हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

सो सब खातर सोहागनी, तूं अरथ करसी अब !

एह विध मोहे तुम दई, अपनी अंगना जान।
परदा बीच टालने, ताथें विरहा परवान।।१२

हे मेरे प्रियतम धनी ! इस प्रकार आपने मुझे अपनी प्यारी अङ्गना जानकर अपना विरह दिया. निश्चय ही हमारे बीच पड.े हुए मायाके आवरणको हटानेके लिए ही आपने अपना विरह दिया है.
प्रकरण ५ कलश हिंदी

विरह को प्रकास-राग आसावरी
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एह बात मैं तो कहूं, जो केहेने की होए।
पर ए खसमें रीझ के, दया करी अति मोहे।।१

परब्रह्म परमात्माके मिलनकी बात यदि इन सीमित शब्दों द्वारा कहने योग्य होती तो मैं अवश्य कहता परन्तु सद्गुरु प्रसन्न होकर दया पूर्वक यह सब कहलवा रहे हैं.
I would say this had this matter be told or if I could express! But the Master being pleased grace me extremely!
सुनियो बानी सोहागनी, दीदार दिया पिया जब।
अंदर परदा उड गया, हुआ उजाला सब।।२

हे सुहागिनी ब्रह्मात्माओ ! यह बात ध्यान पूर्वक सुनो. जब मुझे धनीने दर्शन दिए तबसे मेरे हृदयसे अज्ञाानका पर्दा हट गया और हृदयमें ज्ञाानका प्रकाश छा गया.
Listen O the bride of Lord, when beloved Lord appeared all the veils of within got lifted and the enlightened the whole self or universe(all)!
Supreme Lord gave the knowledge about the creation and the creator Akshar and the leela of Aksharateet and also explained Dhani Devachandraji about him that the soul within is Shyama and Sundari bai of Aksharateet Paramdham who has come to bring home all other soul from Paramdham.
पिया जो पार के पार हैं, तिन खुद खोले द्वार।
पार दरवाजे तब देखे, जब खोल देखाया पार।।३

जो अक्षरसे भी परे अक्षरातीत परमात्मा हैं उन्होंने ही स्वयं आकर परमधामके द्वार खोल दिए. पारके द्वार मुझे तब प्रत्यक्ष हुए जब उन्होंने इस प्रकार खोलकर दिखाए.
The beloved who is from beyond of beyond (beyond all the 14 lokas lies that is nirakaar formless qualityless, nothingness darkness beyond it Akshar beyond is Aksharateet, the Lord of Aksharateet appeared before Dhani Devachandraji ), He Himself opened the door. The door of the beyond could be seen only when He showed it.
कर पकर बैठाए के, आवेस दियो मोहे अंग।
ता दिन थें पसरी दया, पल पल चढते रंग।।४

मेरे सद्गुरु धनीने मेरा हाथ पकड. कर मुझे अपने पास बैठाया और अपना आवेश प्रदान किया. उस दिनसे उनकी अनुकम्पा दिन प्रतिदिन बढ.ने लगी और पल-पल प्रेमका रङ्ग चढ.ता गया.
He held my hand and energized my soul with His inspiration. From that day the grace of Lord spread, rising and immersing in the grace and love every moment.
हुई पेहेचान पीउसों, तब कह्यो महामति नाम।
अब मैं हुई जाहेर, देख्या वतन श्री धाम।।५

जब मेरी पहचान सद्गुरु धनीसे हुई तब उन्होंने मुझे महामतिकी संज्ञाा प्रदान की. अब मैं अपने धनीकी अङ्गनाके रूपमें प्रकट हो गई और मुझे अखण्ड परमधामका साक्षात्कार भी हो गया.
Identifying and recognizing the beloved Lord, then said now you are named Mahamati (greater intelligence). Now I am revealed and witnessed original abode Shri Paramdham.
Shyama avtaar Dhani Devachandraji got the enlightenment, Akshar's mind, tartam gyaan from the Supreme Lord Himself.
बात कही सब वतन की, सो निरखे मैं निसान।
प्रकास पूरन द्रढ हुआ, उड गया उनमान।।६

मेरे सद्गुरुने मुझे परमधामकी सारी बातें बताईं. मैंने वहाँके एक-एक चिह्न (निशान) को देखा. तारतम ज्ञाानका पूर्ण प्रकाश हृदयमें उतर आनेसे ब्रह्म विषयक सभी कल्पनाएँ उड. गइंर्.
Lord narrated me all the details of our original abode (vatan) and I inspected all the signs (checked the facts from scriptures) and the light of knowledge became firm and all the assumptions vanished.
आपा मैं पेहेचानिया, सनमंध हुआ सत।
ए मेहेर कही न जावहीं, सब सुध परी उतपत।।7

तब मैंने स्वयंको पहचाना और परब्रह्म परमात्माके साथका मेरा सम्बन्ध भी सत्य सिद्ध हुआ. सद्गुरुकी इस कृपाका वर्णन किया नहीं जा सकता. उनकी कृपासे ही मुझे सृष्टिकी उत्पत्तिकी सभी सुधि हुई है.
First I knew myself (soul identity) and then the relationship became the true one. One cannot express the grace, as I got the consciousness of creation!
मुझे जगाई जुगतसों, सुख दियो अंग आप।
कंठ लगाई कंठसों, या विध कियो मिलाप।।८

मेरे धनीने अपना आवेश देकर मुझे युक्तिपूर्वक जागृत किया और अखण्ड सुख दिया. मुझे गले लगाकर (मेरे हृदयमें आकर) वे मुझमें एकरूप हो गए.
He awakened me with lots of tactics and bestowed bliss to my soul and embracing me thus united with me. First awakened, then granted the bliss to the soul, accepted the soul fully thus got united.
खासी जान खेडी जिमी, जल सींचिया खसम।
बोया बीज वतन का, सो ऊग्या वाही रसम।।९

मेरे हृदयरूपी धरतीको उर्वरा जानकर उन्होंने उस पर ज्ञाानरूपी हल चलाया और उसमें प्रेमका जल सींचकर परमधामका तारतम ज्ञाानरूपी बीज बो दिया, जो अपनी गरिमाके अनुरूप उगने लगा.
Knowing the fertile field you ploughed -imparted the tartam gyaan, and Lord irrigated with water - love of the Master watered it, and sowed the seeds of original abode(desire to unite with the Supreme) and thus sprouted the desired product of Paramdham (the one who acts like in Paramdham).
बीज आतम संग निज बुध के, सो ले उठिया अंकूर।
या जुबां इन अंकूर को, क्यों कर कहूं सो नूर।।१०

वह तारतम ज्ञाानरूपी बीज मेरा आत्म-बल और अक्षरब्रह्मकी बुद्धिका संग पाकर परमधामके मूल सम्बन्धके रूपमें अंकुरित हुआ. अब मैं अपनी इस नश्वर जिह्वासे उस अंकुर (सम्बन्ध) एवं दिव्य प्रकाशका वर्णन कैसे करूँ ?
The seed (tartam gyaan) along with the soul and intelligence of the self sprouted. With this tongue, how can I describe enlightening of this sprout.
ना तो ए बात जो गुझ की, सो क्यों होवे जाहेर।
सोहागिन प्यारी मुझ को, सो कर ना सकूं अंतर।।११

अन्यथा ये सब रहस्यमयी (गुह्य) बातें कैसे प्रकट की जा सकतीं हैं ? किन्तु परब्रह्म परमात्माकी सुहागिनी आत्माएँ मुझे अति प्रिय हैं, इसलिए मैं उनसे किसी भी प्रकारका अन्तर नहीं रख सकता.
All these are secrets/mysteries how can it be revealed? The brides of Lord are very dear to me, I cannot maintain the difference. (Shyama got the bliss while other souls are suffering in ignorance)! She needs to share the coming and meeting with the Supreme to all souls and thus granting them the same understanding,bliss and the union.
नेक कहूं या नूर की, कछुक इसारत अब।
पीछे तो जाहेर होएसी, तब दुनी देखसी सब।।१२

इसलिए अब मैं इस तारतम ज्ञाानके प्रकाशका सङ्केत मात्र वर्णन करता हूँ. बादमें तो यह सब ओर फैल जाएगा तब सारी दुनियाँ इस प्रकाशको देखेगी.
I will tell about this enlightening in brief and some cues (signs) later everything will be revealed and all the worldly will also witness. Tartamsagar granth is for Brahmshristi who will bring faith in it as soon as they get these cues, jeev shristis won't believe so easily, they will need solid proofs and evidences and this will be gradually revealed and in the end all the secrets and mysteries of the body-self, creations, Akshar and Aksharateet will be known to all in scientifically where there will be no place for any doubts.
ए जो विरहा वीतक मैं कही, पिया मिले जिन सूल।
अब फेर कहूं प्रकास थें, जासों पाइए माएने मूल।।१३

अभी तक मैंने इस प्रकार सद्गुरुके विरहपूर्वक खोजकी बात तथा उन्हें हुए श्रीकृष्णके साक्षात्कारका वृत्तान्त कहा. अब मैं पुनः सद्गुरु द्वारा प्रदत्त तारतम ज्ञाानके प्रकाशसे कहता हूँ, जिससे मूल अर्थ (परमधामका सम्बन्ध) स्पष्ट हो जाएँगे.
The agony of separation that I narrated, by which pain the beloved is met. Now again I will say with light of knowledge you will get the meaning of the original.
ए विरहा लछन मैं कहे, पर नाहीं विरहा ताए।
या विध विरह उदम की, जो कोई किया चाहे।।१४

मैंने इस प्रकार विरहके लक्षण बता दिए. उन्हें विरहिणीके सम्पूर्ण लक्षण मत समझ लेना. प्रिय मिलनकी चाहसे जो विरहमें निमग्न होना चाहते हैं उनके लिए करने योग्य प्रयत्नोंका ही यहाँ निदर्शन हुआ है.
These are symptoms of pain of separation not the real agony itself. How to get the pain of separation I will explain for those who really desire it.
विरहा सुनते पीउ का, आहि ना उड गई जिन।
ताए वतन सैयां यों कहें, नाहिन ए विरहिन।।१५

अपने प्रियतम धनीका वियोग सुनते ही जिस विरहिणीके प्राण न निकल जाएँ, उसके लिए परमधामकी आत्माएँ यही कहेंगी कि यह तो सच्ची विरहिणी नहीं है.
By listening to the pain of separation of beloved, those who are not able to surrender immediately, to those the celestial souls do not call them the true one, suffering the pain of separation.
जो होवे आपे विरहनी, सो क्यों कहे विरहा सुध।
सुन विरहा जीव ना रहे, तो विरहिन कहां थे बुध।।१६

जो स्वयं विरहिणी (विरहसे व्याकुल) होती है, उसमें विरहका वर्णन करनेकी सुधि ही कहाँ रहती है ? अपने प्रियतमके विरहकी बात सुनते ही उसके प्राण निकल जाते हैं, तो फिर उसमें कुछ कहनेकी बुद्धि ही कहाँ रहेगी ?
Those who are suffering from the burning desire to unite with the Supreme and going through the pain how can they be conscious of being in pain? Listening to the pain of separation the jeev ego does not live, then how can you call yourself to be suffering?
The ignorance which is body-sense consciousness ends as soon as one believes one is a soul! And thus the ego no more exists!
पतंग कहे पतंग को, कहां रह्या तूं सोए।
मैं देख्या है दीपक, चल देखाऊं तोए।।१7

यदि कोई पतङ्गा दूसरे पतङ्गेसे जाकर यह कहने लगे, अरे ! तू कहाँ सो रहा था. मैं तो दीपक देखकर आया हूँ. चल, तुझे भी उसके दर्शन कराऊँ.
A moth comes and says another moth that here you are sleeping, I saw the light-fire, let me show it to you.
के तो ओ दीपक नहीं, या तूं पतंग नाहे।
पतंग कहिए तिनको, जो दीपक देख झंपाए।।१८

तब दूसरा पतङ्गा कहता है, तुमने जो देखा है या तो वह दीपक नहीं है या फिर तू पतङ्गा नहीं है. पतङ्गा तो उसे कहा जाता है जो दीपकको देखते ही तत्क्षण झपट पड.े और जल मरे.
The other moth says, either what you saw was not real fire or you are not the real moth. Seeing the fire, the real moth jumps into it that is the real moth.
पतंग और पतंग को, जो सुध दीपक दे।
तो होवे हांसी तिन पर, कहे नाहीं पतंग ए।।१९

जो पतङ्गा दीपक देखकर दूसरे पतङ्गेको उसकी सुधि देने लगे तो उस पर अवश्य हँसी होगी. सब यही कहेंगे कि यह तो पतङ्गा ही नहीं है.
A moth if informs other moths about the fire, then that moth will be laughed as this is not the authentic moth! The moth is naturally drawn towards the fire and jumps into it, how can it go around informing others?
दीपक देख पीछा फिरे, साबित राखे अंग।
आए देवे सुध और को, सो क्यों कहिए पतंग।।२०

जो दीपककी ज्योतिको देखकर भी अपनी देहको यथावत् रखता हुआ लौट आए एवं दूसरोंसे उस दीपककी चर्चा करने लगे तो उसे पतङ्गा कैसे कहा जाए ?
After seeing the fire, the moth cannot back off and maintain the self and come and discuss about it to others how can one call it a moth?
जब मैं हुती विरह में, तब क्यों मुख बोल्यो जाए।
पर ए बचन तो तब कहे, जब लई पिया उठाए।।२१

जब तक मुझे धनीका विरह था तब तक मुखसे कोई भी शब्द कैसे निकल सकते ? किन्तु ये वचन तो मैंने तब कहे, जब मेरे सद्गुरु धनीने अपना आवेश देकर मुझे विरहसे उबार लिया.
While suffering the pain of separation not a single word I could utter. These words could be said only when Master accepted me. I am able to narrate this by the inspiration of the beloved Lord.
ज्यों ए विरहा उपज्या, ए नहीं हमारा धरम।
विरहिन कबहूं ना करे, यों विरहा अनूकरम।।२२

यह विरह जिस प्रकार उत्पन्न हुआ है यह हमारे धर्मके अनुकूल नहीं है. विरहिणी आत्माको कभी भी इस प्रकार अनुक्रम पूर्वक (क्रमशः) विरह उत्पन्न नहीं होता.
The suffering and pain of separation arises in the above mentioned way, this is not our duty, the one going through pain of suffering will never follow this.
विरहा नहीं ब्रह्मांड में, बिना सोहागिन नार।
सोहागिन अंग पीउ की, वतन पार के पार।।२३

वास्तवमें सुहागिनी आत्माओंके अतिरिक्त इस संसारमें अन्य किसीको भी विरह नहीं हो सकता क्योंकि सुहागिनी आत्माएँ ही परब्रह्म परमात्माकी अङ्गनाएँ हैं. उनका घर क्षर, अक्षरसे भी परे अक्षरातीत परमधाम है.
But the pain of separation none in the universe ever experiences except the brides of the Supreme. The brides are the parts and parcel of the beloved Lord whose original abode is beyond of beyond.
अब नेक कहूं अंकूर की, जाए कहिए सोहागिन।
सो विरहिन ब्रह्मांड में, हुती ना एते दिन।।२४

अब मैं थोड.ी-सी बात परमधामका मूल अंकुर धारण करनेवाली आत्माओंके विषयमें कहूँ, जो परब्रह्म परमात्माकी सुहागिनी कहलातीं हैं. ये विरहिणी आत्माएँ इस ब्रह्माण्डमें आज तक नहीं आई थीं.
Now let me tell briefly about the sprout that is called bride of the Supreme, the sufferer of the pain of separation none had before in this universe. The souls from Paramdham had never visited the universe before.
सोई सोहागिन आइयां, पिया की विरहिन।
अंतरगत पिया पकडी, ना तो रहे ना तन।।२५

परब्रह्म परमात्माकी वही सुहागिनी आत्माएँ उनका विरह लेकर इस जागनीके ब्रह्माण्डमें आइंर् हैं. उनके हृदयमें विराजकर प्रियतम परमात्माने उन्हें पूर्ण सहारा दिया है अन्यथा उनका शरीर ही नहीं रह पाता.
The same bride of the Supreme have come along with the pain of separation of the beloved. The beloved Lord sustains them from within otherwise their body cannot withstand this pain.
ए सुध पिया मुझे दई, अन्दर कियो प्रकास।
तो ए जाहेर होत है, गयो तिमर सब नास।।२६

सद्गुरु धनीने तारतम ज्ञाानके प्रकाशसे मेरे हृदयको आलोकित कर मुझे इस प्रकारकी सुधि दी. इसलिए यह अखण्ड सुख प्रकट हो रहा है और अज्ञाानरूपी अन्धकारका नाश हो गया है.
This consciousness, my beloved Lord bestowed upon me and enlightened me within thus all this is revealed and all the darkness is destroyed. Supreme Lord gave the consciousness about the self and enlightened within(अन्दर)!
From the time of Ved till date people were engaged in outward rituals to worship!
First know the self (soul), use its intellegence and seek within the heart to find the Supreme! The enlightening must be within this is revealed which ends all the ignorance/darkness! प्यारी पिया सोहागनी, सो जुबां कही न जाए।
पर हुआ जो मुझे हुकम, सो कैसे कर ढंपाए।।२7

सुहागिनी आत्माएँ परब्रह्मको कितनी प्यारी हैं, उसका वर्णन इस जिह्वासे नहीं हो सकता, किन्तु मेरे धनीने मुझे ब्रह्मात्माओंको जागृत करनेका जो आदेश दिया है अब वह कैसे ढका रह सकता है ?
How dear are the brides of the beloved the tongue cannot say it but since it is the will of the Lord to reveal then how can it be hidden?
अनेक करहीं बंदगी, अनेक विरहा लेत।
पर ए सुख तिन सुपने नहीं, जो हमको जगाए के देत।।२८

इस जगतमें बहुत-से साधक उपासनाएँ करते हैं और बहुत-से विरह भी करते हैं. परन्तु ब्रह्मानन्दका यह अलौकिक सुख उन्हें स्वप्नमें भी अप्राप्य है, जिसे हमारे सद्गुरु हम ब्रह्मसृष्टियोंको जागृत कर दे रहे हैं.
Many ways people have prayed and also accepted the pain of separation but this bliss they cannot attain even in dream that waking us up we received (the bliss we received in awakened mind). (Satguru Dhani Devachandraji only gave tartam mantra to Brahmshristi)
छलथें मोहे छुडाए के, कछू दियो विरहा संग।
सो भी विरहा छुडाइया, देकर अपनों अंग।।२९

इस छलरूपी संसारके मोहसे छुड.ाकर मेरे सद्गुरु धनीने मुझे विरहका थोड.ा-सा अनुभव करवाया. फिर विरहके पश्चात् अपना आवेश देकर तथा मेरे हृदय मन्दिरमें स्वयं विराजमान होकर इस विरहसे भी मुक्त कर दिया.
By giving little bit of pain of separation, he detached me from the illusion and deception. And then he removed the pain of separation by granting his self(soul) to me. The Supreme Lord united with Shyama-Sundarbai and resided in her heart.
Shyama-Sundarbai instructing to Indrawati!
अंग बुध आवेस देए के, कहे तूं प्यारी मुझ।
देने सुख सबन को, हुकम करत हों तुझ।।३०

उन्होंने अपना आवेश (अङ्ग), तथा जागृत बुद्धि (तारतमज्ञाान) देकर मुझे यह कहा कि तुम मेरी प्यारी अङ्गना हो. सब ब्रह्मात्माओंको सुख पहुँचानेके लिए मैं तुझे आदेश देता हूँ.
He gave the soul, intelligence, inspiration and said you are very dear to me. To grant bliss to all, I ordain it to you. Shyama-Sundarbai telling to Indrawati.
दुख पावत हैं सोहागनी, सो हम सह्यो न जाए।
हम भी होसी जाहेर, पर तूं सोहागनियां जगाए।।३१

सुहागिनी आत्माएँ दुःख पा रहीं हैं उनका वह दुःख मुझसे सहा नहीं जाता. मैं स्वयं भी तुम्हारे अन्तरमें प्रकट हो जाऊँगा, परन्तु तुम ब्रह्मात्माओंको जागृत करना.
The brides of beloved are suffering, this I cannot bear, I will also be revealed but you awaken the brides of the beloved.
सिर ले आप खडी रहो, कहे तूं सब सैयन।
प्रकास होसी तुझ से, द्रढ कर देखो मन।।३२

मेरे आदेशको शिरोधार्य कर सब ब्रह्मसृष्टियोंको जाग्रत करनेके लिए तुम खड.े हो जाओ. तुमसे ही तारतम ज्ञाानका प्रकाश पूरे ब्रह्माण्डमें फैलेगा, इस बातको अपने मनमें दृढ.ता पूर्वक धारण करो.
Take the responsibility of waking up all brides on your head, through you the entire universe will be enlightened hence be firm and determine your mind.
तोसों ना कछू अन्तर, तूं है सोहागिन नार।
सत सबद के माएने, तूं खोलसी पार द्वार।।३३
इसलिए मैंने तुमसे कोई अन्तर नहीं रखा है. तुम तो सुहागिनी अङ्गना हो. धर्मग्रन्थोंके सत्य वचनोंका गूढ.ार्थ खोलकर तुम ही सबको अखण्ड परमधामकी पहचान करा सकोगे.
There is no distinction between you and me as you are the bride of the Supreme. The true words of scriptures, it is you who will decifer, and open the doors of the beyond.
जो कदी जाहेर ना हुई, सो तुझे होसी सुध।
अब थें आद अनाद लों, जाहेर होसी निज बुध।।३४

जो रहस्यमय ज्ञाान आज तक प्रकट नहीं हुआ है, उसकी भी सुधि तुम्हें होगी. अबसे अक्षरब्रह्मकी जागृत बुद्धि और तारतम ज्ञाानके द्वारा आदि अनादि (क्षर ब्रह्माण्डसे लेकर अक्षर अक्षरातीत तक) का ज्ञाान तुमसे प्रकट होगा.
What was never revealed before, will be known through you. From begining of the creation to the begininglessness, will be revealed through the intelligence of your self(soul).

ए बातें सब सूझसी, काहूं अटके नहीं निरधार।
हुकम कारन कारज, पार के पारै पार।।३५

इन सभी रहस्योंकी सूझ तुम्हें होगी. निश्चय ही तुम्हें कहीं अटकना (रुकना) नहीं पड.ेगा. परब्रह्म परमात्माके आदेशसे ही संसारकी सृष्टिका कारण (प्रेम सम्वाद) और कार्य (सृष्टि रचना) दोनों बने हैं. बेहदसे परे अक्षर और उससे परे अक्षरातीत परमधामका ज्ञाान तुम्हें ही सुलभ हुआ है.
All the matter will be understood, all problems will be solved, there will be no hurdles. The cause of the creation and its working are by the will of Supreme beloved Lord who is beyond of beyond.

चौदे तबक एक होएसी, सब हुकम के परताप।
ए सोभा होसी तुझे सोहागनी, जिन जुदी जाने आप।।३६

परब्रह्मकी आज्ञााके प्रतापसे चौदहलोकोंके प्राणी एकरूप हो जाएँगे अर्थात् सबको अखण्ड मुक्ति मिलेगी. हे सुहागिनी (इन्द्रावती) ! इसकी सम्पूर्ण शोभा तुझे मिलेगी. तुम स्वयंको मुझसे भिन्न मत समझना.
All the 14 lokas/tabak will become one by the splendor of the will of the beloved. This glory will be given to you O bride of the beloved, as you are not different from me.
जो कोई सबद संसार में, अरथ ना लिए किन कब।
सो सब खातर सोहागनी, तूं अरथ करसी अब।।३7

संसारमें जितने भी धर्मग्रन्थ हैं उनका गूढ.ार्थ आज तक किसीने ग्रहण नहीं किया. सब ब्रह्मात्माओंके लिए तुम उनका रहस्य स्पष्ट करोगे.
All the scriptures in this world, no one knew the true meaning of it all this are for the brides of beloved, you will give the meaning now. (Shyama Sundarbai instructing this to Indravati)
तूं देख दिल विचार के, उड जासी सब असत।
सारों के सुख कारने, तूं जाहेर हुई महामत।।३८

तुम अपने दिलमें विचार कर देखो, अब तुम्हारे द्वारा दुनियाँका समस्त अज्ञाान (असत् भाव) नष्ट हो जाएगा. सबको अलौकिक सुख देनेके लिए ही तुम महामतिके रूपमें प्रकट हुई हो.
You analyze and think deeply from the heart then all the untruth will be destroyed. For the bliss of all the souls, you are revealed as Mahamat (greater intelligence).
सारों के सुख कारने, तूं जाहेर हुई महामत। Now, Indrawati is revealed as Mahamat.
पेहेले सुख सोहागनी, पीछे सुख संसार।
एक रस सब होएसी, घर घर सुख अपार।।३९

सबसे पहले ब्रह्मात्माओंको सुख प्राप्त होगा फिर सारे संसारमें यह वितरित होगा. जब पूरी दुनियाँ एकरस हो जाएगी, तब घर-घरमें अपार सुख होगा.
First the bliss the brides of Supreme will experience later whole world will experience the bliss. All will unite in the love of beloved and every house will experience the infinite bliss.
ए खेल किया जिन खातर, सो तूं कहियो सोहागिन।
पेहेले खेल देखाए के, पीछे मूल वतन।।४०

यह खेल जिन ब्रह्मात्माओंके लिए बनाया है, उन्हें तुम कहना कि पहले उन्हें मायाके खेल दिखाकर फिर मूल घर परमधाममें जागृत किया जाएगा.
This game of creation took place for the brides of the beloved Lord, first enjoy this world and later go back to the original abode.
अंतर सैयों से जिन करो, जो सैयां हैं इन घर।
पीछे चौदे तबक में, जाहेर होसी आखर।।४१

परमधामकी ब्रह्मात्माओंके साथ किसी भी प्रकारका अन्तर मत करना. पश्चात् अन्तिम समयमें तो यह ज्ञाान समस्त संसारमें फैल जाएगा.
Cannot treat the souls differently as these soul belong to this abode(Paramdham) (all will have the bliss that Shyama experienced), later in the end it will be revealed in all the 14 lokas.
तें कहे बचन मुखथें, होसी तिनथें प्रकास।
असत उडसी तूल ज्यों, जासी तिमर सब नास।।४२

तुम्हारे मुखसे निःसृत तारतम ज्ञाानके वचनोंके द्वारा संसारमें ज्ञाानका प्रकाश फैल जाएगा. जिससे असत्य वस्तु (अज्ञाान) रूईके रेशेकी भाँति उड. जाएगी और अज्ञाानरूप अन्धकार भी मिट जाएगा.
The words you are speaking, through you there will be enlightening , the false will vanish and all the darkness will be destroyed.
तूं लीजे नीके मायने, तेरे मुख के बोल।
जो साख देवे तुझे आतमा, तो लीजे सिर कौल।।४३

तुम स्वयं भी अपने मुखसे निःसृत वचनोंके गूढ. आशयको भली-भाँति आत्मसात् करना. जब तुम्हारी आत्मा इन वचनोंकी साक्षी दे, तभी इन वचनोंको शिरोधार्य कर अपनी (परस्पर जगानेकी) प्रतिज्ञााका अनुपालन करना.
You accept the meanings which will come through your mouth, when the soul witness the same, then take the responsibility of the vow.

खसम खडा है अंतर, जेती सोहागिन।
तूं पूछ देख दिल अपना, कर कारज द्रढ मन।।४४

जितनी भी ब्रह्मात्माएँ हैं उन सबके हृदयमें धामधनी विराजमान हैं. इसलिए तू अपनी अन्तरात्मासे पूछकर देख और अपने मनको दृढ.कर जागनीका कार्य कर.
The Supreme Lord is within in all those who are brides of beloved. You seek in your heart and do the job(awakening other souls) with firm mind.
आप खसम अजूं गोप हैं, आगे होत प्रकास।
उदया सूर छिपे नहीं, गयो तमर सब नास।।४५

आत्मा (आप) और परमात्मा (खसम) अभी तक प्रत्यक्ष नहीं हुए हैं. भविष्यमें तारतम ज्ञाानके द्वारा उनका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाएगा. तारतम ज्ञाानरूपी सूर्य उदय हो चुका है, अब यह छिपेगा नहीं इसीसे सारा अन्धकार (अज्ञाान) दूर हो जाएगा.
The self and the Supreme are still hidden but later it will be known. The rising sun cannot be hidden as all the darkness has gone and destroyed.
प्रकरण ९
कलश हिंदी