हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

कठिन निपट विकट घाटी प्रेमकी

कठिन निपट विकट घाटी प्रेमकी,
त्रबंक बंकों सूरों किनों न अगमाए।
धार तरवार पर सचर सिनगार कर,
सामी अंग सांगा रोम रोम भराए।।२

प्रेमका मार्ग निश्चय ही बड.ा विकट तथा कठिन है. इस मार्गमें कर्म, उपासना और ज्ञाानके तीन मोड. हैं. इस लिए बडे.-बडे. ...शूरवीरों (तपस्वी, ज्ञाानी) द्वारा भी इस मार्ग पर चला नहीं जाता. तलवारकी धारके समान तीक्ष्ण इस मार्ग पर शील, सन्तोष, धैर्य, क्षमा, दयारूपी शृङ्गार (कवच) धारण कर प्रवेश करो. सामनेसे शरीरके रोम रोमको बींधने वाले (निन्दा, उपालम्भके वचनरूपी) तीक्ष्ण नोंकवाले भाले भी चुभते हैं.

This path is very difficult to tread. There are three forks in this path (karma, worship,wisdom), many bold and courageos people have tried but have failed. The path is sharp like the edge of a sword and one has to walk over it fully equipped with skills (patience, forgiving, surrendering the self) and must be ready to confront the attacks that will hurt every pores. (The attacks are discourage, obstucles, dissuading people, criticism etcs.) The moment when you find people attacking you about your spirituality when you are sincerly trying to be closer to God, they will first let you as if nothing serious, then they will dissuade you, they will criticize, they will blame you for all the troubles that they are facing, then they will want you to prove them you are right, they will start calling you fake etcs. Get ready to suffer all this pain and agony that will hurt your whole being.)

सागर नीर खारे लेहेरें मार मारे फिरें,
बेटों बीच बेसुध पछाड खावें।
खेलें मछ मिलें गलें ले उछालें,
संधों संध बंधे अंधों यों जो भावे।।३

यह जीव मोहसागरकी काम,क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि खारी लहरोंकी थपेडें. खाता हुआ जन्म-मृत्युरूपी चक्रमें पड.कर थक जानेके बाद विभिन्न सम्प्रदायरूपी द्वीपोंमें आश्रय लेता हुआ बेसुध होकर भटकता है. जिस प्रकार बड.ी मछली छोटी मछलीको निगल जाती है, उसी प्रकार ये सम्प्रदायवादी लोग भी स्वर्ग वैकुण्ठ आदिका प्रलोभन देकर सामान्य जनको अपनी ओर खींचते हैं. इस प्रकार झूठे प्रलोभनमें बँधे हुए अल्पज्ञा लोग उसी सम्प्रदायको श्रेष्ठ मानते हैं.

दाहो दसे दसों दिस सबे धखें,
लाल झाला चलें इंड न झलाए।
फोड आकास फिरे सिर सिखरों,
ए फलंग उलंघ संग खसम मिलाए।।४

दसों दिशाओं (दसों इन्द्रियों) में काम, क्रोध, लोभ, मोहादि अग्निकी ज्वाला धधक रही है. उसकी लाल ज्वाला इस ब्रह्माण्डमें समा नहीं पा रही है. यह ज्वाला आकाशको चीरकर वैकुण्ठ तक पहुँची है एवं इस संसारसे छलाङ्ग लगाकर वैकुण्ठको भी लाँघकर शून्य निराकारसे पार परमात्मासे मिला देती है.

घाट अवघाट सिलपाट अति सलबली,
तहां हाथ ना टिके पपील पाए।
वाओ वाए बढे आग फैलाए चढे,
जलें पर अनल ना चले उडाए।।५

प्रेमरूपी मार्ग (घाट) अत्यन्त विषम (अवघाट) है. उस पर हाथ (सुरता) भी नहीं टिकता और चींटीके पैर (मन) भी नहीं ठहर सकते. इच्छा तथा तृष्णासे भरे हुए पवनके चलने पर काम, क्रोधादिकी अग्नि और धधकती है. उससे आत्मारूपी पक्षीके प्रेम (इश्क) तथा विश्वास (ईमान) रूपी पंख जल जाते हैं. जिससे वह न तो चल सकता है और न ही उड. सकता है.

पेहेन पाखर गज घंट बजाए चल,
पैठ संकोड सुई नाके समाए।
डार आकार संभार जिन ओसरे,
दौड चढ पहाड सिर झांप खाए।।६

शील, सन्तोषरूपी कवच पहनकर वेद कतेबके ज्ञाानरूपी घण्टे बजाते हुए निर्भय होकर हाथीकी चालसे चलो. नम्रता, गरीबीके द्वारा शरीरको समेटकर सुईके छेदके समान सूक्ष्म प्रेमकी संकड.ी गलीमें प्रवेश करो. धनीके चरणोंमें स्वयंको सर्मिपत करनेमें पीछे मत हटो. पहाड.के समान ऊँचे वैकुण्ठ, शून्य, निराकारको पार कर परमधाममें छलाङ्ग लगाओ.

बोहोत बंध फंद धंध अजूं कै बीच में,
सो देखे अलेखे मुख भाख न आवे।
निराकार सुंन पार के पार पीउ वतन,
इत हुकम हाकिम बिना कौन आवे।।7

इस संसारमें इन्द्रियोंके बन्धन, कर्मकाण्डके फन्दे तथा अज्ञाानकी अनेक उलझनें दिखाई देतीं हैं किन्तु मुखसे उनका वर्णन नहीं हो सकता. अपने पियाका धाम निराकार, शून्यके पार अक्षर तथा उससे भी परे है. उन परब्रह्म परमात्मा (हाकिम) की आज्ञााके बिना यहाँ पर कौन आ सकता है ?

मन तन वचन लगे तिन उतपन,
आस पिया पास बांध्यो विस्वास।
कहे महामति इन भांत तो रंग रति,
दै पियाएं आग्या जाग करूं विलास।।८

'पिया निश्चय ही आएँगे' इस आशाके साथ मेरे मन, तन, वचन और विश्वास बँधे हुए हैं. महामति कहते हैं, मैं इस प्रकार धनीके प्रेममें मग्न हूँ कि सद्गुरुकी आज्ञाासे जागृत होकर प्रियतम धनीके साथ आनन्द विलास करूँ.
प्रकरण ६ सनंध

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