हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Nijananda Sampraday aka Shri Krishna Pranami Dharma

चौदह लोक को तारने वाला धर्म श्री कृष्ण प्रणामी शुद्ध सनातन धर्म निजानंद संप्रदाय है। यह किसी धर्म का एक शाखा नहीं बल्कि सभी धर्म इसके शाखा हैं। सभी धर्म के ग्रंथो के रहष्य इस में जाहेर हुआ है।
Shri Krishna Pranami Sudh Sanatan Dharma Nijanand Sampraday is truly Universal Spiritual and all religions are its sects and not vice versa!
Pranam means total submission
Dharm means the rightful duty of the soul
Sanatan eternal
Shudh pure
ISLAM is derived from the Arabic root "SALEMA": peace, purity, submission and obedience. In the religious sense, Islam means submission to the will of God and obedience to His law.
mahamad = shri krishna deen = true spirituality islaam means submission which shri krishna pranami sudh sanatan dharm

कुरान का खुलासा महंमद दीन इसलाम श्री खुलासा वाणी महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन जो बची गिरोह कोहतूर तले, और तोफान किस्ती पर।
बेर तीसरी लैलत कदरमें, जिन रोज कयामत करी फजर।।२३
सोई गिरोह इसलाम की, खेल लैल देखा दो बेर।
तीसरी बेर फजर की, जाके इलमें टाली अंधेर।।२४
सिर बदले जो पाइए, महंमद दीन इसलाम।
और क्या चाहिए रूहन को, जो मिले आखर गिरोह स्याम।।२५ प्र ३
इन महंमद के दीन में, सक सुभे जरा नाहें।
सो हकें दिया इलम अपना, ए सिफत होए न इन जुबांएं।।१० प्र ४
आखर आए रूहअल्ला, सो लीजो कर यकीन।
ए समझेगा बेवरा, सोई महंमद दीन।।१९
जो कछू कह्या महंमदें, ईसे भी कह्या सोए।
ए माएने सो समझही, जो अरवा अरस की होए।।२०
श्रीठकुरानीजी रूहअल्ला, महंमद श्रीकृस्नजी स्याम।
सखियां रूहें दरगाह की, सुरत अक्षर फिरस्ते नाम।।५३ प्र १२
महंमद =श्रीकृस्नजी स्याम दीन =सत्य धर्मइस्लाम= शुद्ध समर्पण पथ श्री कृष्ण प्रणामी शुद्ध सनातन धर्म निजानंद संप्रदाय

ईश्वर: परम : कृष्ण: सच्चिदानन्द विग्रह: |
अनादिरादि गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ||

श्रीकृष्ण परम ईश्वर है, सच्चिदानन्द- विग्रह है, अनादि है| गोविन्द है एवम सब कारण के कारण है|
प्रणाम
श्रीकृस्नजी स्याम।
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श्री खुलासा
श्रीठकुरानीजी रूहअल्ला, महंमद श्रीकृस्नजी स्याम।
सखियां रूहें दरगाह की, सुरत अक्षर फिरस्ते नाम।।५३

इसी प्रकार श्रीठकुराणीजीको रूहअल्लाह एवं श्यामसुन्दर श्रीकृष्णजीको मुहम्मद कहा है तथा ब्रह्मात्माओंको दरगाहकी रूह एवं अक्षरब्रह्मकी सुरताको फरिश्ता नाम दिया है.
खुलासा फुरमानका (कुरानका स्पष्टीकरण)श्री खुलासा

Our Thakurani RoohAllah(Shyama) and Mohamad is Shri Krishna Shyam. The souls of the eternal home (dargah) are Sakhiyan(chosen souls) and the astral figures of Akshar(Noor Jalal) are the angels(farishte)! This is the introduction to Aksharaateet Shri Krishna and Shyama his consort.

Shree Krishna pranami dharma- Nijanand Sampraday is sanatan dharma(eternal duty of the soul)
First and foremost learn our beloved Lord is Shri Krishna in Aksharateet! Those who want further details please read prakaran 12 and 13 from Khulasha granth.

रास मांहें रमाडयां जेणे, प्रगट लीला कीधी तेणे।
श्री धामतणां धणी कहेवाए, ते आवी बेठा आपण मांहें।।५

जिस स्वरूपने वृन्दावनमें अखण्ड रासकी लीला खेलाई उन्होंने ही यहाँ (नवतनपुरीमें) आकर उस लीलाको प्रकट किया. वे ही परमधामके धनी कहलाते हैं. वे ही अभी हम सबके बीच आकर बैठे हैं.
The beloved Lord who sported Raas with us in Vrindavan, the same appeared and revealed us the sport(The raas played in the yogmaya brahmand), He is the Lord of the paramdham who came and resided within us.

प्रकरण २९ prakash gujarati
प्रणाम
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Pran Life force soul or self within , Nam - surrendering to Supreme thus Pranam means surrendering the pran to supreme.
Literally, anyone who does pranam is a pranami.

This is my understanding, sanskrit scholars can make it more clear as Pranam is a sanskrit word.
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The pledge of the soul.

अब मनसा वाचा करमना कर, क्योंए ना छोडूं अखंड घर ।
नैंनों निरखूं करी निरमल चित, रुदे राखूं पीउ प्रेमें हित।।२४

अब मन, वचन और कर्मसे मैं अपना अखण्ड घर-परमधाम कदापि नहीं छोडूँगी. मैं चित्तको निर्मल बनाकर अपने नेत्रोंसे प्रियतम धनीको देखती रहूँ और प्रेमपूर्वक अपने हृदयमें उन्हें विराजित करूँ, यही अभिलाषा मनमें है.
Now with speech, mind and action I will accept the eternal home and never let it go.
With purified consciousness I will see Lord and keep the love for Lord with devotion in my heart.

कर परनाम लागूं चरने, करूं सेवा प्यार अति घनें।
करूं दंडवत जीवके मन, देऊं प्रदछिना रात ने दिन।।२५

हे सद्गुरु ! मेरी इच्छा है कि मैं आपके श्रीचरणोंमें प्रणाम कर प्रेम पूर्वक आपकी सेवामें मग्न रहूँ. अपने अन्तर्मनसे रात-दिन आपकी दण्डवत परिक्रमा करती रहूँ.

Doing parnam I touch the feet and shall serve with extreme love and shall prostrate the mind of the soul in the feet of the Lord and encircle the Lord night and day.

कृपा करत हो साथ पर बडी, भी अधिक कीजो घडी घडी ।
इन्द्रावती पांउ परत आधार, धनी धामके लै मेरी सार ।।२६

हे धनी ! आप अपने सुन्दरसाथ पर सदैव कृपा करते हैं, इसी प्रकार वारंवार और भी कृपा करते रहें. इन्द्रावती अपने धनीके चरणोंमें प्रणाम करती है कि धामके धनीने यहाँ आकर मेरी सुधि ली है.
प्रकरण १० श्री प्रकास (हिन्दुस्थानी)
O Lord, you have been very merciful to all sundarsath, please do more and again and again (increase the intensity and the frequency of your grace), Indrawati(the super soul residing in Paramdham) is falling to the feet of beloved Lord(supporter) as the Lord of the supreme abode considered me(Indrawati)!

(The being, soul, consciousness, chit of the soul, heart of the soul, mind of the jeev, speech, mind and action all are surrendered to Lord Shri Krishna of Aksharateet.)
At present, Pranami or Shri Krishna pranami means the sundarsath following Nijanand Sampraday.

Now with speech, mind and action I will accept the eternal home and never let it go.
With purified consciousness I will see Lord and keep the love for Lord with devotion in my heart.
Doing parnam I touch the feet and shall serve with extreme love and shall prostrate the mind of the soul in the feet of the Lord and encircle the Lord night and day.
(The being, soul, consciousness, chit of the soul, heart of the soul, mind of the jeev, speech, mind and action all are surrendered to Lord Shri Krishna of Aksharateet.)
At present, Pranami or Shri Krishna pranami means the sundarsath following Nijanand Sampraday.
Pranam to Shri Krishna is the cause and the Nijanand is the effect.

झरोखे सामी नजर करें, परनाम करके पीछे फिरें ।
इत और न दूजा कोए, स्वरूप एक है लीला दोए ।। ९८

जैसे श्रीराजजी झरोखेकी ओर दृष्टि डालते हैं उस समय अक्षरब्रह्म उनको प्रणाम कर लौट जाते हैं. वस्तुतः ये अक्षरब्रह्म कोई अन्य नहीं हैं, स्वयं श्रीराजजीके ही स्वरूप हैं. मात्र इनकी लीला ही अन्य प्रकारकी होती है.

भगवानजी खेलत बाल चरित्र, आप अपनी इच्छा सों प्रकृत ।
कोट ब्रह्मांड नजरों में आवें, खिन में देखके पलमें उडावें ।। ९९

अक्षरब्रह्म बाल लीला करते हैं. वे अपनी प्रकृतिके अनुसार क्षण मात्रमें करोड.ों ब्रह्माण्डोंकी रचना करते हैं तथा दूसरे ही क्षण उन्हें उड.ा भी देते हैं.
प्रकरण ३ parikrama

When Aksharateet Shri Rajji looks at the window, at that very time Akshar does pranam and returns back. There is no other person here, they are one but they have two different sports. Akshar Bhagvan plays the sports of kids creating millions of universe as per his wishes which is like his nature. Millions of universes in one blink of eyes he creates and in a moment destroys it.
This Universe that we are living is also created by Akshar who has been from eternity doing pranam to Shri Rajji which is revealed to us by tartam(the secret knowledge of beyond brought to us by Shyama RoohAllah in Devachandraji Maharaj).

श्री देवचन्दजीने लागुं पाय, जेम आ दुस्तर जोपे ओलखाए ।
दई प्रदखिणा करुं परणाम, जेम पहुंचे मारा मननी हाम ।।

मैं सद्गुरु श्री देवचन्द्रजीके श्रीचरणोंमें प्रणाम करता हूँ ताकि इस दुस्तर संसारको भलीभाँति पहचान सकूँ, इसलिए मैं उनकी परिक्रमा करते हुए उन्हें प्रणाम करता हूँ कि मेरे मनकी अभिलाषाएँ पूर्ण हों.

I postrate before Shri Devchandraji's feet who made me understand this world. Pranam to him for fulfilling all the desires of my heart.

अबहीं जो सिर लीजिए, एक वचन जागृत।
तो तबहीं जाग के बैठिए, उड जाए सुपन सुरत।।

Now who pays attention of one awakened word, shall get awakened and the world of dream will come to an end.
Remember even ONE word of this awakening you could accept, you will be enlightened and all the dream or illusion will vanish!

Please sundarsath with utmost love and compassion our Lord has brought this knowledge for us let us understand our duty and perform actions accordingly!
धरम
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Pranam to Aksharateet Shri Krishna is our Dharma!
Dharm means the duty, in the spiritual terms duty of the soul.

जो जीव देते सकुचों, तो क्यों रहे मेरा धरम।
विरहा आगे कहा जीव, ए केहेत लगत मोहे सरम ।।६

धनीके विरहमें यदि अपने जीवको सर्मिपत करनेमें मुझे संकोच हुआ तो मेरा अनन्य भाव (पतिव्रता धर्म) कैसे रहेगा ? वस्तुतः विरहके समक्ष जीवका क्या अस्तित्व है ? फिर भी जीवको सर्मिपत करनेकी बात कहते हुए मुझे लज्जा होती है.

प्रकरण ८ Shri Sanandh granth

If my soul hesitate to surrender to Lord then how have I fulfilled my duty(dharm). First and foremost is the pain of separation which follows the surrendering of the soul and to admit this fact makes me feel ashamed (when this is true then how can I be reluctant to give in!)
Carefully read what is our dharam from Vani? It is surrendering the soul/pran to our Lord!

Indravati unites with Aksharateet Shri Krishna Shyam and gets ready to awaken all other souls.

इन्द्रावतीसुं अतंत रंगे, स्याम समागम थयो।
साथ भेलो जगववा, इन्द्रावतीने में कह्यो।।१३५

इन्द्रावतीकी अन्तरात्मामें धामधनीका समागम हो गया है. सद्गुरु कहते थे कि समस्त ब्रह्मसृष्टिको एकसाथ जागृत करनेके लिए मैंने इन्द्रावतीसे कहा है अर्थात् जागनीका उत्तरदायित्व इन्द्रावतीको सौंपा है.
प्रकरण १२ श्री कलस (गुजराती)

Lord Shyam has united with Indrawati and to asked her to awaken other sundarsath. Indrawati is bhramvasana residing in Meharaj Thakkar. Brahmvasana unites with with Lord Shyam of Paramdham. This is the last chaupai of Shri Kalash Gujrati Granth.

महंमद आया ईसे मिने, तब अहंमद हुआ स्याम।
अहंमद मिल्या मेहेदी मिने, ए तीन मिल हुए इमाम।।२१

कुरानके अनुसार रसूल मुहम्मदमें विद्यमान ब्राह्मीशक्ति जब ईसा रूहअल्लाह श्री देवचन्द्रजीमें प्रविष्ट होती है तब वे अहमद स्वरूप कहलाते हैं. जब ये अहमद स्वरूप महदीमें प्रविष्ट होते हैं तब ये तीनों स्वरूप एक होकर इमाम कहलाते हैं.
प्रकरण १५ श्री खुलासा

When Devachandraji united with the Shyam residing in Mahamad and became Ahmad, when Ahmad united with Mehadi and thus became Imam. This is how Mahamati Prannathji has become Imam Mehadi.

Mahamati Prannath compliled the Tartam gyaan(wisdom of beyond) in Kuljam Swaroop - Swaroop saheb (Our holy book we must treat it as the Aksharateet Shri Krishna the Master of the universe). Every word is word from Aksharateet Shri Krishna residing in Mahamati Prannathji.

दिल अरस : Nijanand : Eternal Bliss of the soul
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पहेले कहूं अव्वल की, हक हादी हुकम।
मोमिन दिल अरस में, हकें धरे कदम।।१

महामति कहते हैं, अब मैं सर्वप्रथम श्रीराजजी और श्री श्यामाजी(श्री देवचन्द्रजी) के आदेशानुसार परमधाम मूलमिलावेका वृत्तान्त कहता हूँ. जिस प्रकार श्री राजजीने ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम बनाकर उनमें अपने चरणकमल प्रतिष्ठित किए हैं.

Let me tell you about the original abode by the will of Our beloved Lord and Shri Devachandraji Maharaj(Shyama) that the souls in the Paramdham has adorned their heart with the feet of the Lord.

दिल अरस मोमिन कह्या, तित आए हक सुभान ।
सो दिल पाक औरों करे, जाए देखो मगज कुरान ।।४३

ब्रह्मात्माओं (मोमिनों) के दिलको तो परमधाम कहा है, जहाँ परमात्मा (हक सुभान) आकर विराजमान होते हैं. ऐसी आत्माएँ अन्य लोगोंके दिलोंको भी पवित्र बना देतीं हैं. जरा कुरानके रहस्योंको तो समझो.

The heart of the souls is the abode of Lord where dwells the Supreme Lord. Such souls will purify other souls go kindly understand the intelligence of the Holy Quran.

One who does pranam to eternal -anadi, beyond imperishable creator - aksharateet and whose name is Shri Krishna one experiences Nijanand -Bliss within the self.
Thus to experience the Nijanand it is the dharm of the soul to surrender (Pranam) to Shri Krishna.
Shri Krishna Pranami Nijanand Sampradayee surrender to anadi aksharateet Lord Shri Krishna with Pranam and since heart of sundarsath(friends of Sundarbai a vasana of Paramdham) is where Shri Krishna resides, sundarsath of nijananda sampraday greet one another with Pranam(recognising the supreme presence in the soul of sundarsath) leading us to experience the eternal bliss within called Nijanand and thus we came to be known as pranami or shri krishna pranami and our following as shri krishna pranami dharm. Now, when we say Shri Krishna Pranami or Pranami it implies the followers of Nijanand Sampraday founded by Shri Devachandraji(Lord Shri Krishna appeared before him and gave the knowledge of His name, abode and the purpose) and propagated by Shri Prannath Swami.
This is the reality and the truth about us. Those who have doubts can make themselves clear about our standing and correct their understanding from this post please.

तारतम
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ल्याए वचन तारतम सार, खोले पारके पार द्वार।
जानो जिन आसंका रहे, साथ ऊपर धनी एता ना सहे।।६

सद्गुरु धनी अपने साथ तारतम ज्ञानके सार पूर्ण वचन लेकर आए हैं, जिनके द्वारा उन्होंने परमधामके द्वार खोल दिए. वे चाहते हैं कि सुन्दरसाथके मनमें किसी भी प्रकारकी आशंका न रहे. धनी सुन्दरसाथके लिए इतनी भी विमुखता सहन नहीं करते.

Lord has brought the gist of the tartam(the knowldege of Lord Shri Krishna, Shyama, sundarsath and Aksharateet abode) and has opened the door of the paramdham(that is beyond of the beyond). There must be no doubt about it and it is warning that Lord does not tolerate any distrust in celestial souls.

प्रकरण ११ श्री प्रकास (हिन्दुस्थानी)

हवे रास तणो सार तमने कहुं, ते तां आपणुं तारतम थयुं।
तारतम सार आ छे निरधार, जिहां वसे छे आपणां आधार।।२२

अब मैं रास ग्रन्थका सार तुम सबको कह रही हूँ. वह तो हमारे अखण्ड घरका तारतम है. तारतमका सार निश्चय ही यह है कि जहाँ हमारी आत्माओंके आधार धामधनी निवास करते हैं.
This Raas that Brahm(Supreme) and the souls played in the jogmaya universe. I will reveal the extract of whole Raas and that will become your emancipator of all the ignorance (tartam). The extract of the Tartam is that where resides our Lord(on whom our soul relies upon).
Remember the Lord resides in the heart of the celestial souls along with His abode.

घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३

हमारा घर अखण्ड परमधाम तथा हमारे धनी श्रीकृष्ण यही तारतमका सार फल है. इस तारतम ज्ञाान द्वारा अत्यन्त प्रकाश फैलता
है. जिससे मनमें किसी भी प्रकारकी शंका नहीं रहती है.

Our real home is Paramdham and Shri Krishna, this is the extract of the fruit of Tartam. The light of this Tartam is so much not a doubt should you have in mind. One must believe this without creating confusion and doubts in the mind.

How to awaken ourselves?

रास प्रकास छोडो जिन खिन, जो बीतक अपनी परवान जी ।
ए छल तुमसे क्योंए न छूटे, पर मैं ना छोडों तुमें निरवान जी ।।

रास तथा प्रकासको एक क्षणके लिए भी हृदयसे दूर मत करो. यही अपनी प्रामाणिक वीतक है. यह माया तुमसे किसी भी प्रकार छूट नहीं रही है फिर भी मैं तुम्हें इस मायामें लिप्त रहने नहीं दूँगी.

Do not let go from your heart, even for a moment, Raas and Prakash, the authentic knowledge about us. Contemplate Raas and Prakash every moment.
You are not able to get rid of illusion(ignorance of the self and attachment to the world) but I will not let you in such condition.

कहे इंद्रावती वचन पीउके, जिन देखाया धाम वतन जी ।
अब कोटक छल करे जो माया, तो भी ना छूटे धनीके चरन जी ।।८

इन्द्रावती कहती है, ये सद्गुरु धनीके वचन हैं जिन्होंने हमें परमधाम का मार्ग दिखाया है. माया अब भला करोड.ों बार हमें छलनेका प्रयास करे, तो भी सद्गुरु धनीके चरण हमसे नहीं छूटेंगे.

Indrawati (celestial soul) is saying but the words of beloved Lord who has showed us our original native abode. No matter how this illusionary world play games of enticement but the soul will not let go the feet of the Lord.
प्रकरण ३ श्री प्रकास (हिन्दुस्थानी)


चरन तले कियो निवास, इन्द्रावती गावे प्रकास।
भानके भरम कियो उजास, पावें फल कारन विस्वास।।१९

ऐसे सद्गुरुके चरणोंमें रह कर इन्द्रावती प्रकाशके वचनोंको इस प्रकार गा रही है. सद्गुरुने मेरी सभी भ्रान्तियोंको मिटाकर मेरे हृदयको प्रकाशित किया है. उनके चरणोंमें विश्वास करनेसे मुझे यह फल प्राप्त हुआ.
I have taken the permanent residence under the feet and thus Indrawati is singing this enlightening words(Prakash), Cleared the confusion and brought enlightening and this is the fruit of faith! (Faith is very essential)!

विस्वास करके दौडे जे, तारतमको फल सोई ले।
तिन कारन करूं प्रकास, ब्रह्मसृष्टि पूरन करूं आस।।२०

जो पूर्ण विश्वासके साथ आगे बढ.गे, उन्हें ही तारतम ज्ञाानका फल प्राप्त होगा. इस प्रकार प्रकाश ग्रन्थके इन वचनोंको प्रकाशित कर ब्रह्मात्माओंकी आशा पूर्ण करूँगी.
Those who move forward with faith can only enjoy the fruit of tartam(knowledge of beyond beyond). To fulfill the wishes and hopes of the celestial souls, I have thrown light upon the enlightening(Prakash granth)
प्रकरण १९ श्री प्रकास (हिन्दुस्थानी)

With above understanding let us proceeed towards Paramdham!

निस दिन रंग मोहोलनमें, साथ स्यामाजी स्याम ।
याद करो सुख सबों अंगों, जो करते आठों जाम ।।५

हम सभी रङ्गमहलमें रात-दिन श्रीश्यामश्यामाजीके साथ रहतीं थीं. अपने अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे उन सुखोंको याद करो जिनको हम आठों प्रहरकी लीलाओंसे प्राप्त किया करतीं थीं.
Everyday in RangMohol, sundarsath, Shyamaji Shyam, remember this bliss which we experienced in all 24 hours(8 prahar)

चौकस कर चित दीजिए, आतम को एह धन ।
निमख एक ना छोडिए, कर मनसा वाचा करमन ।।६

अपने चित्तको सचेत कर उन सुखोंको याद करो. यही आत्माकी अमूल्य सम्पदा है. अपने मन, वचन एवं कर्मसे क्षण भरके लिए भी इस निधिको दूर होने मत दो.
Alert your consciousness and pay attention(with awakened consciousness), this is treasure of the soul, do not let it be away from you for a moment and perfomr this with mind,speach and action.

एही अपनी जागनी, जो याद आवे निज सुख ।
इसक याहीसों आवहीं, याहीसों होइए सनमुख ।।7

इन सुखोंका स्मरण होते रहना ही आत्माकी जागृति है. इसीसे प्रेमका आविर्भाव होगा. इसलिए सर्वदा इसीकी ओर उन्मुख बनीं रहो.
This is our awakening that when we can remember the bliss of the self. From here comes the Ishk(love) and from be always focus towards the remembrance of our original abode and Shyam Shyama.

इसक धनीको आवहीं, याही याद के माहिं ।
इसक जोस सुख धनी बिना और पैदा कहूं नाहिं ।।८

इन सुखोंका स्मरण करने पर अपने प्रियतम धनीके प्रति प्रेम प्रकट होगा. धामधनीके इन सुखोंको याद किए बिना प्रेम तथा जोश प्रकट नहीं हो सकते.
The love for Lord is sprouted in the heart in this very remembrance. Without remembering the Lord, the love and his inspiration and Lord cannot be created.

ताथें पल पलमें ढिग होइए, सुख लीजे जोस इसक ।
त्यों त्यों देह दुख उडसी, संग तज मुनाफक ।।९

इसलिए प्रति-क्षण अपने प्रियतमके निकट होते हुए उनके आवेश एवं प्रेमका सुख प्राप्त करो. तुम जैसे-जैसे मिथ्याचारका त्याग करोगी वैसे-वैसे तुम्हारे शारीरिक दुःख भी दूर हो जाएँगे.
Every moment you will be close to the beloved Lord and will experience the bliss and the inspiration and thus ego-body consciousness will cease and thus all the pains and agony caused by this body will be gone too.

जोलों इसक न आइया, तोलों करो उपाए।
योंहीं इसक जोस आवहीं, पल में देसी पट उडाए ।।१०

जब तक तुम्हारे हृदयमें प्रेम प्रकट नहीं होगा तब तक इस प्रकारके प्रयत्न करतीं रहो. जैसे ही प्रेम और जोश प्रकट होंगे तब पल
मात्रमें मायाका आवरण दूर हो जाएगा.
Till the love for Lord is not sprouted one must keep trying and when the love and inspiration comes, the veil of illusion(maya) will end in a moment.

पल पलमें पट उडत है, बढत बढत अनूकरम ।
इसक आए जोस धनी के, उड गयो अंतर भरम ।।११

जैसे पल-पलमें मायाका आवरण हटता जाएगा वैसे ही प्रेम भी क्रमशः बढ.ता जाएगा. इस प्रकार धामधनीके प्रेम और जोश प्राप्त होने पर अन्तरात्माके भ्रम दूर हो जाएँगे.
As every moment the veil disappears the love in the heart increases. Once one get the love and inspiration of Lord all the internal confusion/doubt/conflicts will fly away.

निमख निमख में निरखिए, पट न दीजे पल ल्याए ।
छेटी छिन ना पर सके, तब इसक जोस अंग आए ।।१२

इसलिए प्रतिक्षण परमधामके सुखोंकी ओर देखतीं रहो. पलमात्रके लिए भी अज्ञाानके आवरणको आने मत दो. जब एक क्षणके लिए भी अन्तर नहीं रहेगा तभी परब्रह्मके आवेश और प्रेम हृदयमें आ जाएँगे.
Hence every moment recall the memory of Paramdham(from heart) and behold it. Even for a moment do not let the veil interfere with it. It will take not even a moment to experience the love, inspiration of the Lord within. (The ang is for the soul and deh is for the body, one must feel one is ang then only any spiritual expererience takes place)

इसक पेहेलें अनभवी, निज सरूप निजधाम।
तिन खिन बेर न होवहीं, धनी लेत असल आराम।।१३

सर्वप्रथम प्रेमके द्वारा ही श्रीराजजीके स्वरूप तथा परमधामका अनुभव होने लगेगा तब एक क्षणका भी विलम्ब किए बिना धामधनी तुम्हें अपने हृदयसे लगा लेंगे.
First experience the love in the heart and the one's self in the Paramdham(abode of the self). Then without delaying for a moment Lord will take the true comfort in your heart and thus beloved Lord will grant you with true comfort.
Nijdham means the abode of the self which is Paramdham the ultimate abode.

बैठे मूल मेले मिने, धनी आगूं अंग लगाए।
अंग इसक जो अनभवी, तुम क्यों न देखो चित ल्याए ।।१४

तुम मूलमिलावामें धामधनीके समक्ष परस्पर अङ्गसे अङ्ग मिलाकर बैठीं हुइंर् हो. तुमने वहाँ पर जिस प्रकार प्रेमका अनुभव किया है अब उसे अपने हृदयमें क्यों अनुभव नहीं कर रहीं हो.
Sitting at moolmilava very close to the beloved Lord. What can make you experience the love of beloved Lord why do not you pay attention to it.

ए वचन विलास जो पेड के, आए हिरदें आतम के अंग ।
तब खिन बेर न लागहीं, असल चित एक रंग ।।१५

परमधामके प्रेमविलासके इन वचनोंको जब आत्मा हृदयङ्गम करने लगेगी, तब पर-आत्माके साथ एक चित्त होनेमें उसे क्षण मात्रका भी विलम्ब नहीं होगा.
These words of love and romance of eternity when the heart of the soul accepts, then it will not take moment to unite with the super soul in the Paramdham.

बैठते उठते चलते, सुपन सोवत जागृत।
खाते पीते खेलते, सुख लीजे सब विध इत।।१६

इसलिए बैठते, उठते, चलते, फिरते, खाते, पीते, हँसते-खेलते, स्वप्नमें तथा जागृतिमें भी तुम यहाँ पर परमधामके उन सुखोंका अनुभव करती रहो.
Thus while sitting, standing, walking, in dreams while sleeping or when being awake! While eating, drinking, playing, experience the bliss of Paramdham while being over here.

एह बल जब तुम किया, तब अलबत बल सुख धाम ।
अरस परस जब यों हुआ, तब सुख देवें स्यामा स्याम ।।१7

इसके लिए यदि तुमने साहस किया तो तुम्हें निश्चय ही परमधामके अखण्ड सुखोंका अनुभव होने लगेगा. इस प्रकार जब आत्मा और पर-आत्मामें सुखोंका आदान-प्रदान होगा तब श्यामश्यामाजी तुम्हें अखण्ड सुखका अनुभव करवाएँगे.
You have been courageous that you determined to experience the bliss of Paramdham. Once you have soaked in the love completely, Shyama and Shyam will shower you with eternal bliss.
प्रकरण ४ parikrama
So we must remember the bliss of Paramdham, Shyam-Shri Krishna, Shyama, sundarsath, the oneness and thus sprout the love in the heart, be soul conscious, eliminate the ego-body consciousness and unite with our super soul.
The brahmshristis are souls, their beloved Lord is Shri Krishna when the soul becomes conscious of the self bliss of the self follows and this is Nijanand.
The love in the heart of the soul, beloved residing in the heart one though physically here experiences the bliss of Paramdham.
Shri Krishna Pranami

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