हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

विस्वास करके दौडे जे, तारतमको फल सोई ले। तिन कारन करूं प्रकास, ब्रह्मसृष्टि पूरन करूं आस

श्रीसुन्दरबाईके चरन पसाए, मूल बचन हिरदें चढि आए । चरन फले निध आई एह, अब ना छोडूं चित चरन सनेह ।।१८
सद्गुरु (सुन्दरबाई) के चरणोंके प्रतापसे परमधामके मूल वचन मेरे हृदयमें प्रकट हुए. जिन चरणोंकी कृपाके फल स्वरूप यह निधि मुझे प्राप्त हुई है, उनका स्नेह अब मैं नहीं छोड. सकती हूँ.
चरन तले कियो निवास, इन्द्रावती गावे प्रकास। भानके भरम कियो उजास, पावें फल कारन विस्वास ।।१९
ऐसे सद्गुरुके चरणोंमें रह कर इन्द्रावती प्रकाशके वचनोंको इस प्रकार गा रही है. सद्गुरुने मेरी सभी भ्रान्तियोंको मिटाकर मेरे हृदयको प्रकाशित किया है. उनके चरणोंमें विश्वास करनेसे मुझे यह फल प्राप्त हुआ.
विस्वास करके दौडे जे, तारतमको फल सोई ले। तिन कारन करूं प्रकास, ब्रह्मसृष्टि पूरन करूं आस।।२०
जो पूर्ण विश्वासके साथ आगे बढ.गे, उन्हें ही तारतम ज्ञानका फल प्राप्त होगा. इस प्रकार प्रकाश ग्रन्थके इन वचनोंको प्रकाशित कर ब्रह्मात्माओंकी आशा पूर्ण करूँगी.
इन्द्रावती धनीके पास, रासको कियो प्रकास। धनिएं दई मोहे जागृत बुध, तो प्रकास करूं तारतमकी निध ।।२१
इन्द्रावतीने सद्गुरुके चरणोंमें रहकर रासके रहस्योंको इस प्रकार (प्रकाश ग्रन्थके द्वारा) प्रकट किया. सद्गुरु धनीने मुझे जागृत बुद्धि प्रदान की है. इसलिए उसके बल पर ही मैं तारतम ज्ञानरूपी अखण्ड निधिको प्रकट करती हूँ. प्रकरण १९ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)

Anil Vala
सत्य की वास्तविकता

दिनांक 19-10-1995 गुरुवार रात्रि 8 बजे पूर्व सूचनानुसार स्थानीय विद्दद् वर्ग की विशेष बैठक श्रीमान् पन्नालालजी शर्मा उपाध्यक्ष ट्रस्ट की अध्यक्षता मेँ संपन्न हुई । जिसमे निम्नांकित महानुभाव उपस्थित हुए एवं 5 बार श्री निजनाम जाप करने के बाद कार्यवाही प्रारंभ हूई ।

1 ) श्री पन्नालालजी शर्मा उपाध्यक्ष 2 ) श्री पं. धनीदासजी 3 ) श्री पं. चेतनदत्तजी शर्मा 4 ) श्री पं. आनंददासजी शर्मा 5 ) श्री पं. पन्नालालजी गूडा 6 ) श्री पं. क्रृष्णदासजी शर्मा
7 ) श्री पं. मानिकलालजी शर्मा 8 ) श्री सुभाषचंद्रजी शर्मा , सचिव ट्रस्ट 9 ) श्री राजक्रृष्णजी दुबे , ट्रस्टी 10 ) श्री बाबुलाल हीरालाल ट्रस्टी 11 ) श्री पु.देवकरनजी त्रिपाठी

# दुसरा विचार श्री निजानंद आश्रम रतनपुरी ( इन्चोली ) से प्रकाशित '' संसार और मेरा भर्तार '' नामक पुस्तक मे कइ विसंगतियाँ श्री क्रृष्ण के संबंध मे तथा और भी धर्म विरोधी बातो की व्याख्या की गइ है जो विरोधात्मक है तथा

श्री निजनाम श्रीक्रृष्णजी है या निजनाम श्री जी साहेब जी है इस विषय पर निर्णय होना है ।

विचार हो तथा मुजफ्फरनगर बुलेटिन हिन्दी दैनिक ता.26 सितम्बर 1995 बैटक मे प्रस्तुत हुआ जिसमे एक लेख श्री निजानंद आश्रम रतनपुरी मे वार्षिकोत्सव टाईटल के अंतर्गत स्पष्ट लेख है कि महाराज श्री क्रृष्णदासजी ने अपने भाषण मे यह स्पष्ट किया कि मूलमंत्र 'निजनाम श्रीजी साहेबजी कहा जाए ' इसका स्पष्टीकरण श्री पं. क्रृष्णदास जी से बैठक मे मांगा गया ।# सर्वसम्मति से यह प्रमाणित किया गया कि मुलमंत्र निजनाम श्री क्रृष्णजी है और वह रहेगा । इसके अलावा पं. श्री क्रृष्णदासजी शर्मा से पूछने पर स्पष्ट किया कि उत्त्क बुलेटिन मे जो मेरा कथन यह छापा गया है कि '' निजनाम श्रीजी साहेबजी है '' यह लेख मेरे '' बिना अनुमति के छापा गया है '' । वह जब मैने बुलेटिन मे पढा था तो उस समय इंचोली प्रवास केदौरान ही मैने इस पर आपत्ति उठाकर रोक लगा दी थी कि बुलेटिन मे छपे अभिभाषण के खंडन हेतु मै लिखकर देने को तैयार हु व मेने इंचोली मे ही रोक लगा दी थी कि धाम दर्शन मे उत्त्क गलत लेख नही आना चाहिए ।------------हस्ताक्षरति---------- 1.पन्नालाल ,2. चेतन दत्त शर्मा ,3.पु.पन्नालाल , 4. देवकरन त्रिपाठी अध्यक्ष श्री धर्म प्रचार संगीत मंडल , 5. धनीदासजी , 6. क्रृष्णदासजी , 7. आनन्ददास , 8. सुभाषचंन्द्र , 9. राज क्रृष्ण दुबे , 10. बाबुलाल , 11. मानिकलाल शर्मा .

1) विक्रम सँवत् 1733 भादरवा सूद एकम से 1746 अषाढ सुद तेरस गुरुवार संग्रह तिथि 1758 चैत्र अग्यारस रविवार समय 334 वर्ष पूर्वलेखन और स्थान ब्रह्ममुनी श्री नंदरामजी तथा ब्रह्ममुनी श्री वीरजीभाई श्रीजी के समकालीन सुप्रसिद्द लेखक स्थान श्री 5 पद्भमावतीपुरी धाम पन्नायह अति प्राचीन और प्रामाणिक हस्तलिखित प्रत श्री घुम्मटजी मंदिर , श्री 5 पद्मावतीपुरीधाम पन्नामे सुरक्षित है ।यह स्वरुप साहेब के अलग अलग किताबे अलग अलग समयमे दोनो ब्रह्ममुनी के द्रारा लीखे गये है यह एक एक पुस्तक का संग्रह संवत 1758 चैत्र सुद 11 रविवार के दिन कीया गया था ।ये स्वरुत साहेब मे रास से लेकर कयामतनामा तक सारे ग्रन्थ मे बीज मंत्र मे निजनाम श्री क्रूष्न जी ही है ।

2) विक्रम संवत 1760 अषाढ वद रविवार 293 वर्ष पहेले लेखक श्रीजी के समकालीन ब्रह्ममूनी श्री वीरजीभाई जो स्वामीजी की जागनी यात्रा मे साथ थे यह ग्रंन्थ पन्ना मे ही लीखा गया हे । स्वरुप साहेब की यह अति प्राचीन नकलो मे रास से लेकर कयामतनामा के आरंभ मे प्रत्येक ग्रन्थ के प्रारंभ मे निजनाम श्री क्रृष्ण जी अनादि अक्षरातीत हि लिखा है ।इस स्वरुप साहेब मे एक और विशेषता हे की सिनगार ग्रन्थ के बीच मे श्री राधाक्रृष्ण का चित्र बना हुआ है जो अनेक रंगो से अत्यंत मनोहर ओर दर्शनीय है ।

3 ) विक्रम संवत 1826 पोष वद 3 ,227 वर्ष पहेले ब्रह्ममुनी श्री गनेश ब्रह्मचारी ने पन्ना जी मे लिखा था ।ग्रन्थ के प्रारंभ मे अथवा कीसी भी जगस पर निजनाम महामंत्र का उल्लेख हुआ हे वहा पर निजनाम श्री क्रृष्णजी अनादी अक्षरातीत ही है ।

4 ) विक्रम संवत 1851 अषाढ सुद 14 शुक्रवार , 202 वर्ष पहेलेश्री श्यामदास जी ने पन्ना परमधाम मे लिखा था ।ग्रन्थ के आरंभ और एक एक पुस्तक के प्रारंभ मे निजनाम श्री क्रृष्णजी अनादि अक्षरातित ही लिखा है।

5) विक्रम संवत 1852 जेठ वद गुरुवार , 201 वर्ष पहेले शाहगढ के राजा परमहंस श्री बखतवली के समय मे महाकोटा मे लीखा गया था । यह स्वरुप साहेब श्री 108 श्री बंगलाजी मे 200 वर्ष पूर्व मजलिस ( चर्चा ) के समय पधराया जाता था । चांदीके कवरमे जडीत यह स्वरुप साहेबका आकार और वजन ईतना है की कोइ साधारन मनुष्य के लिए उठाना अशक्य है । इस स्वरुप साहेब मे भी निजनाम मंत्र मे निजनाम श्री क्रृष्णजी अनादि अक्षरातीत ही है ।que. प्राणनाथजी और देवचंन्द्रजी की वाणी और बीतक का इतना अपमान करने वालो को माफ क्यु कर दिया गया ? किसकी जमीर मे खोट है ? महामतिजी के समाज मे भेदभाव रखनेवालो को पन्नाधाम ने माफ क्यु कर दिया ?WRITTEN BY : LET'S WAKE UP SUNDARSATH GROUP Anil Vala

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