जो सुन्दरसाथ धनीके चरणोंमें हैं, वे तो विचक्षण (तीक्ष्ण प्रतिभावाले) एवं वीर (साहसी) हैं. वे भी इन वचनों पर दृढ.तासे विचार करेंगे.
पर करूं साथ पीछले की बडी जतन, देख बानी आवसी इन बाट वतन ।
देखियो साथ दया धनी, ए कृपाकी बातें हैं अति घनी ।।२३
परन्तु भविष्यमें आने वाले सुन्दरसाथके लिए मैं प्रयत्न कर रही हूँ. इसी वाणीको देखकर वे परमधामके इस मार्ग पर आएँगे. हे सुन्दरसाथजी ! धनीजीकी दयाको देखो, उनकी कृपाकी बातें बहुत हैं.
ए दया धनी मैं जानूं सही, पर इन जुबां ना जाए कही ।
जो जीव वचन विचारे प्रकास, तो अंग उपजे धाम धनी उलास ।।२४
धनीकी इस अपार कृपाको मैं ही समझती हूँ किन्तु इस नश्वर जिह्वासे कह नहीं सकती. जो जीव इस प्रकाश ग्रन्थकी वाणी पर विचार करेंगे, तब उनका मन धामधनीसे मिलनेके लिए सदैव उल्लसित होगा.
कहे इन्द्रावती सुन्दरबाई चरने, सेवा पीउकी प्यार अति घने ।
और कछू ना इन सेवा समान, जो दिल सनकूल करे पेहेचान ।।२५
इन्द्रावती कहती है कि सुन्दरबाईके चरणोंकी सेवा करनेसे प्रियतम धनीका अत्यधिक प्रेम प्राप्त होता है. धामधनीको पहचान कर प्रसन्न दिलसे उनकी सेवा करनेके समान अन्य कुछ भी सुख नहीं है.
प्रकरण २४

श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी

अब सांचा तो जो करे रोसन, जोत पहोंची जाए चौदे भवन ।
ऐ समया तो ऐसा मिल्या आए, चौदे भवनमें जोत न समाए ।।२२

सच्चा ज्ञान वही है जो आत्माको प्रकाशित कर दे और उस ज्ञाानकी ज्योति चौदह लोकोंमें पहुँच जाए. यह समय तो ऐसा प्राप्त हुआ है कि चौदह लोकोंमें इस (तारतम) ज्ञाानकी ज्योति समाती नहीं है.

The true knowledge is that which will illumine the soul and the light of this illumination will spread in all the 14 lokas. This moment you have got which is so bright, that the light cannot be contained in all the 14 lokas. It is by the knowledge and understanding one can awaken the jeev and thus the soul and finally experience the Supreme. This knowledge and understanding will illumine whole 14 lokas!
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यों हम ना करें तो और कौन करे, धनी हमारे कारन दूजा देह धरे ।
आतम मेरी निजधामकी सत, सो क्यों ना कर उजाला अत ।।२३
श्री सुन्दरबाईके चरन प्रताप, प्रगट कियो मैं अपनों आप ।
मोंसों गुनवंती बाइएं किए गुन, साथें भी किए अति घन ।।२४
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यदि हम ऐसा (इस तारतम ज्ञाानको फैलानेका) कार्य नहीं करेंगे तो अन्य कौन करेगा ? सद्गुरु धनीने हमारे लिए ही दूसरी बार शरीर धारण किया है. यदि मेरी आत्मा सचमुच परमधामकी है तो वह इस संसारमें परमधामके ज्ञाानका प्रकाश क्यों नहीं फैलाएगी ?

Illuminating the universe with light of supreme knowledge, if I do not do then who else will do. Out of compassion our beloved Lord has taken the human form twice. My soul is truth of abode of the self(निजधामकी सत), then why will it not illuminate the universe extremely.

This reference धनी हमारे कारन दूजा देह धरे
Means Lord first came in Shyama-Sundarbai and then He united with Indravati again!

सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी (सुन्दरबाई) के चरणोंके प्रतापसे मैंने स्वयंको प्रकट किया है. मुझ पर श्रीगोवर्धन ठाकुर (गुणवन्तीबाई) ने बडे. उपकार किए हैं और सुन्दरसाथने भी मुझ पर बड.ा अनुग्रह किया है.

By the mercy of Sundarbai(celestial soul of Paramdham who resided in Devachandraji Maharaj), I could manifest myself(Indrawati). Gunvanti bai(a celestial soul residing in Govardhan Thakkar, Meheraj’s elder brother) have obliged me a lot and all other sundarsath also were extremely graceful towards me.

It is Indrawati who is enlightened by the grace of Lord who resided within her and said and eliminated all the darkness and brought the soul to right path from the wrong ones!
जोत करूं धनीकी दया, ए अंदर आएके कहया।
उडाए दियो सबको अंधेर, काढयो सबको उलटो फेर ।।२५

अब मैं धनीकी दयाको प्रकाशित करती हूँ. उन्होंने मेरे हृदयमें बैठकर ये वचन कहे हैं. उन्होंने इन वचनोंके द्वारा सबके अज्ञाानरूपी अन्धकारको दूर किया और संसारके समस्त जीवोंके जन्म-मरणके उलटे चक्रको समाप्त कर दिया.
The compassion of our beloved Lord let me throw light upon it, it is He who residing in me, has spoken these words. All the darkness of ignorance is eliminated. Salvaged all the beings from birth and death into eternity! (The world is a place of suffering, misery, always longing for happiness which never lasts, going through birth and death exactly opposite to the bliss, everlasting happiness and eternity.)
इन्द्रावती प्रगट भई पीउ पास, एक भई करे प्रकास ।
अखंड धाम धनी उजास, जाग जागनी खेले रास।।२६

इन्द्रावती पिया (सद्गुरु) के साथ प्रकट हुई है. वह उनसे एकाकार होकर इन वचनोंको प्रकाशित कर रही है. धामधनीके ज्ञाानके अखण्ड प्रकाशसे जागृत होकर जागनी रास खेल रही है.
Indrawati (celestial soul of Paramdham) is revealed and became near to beloved and united with the beloved is bringing this light (illuminating). Awakening in the light of the eternal Lord of the abode is playing the raas (one which is full of nectar of bliss) of awakening!
Indrawati united with the Aksharateet Lord is requesting all the brahmshriti to understand these words for which she has given the proof from the scriptures too and recognize the supreme Lord.
Those who fail to understand and follow their stupidity will end in the hell where the suffering is indescribable.
प्रकरण २१ प्रकाश (हिंदुस्तानी)

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