हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Sundarsath


तुम मांगी धनीपें करके खांत, ए जो धनिएं करी इनायत ।
याद करो सोई साइत, ए जो बैठके मांग्या जित ।।१९०

तुमने स्वयं इच्छा व्यक्त कर धामधनीसे इस खेलकी माँग की. धामधनीने भी तुम्हें अपनी अङ्गना समझकर तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण की है. इसलिए अब उस घड.ीको याद करो जब तुमने मूलमिलावेमें बैठकर यह खेल देखनेकी माँग की थी.
We desired for this game and Lord has mercifully granted us. Remember the same moment where sitting in the moolmilava we asked Lord to show us this game of illusion!

स्यामस्यामाजी साथ सोभित, क्यों न देखो अंतरगत ।
पीछला चार घड.ी दिन जब, ए सोई घडी है अब ।।१९१

वहाँ पर श्रीश्यामश्यामाजी तथा सखियाँ शोभायमान हैं. तुम इस दृश्यको अपनी अन्तरात्मासे क्यों नहीं देखते ? जब हमने खेल माँगा था उस समय चार घड.ी दिन शेष था, अब भी वही घड.ी है.
Why cannot you see from the eye of the soul the splendor of Shyam, Shyama and sundarsath? The time of the day where last 4 ghadi time is left and it is still the same time.... Not even a moment has passed!

याद करो जो कह्या मैं सब, नींद छोडो जो मांगी है तब ।
याद करो धनीको सरूप, श्रीस्यामाजी रूप अनूप ।।१९२

मैंने जो कुछ कहा है उसे अब याद करो, उस समय तुमने जो माँगा था उस नींद (माया) को त्याग दो. अब अपने धनीके स्वरूपको याद करो, श्रीश्यामाजीका स्वरूप अनुपम है.
Remember what I have said everything, let go this sleep which we begged at that time. Remember our Lord and Shri Shyamaji's beautiful swaroop (looks)!

याद करो सोई सनेह, साथ करत मिनों मिने जेह ।
सुख सैयां लेवें नित, अंग आतम जो उपजत ।।१९३

उस अलौकिक प्रेमका भी स्मरण करो जो सखियाँ परस्पर किया करतीं हैं. वहाँ पर एक आत्माके हृदयमें जो इच्छा उत्पन्न होती है उसका सुख सभी ब्रह्मात्माएँ नित्यप्रति प्राप्त करतीं हैं.
Remember the same affection which we had together and the bliss that we eternally experienced which originated from the soul.

रस प्रेम सरूप है चित, कै विध रंग खेलत ।
बुध जाग्रत ले जगावती, सुख मूल वतन देखावती ।।१९४

श्री राज श्यामाजीका प्रेम रस स्वरूप है. उसे हृदयङ्गम करो. परमधाममें तुम सभी आनन्दमयी क्रीड.ाएँ करतीं हो. इस प्रकार इन्द्रावती जागृत बुद्धिके द्वारा ब्रह्मात्माओंको जगाती है एवं उन्हें परमधामके अखण्ड सुख दिखाती है.
The nectar of love is our consciousness(chit) and various types of sport we play. Indrawati sakhi(the one whose paratam is in Paramdham) with the awakened mind of Akshar(cosmic consciousness-The mind of Akshar plays a key role in our intelligence) is waking you up to show the bliss of original abode.

प्रेम सागर पूर चलावती, संग सैयौं को भी पिलावती ।
पियाजी कहें इन्द्रावती, तेज तारतम जोत करावती ।।१९५

सद्गुरुकी आज्ञाानुसार इन्द्रावती प्रेमका प्रवाह चलाती है. सभी सखियोंको प्रेम रसका पान कराती है तथा तारतम ज्ञाानकी ज्योतिसे सभीकी अन्तरात्माको आलोकित करती है.
Indrawati the celestial soul residing in Paramdham is waving the ocean of nectar of love and also sharing it with all the other celestial souls (intoxicating them in the love of Lord). Our beloved Lord has say it is Indrawati who is enlightening the souls with the light of Tartam (tartam knowledge is the leela of Shyam, Shyama and sath and their sport of love in Paramdham this wisdom is brought by RoohAllah Shyama in Devachandraji) !

(It is Indrawati who is saying here (the love of Lord in Paramdham can be expressed only by her) please and giving the details of our original abode hence believe it as absolute truth)

तासों महामत प्रेम ले तौलती, तिनसों धाम दरवाजा खोलती ।
सैयां जाने धाममें पैठियां, ए तो घरहींमें जाग बैठियां ।।१९६

महामति इसी तारतम ज्ञानके द्वारा प्रेमकी तुलना करते हैं एवं उससे परमधामके द्वार खोलते हैं. तब सभी ब्रह्मात्माएँ परमधाममें प्रवेश कर रही अनुभव करतीं हैं. वस्तुतः वे तो अपने घरमें ही जागृत होकर बैठीं हुइंर् हैं.

Uniting with this understanding of love in paramdham and the consciousness of Akshar (jagrit budhi) -- Mahamati(the greater intelligence) can measure the love and with this will open the doors of Paramdham. Only the celestial souls are feeling they are entering the Paramdham but in fact they are residing there and getting awakened.

प्रकरण ३ parikrama


नाम मेरा सुनते, और सुनत अपना वतन।
सुनते मिलावा रूहों का, याद आवे असल तन।।४९

इन ब्रह्मात्माओंको मेरा नाम अथवा अपना घर परमधाम तथा वहाँ पर आत्माओंके मिलनकी बात सुनते ही अपने मूल स्वरूप (पर आत्मा) का स्मरण हो आएगा.
The celestial souls when they hear my name, their original abode and the union of souls in Paramdham they will remember their original real self.
प्रकरण १३ shri khilavat granth


एक ईमान दूजा इसक, ए पर मोमिन बाजू दोए ।
पट खोल पोहोंचावे लुदंनी, इन तीनों में दुनीपे न कोए ।।१८

ब्रह्मात्माओंको उड.ान भरनेके लिए एक ओर विश्वासका पङ्ख है तो दूसरी ओर प्रेमका पङ्ख है. इनके पास वह तारतम ज्ञान है जो अज्ञानके आवरणोंको दूर कर परमधामका अनुभव करवा सकता है जबकि नश्वरजगतके जीवोंके पास न प्रेम है, न विश्वास है और न ही इस प्रकारका ज्ञान है.
Faith and Love are the two wings of the celestial souls. The moment they open the holy book of wisdom like (Bhagawat, Quran,Tartamsagar) they experience the abode. The wordly people are missing all three faith,love and wisdom. (Even if they get hold of the book they cannot understand the mysticism and create confusions and divisions.)

ए दुनी चले चाल वजूद की, उमत चले रूह चाल ।
लिख्या एता फरक कुरानमें, दुनी उमत इन मिसाल ।।१९

नश्वर जगतके जीव शरीरके द्वारा (कर्मकाण्डके मार्ग पर) चलते हैं जबकि ब्रह्मात्माएँ आत्माकी रीतिसे चलतीं हैं. इस प्रकार कुरानमें नश्वर जगतके जीव एवं ब्रह्मात्माओंमें इतना अन्तर लिखा है.
The worldly people take the path of physical existence and take to rites and rituals. While the celestial souls realise the spiritual entity(soul). There is difference in these two beings.

कह्या दुनियां दिल मजाजी, सो उलंघे ना जुलमत ।
दिल अरस हकीकी मोमिन, ए कहे कुरान तफावत ।।२०

नश्वर जगतके जीवोंका हृदय भ्रमित है इसलिए वे शून्य-निराकारको पार कर आगे नहीं बढ. सकते जबकि ब्रह्मात्माओंका हृदय सत्य परमात्माका धाम कहा गया है. कुरानमें इन दोनोंमें यह अन्तर कहा गया है.
The mind of the worldly being (physical existence) is confused. Their desires also are physical and materialistic. They cannot achieve beyond the formless nothingness (Sunya, Nirakaar Niranjan). The world is miserable because of ego when one subdues the ego one experiences the peace (If you are walking on fire you are hurt when you leave the fire you will feel good but that is called relief not the supreme bliss)
But the heart of the celestial souls is the eternal abode as Supreme Brahm Shri Krishna of Aksharateet resides in their heart. Thus holy Quran distinguishes between the two beings.

इनमें रूह होए जो अरस की, सो क्यों रहे दुनीसों मिल ।
कौल फैल हाल तीनों जुदे, तामें होए ना चल विचल ।।२१

इस जगतमें जो परमधामकी आत्माएँ होंगी वे नश्वर जगतके जीवोंके साथ मिल कर कैसे रह सकेंगीं ? क्योंकि उन दोनोंके मन, वचन एवं कर्म तीनों ही भिन्न-भिन्न प्रकारके होंगे, जिनमें कोई परिवर्तन नहीं होगा.
The celestial souls in this world, who are from the Paramdham always long for the beloved Lord, how can they integrate with the beings who aspire for the worldly (physical and materialistic) pleasures. There is no relation between the speech, action and living of the worldly beings. The worldly say one thing, think and act another.
Where as, the celestial souls, the mind, speech and actions are corelated, they walk the talk and pursue the truth.

सरीयत करे फरज बंदगी, करे जाहेर मजाजी दिल ।
बका तरफ न पावे अरस की, ए फानी बीच अंधेर असल ।।३३

नश्वर जगतके जीव कर्मकाण्डके आधार पर औपचारिक पूजा-वन्दना करते हैं. उनका हृदय असत्यकी ओर उन्मुख होता है. इनको अखण्ड परमधामकी दिशा प्राप्त न होनेसे ये नश्वरताको ही सत्य समझ कर अज्ञाानरूप अन्धकारमें पड.े रहते हैं.
The worldly being follow the rituals and pray as a formality towards God. Their mind is restless. They strive towards name,fame and glory.
Their objective is to be recognised by others, they strive to rule in other's lives and do not know themselves.
Their desires are materialistic and physical. They cannot concentrate on the deeper meanings of the scriptures. They do not aspire for the eternal abode or the beloved Lord and live in the darkness of ignorance.

दिल हकीकी जो मोमिन, सो लें माएने बातन।
हक इलम इसक हजूरी, रूहें चलें बका हक दिन।।३४

ब्रह्मात्माएँ सत्यहृदया कहलातीं हैं वे ही धर्मग्रन्थोंके गूढ. रहस्योंको ग्रहण करतीं हैं. वे तारतम ज्ञाानरूपी ब्रह्मज्ञाानको प्राप्त कर प्रेमपूर्वक परब्रह...्म परमात्माकी सेवा करतीं हैं. ये ब्रह्मात्माएँ ब्रह्मज्ञाानके प्रकाशमें अखण्ड धामका मार्ग ग्रहण करतीं हैं.
The will of the Lord rules the heart of the celestial souls. They gain the understanding of the true meaning in the scriptures. With the light of the Lord as the Commander, wisdom, love and devotion these souls reach the abode of the Lord.
श्री कयामतनामा (छोटा)


क्यों न होए प्रेम इनको, जाके घर यह धाम ।
स्याम स्यामाजी साथ में, जाको इत विश्राम ।।१८

जिन ब्रह्मात्माओंका निवास ही अखण्ड परमधाममें है एवं जो स्वयं श्रीश्यामश्यामाजीके साथ वहाँ पर विश्राम करतीं हैं, उनके हृदयमें प्रेम कैसे अङ्कुरित नहीं होगा ?

क्यों न होए प्रेम इन को, जो बैठत पीउ के पास ।
निस दिन रामत रमूज में, होत न वृथा एक स्वास ।।३८

जो ब्रह्मात्माएँ सर्वदा धामधनीके सान्निध्यमें रहतीं हैं एवं उनके साथ ही हास-परिहास करती हुई एक श्वासको भी व्यर्थ जाने नहीं देतीं हैं, उनके हृदयमें प्रेम कैसे अङ्कुरित नहीं होगा.

महामत कहे मेहेबूबजी, अब दीजे पट उडाए।
नैना खोल के अंग भर, लीजे कंठ लगाए।।८४

महामति कहते हैं, हे धामधनी ! अब अज्ञाानरूपी आवरणको उड.ाकर हमारी आँखें खोल दीजिए एवं हमें प्रेमपूर्वक अपने गले लगा लीजिए.
प्रकरण ३९
shri parikrama


निन्दा स्तुति छोडके कहे यथार्थ बात ।
पक्षापक्ष गिने नहीं सो जानो तुम साथ ॥

श्री नवरंग स्वामी सुन्दरसागर में आज्ञा करते हैं कि निंदा और स्तुति दोनोंको छोडकर निष्पक्ष बातको ग्रहण करे, उसे सुन्दरसाथ जानो ।
Shri Navrang Swami in Sundarsagar says one who rejects both criticism and eulogy and always says what is truth and reality, on whom one can count on impartiality know such one as Sundarsath.

इतहीं जगात इत जारत, इत बंदगी परहेजी जान।
और आसिक न रखे या बिना, इतहीं होवे कुरबान।।८९
इन ब्रह्मात्माओंका दान-पुण्य, तीर्थयात्रा, पूजा-उपासना तथा साधना ही धामधनीके श्रीचरण हैं. वे इनके बिना अपने शरीरको ही धारण नहीं कर सकतीं. वे तो इन्हीं चरणोंमें सर्मिपत हैं.
खाना दीदार इनका, यासों जीवें लेवें स्वास।
दोस्ती इन सरूप की, तिनसे मिटत प्यास।।९०
अपने प्रियतम धनीके दर्शन ही इनका आहार है. इसीके लिए वे श्वास लेती हुई जीवित हैं. धामधनीकी प्रीति (मित्रता) से ही इनकी प्यास मिटती है.
हक खिलवत जाहेर करी, इत सेजदा हैयात।
इतहीं इमाम इमामत, इतहीं महंमद सिफात।।९१
ऐसे दिव्य परमधामकी अन्तरङ्ग बैठक (मूलमिलावा) का वर्णन मैंने प्रकट रूपमें किया है. यह शाश्वत भूमिका सर्वदा वन्दनीय है. वस्तुतः गुरुका गुरुत्व इसीमें है. इसके लिए ही रसूल मुहम्मदने ब्रह्मात्माओंकी प्रशंसा की है.
sagar प्रकरण ५