हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

आंखां खोल तूं आप अपनी, निरख धनी श्री धाम।

आंखां खोल तूं आप अपनी, निरख धनी श्री धाम।
ले खुसवास याद कर, बांध गोली प्रेम काम ।।१
हे मेरी आत्मा ! तू स्वयं अपनी अन्तर्दृष्टि खोलकर परमधामके धनीको निहार. परमधामको याद कर वहाँकी सुगन्धि ग्रहण कर अपनी कामनाओंको प्रेमपूर्वक धनीके चरणोंमें लगा.
प्रेम प्याला भर भर पीऊं, त्रैलोकी छाक छकाऊं।
चौदे भवनमें करूं उजाला, फोड ब्रह्मांड पीउ पास जाऊं ।।२
मेरी इच्छा है कि मैं धनीके प्रेमके प्याले भर-भर कर पी लूँ और फिर उस प्रेमामृतसे तीनों लोकोंकी तृषाको शान्तकर दूँ. चौदह लोकोंमें इस प्रेमको प्रकाशित कर ब्रह्माण्डको भी फोड.कर मैं अपने प्रियतमके पास पहुँच जाऊँ.
वाचा मुख बोले तूं वानी, कीजो हांस विलास।
श्रवना तूं संभार आपनी, सुन धनीको प्रकास।।३
हे वाचा ! तू अपनी वाणीसे धनीजीके गुणोंका उच्चारण कर और उनसे हास-परिहास कर. हे श्रवण ! तुम स्वयंको सम्हालकर धामधनीके प्रकाश स्वरूप तारतम ज्ञाानको सुन.
कहे विचार जीवके अंग, तुम धनी देखाया जेह।
जो कदी ब्रह्मांड प्रले होवे, तो भी ना छोडूं पीउ नेह ।।४
जीवके सभी अंग विचार कर कहते हैं कि तुमने हमें धनीकी पहचान करवाई है. यदि कभी ब्रह्माण्डका प्रलय भी हो जाए तो भी हम धाम धनीका स्नेह नहीं छोड.ेंगे.
खोल आंखां तूं हो सावचेत, पेहेचान पीउ चित ल्याए ।
ले गुन तूं हो सनमुख, देख परदा उडाए।।५
मेरे जीव ! तू आँखें खोलकर सावचेत हो जा और दिलसे अपने धनीको पहचान ले. तू उनके सम्मुख रहकर उनके गुणोंको ग्रहण कर और अज्ञाानके पर्देको उड.ाकर उनकी ओर निहार.
एते दिन वृथा गमाए, किया अधमका काम।
करम चंडालन हुई मैं ऐसी, ना पेहेचाने धनी श्री धाम ।।६
इतने दिनोंको व्यर्थ ही गँवाकर तूने बड.ी नीचताका काम किया है, जिसके कारण मैं चण्डालकर्म करनेवाली हो गई और मैंने अपने परमधामके धनीको भी नहीं पहचाना.
भट परो मेरे जीव अभागी, भट परो चतुराई।
भट परो मेरे गुन प्रकृती, जिन बूझी ना मूल सगाई ।।७
हे मेरे अभागे जीव ! तुझे धिक्कार है. मेरी चतुराईको भी धिक्कार है. मेरे सारे गुण और स्वभावको भी धिक्कार है जिन्होंने धामधनीके मूल सम्बन्धको नहीं पहचाना.
I condemn my life force(jeev) which is unfortunate, and also condemn the cunningness, I condemn the physical nature, which never understood the primordial relationship with the beloved Lord!
आग परो तिन तेज बलको, आग परो रूप रंग।
धिक धिक परो तिन ग्यानको, जिन पाया नहीं प्रसंग ।।८
उस तेज, बल, रूप और रंग सबको आग लग जाए. उस ज्ञाानको भी धिक्कार है, जो धामधनीका सङ्ग नहीं कर सका.
धिक धिक मेरी पांचो इन्द्री, धिक धिक परो मेरी देह ।
श्री स्याम सुन्दर वर छोडके, संसारसों कियो सनेह ।।९
मेरी पाँचों इन्द्रियोंको धिक्कार है, मेरे शरीरको भी धिक्कार है क्योंकि श्याम सुन्दर जैसे सर्वगुण सम्पन्न वर (धनी) को छोड.कर इन्होंने इस कुटिल संसारसे स्नेह किया.
धिक धिक परो मेरे सब अंगों, जो न आए धनीके काम ।
बिना पेहेचाने डारे उलटे, ना पाए धनी श्री धाम।।१०
मेरे सभी अंगोंको धिक्कार है जो धनीजीके काम कभी नहीं आए. पहचाने बिना ही प्रतिकूल मार्ग पर चलनेसे धामधनीको पानेसे वे वञ्चित रह गए.
तुम तुमारे गुन ना छोडे, मैं बोहोत करी दुष्टाई।
मैं तो करम किए अति नीचे, पर तुम राखी मूल सगाई ।।११
हे सद्गुरु धनी ! आपने अपने गुणों (उपकार) को कभी नहीं छोड.ा, मैंने तो (आपको न पहचानकर) बहुत दुष्टता की है. मैंने नीच कार्य किए हैं फिर भी आपने अपने मूल सम्बन्धको बनाए रखा.
प्रकरण २२ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)

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