हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Caste System

The descrimination on the basis of caste or anything is totally wrong. Mahamati Prannathji ridicules the existing system where a person is judged on the basis of his caste or anything that is seen outside. He says what matters is what a person is within. A person can wear clean clothes, recite all the ved mantras and perform all sorts of rituals, proclaim oneself pious and virtuos yet cannot see Shyam even in dreams. And there is another who is called Chandaal by the world, who day in and out remembers Lord's name and does it secretly. He seems very lowly in front of the world but his soul is illumined by the light of the Lord. Now,
Mahamati Prannathji asks us, who is really an untouchable the fake Vipra or real Chandaal?

Mahamati Prannath ji in this Kalash Hindustani Prakaran 16 explains how the world is topsy turvy.
वैराटका कोहेडा

वैराट का फेर उलटा, मूल है आकास।
डारें पसरी पाताल में, यों कहे वेद प्रकास।।१

इस विराट ब्रह्माण्डका चक्र ही उलटा है क्योंकि इस संसाररूप वृक्षका मूल (उत्पत्ति) आकाशमें है तथा इसकी शाखाओंका विस्तार नीचे पातालकी ओर है. वेदोंने इस प्रकार स्पष्ट किया है.

This cycle cosmic universe is totally topsy turvy because the tree of the world itself is upside down. The Ved throws light on it as the source of creation is upwards in sky and the branches spread in the lower plains (pataal) /realms of existence.

फल डारें अगोचर, आडी अंतराए पाताल।
वैराट वेद दोऊ कोहेडा, गूंथी सो छल की जाल।।२

इस संसार वृक्षके फल तथा शाखाएँ अगोचर (इन्द्रियातीत) हैं. यहाँ पर पातालसे लेकर वैकुण्ठ तक अज्ञाानका पर्दा टँगा हुआ है. इसके कारण वैराट और वेद दोनों ही अज्ञाानियोंके लिए पहेलीके समान उलझनें पैदा करते हैं. इस प्रकार मायावी जालके समान संसारकी रचना हुई है.
The fruits and branches all are unseen what that exist but cannot be seen! There is obstrucle of veil (ignorance) in all the realms of existence. For the ignorant person the cosmos and the ved both are puzzle and thus the illusion and fake weaves the net in which everyone is entangled.

विध दोऊ देखिए, एक नाभ दूजा मुख।
गूंथी जालें दोऊ जुगतें, मान लिए दुख सुख।।३

वेद और वैराट दोनोंकी उत्पत्ति इस प्रकार है, शेषशायी नारायणके नाभि कमलसे ब्रह्माजीने प्रकट होकर इस वैराटमें सृष्टि की और उन्होंने ही अपने चतुर्मुखसे चारों वेदोंका गायन किया. इस प्रकार दोनोंने संसारके जीवोंको अपनी जालमें युक्तिपूर्वक गूँथ लिया है. इसीमें निमग्न होकर विश्वके समस्त प्राणी दुःख-सुखको अपना भाग्य मान रहे हैं.
Try to visualize the two (cosmos and ved), one is created from one naval and another from the mouth. the four headed Lord Brahmaa originated from the naval of SheshShayee Narayan and spoke Ved mantra, very tactfully all the living were interweaved and all the living accepted the pain and pleasure.

कोहेडे दोऊ दो भांत के, एक वैराट दूजा वेद।
जीव जालों जाली बांधे, कोई जानें ना याको भेद।।४

इन दोनों (वेद और वैराट) से उत्पन्न समस्याएँ (पहेलीके समान उलझनें) भी दो प्रकारकी हैं. एक ओर विस्तृत वैराटका पारिवारिक सम्बन्ध है, तो दूसरी ओर वेदका अथाह कर्मकाण्ड. जीव इनके नियमोंकी जालीमें इस प्रकार फँसा (बँधा) रहता है कि उससे निकल नहीं पाता. आज तक मायाके इस रहस्यको कोई नहीं जान पाया.
The fog/confusion are of two kinds one is the cosmos and another is Ved.
One that the jeev(the life) binds to the various webs(relationship) and no one know the mystery behind it.

देखलावने तुम को, कोहेडे किए एह।
बताए देऊं आंकडी, छल बल की है जेह।।५

हे ब्रह्मात्माओ ! तुम्हें दिखानेके लिए ही पहेलीकी भाँति इस संसारकी रचना की गई है. अब इस छल-बलयुक्त मायाके रहस्य (आँकड.ी) को मैं स्पष्ट करता हूँ.
O celestial souls (Soul from the Supreme Brahm) , to show you this cosmos of confusion is created and let me explain the mystery of this illusionary world and its power of its deception.

आंकडी एक इन भांत की, बांधी जोरसों ले।
आतम झूठी देखहीं, सांची देखे देह।।६

इस मायावी रचनाका रहस्य ही इस प्रकारका है कि इसने सब जीवोंको फँसानेके लिए कर्मकाण्डके बन्धन जोरसे बाँध दिए हैं, इसलिए यहाँके प्राणी आत्माको झूठी और शरीरको सत्य मान बैठे हैं.

One of the mystery is of this type, which has bound all the living tightly. They think the soul is fake and not real and what they see real is the body.

करे सगाई देह सों, नहीं आतमसों पेहेचान।
सनमंध पालें इनसों, ए लई सबों मान।।7

इसलिए लोग शरीरसे सम्बन्ध बाँधते हैं. उन्हें आत्माकी पहचान नहीं होती है. इस प्रकार लोग क्षणभङ्गुर शरीरके झूठे सम्बन्धोंके निर्वहनमें ही अपना सब कुछ मान लेते हैं.
Thus they find relationship with the other physical bodies.
People relate themselves with physical body and do not know the self the soul and thus all the relationships they have is through body which they consider everything!

नहवाए चरचे अरगजे, प्रीते जिमावे पाक।
सनेह करके सेवहीं, पर नजर बांधी खाक।।८

इस क्षणभङ्गुर शरीरको ही नहलाकर इस पर चन्दनका सुगन्धित लेप करते हैं, फिर बड.े प्यारसे इसे अच्छा भोजन करवाते हैं. बड.े स्नेहसे इसकी सेवा करते हैं. वस्तुतः इन सबकी दृष्टि तो नश्वर माटीकी काया (खाक) से ही बँधी है.

People clean the body and spray perfumes over it and with lots of love feed it with delicious food and with affection serve it and thus pay attention in binding themselves to the dust.

जीव गया जब अंग थें, तब अंग हाथों जालें।
सेवा जो करते सनेह सों, सो सनमंध ऐसा पालें।।९

जब शरीरसे जीव निकल जाता है तब अपने ही हाथोंसे उस र्पािथव शरीरको आगसे जला देते हैं. जिस शरीरकी सेवा-शुश्रूषा इतने प्यारसे करते थे, उसीके साथ ऐसा सम्बन्ध (व्यवहार) निभाते हैं.
When the living source (Jeev) leaves the body, people burn it (using hands) and all the affection they were showing to the physical body thus they treat to the body and maintain the relationship.

हाथ पांउ मुख नेत्र नासिका, सब सोई अंग के अंग।
तिन छूत लगाई घर को, प्यार था जिन संग।।१०

शरीरसे प्राण निकलनेके बाद भी हाथ, पाँव, मुख, आँख, नाक, कान ये सारे अङ्ग तो यथावत् ही रहते हैं. किन्तु जिसके साथ इतना प्यार था, उसी शरीरने प्राण निकलते ही उस घरको अपवित्र बना दिया.
After the life source lives the body, the hands, legs, the mouth, eyes, nose all the body parts are still intact yet people say the whole house has become untouchable for the dear one who resided with them.

अंग सारे प्यारे लगते, खिन एक रह्यो न जाए।
चेतन चले पीछे सो अंग, उठ उठ खाने धाए।।११

जिस शरीरके अङ्ग-प्रत्यङ्ग इतने प्यारे लगते थे कि जिसका क्षणभरका वियोग भी सहन नहीं होता था, किन्तु चेतन आत्माके चले जाने पर वह (मृत) शरीर मानों उठकर खाने लगता हो, ऐसा हो जाता है.
The physical body all were so much loved that even for a moment one could not stay separated but the moment the conscious being when leaves, the same physical body now is so scary as if it will rise and eat everyone all up.

सनमंधी जब चल गया, अंग बैर उपज्या ताए।
सो तबहीं जलाए के, लियो सो घर बटाए।।१२

जब शरीरका सम्बन्धी (जीव) निकल गया तब उसी शरीरसे शत्रुता उत्पन्न हो गई. इसीलिए लोग उसी क्षण उस (शरीर) को जलाकर धन-सम्पत्ति, घर आदिका बँटवारा कर लेते हैं.

The one related to the body when leaves, the dead body becomes looks like a foe (must be disposed off as soon as possible). The relatives they burn the body immediately and come divide the home and property.

छोड सगाई आतम की, करे सगाई आकार।
वैराट कोहेडा या विध, उलटा सो कै परकार।।१३

लोग आत्माके सम्बन्धको छोड. कर मात्र शरीरसे ही सम्बन्ध जोड.ते हैं. इस प्रकार यह विश्व अनेक प्रकारकी विपरीत उलझनोंसे भरा हुआ है.
Everyone reject the relationship of the soul and engage in the relationship with the body. Thus is the confusion of this cosmos and opposites of many such types exist.

कै विध यों उलटा, वैराट नेत्रों अंध।
चेतन बिना कहे छूत लागे, फेर तासों करे सनमंध।।१४

इस प्रकार यह संसार अनेक प्रकारसे उलटा है. समस्त ब्रह्माण्डके लोग आँखोंके होते हुए भी अन्धों जैसा व्यवहार करते हैं. चेतनाके बिना जिस शरीरको अशुद्ध समझकर त्याग देते हैं, फिर वैसे ही नश्वर शरीरोंके साथ सम्बन्ध जोड. लेते हैं.
The cosmos is opposite(not what is seen or understood) and people over here, though they have eyes, they appear to be blind. The dead body which is devoid of living being must not be touched (must be cremated as soon as possible) and then they relate oneself to the body itself.

एक भेष जो विप्र का, दूजा भेष चंडाल।
जाके छुए छूत लागे, ताके संग कौन हवाल।।१५

इसी प्रकारके नश्वर शरीरोंमें भी एक शरीर ब्राह्मणका है, तो दूसरा चण्डालका है. जिस चण्डालको छूने मात्रसे कोई अपवित्र हो जाए, तो उसके साथ रहने पर फिर क्या गति होगी ?

In the same way Mahamati Prannathji explains about the one who wears as Vipra(very knowledgeable person) and the second one who wears as chandaal to whom if one touches becomes untouchable what will be the condition if one lives with such a person?
चंडाल हिरदे निरमल, खेले संग भगवान।
देखलावे नहीं काहूं को, गोप राखे नाम।।१६
अंतराए नहीं खिन की, सनेह सांचे रंग।
एहेनिस द्रष्ट आतम की, नहीं देहसों संग।।१7
यदि वह चण्डाल निर्मल हृदयका हो और रात-दिन प्रभुके प्रेममें मस्त रहता हो एवं किसीको दिखाए बिना ही भजन (भक्ति) करता हुआ अपने हृदयमें गुप्तरूपसे प्रभुका नाम लेता हो, क्षण भरके लिए भी वह अपने इष्टसे दूर नहीं होता हो अपितु सदैव उसकी आत्म-दृष्टि बनी रहती हो और वह शरीरके सम्बन्धोंको भी महत्त्व नहीं देता हो.

The Chandaal's heart is very pure (without any dirt) and sports with God and does not show the worship to anyone and recites the name of Lord secretly. Even for a moment does not separte from the Lord and is true to oneself (maintains affection with the self the true one - the soul). Always the sees from the eyes of the soul and has no relationship with the body (is always soul conscious and not the body conscious)!

विप्र भेष बाहेर द्रष्टि, षट करम पाले वेद।
स्याम खिन सुपने नहीं, जाने नहीं ब्रह्म भेद।।१८
उदर कुटुम्ब कारने, उतमाई देखावे अंग।
व्याकरन वाद विवाद के, अरथ करे कै रंग।।१९
इधर ब्राह्मणका वेश बनाया हुआ व्यक्ति बाह्य दृष्टि रखकर वेदानुसार शास्त्रोंका अध्ययन- अध्यापन, यजन-याजन (यज्ञा करना, कराना), ग्रहण-प्रतिग्रहण (दान लेना, देना) आदि षट्कर्मोंमें ही मग्न रहता है और परब्रह्म परमात्मा श्यामसुन्दरकी याद तो उसे स्वप्नमें भी न आती हो, तो वह ब्रह्मके वास्तविक रहस्यको नहीं जानता है. वह कुटुम्ब परिवार पोषण और अपनी उदर र्पूितके लिए ही कर्मकाण्ड और शारीरिक स्वच्छताका ढोंग रचता है. व्याकरणके वाद-विवादमें पड.कर एक-एक शब्दके अनेक अर्थ निकालता है.
The vipra (very knowledgeable person) focus on outward views and performs various rituals described in Ved. Shyam is not even in the dreams and does not know the mystery of Supreme Brahm.
To feed the bellies of entire family, shows cleanliness in the physical body and indulging in grammar debates and interpretes each word with different colors of meaning (spends time in meaningless endeavor)

अब कहो काके छुए, अंग लागे छोत।
अधम तम विप्र अंगे, चंडाल अंग उदोत।।२०

अब कहो, किसके स्पर्शसे छूत लगती है ? वस्तुतः ब्राह्मणका शरीर स्वच्छ होते हुए भी उसकी प्रकृति नीच है, इसलिए वह अधम है जबकि चण्डालका हृदय निर्मल होनेसे वह श्रेष्ठ है.
Now, Mahamati Prannathji asks to whom one touches one becomes untouchable?
The abject and ignorant being Vipra or illuminated being Chandaal?

पेहेचान सबोंको देह की, आतम की नहीं द्रष्ट।
वैराट का फेर उलटा, इन विध सारी सृष्ट।।२१

सबको नश्वर देहकी पहचान है. आत्म-दृष्टि किसीमें नहीं है. इस प्रकार वैराट (संसार) का यह सम्पूर्ण चक्र ही उलटा है तथा
सारी सृष्टिकी ऐसी ही उलटी रीति है.
Everyone acknowledges the physical body and no one is conscious about the soul. This is the topsy turvy of the cosmos, this is how the entire creation (from Baikunth to Pataal)

एक देखो ए अचंभा, चाल चले संसार।
जाहेर है ए उलटा, जो देखिए कर बिचार।।२२

देखो, सारी दुनियाँ कैसी आश्चर्यजनक चाल चल रही है ? यदि अन्तरमें विचार कर देखा जाए, तो पता चलेगा कि वस्तुतः यहाँकी रीति ही उलटी है.
See the amazing way the world acts, if you ponder over it and watch, it will be revealed that this is totally opposite to what it is seen.

सांचे को झूठा कहें, और झूठे को कहें सांच।
सो भी देखाऊं जाहेर, सब रहे झूठे रांच।।२३

यहाँ पर सत्य (आत्मा एवं परमात्मा) को असत्य और झूठे (स्वप्नवत् पिण्ड-ब्रह्माण्ड) को सत्य मानते हैं. यह भी मैं प्रत्यक्ष दिखाता हूँ कि इस असत्यमें लोग कैसे मग्न (एकरस) हो रहे हैं.
To what is the truth the world says false and what is false the world calls it true.
Now I will show how everyone is happy playing the falsehood.

आकार को निराकार कहे, निराकार को आकार।
आप फिरे सब देखें फिरते, असत यों निरधार।।२४

यहाँ पर लोग यथार्थ आकार (चिन्मय स्वरूप ब्रह्म) को निराकार कहते हैं और नश्वर पिण्ड-ब्रह्माण्डको साकार समझते हैं. कालके चक्रमें घूमने वालोंको सब कुछ घूमता हुआ ही दिखाई देता है. निश्चय ही यह सब सृष्टि असत्य है.
The one who has real form the worldly call it as formless and the one that is formless they call it as form. (The Supreme Brahm is truth, eternal, unchanging, imperishable has form, the worldly physical body which appears to have form actually is formless as all the elements that make it are formless earth, water, air, energy and akash. The body gets the form only because of the soul within.)
When one rotates, they see the others rotating(registering what appears as the truth) and thus what that is not true is established.

मूल बिना वैराट खडा, यों कहे सब संसार।
तो ख्वाब के जो दम आपे, ताए क्यों कहिए आकार।।२५

संसारके सब लोग ऐसा कहते हैं कि मूल आधारके बिना ही यह ब्रह्माण्ड खड.ा है. फिर स्वप्नके समान अस्तित्वहीन संसारको कैसे साकार कहा जाए ?
The cosmos stands without a source (originates from nothing) thus whole world says. Thus what appears like dream the one that is temporary, how can one call oneself the form.

आकार न कहिए तिनको, काल को जो ग्रास।
काल सो निराकार है, आकार सदा अविनास।।२६

कालके प्रवाहमें जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसे आकारवान् नहीं कहा जा सकता क्योंकि काल (नश्वर) स्वयं निराकार होता है जबकि आकार सदा अविनाशी होता है.
One cannot call it a form that becomes the morsel of tense (time). The one that is dependent on the time cannot be called form because the time(tense) is formless and the form is eternally imperishable.

जिन राचो मृगजल द्रष्टे, जाको नाम परपंच।
ए छल मायाएं किया, ऐसे रचे उलटे संच।।२7

इसलिए हे सुन्दरसाथजी ! ऐसे मृगजलके समान संसारमें मत फँसो, जिसका नाम ही प्रपञ्च (इन्द्रजाल) है. इस छलरूपिणी मायाने ही ऐसे उलटे सीधे खेल (ढाँचे) बनाए हैं.
Thus, O souls, do not involve in the sight of this mirage whose name is delusion(unfair affairs). The Maya(illusion) has created this deception and thus it is created a game of opposite (what is, is not and what is not, is)

प्रकरण १६
श्री कलश
(हिन्दुस्तानी)