हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Divine Intelligence

निज बुध भेली नूर में, आग्या मिने अंकूर।
दया सागर जोस का, किन रहे न पकरयो पूर।।१
तारतमका प्रकाश और अक्षरब्रह्मकी मूलबुद्धि एकाकार होकर श्री धनीजीकी आज्ञाासे इन्द्रावतीके हृदयमें अङ्कुरित हुई. अक्षरातीत ब्रह्मके आवेशके साथ अवतीर्ण दयाके सागरका प्रवाह किसीसे भी पकड.ा नहीं जा सकता.
The intelligence of the self(soul residing in Paramdham) united with the cosmic consciousness of the creator Akshar by the mercy and command of the Lord sprouted in Indrawati’s heart. The inspiration and the ocean of grace and mercy no one can contain it completely(it is overwhelming)
ए लीला है अति बडी, आइया इंड मांहें।
कै हुए कै होएसी, पर किन ब्रह्मांडों नांहें।।२
परमधामकी यह लीला अति महत्त्वपूर्ण है, जो इस ब्रह्माण्डमें जागनी लीलाके रूपमें प्रकट हुई है. भूतकालमें ऐसे कई ब्रह्माण्ड बने और भविष्यमें भी बनेंगे परन्तु यह लीला अन्य किसी ब्रह्माण्डमें न हुई है और न ही होगी.
This leela is extremely important which is played in this universe. Many already happened and many will happen but never in any universe/cosmos this ever took place.
ए अगम अकथ अलख, सो जाहेर करें हम।
पर नेक नेक प्रकास ही, जिन सेहे न सको तुम।।३
इन अगम, अकथ तथा अप्रकट लीलाओंको हम प्रकट कर रहे हैं, किन्तु इनको धीरे धीरे ही प्रकाशित कर रहे हैं. अन्यथा इन्हें तुम एक साथ सहन (सुन) नहीं कर पाओगे.
This which cannot be comprehended, never said before, never revealed that is being revealed by us. But the illumination will grow gradually(will be revealed slowly to entire universe), because the world will not be able to tolerate it.
जो कबूं कानों ना सुनी, सो सुनते जीव उरझाए।
ताथें डरती मैं कहूं, जानूं जिन कोई गोते खाए।।४
जो बात कभी कानोंसे नहीं सुनी है, उसे सुनते ही जीव उलझनमें पड.ेगा. इसीलिए मैं कहते हुए सङ्कोच करता हूँ कि कोई व्यर्थमें गोते न खाए.
What is never heard before such when heard will completely baffle the life-force and that is why I am worried(afraid) for those who will unnecessarily be confused.
ना तो सब जाहेर करूं, नाहीं तुमसों अंतर।
खेंच खेंच तो केहेती हूं, सो तुमारी खातर।।५
अन्यथा मैं तुम्हारे सामने सब कुछ एक ही बार प्रत्यक्ष कर देता, मैं तुम्हारे साथ कोई अन्तर नहीं रखता. तुम्हारे लिए ही मैं सोच-विचार कर कहता हूँ.
Neither everything I will reveal, nor I will keep any secret(hide and discriminate between you and I), carefully I am speaking only for your benefit.
तुम दुख पाया मुझे साल ही, अब सुख सब तुम हस्तक।
दिया तुमारा पावहीं, दुनियां चौदे तबक।।६
तुमने अभी तक जो दुःख प्राप्त किए हैं, उनसे मुझे भी कष्ट हो रहा है, इसलिए अब सभी सुख तुम्हारे हाथमें सौंप दिए हैं. यहाँ तक कि चौदह लोकोंकी दुनियाँ भी तुम्हारे दिए हुए सुख ही प्राप्त कर पाएगी.
When you are in pain, it bothers me and now all the bliss I am bestowing in your hand and through you the entire 14 lokas will gain this bliss.
अजूं केहेती सकुचों, पर बोहोत बडी है बात।
सोभा पाई तुम याथें बडी, जो पिया वतन साख्यात।।7
अभी भी यह सब कहते हुए मुझे सङ्कोच हो रहा है, किन्तु यह बात सचमुच बहुत बड.ी है. तुमने तो इससे भी बड.ी शोभा प्राप्त की है क्योंकि संसारको मुक्ति देनेके सामर्थ्यके साथ साथ तुम्हें अपने प्रियतम धनीके परमधामका भी अनुभव हो गया है.
Still with hesistantation I am saying, this is a really important matter.
You have received a great splendour along with beloved Lord and abode.
इंड अखंड भी जाहेर, किए जागनी जोत।
अब सुंन फोड आगे चली, जहां थे इंड पैदा होत।।८
जागनी लीलामें तारतमकी इस अखण्ड ज्योतिने व्रज, रास आदि अखण्ड ब्रह्माण्डको भी प्रकट कर दिया. अब शून्य मण्डल पारकर यह ज्योति वहाँ तक पहुँची, जहाँसे यह जगत उत्पन्न होता है.
The perishable and imperishable,indivisible abode is revealed by the flame of awakening.
The light has pierced the (nothingness blackhole) and gone beyond from where the universes are created!
सोभा इन मंडल की, क्यों कर कहूं वचन।
सो बुध नूर जाहेर करी, जो कबूं सुनी न कही किन।।९
मैं इन वचनोंसे इस अखण्ड मण्डलकी शोभाका वर्णन कैसे करूँ ? आज तक जिसको किसीने कहा या सुना तक नहीं था, उस शोभाको तारतम ज्ञाानके प्रकाश और अक्षरब्रह्मकी जागृत बुद्धिने इस जगतमें प्रकट कर दिया है.
The splendour of this indivisible/imperishable abode how can I describe(have no words)? Never before heard is revealed by the cosmic enlightened mind.
रास वरनन भी ना हुआ, तो अक्षर वरनन क्यों होए।
कही न जाए हद में, पर तो भी कहूं नेक सोेए।।१०
इन सांसारिक शब्दोंके द्वारा रासका भी वर्णन नहीं हो सका, तो अक्षर धामकी लीलाका वर्णन कैसे हो सकता है ? इस क्षर ब्रह्माण्डमें बेहद लीलाका वर्णन नहीं किया जा सकता, फिर भी मुझे थोड.ा-सा कहना है.
The Raas was also not described well then how can they describe Akshar? These cannot be spoken in the perishable world still I will speak little bit.(Not everything is revealed)
जोगमाया तो माया कही, पर नेक न माया इत।
ख्वाबी दम सत होवहीं, सो अक्षर की बरकत।।११
योगमायाको माया कहा गया है किन्तु इसके अन्तर्गत रास मण्डलमें मायाका लेश मात्र भी नहीं है. अक्षरब्रह्मकी जागृत बुद्धिमें इतना सामर्थ्य है कि उससे स्वप्न जगतके जीव अखण्ड हो जाते हैं.
In Jogmaya there is word maya (illusion) but there was not even a trace of maya there. The dream creations can be made real by the grace of Creator Akshar.
ताथें कालमाया जोगमाया, दोऊ पल में कै उपजत।
नास करे कै पल में, या चित थिर थापत।।१२
अक्षर ब्रह्मके एक पल मात्रमें योगमाया तथा कालमाया द्वारा र्नििमत ऐसे अनेक ब्रह्माण्ड उत्पन्न होते हैं. ऐसे कई ब्रह्माण्डोंका वे पल भरमें नाश कर देते हैं और कितनोंको अपने चित्तमें धारण कर अखण्ड कर लेते हैं.
Infinite universes like Kaalmaya and Jogmaya are created in a single moment and destroyed many in a moment and many he takes it in his heart (makes imperishable)!
तहां एक पलक ना होवहीं, इत कै कलप वितीत।
कै इंड उपजे होए फना, ऐसे पल में इन रीत।।१३
अक्षर धाममें एक पल भी नहीं हुआ होता इतनेमें संसारमें कई कल्प व्यतीत हो जाते हैं. इस प्रकार अक्षर ब्रह्मके एक पलमें ऐसे कई ब्रह्माण्ड उत्पन्न होकर लय हो जाते हैं.
There not even a moment is passed and here many eons pass. Many universes are created and destroyed, all in a moment such is the way.
जागते ब्रह्मांड उपजे, पाव पल में अनेक।
सो देखे सब इत थें, विध विध के विवेक ।।१
अक्षरब्रह्म जागृत अवस्थामें पाव पलक (पलकके चौथाई समय) में अनेक ब्रह्माण्ड उत्पन्न करते हैं. उन सबको हम तारतम ज्ञाानके प्रकाशमें यहींसे देख रहे हैं.
All the dream creations are created in wakeful state in fraction of a moment. All these we are able to witness from here by our using our intelligence.
ए लीला है अति बडी, द्रष्टें उपजे ब्रह्मांड।
ए खेल खेलें नित नए, याकी इछा है अखंड ।।१५
अक्षरब्रह्मकी यह लीला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है. उनकी दृष्टिमात्रसे अनेक ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति हो जाती है. वे नित्य नइंर् (बाल) लीलाएँ करते हैं. उनकी इच्छा भी अखण्ड होती है.
These leelas (sports) of Akshar Brahm are very important by mere sight the universes are created. He plays new games and his desires are imperishable.

ए मंडल है सदा, जाए कहिए अक्षर।
जाहेर इत थें देखिए, मिने बाहेर थें अंतर ।।१६
यह मण्डल सदा रहनेवाला (शाश्वत) है जिसे अक्षरधाम कहा गया है. अक्षर ब्रह्म तथा उनके धामकी लीलाओंका रहस्य तारतम ज्ञाान द्वारा यहींसे स्पष्ट देखा जा सकता है.
This abode is eternal where Akshar resides. By this revelations, see from here(perishable world earth) the inside, outside and within of this place.
उतपन देखी इंड की, ना अंतर रती रेख।
सत वासना असत जीव, सब विध कही विवेक ।।१7
इसमें लेश-मात्र भी सन्देह नहीं है कि तारतम ज्ञाानके द्वारा मैंने इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति जान ली और विवेकपूर्वक यह भी कहा कि जगतके जीव असत् हैं और ब्रह्मवासनाएँ सत् हैं.
Witnessed the creation of this universe and I have not hidden from you a trace of knowledge. The true (astral) soul and perishable jeev(life force), all I have said with greater intelligence.
मोह उपज्यो इतथें, जो सुंन निराकार।
पल मीच ब्रह्मांड किया, कारज कारन सार।।१८
अक्षर ब्रह्मके (अव्याकृत) द्वारा मोहतत्त्वकी उत्पत्ति हुई जिसे शून्य, निराकार भी कहा गया है. अक्षरब्रह्मने ब्रह्मात्माओंके लिए निमेष मात्रमें इस मायावी खेलकी रचना की.
The water of ignorance(unconsciousness- not knowing the soul) is created from here that is what called formless and nothingness(blackhole), in a moment created the universe to to show the souls the game of creation.
मोह अग्यान भरमना, करम काल और सुंन।
ए नाम सारे नींद के, निराकार निरगुन।।१९
मोह, अज्ञाान, भ्रम, कर्म, काल तथा शून्य ये सब निद्राके ही नाम हैं. इनको निराकार, निर्गुण भी कहा जाता है.
The unconsciousness, ignorance, confusion, action(karma),time and nothingness all these are the components of slumber of formless and qualityless.
मन पोहोंचे इत लों, बुध तुरिया वचन।
उनमान आगे केहेके, फेर पडे मांहें सुन ।।२०
यहीं तक मन, बुद्धि, चित्त तथा वाणी पहुँचती है. ज्ञाानी जन इससे आगेका वर्णन अनुमान द्वारा करते हैं और पुनः शून्य-निराकारमें आकर रुक जाते हैं.
The desire,mind(intelligence), state of enlightened and words reach here and beyond this there is only guessing and then again land back in the nothingness.
जो जीव होसी सुपन के, सो क्यों उलंघे सुन ।
वासना सुंन उलंघ के, जाए पोहोंचे अक्षर वतन ।।२१
जो जीव स्वयं स्वप्न द्वारा ही उत्पन्न हुए हैं, वे शून्य निराकारको किस प्रकार लाँघ सकते हैं ? ब्रह्मात्माएँ शून्यको लाँघकर अविनाशी धामको प्राप्त करतीं हैं.
The jeev (life force) of dream, cannot cross the nothingness, only the astral body of the soul will cross and will reach the abode of Akshar.
ए सबे तुम समझियो, वासना जीव विगत।
झूठा जीव नींद ना उलंघे, नींद उलंघे वासना सत ।।२२
हे ब्रह्मात्माओ ! ब्रह्मवासना तथा नश्वर जगतके जीवोंका विवरण इस प्रकार समझ लो. झूठे जीव नींदको लाँघकर आगे नहीं जा पाएँगे. सत्य आत्माएँ ही भ्रमरूपी निद्राको पार कर सकेंगी.
O celestial souls, you understand all these what is vaasana(astral body) and jeev(life force). The jeev is false and cannot cross the unconsciousness, only the true vaasana crosses the unconsciousness.
सुपने नगरी देखिए, तिन सब में एक रस।
आपै होवे सब में, पांचों तत्व दसों दिस।।२३
जिस प्रकार स्वप्न द्रष्टा इस जगतमें स्वप्नकी नगरीको देखता हुआ उन सभी दृश्योंमें स्वयं एक रस विद्यमान रहता है, दसों दिशाओंमें तथा पाँचों तत्त्वों द्वारा र्नििमत सभी वस्तुओंमें वह स्वयं रूपायित होता है (इसी प्रकार अक्षरब्रह्मके द्वारा यह जगतरूप स्वप्न देखा जा रहा है).
How you see the dream, where you fine one self in all.
You are in all in five elements and 10 directions (The dream is projection of your mind which never leaves away from you).
तिनमें भी दोए भांत है, एक वासना दूजे जीव।
संसा न राखूं किनका, मैं सब जाहेर कीव।।२४
संसारके इस स्वप्नके अन्दर भी दो प्रकारके जीव हैं, एक तो वासना (आत्मा) द्रष्टा है तथा दूसरे (जीव) दृश्यमान नाटकके पात्र है. इस विषयमें किसीका संशय शेष न रहे, इसलिए इसे और स्पष्ट कर देता हूँ.
In this dream world there are two types of living one is vaasana(astral body of the real soul) and second is jeev the life force of dream.
I will not keep any doubts and will reveal and explain it to you.
देखो सुपनमें कै लड मरे, सबे आपे पर ना दुखात।
जब देखे मारते आपको, तब उठे अंग धुजात।।२५
देखो, स्वप्न देखनेवाला स्वप्नमें कई लोगोंको झगड.ते हुए देखता है. वह स्वयं ही सम्पूर्ण दृश्योंमें रूपायित हुआ है किन्तु उस समय उसे किसी भी प्रकारके दुःखका अनुभव नहीं होता. परन्तु जब उसी स्वप्नमें स्वयं उसे ही कोई मारने पीटने लगे तो डरसे कम्पायमान होता हुआ स्वप्नसे जागृत होता है (इसी प्रकार ब्रह्मात्माएँ स्वप्नके संसारका भयावह खेल देखकर स्वयं परमधाममें जागृत होंगी किन्तु स्वप्नके जीव स्वप्नकी भाँति वहीं मिट जाएँगे).
In the dream you see many people fighting with one another but it not affect you but inside the dream when you see, you are being hurt then you tremble and wake up immediately.
वासना उतपन अंग थें, जीव नींदकी उतपत।
कोई ना छोडे घर अपना, या विध सत असत।।२६
वासनाएँ श्री राजजीके अङ्गसे उत्पन्न हुईं हैं और जीव निद्रा द्वारा उत्पन्न हुए हैं. इस प्रकार दोनों (वासना तथा जीव) अपना-अपना घर (उद्गमस्थान) नहीं छोड.ते हैं. सत्य वासनाओं तथा असत्य जीवोंकी यही वास्तविकता है.
The vasaana(astral) is created from the real body of the soul and jeev(life force) is created from the dream. None will leave its abode thus will determine the truth and false.
ब्रह्मांड चौदे तबक, सब सत का सुपन।
इन द्रष्टांतें समझियो, विचारो वासना मन।।२7
यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा इसके चौदह लोक सभी सत्स्वरूप अक्षरब्रह्मका ही स्वप्न है. इसी दृष्टान्तके द्वारा अपने अन्तर्मनसे वासनाका महत्त्व समझना चाहिए.
The universe of 14 plains of existence are all the dreams of the true creator. You can understand and ponder over from this citation.
सुपन सत सरूप को, तुम कहोगे क्यों कर होए।
ए विध सब जाहेर करूं, ज्यों रहे न धोखा कोए।।२८
तुम कहोगे कि सत्स्वरूप अक्षर (जो जागृत अवस्थामें है) को स्वप्न कैसे आया ? इस विषयमें भी सविस्तार समझाऊँगी ताकि किसीको भी किसी प्रकारका सन्देह न रहे.
The dream of true form how can that be you will ask? I will reveal you all this so there will be any confusion/doubts.
एक तीर खेंच के छोडिए, तिन बेधाए कै पात।
सो पात सब एक चोटें, पाव पल में बेधात।।२९
पेड.के पत्तोंको एकत्रित करके यदि उन पर तीर फेंका जाय तो एक साथ कई पत्ते बींध जाते हैं. वे सब पत्ते एक ही चोटमें मात्र पाव पल (एक पलके चौथाई भाग) में बींध जाते हैं.
If you target one arrow it can pierce many leaves and you will find all the leaves bind together are pierced in the fraction of moments.
पर पेहेलें पात एक बेध के, तो दूजा बेधाए।
यामें सुपन कै उपजे, बेर एती भी कही न जाए।।३०
परन्तु बींधते समय प्रथम तो एक पत्तेको बींधकर वाण दूसरे पत्ते तक पहुँचता है. एक पत्तेसे दूसरे पत्ते तक पहुँचनेमें जितना समय लगता है, उससे भी कम समयमें अक्षरब्रह्म द्वारा कई ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो जाते हैं.
The time taken to pierce one leaf and approaches the second, in less than this time many creations of dream are created.
तो बेर एक की कहा कहूं, इत हुआ कहां सुपन।
पर सत ठौर का असत में, द्रष्टांत नहीं कोई अन।।३
इतने कम समयमें अक्षरब्रह्मको स्वप्न हुआ यह कैसे कह सकते हैं ? किन्तु अखण्ड भूमिकाको समझानेके लिए इस झूठे संसारमें कोई अन्य दृष्टान्त भी तो नहीं है.
How can the dream of Akshar be so less one can ask but speaking about the true abode in the false I cannot cite any example.
इत भेलें रूह नूर बुध, और आग्या दया परकास।
पूरूं आस अक्षर की, मेरा सुख देखाए साख्यात।।३२
मेरे हृदयमें श्री श्यामाजीकी आत्मा, तारतम (नूर), अक्षरकी जागृत बुद्धि (बुध), श्री राजजीकी आज्ञाा और कृपाका पूर्ण प्रकाश है. अब मैं इन सबके द्वारा मेरे घरका सुख दिखाकर परमधामकी लीला देखनेकी अक्षरब्रह्मकी इच्छाको पूर्ण कर दूँ.
Here unites in my soul(Shyama),light of Supreme knowledge(tartam gyaan), the cosmic mind of Akshar, will/command of the Lord, the grace and enlightening(realisation of the self). I will fulfill the desire of Akshar by showing the bliss of the real abode and supreme.
इत भी उजाला अखंड, पर किरना न इत पकराए।
ए नूर सब एक होए चल्या, आगूं अक्षरातीत समाए।।३३
तारतम ज्ञाानके अखण्ड प्रकाशसे यह संसार भी प्रकाशित हुआ है किन्तु इस दिव्य ज्ञाानकी किरणें यहाँ समा नहीं रहीं हैं. उपर्युक्त बुद्धि, आज्ञाा, दया सबके सब एक साथ अपना प्रकाश फैलाते हुए अक्षरातीत धाममें जाकर समा जाते हैं.
By the light of the supreme wisdom of indivisible true abode there is enlightening but one cannot contain the rays. These enlightening (all five described ahead)bound together enter into the heart of Aksharateet Paramdham.
ए नूर आगे थें आइया, अक्षर ठौर के पार।
ए सब जाहेर कर चल्या, आया निज दरबार।।३४
अक्षरसे परे अक्षरातीतके धामसे ही तारतमका प्रकाश इस संसारमें आया है. सम्पूर्ण क्षर ब्रह्माण्ड, अक्षरधाम और परमधाम इन सभी भूमिकाओंको प्रकट कर यह फिर अपने स्थान परमधाममें ही समा जाएगा.
This enlightening has come from beyond, beyond the abode of Akshar. All these are revealed and now we are at the palace of the self(where Indrawati resides).
वतन देख्या इत थें, सो केते कहूं परकार।
नूर अखंड ऐसा हुआ, जाको वार न काहूं पार।।३५
ब्रह्मात्माओंने इस तारतम ज्ञाानके प्रतापसे संसारमें रहते हुए भी परमधामके दर्शन किए, इसका विवरण कहाँ तक दूँ ? ज्ञाानका ऐसा अखण्ड प्रकाश फैला जिसका कोई पारावार ही नहीं है.
Living in this world, I saw my abode, how can I describe how it is!
The imperishable enlightening is such there is neither I can describe this side nor the other side (unbound and unlimited at all end)
किए विलास अंकूर थें, घर के अनेक परकार।
पिया सुंदरबाई अंग में, आए कियो विस्तार।।३६
परमधामके सम्बन्धी होनेके कारण हम ब्रह्मात्माओंने इस जगतमें रहते हुए भी परमधामके अनेक प्रकारके अखण्ड सुखोंमें विलास किया. सुन्दरबाई (सद्गुरु) के स्वरूपमें स्वयं प्रियतम परमात्माने मेरे हृदयमें विराजमान होकर धाम लीलाका विस्तार किया.
Due to relationship, we enjoyed in many ways the unlimited(abundance) sport of original home. Beloved Lord came in the soul of Sundarbai and spread the revelations.
ए बीज बचन दो एक, पिया बोए किओ परकास।
अंकूर ऐसा उठिया, सब किए हांस विलास।।३7
सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजी महाराजने मेरे हृदयमें तारतम ज्ञाानके बीज वचन बोकर ही यह प्रकाश किया है. उसका ऐसा अङ्कुर फूटा (तारतम वाणी प्रकट हुई) कि इसके द्वारा सभीने परमधामके अपार सुखोंका अनुभव किया.
By the word of seeds, beloved Lord sowed and enlightened. The seed sprouted so well (tartam vani) all are able to enjoy the union with the beloved.
सूर ससी कै कोट कहूं, नूर तेज जोत परकास।
ए सबद सारे मोहलों, और मोह को तो है नास।।३८
यदि मैं सद्गुरु प्रदत्त तारतम ज्ञाानरूपी प्रकाशको करोड.ों सूर्य-चन्द्रमाके प्रकाशकी उपमा दूँ, तो भी ये सब शब्द तो मोहतत्त्व तक ही पहुँचते हैं और मोहतत्त्वका तो नाश हो जाता है.
The flame, light and speed of Millions of sun and moon if I mention all these are description of the creation of (moh) unconsciousness which are all perishable!
अब इन जुबां मैं क्यों कहू, निज वतन विस्तार।
सबद ना कोई पोहोंचहीं, मोह मिने हुआ आकार।।३९
अब मैं इस मायावी जिह्वा द्वारा अखण्ड घर परमधामके विस्तारका वर्णन किस प्रकार करूँ ? क्योंकि संसारकी वाणीका एक भी शब्द उस अखण्ड घर (दिव्य ब्रह्मपुर धाम) तक नहीं पहुँचता है और हमारा यह आकार (शरीर) भी तो मोहके अन्तर्गत ही है.
How can I describe from this tongue, the vastness of abode of the self? No words ever can reach it (cannot describe it) as all the form over here is of unconsciousness(moh).
मोह सो जो ना कछू, इनसे असंग बेहद।
सत को असत ना पोहोंचहीं, या विध ना लगे सबद।।४०
मोहतत्त्व तो कुछ भी नहीं है अर्थात् वह नाशवान है और बेहदभूमि इस मोह तत्त्वसे भिन्न है. इसलिए असत्य वस्तु सत्य तक कभी नहीं पहुँचती. इस प्रकार इस झूठी जिह्वाके वचन अखण्ड परमधाम तक नहीं पहुँच पाते.
Moh Unconsciousness is nothing(it perishes the moment consciousness comes) hence the unlimited imperishable has nothing in common with it, The unlimited imperishable behad is totally unlike the untrue moh unconsciousness.
The false cannot reach the truth and there no words can reach.
बेहद को सबद ना पोहोंचहीं, तो क्यों पोहोंचे दरबार।
लुगा न पोहोंच्या रास लों, इन पार के भी पार ।।४१
जब ये शब्द बेहद भूमिका तकका ही वर्णन नहीं कर सकते तो ब्रह्मधामका कैसे वर्णन कर सकेंगे ? जब रासके वर्णनमें ही एक अक्षर भी सक्षम न हुआ तो फिर परमधाम तो उसके पार (अक्षरधाम) से भी पार है.
The words cannot reach the unlimited (words cannot describe it) then how can we reach that palace? Akshar could not even describe one sport Raas very well then we are talking about the beyond of beyond.
कोट हिसे एक लुगे के, हिसाब किया मिहीं कर।
एक हिसा न पोहोंच्या रास लों, ए मैं देख्या फेर फेर।।४२
मैंने एक-एक अक्षरके करोड.ों सूक्ष्मभाग बनाकर अति सूक्ष्मरूपसे हिसाब किया और बार-बार देखा भी किन्तु उन सूक्ष्म भागोंमेंसे कोई एक भाग भी रास लीलाके वर्णनके लिए उपयुक्त नहीं पाया.
I will divide my one word in millions and calculated it microscopically and not even a single piece could touch the jogmaya brahmand of Raas and pondering about it deep in my heart I have seen this.
Trying to speak the Jogmaya brahmand of Raas, there is no word which can make express it. Mahamati is trying to speak the unspeakable.
मैं अंगे रंगे अंगना संगे, करूं आप अपनी बात।
अब बोलते सरमाऊं, ताथें कही न जाए निध साख्यात।।४३
श्री श्यामाजी स्वरूप सद्गुरु धनी इस प्रकार कहते थे कि मैं अपनी अङ्गना इन्द्रावतीके सङ्गमें रङ्गा हुआ हूँ. हम परस्पर अपनी (अखण्ड घर परमधामकी) ही बातें करते हैं. परन्तु संसारमें ऐसा कहते हुए (परमधामकी-निजानन्दकी बातें करते हुए) मुझे लज्जाका अनुभव होता है. इसलिए संसारमें साक्षात् निधि कही नहीं जा सकती.
Now I will color my soul with my soul mate and will speak about ourselves. Now while speaking I am blushing and am not able to say the treasures of abode completely.
वतन बातें केहेवे को, मैं देखती नहीं कोई काहूं।
देखों तो जो होए दूसरा, नहीं गांऊ नांऊ न ठांऊ।।४४
परमधामकी बात करने (सुनाने) के लिए मैं किसीको भी योग्य नहीं देख रहा हूँ. ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त अन्य किसीका अस्तित्व हो तभी न दिखाई दे. अन्य जीवोंका तो न नाम है, न गाँव है, न ही कोई स्थान है अर्थात् वे सब तो अस्तित्वहीन एवं नाशवान् हैं.
To speak about the abode, I do not see anybody else who are capable. Whoever I see is but the other one who has neither residence nor name nor abode(nothingness).
जहां नहीं तहां है कहे, ए दोऊ मोह के वचन।
ताथें विस्तार अंदर, बाहेर होत हों मुन।।४५
जहाँ (इस नाशवान संसारमें) कुछ भी नहीं है वहाँ परमात्मा हैं, ऐसा कहा जाता है. वस्तुतः संसारमें परमात्मा 'है' कहना अथवा 'नहीं है' कहना ये दोनों वचन मोहके हैं (क्योंकि जब संसार ही अस्तित्व हीन है तो उसको लेकर विवाद ही क्यों ?) इसलिए मैंने अपने अन्तर हृदयमें ही इसका विस्तार किया है और बाहर कहनेके लिए मैं मौन रह जाता हूँ अथवा मैं सुन्दरसाथके अन्दर ही इस वाणीका विस्तार करता हूँ और बाहरके लोगोंके लिए मौन रहता हूँ.
Where there is nothing, they say it is and both are the words of unconsciousness, hence inside my heart I have spread it but outside I am silent.
एता भी मैं तो कह्या, जो साथ को भरम का घेन।
वचन दो एक केहेके, टालूं सो दूतिया चेन।।४६
इतने वचन भी मैंने इसलिए कहे हैं कि सुन्दरसाथ पर माया (अज्ञाान) का नशा चढ.ा हुआ है. इस प्रकारके दो चार वचन कहकर मायाके द्वैतभावको मिटा दूँ.
This much also I have spoken because my soulmates(sath) are surrounded by confusion and unconsciousness. By saying one or two words, I will end the dualism (establish unity consciousness).
साथ के सुख कारने, इन्द्रावती को मैं कह्या।
ताथें मुख इन्द्रावती के, कलस सबन का भया।।४7
सुन्दरसाथको परमधामके अखण्ड सुख प्रदान करनेके लिए मैंने ही इन्द्रावतीको यह सब कहनेका आदेश दिया. इसलिए इन्द्रावतीके मुखारविन्दसे प्रस्फुटित यह तारतम वाणी समस्त शास्त्रोंके ज्ञाान मन्दिर पर कलशके रूपमें प्रतिष्ठित हुई.
For the bliss of sundarsath, I told to Indrawati, thus spoken by Indrawati these words are supreme wisdom of all the scriptures.
प्रकरण २४ श्री कलश ग्रन्थ (हिन्दुस्तानी)

Maha means greater or higher mati means Intelligence. This intelligence is not coming from human mind. There are five components in this.
Shyama Maharani's soul (all brahmshristi are part of this soul) realisation that we are soul and not body.
Indrawati's Nij budhi (Indrawati who is a soul residing in paramdham, individual intelligence of her self )
Noor Budhi (Mind of the Creator Akshar aka Cosmic Mind) Intelligence of Akshar the creator of this cosmos, connecting to this mind one will know the entire science of cosmos.
Tartam Gyan brought by Shyama This is the knowledge given by Supreme Lord Himself to Shyama in this world. This knowledge is about the Supreme, His souls, His abode , His activities, His leela etcs. and the cause of creation.
Finally, the inspiration of the Supreme Brahm Shri Krishna Raaj. jahan josh tahan mehar, jahan mehar tahan hak hukum.
Inspiration of the Supreme (Josh) and Will of the Supreme. When all these five are together, the action committed are for the benefit of entire living being and thus called master of the living force.
Thus Mahamati Prannath speaks it is with greater intelligence the master of the living is revealing the secrets in order to bring bliss in this universe. 'sukh shital karoon sansaar'