हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

The true meaning of Mahamati

Can Dhani Devachandraji be called Mahamati or not?

इत भेलें रूह नूर बुध, और आग्या दया परकास।
पूरूं आस अक्षर की, मेरा सुख देखाए साख्यात।।३२

मेरे हृदयमें श्री श्यामाजीकी आत्मा, तारतम (नूर), अक्षरकी जागृत बुद्धि (बुध), श्री राजजीकी आज्ञाा और कृपाका पूर्ण प्रकाश है. अब मैं इन सबके द्वारा मेरे घरका सुख दिखाकर परमधामकी लीला देखनेकी अक्षरब्रह्मकी इच्छाको पूर्ण कर दूँ.

Here unites in my soul(Shyama),light of Supreme knowledge(tartam gyaan), the cosmic mind of Akshar, will/command of the Lord, the grace and enlightening(realisation of the self). I will fulfill the desire of Akshar by showing the bliss of the real abode and supreme.

इत भी उजाला अखंड, पर किरना न इत पकराए।
ए नूर सब एक होए चल्या, आगूं अक्षरातीत समाए।।३३

तारतम ज्ञाानके अखण्ड प्रकाशसे यह संसार भी प्रकाशित हुआ है किन्तु इस दिव्य ज्ञाानकी किरणें यहाँ समा नहीं रहीं हैं. उपर्युक्त बुद्धि, आज्ञाा, दया सबके सब एक साथ अपना प्रकाश फैलाते हुए अक्षरातीत धाममें जाकर समा जाते हैं.
By the light of the supreme wisdom of indivisible true abode there is enlightening but one cannot contain the rays. These enlightening (all five described ahead)bound together enter into the heart of Aksharateet Paramdham.

ए नूर आगे थें आइया, अक्षर ठौर के पार।
ए सब जाहेर कर चल्या, आया निज दरबार।।३४

अक्षरसे परे अक्षरातीतके धामसे ही तारतमका प्रकाश इस संसारमें आया है. सम्पूर्ण क्षर ब्रह्माण्ड, अक्षरधाम और परमधाम इन सभी भूमिकाओंको प्रकट कर यह फिर अपने स्थान परमधाममें ही समा जाएगा.
This enlightening has come from beyond, beyond the abode of Akshar. All these are revealed and now we are at the palace of the self.

वतन देख्या इत थें, सो केते कहूं परकार।
नूर अखंड ऐसा हुआ, जाको वार न काहूं पार।।३५

ब्रह्मात्माओंने इस तारतम ज्ञाानके प्रतापसे संसारमें रहते हुए भी परमधामके दर्शन किए, इसका विवरण कहाँ तक दूँ ? ज्ञाानका ऐसा अखण्ड प्रकाश फैला जिसका कोई पारावार ही नहीं है.

Living in this world, I saw my abode, how can I describe how it is!
The imperishable enlightening is such there is neither I can describe this side nor the other side (unbound and unlimited at all end)

किए विलास अंकूर थें, घर के अनेक परकार।
पिया सुंदरबाई अंग में, आए कियो विस्तार।।३६

परमधामके सम्बन्धी होनेके कारण हम ब्रह्मात्माओंने इस जगतमें रहते हुए भी परमधामके अनेक प्रकारके अखण्ड सुखोंमें विलास किया. सुन्दरबाई (सद्गुरु) के स्वरूपमें स्वयं प्रियतम परमात्माने मेरे हृदयमें विराजमान होकर धाम लीलाका विस्तार किया.

Due to relationship, we enjoyed in many ways the unlimited(abundance) sport of original home. Beloved Lord came in the soul of Sundarbai and spread the revelations.

ए बीज बचन दो एक, पिया बोए किओ परकास।
अंकूर ऐसा उठिया, सब किए हांस विलास।।३7

सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजी महाराजने मेरे हृदयमें तारतम ज्ञाानके बीज वचन बोकर ही यह प्रकाश किया है. उसका ऐसा अङ्कुर फूटा (तारतम वाणी प्रकट हुई) कि इसके द्वारा सभीने परमधामके अपार सुखोंका अनुभव किया.
By the word of seeds, beloved Lord sowed and enlightened. The seed sprouted so well (tartam vani) all are able to enjoy the union with the beloved.
The revelations which Lord spread through Sundarbai, the same knowledge is planted as seed in Indrawati which sprouts for us tartamsagar so we all can unite and sport with our beloved Lord.
प्रकरण २४ श्री कलश ग्रन्थ (हिन्दुस्तानी)

श्री सुंदरबाई स्यामाजी अवतार, पूरन आवेस दियो आधार ।
ब्रह्मसृष्ट मिने सिरदार, श्री धाम धनीजी की अंगना नार ।।१

सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजी (सुन्दरबाई) श्रीश्यामाजीके अवतार हैं. धामधनीने उनको अपना पूर्ण आवेश दिया है. वे ब्रह्मसृष्टियोंमें शिरोमणि हैं और धामधनीकी अर्धाङ्गिनी हैं.

Shri Sundarbai avataar of Shyamaji whom the Master gave पूरन complete aavesh(inspiration). She is the head of all other Brahmshristi and she is the part of Master of Paramdham.
prakaran 5 Prakash Hindi
Shyama avtaar Dhani Dev chandra first got tartam gyaan from the Supreme Lord then Lord resided in her heart.
All five will of the Lord, grace, tartam gyaan of original abode mool vatan, intelligence of Akshar, inspiration of Lord came along with it.
He thus became Mahamat first and showed the game to Indrawati and all other souls. Later, united with Indrawati and she too became Mahamati!
स्याम स्यामाजी आए देखो खेल बनाए, सब उठियां हंसकर ।
खेले महामति देखलावे इंद्रावती, खोले पट अंतर ।।१० प्रकरण ४० श्री परिक्रमा
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उस समय श्रीश्यामश्यामाजीने वहाँ पर आकर सखियोंकी यह लीला देखी तो सभी सखियाँ हँसती हुईं उठ गइंर्. इस प्रकार इन्द्रावती आदि सखियोंके इन खेलोंको दिखाते हुए महामति सभी सुन्दरसाथके अन्तर पटको खोल रहे हैं.

श्री भागवत को करत श्रवण, श्री पुरुषोत्तम दियो दर्शन /
प्रथम दृष्टि उजियारो आयो, पीछे स्वरूप को दर्शन पायो // 39 //

वय किशोर अति सुन्दर स्वरूप, तेज पुंज सिंगार अनूप /
श्री श्यामा जी की सुरत सुदेश, तापर पुरुषोत्तम आवेश // 40 //

आज्ञा, बुध, अरु मूल तारतम, पांचो निध आई उत्तम /
कह्यो थो श्यामनी रास मोझारी, अहम् कृष्ण कृष्ण भई प्यारी // 41 //

है स्वरूप सुन्दर सुखदाई, साक्षात जागनी रूप सुहाई /
श्री देवचन्द्र जी को दर्शन जब भयो, तब होकारो कथा को रेहे गयो // 42 //
श्री जयराम कंसारा जी (करुणा सखी) द्वारा रचित बीतक

बुद्धि सु अक्षर ब्रह्म की जगी रास मधि सोई । ध्यान कार्यो ब्रज्रासको बहुबिध चेतन होई ।।
जाग्रत बुद्धि को तातें प्रयो जू नाम । श्यामा ताको संग ले प्रगटी नौतन ठाम ।।
(वृत्तान्त मु. ३४ )
The intelligence of Akshar was awakened at Raas. If you meditate on Braj and Raas you will become conscious. Shyama using this awakened mind appeared in Nautan place.
Akshar then provides the cosmic consciousness noor budhi so to understand the creation and also attracts the gyaan from moolbudhi to itself. Thus we see the creation/destruction laws of creation and Akshar sees the leela of Paramdham.
दृष्टि अन्तरगत जेही, खोली धनी देवचन्द्रकी तेही ।
प्रथमै व्रज अखंड जो देख्यो, पीछे रास अखंड निज पेख्यो ॥
मंगलमूल धाम दृष्ट आयो, लीला सहित सो निकट सुहायो ।
मूल मेलो परम निज जोई, दृष्ट देख्यो साक्षात सोई ॥

सरूप पन्च सोहावे, मूल आज्ञा ताहिं खेलावे ।
आवेस श्री स्वामिनी संग जानो, सो श्री सुन्दरबाई विषे मानो ॥
बुध अक्षर की अवतरी, बुद्धि तारतम दृष्ट विस्तरी ।
आज्ञा मूल सरूपकी जेही, पांचो सरूप खेलावे तेही ॥
(सुन्दरसागर २७)

तब हारके धनिएं विचारिया, क्यों छोडूं अपनी अरधंग ।
फेर बैठे माहे आसन कर, महामति हिरदें अपंग।।११
तब हताश होकर धनीने विचार किया कि मैं अपनी अङ्गनाको अकेली कैसे छोड. दूँ ? पश्चात् वे महामति अपङ्ग हृदयमें विराजमान हो गए.
प्रकरण ९९ श्री किरन्तन

आदके द्वार ना खुले आज दिन, ऐसा हुआ ना कोई खोले हम बिन ।
सो कुंजी दई मेरे हाथ, तूं खोल कारन अपने साथ।।९३

उन्होंने बताया कि आज दिन तक परमधामके द्वार नहीं खुले थे (अर्थात् शास्त्रोंके अर्थ स्पष्ट नहीं हुए थे) हमारे बिना ऐसा कोई भी नहीं हुआ कि उन (रहस्यों) को खोल (स्पष्ट कर) सके. उन द्वारोंको खोलनेकी कुञ्जी (तारतम ज्ञाान) मेरे हाथमें देते हुए सद्गुरुने मुझे आदेश दिया, ‘तुम अपने सुन्दरसाथके लिए उन रहस्योंको खोल दो.’
The door of Paramdham was not opened to anyone before.
The hidden signs/symbols/messages were not revealed to anyone other than me. The key to all the scriptures the revealations, the tartam gyaan I am giving it to you, you open the doors for rest of the sundarsath said Satguru Dhani Devachandraji(Shyama – Sundarbai)

मोहे करी सरीखी आप, टालने हम सबोंकी ताप।
आतम संग भई जाग्रत बुध, सुपनथें जगाए करी मोहे सुध ।।९४

हम सब ब्रह्मात्माओंका सन्ताप मिटानेके लिए सद्गुरुने मेरे हृदयमें बैठकर मुझे अपने समान बनाया. मेरी अन्तर आत्मामें उनकी जागृत बुद्धिका प्रवेश हुआ. इस स्वप्नवत् संसारमें सोई हुई मेरी आत्माको जगाकर उन्होंने मुझे सब प्रकारकी सुधि दी.
Made me equal to him, awakened the intelligence and gave the conciousness!
Satguru made me as equal to her(sundarbai) to elliminate all misery in us. Awakened my soul and mind and
awakened me from the dream and gave me complete consciousness.
Remember Satguru Dhani Devachandraji made Mahamati Prannath equal to himself. He gave all the wisdom of Paramdham and also gave the key to all the scriptures and gave the privilege to open the doors of Paramdham to all. This is what Satguru does equips your disciple with truth, intelligence, awakening, enlightening, soul realization and krishna consciousness!

श्रीधनीजीको जोस आतम दुलहिन, नूर हुकम बुध मूल वतन ।
ए पांचों मिल भई महामत, वेद कतेबों पोहोंची सरत ।।९५

श्रीधनीजीका जोश, श्रीश्यामाजीकी आत्मा, अक्षरब्रह्मका नूर, श्रीराजजीका आदेश, परमधामकी मूल बुद्धि (तारतम ज्ञाान) इन पाँचों शक्तियोंको प्राप्तकर मैं महामति बन गई. वेद शास्त्रों तथा कुरानादिकी भविष्य वाणी (परब्रह्मका ज्ञाान संसारमें आएगा ऐसी) का समय आ गया है.
The inspiration of Supreme Master, consort the soul of the Master-Shyama, Cosmic Intelligence of Akshar, Will of the Master, the intelligence of the original soul (the intelligence of soul in Paramdham), akshar's awakened mind, together, I became Mahamat (Greater Intelligence), thus fulfilling the profecies of Ved and Kateb.
Sundarbai got Dhamdhani's complete avesh, she was shyama avtaar herself. She got tartam gyaan from Shri Rajji. She was commanded to awaken the sundarsath that is hukum, She came to earth with the Akshar's mind that awakened in Nitya Raas hence is called Budh avtaar. That is why Sundarbai Shyama and Shyam residing in Dhani Devchandra is Mahamati too. When united with Indrawati in Meheraj, he became Mahamati too.
When all five above are present then one becomes Mahamat.
Sundari sakhi resided in Dhani Devachandraji and Indrawati sakhi resided in Meharaj ji. In both Shyama resided and both united with Shri Krishna Shri Raaj Prannath. Both got Tartam gyaan, both got hukum to awaken sundarsath, both were awakened mind. All sakhis are Shyama'a ang and Shyama is Shri Rajji Shyam's ardhang(half part), all are parts and parcel of Shri Rajji, Shri Rajji is working through them. When something is done by a person do we ask which hand of his actually did the work? Do we credit the legs for walking and mind for thinking etcs or we just credit the person and appreciate the work done.

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