हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Can Dream and Reality unite?


लेहेरी सुख सागर की, लेसी रूहें अरस।
याके सरूप याको देखसी, जो हैं अरस परस।।१

परमधामकी ब्रह्मात्माएँ ही इन विशाल सागरोंकी सुखमयी तरङ्गोंके आनन्दका अनुभव कर सकतीं हैं. ये ही आत्माएँ अपने मूल स्वरूप (पर-आत्मा) को देख सकेंगी क्योंकि उनका पारस्परिक सम्बन्ध है.

ए जो सरूप सुपन के, असल नजर बीच इन।
वह देखें हमको ख्वाब में, जो असल हमारे तन।।२

ब्रह्मात्माओंके इस स्वप्नके स्वरूप पर भी सदैव परमधामके अखण्ड स्वरूप (पर-आत्म) की दृष्टि बनी रहती है. क्योंकि हमारी पर आत्मा इस नश्वर शरीरको स्वप्नमें देख रही है.

उन अंतर आंखें तब खुलें, जब हम देखें वह नजर।
अंदर चूभे जब रूह के, तब इतहीं बैठे बका घर।।३

पर-आत्माकी आँखें तभी खुलेंगी (उनकी स्वप्नावस्था तभी दूर होगी) जब हम जागृत होकर उनकी ओर देखेंगी. जब ब्रह्मात्माओंके हृदयमें अपना मूल स्वरूप अङ्कित होगा तब यहीं बैठे-बैठे परमधामका अनुभव होगा (परमधाममें जागृत हो जाएँगी).

सुरत उनों की हम में, ए जुदे जुदे हुए जो हम।
ए जो बातें करें हम सुपन में, सो करावत हक इलम।।४

यद्यपि हम इस स्वप्नवत् जगतमें अलग-अलग शरीर धारण कर बैठीं हैं तथापि पर-आत्माकी सुरता हमारे ऊपर ही लगी हुई है. इस स्वप्न जगतमें जो बातें कर रहीं हैं वह भी धामधनीका आदेश ही करवा रहा है.

इन विध हक का इलम, हमको जगावत।
इलम किल्ली हमको दई, तिनसे बका द्वार खोलत।।५

इस प्रकार धामधनी द्वारा प्रदत्त ब्रह्मज्ञाान (तारतमज्ञाान) हमें जागृत कर रहा है. धामधनीने सद्गुरुके रूपमें आकर हमें तारतम ज्ञाानरूपी कुञ्जी प्रदान की है जिससे परमधामके द्वार खुल जाते हैं.

बीच असल तन और सुपने, पट नीदैं का था।
सो नींद उडाए सुपना रख्या, ए देखो किया हक का।।६

परमधामके मूल शरीर (पर-आत्मा) और इस स्वप्नवत् जगतके स्वप्नके शरीरके मध्यमें अज्ञाानरूपी निद्राका आवरण पड.ा था. धामधनीने तारतम ज्ञाानके द्वारा निद्राके उस आवरणको तो दूर किया किन्तु स्वप्नको यथावत् बनाए रखा. यह धामधनीकी ही विचित्र लीला है.

ना तो नींद उडे पीछे सुपना, कबलों रेहेवे ए।
इन विध सुपना ना रहे, पर हुआ हाथ हुकम के।।7

अन्यथा नींदके उड. जाने पर यह स्वप्न कब तक बना रह सकता ? इस प्रकार यह स्वप्न नहीं रहना चाहिए किन्तु धामधनीके आदेशसे ही यह अभी तक टिका हुआ है.

हुकमें खेल देखाइया, जुदे डारे फरामोसी दे।
खेल में जगाए इलमें, अब हुकम मिलावे ले।।८

धामधनीके आदेशने ही यह खेल दिखाया है. उसीने अज्ञाानका आवरण डालकर इस खेलमें हमें अलग-अलग कर दिया है. यही आदेश हमें तारतम ज्ञाानके द्वारा खेलमें भी जागृत कर रहा है. अब यह (हम सभीको) मूलमिलावेका अनुभव कराएगा.

बात पोहोंची आए नजीक, अब जो कोई रेहेवे दम।
उमेदा तुमारी पूरने, राखी खसमें तुम हुकम।।९

अब परमधाममें जागृत होनेका समय निकट आ गया है. अभी जितने श्वास (समय) शेष रहे हैं उसमें भी तुम्हारी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेके लिए ही धामधनीके आदेशने तुम्हें इस प्रकार खेलमें रखा है.

जो रूहें अरस अजीम की, सो मिलियो लेकर प्यार।
ए बानी देख फजर की, सब हुजो खबरदार।।१०

जो परमधामकी ब्रह्मात्माएँ हैं वे पस्पर प्रेमपूर्वक मिलें. आत्म जागृतिके प्रभातकी यह वाणी सुनकर सभी सावचेत हो जाएँ.

अब फरामोसी क्यों रहे, जब खोल्या बका द्वार।
रूबरू किए हमको, तन असल नूर के पार।।११

जब पारके द्वार खुल गए हैं तब यह नींद कैसे रह सकेगी ? धामधनीने तो हमें तारतम ज्ञाानके द्वारा परमधामके मूलतन (पर-आत्मा) का प्रत्यक्ष अनुभव करवाया है.

बैठी थी डर जिनके, सब हिम मिल एक होए।
हुकम हक के कौल पर, उलट तुमको जगावे सोए।।१२

धामधनीके वियोगके भयकी जिस आशङ्कासे सभी ब्रह्मात्माएँ मूलमिलावेमें एक साथ मिलकर बैठी थंीं, अब वे ही धामधनी अपने वचनके अनुसार अपने आदेशके द्वारा तुम्हें जागृत कर रहे हैं.

ना तो सुपन के सरूप जो, सो तो खेलै को खैंचत।
सो हुकमें तुमें सुपना, हक को मिलावत।।१३

अन्यथा ये स्वप्नके स्वरूप तो स्वप्नवत् जगतके खेलकी ओर ही खींचते हैं. यह तो श्रीराजजीका आदेश ही है जो इस स्वप्नके तनमें भी श्रीराजजीके साथ तुम्हारा मिलन करा रहा है.

यों सीधी उलटीय से, कौन करे बिना इलम।
इत जगाए उमेदां पूरन कर, खैंचत तरफ खसम।।१४

अन्यथा तारतमज्ञाानके अतिरिक्त अन्य कौन-सा ज्ञाान परमधामसे विमुख आत्माओंको परमधामकी ओर उन्मुख कर सकता है ? यही ज्ञाान ब्रह्मात्माओंके मनोरथोंको पूर्ण कर उन्हें जागृत करते हुए धामधनीसे मिलनेके लिए प्रेरित करता है.

ए होत किया सब हुकम का, ना तो इन विध क्यों होए।
जाग सुपना मूल तन का, जगाए हुकम मिलावे सोए।।१५

धामधनीके आदेशसे ही यह सब हो रहा है अन्यथा इस प्रकार कैसे हो सकता है ? इस स्वप्नके शरीरसे सुरताको जागृत कर मूल शरीरके साथ मिलानेका कार्य धामधनीके आदेशसे ही सम्भव है.

सो सुध आपन को नहीं, जो विध करत मेहेरबान।
ना तो कै मेहेर आपन पर, करत हैं रेहेमान।।१६

परमकृपालु धामधनी हम पर कैसी अहैतुकी कृपा कर रहे हैं, इसकी हमें लेशमात्र भी सुधि नहीं है. अन्यथा धामधनी तो हम पर प्रतिपल कृपाकी ही वर्षा कर रहे हैं.

महामत कहे मेहेर हक की, रूहों आवे एक नजर।
तो तबहीं रात को मेट के, जाहेर करें फजर।।१7

महामति कहते हैं, यदि ब्रह्मात्माओंको धामधनीकी अहैतुकी कृपाका लेशमात्र बोध भी हो जाए तो उसी समय अज्ञाानरूपी रात मिटकर ज्ञाानका प्रभात हो जाएगा.
प्रकरण ३ marfatsagar