हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

The heart of the Brahmatma (Momin) is Paramdham!

बृहच्च तद् दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत् सूक्ष्मतरं विभाति ।
दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यन्त्विहैव निहितं गुहायाम् ॥७॥

brihaccha tad divyam achintya rupam
sukshmaccha tat sukshmataram vibhati ।
durat sudure tadihantike cha
pashyantvihaiva nihitam guhayam ॥7॥

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मण वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥८॥

na chakshusha grihyate napi vacha
nanyair devais tapasa karmana va ।
jnana-prasadena vishuddha-sattvas tat
astu tam pashyate nishkalam dhyayamanah ॥8॥

Mundak Upanishad 3/1part
The Supreme Brahm resides in the heart of the soul.
Neither eye can see Him, nor He can be attained by tapasya, He can be known by the intelligence and wisdom and contemplation with pure heart can only witness Brahm.


प्यारे कदम राखों छाती मिने, और राखों नैनों पर।
सिर ऊपर लिए फिरों, बैठो दिलको अरस कर।।२४/ प्रकरण ८ sagar

मैं इन प्यारे चरणोंको अपने हृदयरूपी सिंहासन पर स्थापित करूँ अथवा इन्हें अपने नयनोंमें बसाऊँ, या तो अपने शिर पर धारणकर विचरण करूँ. हे धनी ! आप मेरे हृदयको परमधाम बनाकर इसीमें विराजमान हो जाएँ.
O my beloved Lord, step inside my heart and also in my eyes or should I take these feet on my head! O my Lord, reside in my heart and make it your abode!

ए जो अरवाहें अरस की, पडी रहें तले कदम।
खान पान इनों इतहीं, रूहें रहें तले हुकम।।१४४

जो परमधामकी आत्माएँ हैं. वे सदा सर्वदा इन्हीं चरणोंमें रहतीं हैं (इनका ही चिन्तन करतीं हैं). उनका खान पान एवं अधिष्ठान इन्हीं चरणोंके अधीन हैं.
The soul that have come from the Arash(Paramdham) reside under the feet of the Supreme Lord, they eternally contemplate the feet of the beloved. Their eating, drinking and living of these souls is under the lotus feet of the Supreme Brahm.

याही ठौर रूहें बसत, रात दिन रहें सनकूल।
हक अरस मोमिन दिल, तिन निमख न पडे भूल।।१४५

इन्हीं चरणोंमें रहती हुई ब्रह्मआत्माएँ रात-दिन प्रसन्नताका अनुभव करतीं हैं. क्योंकि ब्रह्मआत्माओंका हृदय ही श्रीराजजीका परमधाम है. इसलिए उनसे लेशमात्र भी भूल नहीं हो सकती है कि वे इन चरणोंसे दूर हो जाएँ.
Residing in this place(feet of the Lord) day and night, the souls experience the bliss. The abode of the Supreme Lord is the heart of the celestial souls, hence they cannot go wrong.

हक कदम हक अरसमें, सो अरस मोमिन दिल।
छूटे ना अरस कदम, जो याहीं की होए मिसल।।१४६

श्रीराजजीके ये चरणकमल परमधाममें ही हैं. अब ब्रह्मआत्माओंका हृदय परमधाम बन गया है. इसलिए जो परमधामकी इन आत्माओंके समूहमें-से होंगी उनसे धामधनीके ये चरणकमल क्षणमात्रके लिए भी नहीं छुटेंगे.

The feet of the Lord is in Arash (Paramdham) of the Supreme and that abode of the Lord Arash is the heart of the celestial soul. The heart of these souls who belong to Paramdham Arash are never devoid of the feet of Lord of the Supreme. The feet of the Supreme Brahm God reside in the heart of the celestial soul and not even for a moment these feet are away from the heart of these soul.

ए चरन राखों दिलमें, और ऊपर हैडे।
लेके फिरों नैनन पर, और सिर पर राखों ए।।१४7

इसलिए इन श्रीचरणोंको अपने हृदयमें धारण करता हूँ. मेरी र्हािदक इच्छा है कि मैं इनको अपने वक्षस्थलपर अङ्कित कर अपनी आँखोंमें समा लूँ एवं सिर पर धारण कर घुमने लग जाऊँ.
Keeping these feet in our heart and carry it in my eyes and also keep it on my head.
(Lord is love and love is Lord and the soul is always thirsty of divine love which only the Supreme Brahm.)

भी राखों बीच नैन के, और नैनों बीच दिल नैन।
भी राखों रूहके नैनमें, ज्यों रूह पावें सुख चैन।।१४८

मुझे यह भी इच्छा बनी रहती है कि इन चरणोंको मैं अपने आँखोंके अन्दर स्थापित करूँ. उससे भी अन्दर हृदयके आँखोंमें धारण कर उससे भी आगे बढ.कर आत्माकी आँखोंमें इन्हें स्थापित करूँ जिससे आत्माको सुख एवं शान्तिका अनुभव हो.


महामत कहे इन चरन को, राखों रूह के अन्तसकरन।
या रूह नैन की पुतली, बीच राखों तिन तारन।।१४९

महामति कहते हैं, मैं इन श्रीचरणोंको अपनी आत्माके अन्तःकरणमें स्थापित करता हूँ अथवा तो आत्माके नयनोंकी पुतलीमें बसा लेता हूँ या फिर उसके भी तारोंमें स्थापित करता हूँ (ताकि ये चरण कमल मुझसे कभी भी दूर न हो जाएँ).
प्रकरण ९ sagar

जो कोई निज धाम की, सो निकसो रोग पेहेचान।
जो सुरत पीछी खैंचहीं, सो जानो दुसमन छल सैतान।।

जो परमधामकी आत्माएँ हैं, वे राग-द्वेषरूपी रोगको पहचानकर उससे मुक्त हो जाएँ. परमधामकी ओर जा रही सुरताको जो मायाकी ओर खींचते हैं, उन्हें ही छल-कपट वाले शत्रु समझना.

All those souls who belong to Supreme Abode of within, understand all the diseases of this world (greed, prejudice, hatred etc) and come clean out of it. All the vices that keep you away from your true abode that is only your bitter enemy.


नूर रोसन बल धाम को, सो कोई न जाने हम बिन।
अंदर रोसनी सो जानहीं, जिन सिर धाम वतन।।

परमधामके दिव्य ज्ञानके प्रकाशके सामर्थ्यकी जानकारी हम ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त किसीको नहीं है. जिनको परमधामका दायित्व प्राप्त है, वे ही उसके अन्दरके प्रकाशको जान सकतीं हैं.

No one but the divine celestial souls know the splendour, illumination and power of the supreme abode paramdham. Those who are acquainted with light within, only those can experience the original abode of the supreme and bear the responsibility of Paramdham.


दीदार हुआ हक सूरत का, देख अरस नजर बातन ।
न्यामत अरसोंकी सबे, लै अरस दिन मोमन।।३/९ मारफतसागर

आत्मदृष्टि खुलने पर जिनको परमधामके दर्शन हुए हैं उनको ही परब्रह्म परमात्माकी पहचान होगी. धाम हृदया ब्रह्मात्माएँ क्षर जगतसे लेकर अक्षरसे परे अक्षरातीत परमधामकी सम्पूर्ण सम्पदा प्राप्त करतीं हैं.

When one sees through the eyes of self which dwells in supreme abode then one can see the face of the Supreme Lord. All the bounties(love, unity consciousness, bliss, joy, trust) of Supreme abode Nijdham (arash e azim) is granted by the soul whose heart itself is called supreme abode.


कह्या हक सेहेरग से नजीक, हक अरस मोमिन दिल।
ना ऊपर तले दाएं बाएं, ए बतावें मुरसद कामिल।।५८
prakaran 4, Marfatsagar

कुरानमें परमात्माके लिए कहा गया है कि वे प्राणनलीसे भी अति निकट हैं. वे स्वयं ब्रह्मात्माओंके हृदयमें हैं इसलिए उन्हें निकट कहा गया है. कुरानको पढ.नेवाले कहते हैं कि परमात्मा ऊपर, नीचे, दायेंसे बायें कही भी नहीं हैं. इसका तात्पर्य है कि वे ब्रह्मात्माओंके हृदयमें हैं.

In Holy Quran it is said that the beloved Lord Supreme is closer than the windpipe and His abode is the heart of Brahmatma (momin) celestial souls. The holy Quran expert say one cannot find the Paramdham Arsh e azim in any direction (up, down, right or left)!

अरस कहिये दिल तिन का, जित है हक सहूर|
इलम इसक दोऊ हक के, दोऊ हक रोसनी नूर|| महासिंगार/२४/४२

Aras kahiae dil tin kaa, jit hai haq sahoor; Ilam isak dou haq ke, dou haq rosanee neer. Mahasingaar/24/42

उन्ही आत्माओं का दिल वस्तुतः परमधाम कहा गया है, जहाँ पर हर पल श्री राज जी का चिन्तन, उन्ही की चितवनी चलती रहेती है| वस्तुतः ज्ञान और प्रेम, दोनों ही श्री राजजी के तेजोमय प्रकाश स्वरुप की अमूल्य निधियाँ हैं|

Only that heart is said to be the Abode of the Lord Almighty, Paramdham, which contemplates on beloved Lord ceaselessly. Literally, Knowledge and Love of the Supreme Commander, both are His essence of His illuminous Form.

अरस नाहीं सुमारमें, सो हक ल्याए माहें दिल मोमन।
बेसुमार ल्याए सुमार में, माहें आवने दिल रूहन।।५7

परमधामकी कोई सीमा ही नहीं है. ऐसे परमधामको धामधनीने ब्रह्मात्माओंके हृदयमें अङ्कित कर दिया है. स्वयं ब्रह्मात्माओंके हृदयमें विराजमान होनेके लिए ही धामधनीने इस असीम परमधामको उनके हृदयमें अङ्कित कर दिया है.
The absolute abode Paramdham arash azeem is not limited but the Supreme brought it in the heart of celestial souls. The infinite came in finite within the heart of the soul so Lord could reside within!
prakaran 1 Saagar


तुम लिखिया फुरमान में, हक अरस मोमिन कलूब|
तो सुकन पालो अपना, तुम हो मेरे महेबूब|| सागर/८/७

Tum likhiyaa furmaan mein, haq aras momin kaloob; To sukan paalo apnaa, tum ho mere meheboob. Saagar/8/7

आप ने ही कुरान में लिखवाया है कि ब्रह्मात्माओं का ह्रदय ही आप का परमधाम है| हे धनी! आप उन वचनों को पूर्ण करें| आप ही तो हमारे प्रियतम हैं|

You have proclaimed in Koran that the hearts of The celesial (brahm) souls is Your abode, is your Paramdhaam. O Almighty! Kindly fulfill your promise. You are our ONLY Beloved Lord.


मोमिन होए सो देखियो, तुमारा दिल कह्या अरस ।
चारों घाट लीजो दिलमें, दिल ज्यों होए अरस परस ।।८

हे ब्रह्मात्माओ ! तुम्हारे हृदयको परमधाम कहा है, इसीलिए तुम इस दृश्यको देखो ! इन चारों घाटोंको हृदयमें अङ्कित करो, जिससे तुम्हारा हृदय इन शोभाओंसे ओत-प्रोत हो जाए.

Behold O celesial souls (brahmatma, momin), its your heart is called the abode of the Lord the Paramdham. Visualize four banks of Paramdham in your heart by which the heart is drenched completely in its divinity.


एही पट आडे तेरे, और जरा भी नाहें।
तो सुख जीवत अरस का, लेवे ख्वाब के माहें।।३२

यही अहं तेरे और धामधनीके बीच आवरण बना हुआ है. इसके अतिरिक्त अन्य कोई आवरण ही नहीं है. इसको हटाने मात्रसे इस स्वप्नवत् संसारमें जीवित रहते हुए ही परमधामके सुखोंका अनुभव होगा.

This veil(ignorance,ego) is your main obstacle and there is nothing else. You could attain the bliss of eternal living of Paramdham while in this world of illusion.


हकें अरस किया दिल मोमिन, सो मता आया हक दिल से।
तुमें ऐसी बडाई हकें लिखी, हाए हाए मोमिन गल ना गए इनमें ।। ६

श्रीराजजीने ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम बनाया है. यह तारतम ज्ञाानरूपी सम्पदा भी उनके ही हृदयसे आई है. स्वयं धामधनीने तुम्हारी इतनी बड.ी प्रशंसा की है तथापि खेद है कि ब्रह्मात्माओंका हृदय द्रवित नहीं हो रहा है.

The Supreme Commander of the Universe our beloved Lord has made the heart of the celesial souls His Abode, the Paramdham and this intent also has come from His heart. Beloved Lord has praised you so much but alas my souls you could not melt in it.

वरनन करो रे रूहजी, हकें तुम सिर दिया भार।
अरस किया अपने दिल को, माहें बैठाओ कर सिनगार।।१

महामति कहते हैं, हे मेरी आत्मा ! श्रीराजजीने तुझे गुरुतर दायित्व सौंपा है. अब तू उनके शृङ्गारका वर्णन कर. उन्होंने ब्रह्मआत्माओंके हृदयको अपना धाम बनाया है. इसलिए तू सम्पूर्ण शृङ्गारसे सुसज्जित उनके स्वरूपको अपने हृदयमें अङ्कित कर.

Let me describe you O my Souls,says Mahamati, how Beloved Lord has expected you to take the great responsibility. He has made His abode our heart so adorn your heart, Him seated with all His splendor.

रात दिन बसें हक अरस में, मेरा दिल किया अरस सोए।
क्यों न होए मोहे बुजरकियां, ऐसा हुआ न कोई होए।।३

श्रीराजजी सर्वदा अखण्ड परमधाममें रहते हैं. अब उन्होंने मेरे हृदयको अपना परमधाम बनाया है. इसलिए मुझे श्रेष्ठतम गौरव क्यों प्राप्त नहीं होगा ? यह विशेषता आज तक किसीको भी प्राप्त नहीं हुई हैं और भविष्यमें भी नहीं होगी.

Eternally,Beloved Lord (the Supreme Commander) dwells in indivisible, imperishable Paramdham. He has made my heart as his dwelling place and thus has turned into Paramdham. How could I not feel the gratitude, nothing such as this has ever happened before nor shall ever happen after.

पहेले कहूं अव्वल की, हक हादी हुकम।
मोमिन दिल अरस में, हकें धरे कदम।।१

महामति कहते हैं, अब मैं सर्वप्रथम श्रीराजजी और श्री श्यामाजी(श्री देवचन्द्रजी) के आदेशानुसार परमधाम मूलमिलावेका वृत्तान्त कहता हूँ. जिस प्रकार श्री राजजीने ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम बनाकर उनमें अपने चरणकमल प्रतिष्ठित किए हैं.

Let me tell you about the original abode by the will of Our beloved Lord and Shri Devachandraji Maharaj(Shyama) that the souls in the Paramdham has adorned their heart with the feet of the Lord.

दिल मोमिन अरस कह्या, सैतान दुनी दिल पर ।
क्यों गिरो दुनी भेली चले, भई तफावत यों कर ।।१५

इसीलिए ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम कहा है, नश्वर जगतके जीवोंके हृदयमें तो दुष्ट इब्लीसका साम्राज्य है. इस प्रकार नश्वर जगतके जीव
ब्रह्मात्माओंके साथ कैसे चल सकते हैं ? इन दोनों समुदायोंमें यही अन्तर है.

The heart of the celestial soul is the true abode of the Lord (eternal, imperishable, absolute Paramdham) but the Satan(Maya) rules the heart of the worldly people. How can these two group go hand in hand when there is nothing common between them.

दिल अरस मोमिन कह्या, तित आए हक सुभान ।
सो दिल पाक औरों करे, जाए देखो मगज कुरान ।।४३

ब्रह्मात्माओं (मोमिनों) के दिलको तो परमधाम कहा है, जहाँ परमात्मा (हक सुभान) आकर विराजमान होते हैं. ऐसी आत्माएँ अन्य लोगोंके दिलोंको भी पवित्र बना देतीं हैं. जरा कुरानके रहस्योंको तो समझो.

The heart of the souls is the abode of Lord where dwells the Supreme Lord. Such souls will purify other souls go kindly understand the intelligence of the Holy Quran.

राह पकडे तौहीद की, धरे महंमद कदमों कदम।
सो जानो दिल मोमिन, जिन दिल अरस इलम।।१९

जो आत्माएँ अद्वैतका मार्ग ग्रहण कर अन्तिम मुहम्मद (मेरे) के पदचिह्नों पर चलती हैं तथा जिनका हृदय परमधामके ज्ञाानसे प्रकाशित है, उन्हीं ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम कहा गया है.

Those who choose the path of Non-dual(worshipping only one Lord) and follows me step by step, are the supreme celesial souls and whose heart is abode of Supreme intelligence.

दिल मोमिन अरस नूर में, नूर इसक आग जलाए ।
एक नूर वाहेदत बिना, और नूर आग कहूं न बचाए ।।२४ प्रकरण ३५ परिकरमा

ब्रह्मात्माओंका हृदय ही तेजोमय परमधाम है. उनके हृदयमें भी प्रेमरूपी अग्नि प्रज्ज्वलित होती है. परमधामके अद्वैत (एकात्म) भावके बिना इस तेजोमय अग्निसे अखिल ब्रह्माण्डमें कोई भी नहीं बच सकता है.
The heart of the celestial soul is enlightened Paramdham Arash, here the devine love burns, without unity consciousness (divine oneness) nothing other fire can ever save!

दिल मोमन अरस कह्या, बडा बेवरा किया इत।
दुनी दिल पर इबलीस, यों कहे कुरान हजरत।।४

ब्रह्मप्रियाओंके हृदयको परमधाम कहा है कुरानमें उनकी महिमाका वर्णन विस्तारपूर्वक हुआ है. इसी प्रकार हजरत मुहम्मदने कुरानमें यह भी कहा है कि संसारके लोगोंके हृदयमें दुष्ट इबलीसकी बैठक है.

The heart of the souls is the abode of Lord it is appreciated and explained extensively here. The heart of the worldly people is ruled by Satan (Iblish) Maya says so Hajrat Mohammad in holy Quran

हकीकत सों समझावना, समझें इसारतसों मोमन।
हक सूरत द्रढ कर दई, तब दिल अरस हुआ वतन।।६३

यह भी कहा है कि ब्रह्मात्माओंको यथार्थ ज्ञानके द्वारा समझाना, वे सङ्केत मात्रसे ही समझ जाएँगी. उन ब्रह्मात्माओंने जब परब्रह्म परमात्माके स्वरूपको अपने हृदयमें दृढ. कर लिया तभी उनका हृदय परमधाम कहलाया.

While teaching with the help of realities of the world, the celestial souls will understand even the cues or signals (hidden not explicitly said). They will adorn the form of the Supreme Commander in their heart and then the heart will be abode of Supreme, Paramdham.

महंमद बतावें हक सूरत, तिनका अरस दिल मोमन।
सो अरस दिल दुनी छोड के, पूजे हवा उजाड जो सुन।।८३

रसूल मुहम्मदने परमात्माका स्वरूप बताया है और उनका धाम ब्रह्म आत्माओंका हृदय बताया है. ऐसी (धामहृदया) ब्रह्म आत्माओंको छोड.कर संसारी जीव उजाड. शून्य-निराकारकी पूजा करते हैं.

Mohammad Rasool has described the form of the Supreme Lord and have also said the abode of Lord Supreme is the heart of the celestial souls. The worldly people worship nothingness,empty and formlessness as God instead of following such souls whose heart is abode of the Supreme.

तो अरस कह्या दिल मोमिन, पाया अरस खिताब।
इतहीं गिरो पैगंमरों, काजी कजा इत किताब।।८

ब्रह्मसृष्टिके हृदयको इसलिए परमधाम कहा है क्योंकि उनको ही परमधामके होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है. इन्हींके बीच पैगम्बरोंका समुदाय समाहित हुआ है और कुरानके अनुसार परमात्माने भी इन्हींके साथ आकर न्याय किया.

The heart of the souls is the abode of Lord as they have attained the honour of Paramdham(It is their original abode). The paigambars later joined them and Lord has done justice with them says the holy Quran.

अरस कह्या दिल मोमिन, सब अरस में न्यामत।
कह्या और दिल पर इबलीस, अब देखो तफावत।।८६

ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमात्माका धाम कहा गया है, उसी हृदयमें परमधामकी सभी सम्पदा समाई हुई है. संसारके अन्य लोगोंके हृदय पर तो दुष्ट इबलीसका साम्राज्य कहा गया है. देखो, ब्रह्मात्माओं और संसारके सामान्य जीवोंमें यही अन्तर है.

The heart of the souls is the abode of Lord along with all the splendor and bounties of the Paramdham. It is said the Satan(Maya) rules the heart of the worldly people.These are the main distinction between the two.

दिल मजाजी जो कहे, ताकों अरस दिल कबूं न होए ।
सो आए न सके वाहेदतमें, जिन दिल इबलीस कह्या सोए ।।२

जिनका हृदय मोहग्रस्त है वह परमात्माका धाम कभी नहीं हो सकता है. इसलिए नश्वर जगतके जीव कभी भी दिव्य परमधाममें नहीं आ सकते हैं. क्योंकि उनके हृदयमें दुष्ट इब्लीसका साम्राज्य है.

The heart which pursuits the worldly pleasure, is under the control of the senses and follows the will of the senses that heart cannot be the abode of the beloved Supreme Lord. Such souls can never be able to reach Paramdham and its eternal splendor, as their heart is ruled by the Satan (Iblish).

महामत कहें ऐ मोमिनो, राह बका ल्योगे तुम।
जिन का दिल अरस कह्या, औरों ना निकसे मुख दम।।८८

महामति कहते हैं, हे ब्रह्मात्माओ ! उक्त अखण्ड मार्ग पर तुम ही चल पाओगे, तुम्हारे हृदयको ही परमात्माका धाम कहा गया है. अन्य लोग

Oh my divine souls, only you can walk the walk of eternal and imperishable path and your heart is called the Paramdham the abode of beloved Lord. Other people enmeshed in worldly pleasure and pain cannot dare to agree to join this path even verbally and shall walk out of it.

तो हुकम दिया दिल अरस किया, हकें कह्या महंमद मासूक।
ए कौल सुन रूह मोमिन, हाए हाए हुए नहीं टूक टूक।।१५

अपना आदेश देकर धामधनी श्री श्यामाजी (सद्गुरु) के हृदयमें स्वयं विराजमान हुए और उनके हृदयको परमधाम बना दिया. धामधनीने श्यामाजीको अत्यन्त प्रिय कहकर उनकी प्रशंसा की. हाय ! इन वचनोंको सुनकर भी ब्रह्मात्माओंका हृदय विदीर्ण हो टुकड.े-टुकड.े नहीं हुआ.
इस मार्गकी बात भी मुखसे नहीं कह सकेंगे (फिर चलनेकी बात तो दूर ही रह गई).

The Lord first willed and made the heart of Shri Devachandraji his abode. Lord said to Shri Shyama that she is extremely dear to her and praised her. Alas, listening to these words when your heart did not turn into pieces out of separation and longing for Lord, then how can you walk on this path.

दिल अरस मोमिन कह्या, जामें अमरद सूरत।
छिन ना छूटे मोमिनसे, मेहेबूब की मूरत।।३१

ब्रह्मात्माओंके हृदयको ही परमधाम कहा गया है. क्योंकि उसमें किशोर स्वरूप परब्रह्म परमात्मा विराजमान हैं. इसलिए ब्रह्मात्माओंके हृदयसे क्षण मात्रके लिए भी प्यारे परमात्माका स्वरूप दूर नहीं होता.

The heart of celestial souls is the abode of Supreme, Paramdham, where resides the eternal living Lord's face. The celestial souls cannot live for a moment without beloved Shri Rajji the Supreme Lord's image.

दिल मोमिन अरस कह्या, ए जो असल अरसमें तन।
ए लिख्या फुरमानमें जाहेर, पर किया न बेवरा किन।।३५

ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम कहा गया है. उनका चिन्मय शरीर पर-आत्मा परमधाममें है. इस प्रकार कुरानमें स्पष्ट कहा है किन्तु किसीने भी उनका विवरण नहीं दिया कि वे ब्रह्मात्माएँ कौन हैं ?

The heart of celestial souls is the abode of Supreme, Paramdham whose real body is in the Paramdham itself the one over here is only the Surta(do not know in English) in the Jeev of this world. This is very clearly stated in holy Quran but no one has thrown light on who these souls are?

और दिल हकीकी अरस मोमिन, हकें दिल अरस कह्या इन।
दिल मजाजी गोस्त टुकडा, और ऊपर कह्या दुसमन।।४०

परमधामकी ब्रह्मात्माएँ ही सत्य हृदया हैं. इनके हृदयको ही परमात्माने अपना धाम कहा है. संसारके जीवोंका हृदय तो मात्र मांसपिण्ड है और उसमें भी दुष्ट शत्रु (इबलीस) बैठा हुआ है.

The souls coming from Paramdham are true at heart and their heart is the abode of the Lord. The heart of the worldly is a piece of meat and upon it sits the enemy (the Satan).

दुनियां दिल मजाजी इबलीस, दिल हकीकी पर हक।
एक गिरो दिल अरस कही, सोई अरस रूहें बुजरक।।४१

नश्वर जीवोंके झूठे हृदय पर दुष्ट इबलीस बैठा हुआ है एवं सत्य हृदय पर परमात्माकी बैठक है. जिस एक समुदायके हृदयको परमधाम कहा है वह परमधामकी श्रेष्ठ आत्माओंका ही समुदाय है.

The satan Iblish resides on the perishable worldly's heart which is not true (they have one thing in heart and display something else) and the Supreme Lord resides on the heart of the celestial soul whose heart is true.

वाहेदत निसबत अरस की, जब जाहेर हुई खिलवत।
ए सुकन सुन मोमिन, दिल लेसी अरस लज्जत।।४८

परमधामका अद्वैत सम्बन्ध एवं मूलमिलावाका अन्तरङ्ग रहस्य जब तारतम ज्ञाानके द्वारा स्पष्ट हो ही गया है तो इन वचनोंको सुनकर ब्रह्मात्माएँ अपने हृदयमें परमधामका आनन्द अनुभव करेंगी.

हम बंदे रूहें इन दरगाह के, कह्या दिल अरस मोमन।
यारों बुलावें महंमद, करो सेजदा हजूर अरस तन।।४

हम आत्माएँ इसी परमधामके वासी हैं और हम ब्रह्मात्माओंको धामहृदया भी कहा गया है. श्यामाजी अपने आत्माओंको बुलाकर कह रही हैं कि परमधामके अपने चिन्मय शरीरके द्वारा धामधनीके चरणोंमें प्रणाम करो.

कोई पांच बिने की दस करो, पालो अरकान लग आखर।
पर अरस बका हक का, दिल होए न मोमिन बिगर।।३०

कोई इन पाँच नियमोंके स्थान पर धर्मके दस नियमोंका पालन अन्तिम समय (कयामतकी घड.ी) तक क्यों न करे किन्तु ब्रह्मात्माओंके हृदयके अतिरिक्त अन्य किसी भी जीवका हृदय परमात्माका धाम नहीं बन सकता.

हक हादी रूहें लाहूतमें, ए महंमद रूहों वतन।
इसक हकीकत मारफत, तो हक अरस दिल मोमन।।५५

परब्रह्म परमात्मा श्रीराजजी, श्यामाजी तथा ब्रह्मात्माएँ इसी परमधाममें हैं. यही तो ब्रह्मात्मा तथा श्यामाजीका मूल घर है. इन्हीं ब्रह्मात्माओंमें अपने
धनीका अखण्ड प्रेम, यथार्थ ज्ञाान तथा पूर्ण पहचान है. इसीलिए इनके हृदयको परमात्माका धाम कहा गया है.

अरस दिल इनका कह्या, और कह्या हकीकी दिल।
एती बडाई इनको दै, जो वाहेदत इनों असल।।६४

इन्हीं आत्माओंके हृदयको परमधाम कहा गया है. ये ही आत्माएँ सत्यहृदया कही गइंर् हैं. इनको इतनी महत्ता इसीलिए दी गई है कि ये स्वयं
परब्रह्मसे अभिन्न तथा अद्वैत हैं.

चौदे तबक की जहानमें, किन तरफ न पाई अरस हक।
सो किया अरस दिल मोमिनों, ए निसबत मेहेर मुतलक।।६९

चौदह लोकोंकी सृष्टिमें किसी भी जीवको परमधाम तथा परमात्मा (परब्रह्म) का मार्ग प्राप्त नहीं हुआ. जबकि परमात्माने ब्रह्मात्माओंके हृदयको अपना परमधाम बनाया. वस्तुतः अद्वैत सम्बन्धके कारण ही उन पर यह विशेष कृपा हुई है.

जो मोमन बिने पांच अरसमें, सो होत बंदगी बातन।
जिन विध होत हजूर, सो करत अरस दिल मोमन।।२

ब्रह्मात्माओंके लिए कहे गए धर्मके पाँच नियम तो वस्तुतः परमधाममें ही अध्यात्मिक रूपसे सम्पन्न होते हैं. धामधनीके सान्निध्यमें जैसी उनकी दिनचर्या होती है उसीके अनुरूप धामहृदया आत्माएँ नश्वर संसारमें भी आचरण करती हैं.

दिल अरस हकीकी तो कह्या, जो हक कदम तले तन।
रसूल उमती उमती तो कहे, जो हक खिलवत बीच रूहन।।३

ब्रह्मात्माओंको इसीलिए धामहृदया कहा है कि उनकी परआत्मा परमधाममें धामधनीके चरणोंमें है. रसूलने वारंवार इनको ब्राह्मी समुदाय इसीलिए कहा कि ये आत्माएँ परमधाम मूलमिलावामें धामधनीके चरणोंमें ही हैं.

तिन हकें मोमिन दिल को, अपना कह्या अरस।
कह्या तुम भी उतरे अरस से, यों दै सोभा अरस परस।।३२

धामधनीने ब्रह्मात्माओंके हृदयको अपना परमधाम कहा है तथा यह भी कहा है कि तुम स्वयं परमधामसे इस संसारमें आई हो. इस प्रकार धामधनीने हमारा अद्वैत सम्बन्ध स्पष्ट कर परस्पर शोभा बढ.ाई है.

ए इलम लिए ऐसा होत है, रूह अपनी साहेदी देत।
बैठ बीच ब्रह्मांड के, अरस बका में लेत।।४९

इस तारतम ज्ञानको प्राप्त करने पर इस प्रकार अन्तर्दृष्टि खुल जाती है और आत्मा अपनी ही साक्षी देने लगती है. तब इस नश्वर संसारमें रहते हुए भी अखण्ड परमधामका अनुभव होने लगता है.

असल आराम हिरदे मिने, अरस को अखंड।
तब ए झूठे ख्वाब को, रहे न पिंड ब्रह्मांड।।९

जब हृदयमें परमधामके वास्तविक आनन्दका अनुभव हो जाएगा तब इस स्वप्नवत् खेलके पिण्ड तथा ब्रह्माण्डका अस्तित्व भी मिट जाएगा.

कायम हक के अरसमें, बैठे अपने ठौर।
हक के इत वाहेदतमें, कोई नाहीं काहूं और।।१०

धामधनीके अखण्ड घर परमधामके मूलमिलावामें हम सब आत्माएँ बैठी हैं. धामधनीके इस अद्वैत भूमिमें उनके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है.

We all are sitting in the eternal imperishable abode of the Lord firmly. In this land of the Supreme Lord there nothing but Lord.

महामत कहे ऐ मोमिनो, इसक लीजे हक।
असल अरस के बीचमें, हक का नाम आसिक।।११

महामति कहते हैं, हे सुन्दरसाथजी ! इस प्रकार धामधनीका अखण्ड प्रेम प्राप्त करो. क्योंकि अखण्ड परमधाममें श्रीराजजीको प्रेमी (आशिक) कहा गया है.

Mahamati Shri Prannath says O seeker, win the love of our beloved Lord. In the absolute abode, the Supreme commander is known as the lover.

एक हक बिना कछू ना रखें, दुनी करी मुरदार।
अरस किया दिल मोमिन, पोहोंचे नूर के पार।।१

ऐसी ब्रह्माङ्गनाएँ अपने दिलमें धामधनीके अतिरिक्त कुछ भी नहीं रखतीं. उन्होंने नश्वर संसारको मृतक तुल्य (तुच्छ) माना है. इसलिए धनीजीने ऐसी ब्रह्माङ्गनाओंके हृदयको परमधाम बना दिया. वे ही अक्षरके परे परमधाममें पहुँच सकीं हैं.

Supreme souls contemplate on One Lord and nothing else. They treat entire world as lifeless objects and are not affected by the external changes. The heart of such soul is the abode of the beloved Lord and they reach the Paramdham which is beyond Akshar.


दिल दिलगीरी छोड दे, होत तेरा नुकसान।
जानत है गोविंद भेडा, याको पीठ दिए आसान।।४

तुम हृदयकी हताशाको छोड. दो, इससे तो तुम्हें हानि हो रही है. यह संसार गोविन्द भेड.ा (भूतनगरी) के समान है. इसको पीठ देनेसे ही परमधामका मार्ग सरल बनेगा.

O my Souls, you abandon the pursuit of heart of joy and sorrow, it just harms you (distracts you from your soul goal). This world is an illusion and its pursuits are wasteful.Ease yourself by turning your back towards it.

बचन हमारे धाम के फैले हैं भरत खंड ।
अब पसरसी त्रैलोक में, जित होसी मुक्त ब्रह्मांड ॥

हमरे परमधामकी बातें पूरे भरतखण्ड में फैली है। अब चौदह लोकों में इसका विस्तार होगा, जिससे ब्रह्माण्ड के जीव मुक्त हो जाएँगे।

The words of paramdham is spread in Indian subcontinent. Now, it has to spread over entire universe and free all the living beings.


अरस कहिये दिल तिन का, जित है हक सहूर|
इलम इसक दोऊ हक के, दोऊ हक रोसनी नूर|| महासिंगार/२४/४२

Aras kahiae dil tin kaa, jit hai haq sahoor; Ilam isak dou haq ke, dou haq rosanee noor. Mahasingaar/24/42
उन्ही आत्माओं का दिल वस्तुतः परमधाम कहा गया है, जहाँ पर हर पल श्री राज जी का चिन्तन, उन्ही की चितवनी चलती रहेती है| वस्तुतः ज्ञान और प्रेम, दोनों ही श्री राजजी के तेजोमय प्रकाश स्वरुप की अमूल्य निधियाँ हैं|
Only that heart is said to be the Abode of the Lord Almighty, Paramdham, which constantly dwells on Him. As a matter of fact, Divine Knowledge and Divine Love, both are invaluable treasures of His Splendorous Form.

तुम लिखिया फुरमान में, हक अरस मोमिन कलूब|
तो सुकन पालो अपना, तुम हो मेरे महेबूब|| सागर/८/७

Tum likhiyaa furmaan mein, haq aras momin kaloob; To sukan paalo apnaa, tum ho mere meheboob. Saagar/8/7
आप ने ही कुरान में लिखवाया है कि ब्रह्मात्माओं का ह्रदय ही आप का परमधाम है| हे धनी! आप उन वचनों को पूर्ण करें| आप ही तो हमारे प्रियतम हैं|
You have written/foretold in Koran that the hearts of The Divine Souls is Your abode, is your Paramdhaam. O Almighty! Kindly fulfill your words/promise. You are our ONLY Beloved.

मोमिन होए सो देखियो, तुमारा दिल कह्या अरस ।
चारों घाट लीजो दिलमें, दिल ज्यों होए अरस परस ।।८

हे ब्रह्मात्माओ ! तुम्हारे हृदयको परमधाम कहा है, इसीलिए तुम इस दृश्यको देखो ! इन चारों घाटोंको हृदयमें अङ्कित करो, जिससे तुम्हारा हृदय इन शोभाओंसे ओत-प्रोत हो जाए.

एही पट आडे तेरे, और जरा भी नाहें।
तो सुख जीवत अरस का, लेवे ख्वाब के माहें।।३२

यही अहं तेरे और धामधनीके बीच आवरण बना हुआ है. इसके अतिरिक्त अन्य कोई आवरण ही नहीं है. इसको हटाने मात्रसे इस स्वप्नवत् संसारमें जीवित रहते हुए ही परमधामके सुखोंका अनुभव होगा.

हकें अरस किया दिल मोमिन, सो मता आया हक दिल से।
तुमें ऐसी बडाई हकें लिखी, हाए हाए मोमिन गल ना गए इनमें ।। ६

श्रीराजजीने ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम बनाया है. यह तारतम ज्ञाानरूपी सम्पदा भी उनके ही हृदयसे आई है. स्वयं धामधनीने तुम्हारी इतनी बड.ी प्रशंसा की है तथापि खेद है कि ब्रह्मात्माओंका हृदय द्रवित नहीं हो रहा है.

वरनन करो रे रूहजी, हकें तुम सिर दिया भार।
अरस किया अपने दिल को, माहें बैठाओ कर सिनगार।।१

महामति कहते हैं, हे मेरी आत्मा ! श्रीराजजीने तुझे गुरुतर दायित्व सौंपा है. अब तू उनके शृङ्गारका वर्णन कर. उन्होंने ब्रह्मआत्माओंके हृदयको अपना धाम बनाया है. इसलिए तू सम्पूर्ण शृङ्गारसे सुसज्जित उनके स्वरूपको अपने हृदयमें अङ्कित कर.

रात दिन बसें हक अरस में, मेरा दिल किया अरस सोए।
क्यों न होए मोहे बुजरकियां, ऐसा हुआ न कोई होए।।३

श्रीराजजी सर्वदा अखण्ड परमधाममें रहते हैं. अब उन्होंने मेरे हृदयको अपना परमधाम बनाया है. इसलिए मुझे श्रेष्ठतम गौरव क्यों प्राप्त नहीं होगा ? यह विशेषता आज तक किसीको भी प्राप्त नहीं हुई हैं और भविष्यमें भी नहीं होगी.


पहेले कहूं अव्वल की, हक हादी हुकम।
मोमिन दिल अरस में, हकें धरे कदम।।१

महामति कहते हैं, अब मैं सर्वप्रथम श्रीराजजी और श्री श्यामाजी(श्री देवचन्द्रजी) के आदेशानुसार परमधाम मूलमिलावेका वृत्तान्त कहता हूँ. जिस प्रकार श्री राजजीने ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम बनाकर उनमें अपने चरणकमल प्रतिष्ठित किए हैं.

दिल मोमिन अरस कह्या, सैतान दुनी दिल पर ।
क्यों गिरो दुनी भेली चले, भई तफावत यों कर ।।१५

इसीलिए ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम कहा है, नश्वर जगतके जीवोंके हृदयमें तो दुष्ट इब्लीसका साम्राज्य है. इस प्रकार नश्वर जगतके जीव ब्रह्मात्माओंके साथ कैसे चल सकते हैं ? इन दोनों समुदायोंमें यही अन्तर है.


दिल अरस मोमिन कह्या, तित आए हक सुभान ।
सो दिल पाक औरों करे, जाए देखो मगज कुरान ।।४३

ब्रह्मात्माओं (मोमिनों) के दिलको तो परमधाम कहा है, जहाँ परमात्मा (हक सुभान) आकर विराजमान होते हैं. ऐसी आत्माएँ अन्य लोगोंके दिलोंको भी पवित्र बना देतीं हैं. जरा कुरानके रहस्योंको तो समझो.


राह पकडे तौहीद की, धरे महंमद कदमों कदम।
सो जानो दिल मोमिन, जिन दिल अरस इलम।।१९

जो आत्माएँ अद्वैतका मार्ग ग्रहण कर अन्तिम मुहम्मद (मेरे) के पदचिह्नों पर चलती हैं तथा जिनका हृदय परमधामके ज्ञाानसे प्रकाशित है, उन्हीं ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम कहा गया है.

दिल मोमन अरस कह्या, बडा बेवरा किया इत।
दुनी दिल पर इबलीस, यों कहे कुरान हजरत।।४

ब्रह्मप्रियाओंके हृदयको परमधाम कहा है कुरानमें उनकी महिमाका वर्णन विस्तारपूर्वक हुआ है. इसी प्रकार हजरत मुहम्मदने कुरानमें यह भी कहा है कि संसारके लोगोंके हृदयमें दुष्ट इबलीसकी बैठक है.


हकीकत सों समझावना, समझें इसारतसों मोमन।
हक सूरत द्रढ कर दई, तब दिल अरस हुआ वतन।।६३

यह भी कहा है कि ब्रह्मात्माओंको यथार्थ ज्ञाानके द्वारा समझाना, वे सङ्केत मात्रसे ही समझ जाएँगी. उन ब्रह्मात्माओंने जब परब्रह्म परमात्माके स्वरूपको अपने हृदयमें दृढ. कर लिया तभी उनका हृदय परमधाम कहलाया.

महंमद बतावें हक सूरत, तिनका अरस दिल मोमन।
सो अरस दिल दुनी छोड के, पूजे हवा उजाड जो सुन।।८३

रसूल मुहम्मदने परमात्माका स्वरूप बताया है और उनका धाम ब्रह्म आत्माओंका हृदय बताया है. ऐसी (धामहृदया) ब्रह्म आत्माओंको छोड.कर संसारी जीव उजाड. शून्य-निराकारकी पूजा करते हैं.

तो अरस कह्या दिल मोमिन, पाया अरस खिताब।
इतहीं गिरो पैगंमरों, काजी कजा इत किताब।।८

ब्रह्मसृष्टिके हृदयको इसलिए परमधाम कहा है क्योंकि उनको ही परमधामके होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है. इन्हींके बीच पैगम्बरोंका समुदाय समाहित हुआ है और कुरानके अनुसार परमात्माने भी इन्हींके साथ आकर न्याय किया.


अरस कह्या दिल मोमिन, सब अरस में न्यामत।
कह्या और दिल पर इबलीस, अब देखो तफावत।।८६

ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमात्माका धाम कहा गया है, उसी हृदयमें परमधामकी सभी सम्पदा समाई हुई है. संसारके अन्य लोगोंके हृदय पर तो दुष्ट इबलीसका साम्राज्य कहा गया है. देखो, ब्रह्मात्माओं और संसारके सामान्य जीवोंमें यही अन्तर है.


महामत कहें ऐ मोमिनो, राह बका ल्योगे तुम।
जिन का दिल अरस कह्या, औरों ना निकसे मुख दम।।८८

महामति कहते हैं, हे ब्रह्मात्माओ ! उक्त अखण्ड मार्ग पर तुम ही चल पाओगे, तुम्हारे हृदयको ही परमात्माका धाम कहा गया है. अन्य लोग तो इस मार्गकी बात भी मुखसे नहीं कह सकेंगे (फिर चलनेकी बात तो दूर ही रह गई).

हुकम दिया दिल अरस किया, हकें कह्या महंमद मासूक।
ए कौल सुन रूह मोमिन, हाए हाए हुए नहीं टूक टूक।।१५

अपना आदेश देकर धामधनी श्री श्यामाजी (सद्गुरु) के हृदयमें स्वयं विराजमान हुए और उनके हृदयको परमधाम बना दिया. धामधनीने श्यामाजीको अत्यन्त प्रिय कहकर उनकी प्रशंसा की. हाय ! इन वचनोंको सुनकर भी ब्रह्मात्माओंका हृदय विदीर्ण हो टुकड.े-टुकड.े नहीं हुआ.


दिल अरस मोमिन कह्या, जामें अमरद सूरत।
छिन ना छूटे मोमिनसे, मेहेबूब की मूरत।।३१

ब्रह्मात्माओंके हृदयको ही परमधाम कहा गया है. क्योंकि उसमें किशोर स्वरूप परब्रह्म परमात्मा विराजमान हैं. इसलिए ब्रह्मात्माओंके हृदयसे क्षण मात्रके लिए भी प्यारे परमात्माका स्वरूप दूर नहीं होता.


मता मोमिन का काफर, ले ना सके क्योंए कर।
दिल मोमिनका अरस कह्या, दिल काफर इबलीस घर ।।४

वास्तवमें ब्रह्माङ्गनाओंकी सम्पत्तिको संसारके नास्तिक लोग कदापि ले नहीं सकते. ब्रह्माङ्गनाओंके हृदयको परमात्माका धाम कहा गया है. इन जीवोंके नास्तिक हृदय पर कलियुग (शैतान) सवार है.


हकें जगाए मोमिन, अपनी जान निसबत।
अरस किया दिल मोमिन, बैठाए बीच खिलवत।।

ब्रह्मस्वरूप सद्गुरुने ब्रह्माङ्गनाओंको अपने मूल सम्बन्धी मानकर जागृत किया. उनके हृदयको परमधाम बनाया तथा उन्हें मूलमिलावाकी बैठकमें बैठी हुइंर् अनुभव करवाया.


दिल हकीकी रूहें अरस की, जामें आप आसिक हुआ सुलतान ।
तो कही गिरो ए रबानी, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।१

परमधामकी ब्रह्मात्माएँ सच्चे दिलवाली हैं, जिनके बीच स्वयं पूर्णब्रह्म परमात्मा (सुल्तान) चाहक (आशिक) बनकर बैठे हैं. कुरानमें इस समुदायको ब्रह्मात्माओंका समुदाय (रब्बानी गिरोह) कहा है. ऐसी ब्रह्मात्माओंके दिलको ही पूर्णब्रह्म परमात्मा (सुभान) का परमधाम (अर्श) कहा गया है.


जेता कोई दिल मजाजी, चढ सके न नूर मकान ।
दिल हकीकी पोहोंचे नूर तजल्ला, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।२

जो आत्माएँ विकारयुक्त दिलवाली (दिल मजाजी) हैं, वे अक्षर धाम (नूर मकान) तक भी नहीं पहुँच सकतीं. सच्चे हृदयवाली (दिल हकीकी) ब्रह्मात्माएँ तो परमधाम (नूरतजल्ला) पहुँच जातीं हैं. ऐसी ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमात्माका धाम कहा गया है.


रूहें उतरी लैलत कदर में, सो उमत रबानी जान ।
इनको हिदायत हक की, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।३

जो आत्माएँ महिमामयी रात्रि (लैल-तुल-कद्र) के तीनों खण्डोंमें खेल देखनेके लिए उतरी हैं, वे ब्रह्मात्माएँ (रब्बानी गिरोह) कहलातीं हैं. उनको ही परमात्माका सन्देश (उपदेश) प्राप्त हुआ है. ऐसी ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमात्माका परमधाम कहा गया है.

होवे फारग दुनी के सोर सें, ए दिल हकीकी निसान ।
करें हजूर बातून बंदगी, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।४

सच्चे दिलवाली आत्माओंके लक्षण हैं कि वे साँसारिक (दुनियाँके) बन्धनोंके कोलाहल वाले वातावरणसे अलग रहतीं हैं. ऐसी ब्रह्मात्माएँ परब्रह्म परमात्माके समीप रहकर हृदयसे उनकी वन्दना करतीं हैं. इन ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमात्माने अपना धाम बनाया है.


हकें कौल किया जिन रूहन सों, सोई वारस हैं फुरकान ।
जिन वास्ते आए हक मासूक, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।५

पूर्णब्रह्म परमात्माने जिन आत्माओंको जगानेके लिए परमधामकी साक्षियोंको भेजनेका वचन दिया था, वे ही ब्रह्मात्माएँ कुरानकी सच्ची उत्तराधिकारिणी हैं. प्रियतम परमात्मा उन्हीं ब्रह्मात्माओंके लिए (माशूक बनकर) परमधामसे इस संसारमें आए हैं. ऐसी ब्रह्मात्माओंका हृदय ही परमात्माका परमधाम है.


याही वास्ते इमाम रूहअल्ला, आए उतर चौथे आसमान ।
कौल किया लाहूत में इनों से, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।६

इन्हीं ब्रह्मात्माओंके लिए श्यामाजी (रुह अल्लाह) सद्गुरु (इमाम) बनकर परमधाम (चौथे आसमान)से इस संसारमें आईं हैं. इन्हीं ब्रह्मात्माओंको जागृत करनेके लिए श्यामाजीको भेजनेका वचन परब्रह्म परमात्माने परमधाममें दिया था. इसलिए इन्हीं ब्रह्मात्माओंके हृदयमें परमात्माका सिंहासन सुशोभित है.


ए गिरो कै बेर बचाई तोफान से, और डुबाई कुफरान ।
एही उमत खासी महंमदी, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।

ब्रह्मात्माआंेके इस समुदायको स्वयं परमात्माने कई बार विपत्तियों (तूफानों)से बचाया है और नास्तिक (काफिर) जीवोंको डुबोया है. श्यामाजीका खास समुदाय (मुहम्मदी उमत) यही है. इनके ही हृदयको परमात्माने परमधाम बनाया है.


एही नाजी फिरका तेहेतरमा, जिनमें लुदंनी पेहेचान ।
खोलें हक इसारतें रमूजें, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।८

रसूल महम्मदने इसी समुदायको तिहत्तरवाँ फिरका 'नाजी फिरका' कहा है. इनको ही तारतम ज्ञाान (इलम लुदन्नी) की पहचान है. इसी तारतम ज्ञाानके द्वारा ये आत्माएँ कुरानमें पूर्णब्रह्म परमात्माके लिए किए गए संकेतोंका रहस्य खोलतीं हैं. इन्हीं आत्माओंके हृदयमें परमात्माका सिंहासन है.

हरफ मुकता इनों वास्ते, रखे बातून माहें फुरमान ।
सो खासे करसी जाहेर, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।९

कुरानके मुक्तआत (अलफ लाम मीम इत्यादि) इन्हीं ब्रह्मात्माओंके लिए गुप्त रख दिए हैं. ये ही सच्ची हृदयवाली आत्माएँ इन रहस्योंको स्पष्ट करेंगी. इनके हृदयको ही परमात्माने परमधाम बनाया है.

हकें सिफत लिखी नामें पैगंमरों, बीच हदीसों कुरान ।
सो कही सिफत सब महंमदकी, ए जाने दिल मोमिन अरस सुभान ।।१०

परमात्माने रसूल पैगम्बर द्वारा कुरान, हदीसों एवं पैगम्बरनामा (नूरनामा) में पैगम्बरोंकी विशेषताएँ अनेक प्रकारसे बताई हैं. ये सारी विशेषताएँ पूर्णब्रह्म परमात्मा द्वारा प्रशंसित (मुहम्मद) श्यामाजीके समूह-ब्रह्मात्माओंकी प्रशंसाके लिए हैं. इस रहस्यको वही ब्रह्मात्माएँ जानतीं हैं, जिनके हृदयको परमात्माने परमधाम बनाया है.

एही भांत उमत महंमद की, कही सिफत रसूल समान ।
धरे बोहोत नाम उमत के, ए जाने दिल मोमिन अरस सुभान ।।११

इस प्रकार ब्रह्मात्माओंके समुदायको कुरान और हदीसोंमें रसूल मुहम्मदके समान कहकर उनकी प्रशंसा की है और उनके कई नाम भी बताए हैं. इन रहस्योंको वे ही ब्रह्मात्माएँ जानतीं हैं, जिनके हृदयमें परमात्मा विराजमान हैं.


जबराईल असराफील, हक नजीकी निदान।
सो भी आए उमत वास्ते, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।१२

कुरानमें कहा है कि परब्रह्म परमात्माके निकट रहने वाले फरिश्ते जिब्रिल और असराफील भी ब्रह्मात्माओंके लिए ही संसारमें आए हैं. इसलिए उन ब्रह्मात्माओंके दिलको परमधाम कहा है.


ए सब किया महंमद वास्ते, चौदे तबक की जहान ।
सो महंमद आए उमत वास्ते, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।१३

चौदह लोकोंकी पूरी दुनियाँ परमात्मा द्वारा प्रशंसित (मुहम्मद) श्यामाजी के लिए बनाई गई है. यही श्यामाजी ब्रह्मात्माओंके लिए इस खेलमें अवतरित हुईं हैं. उन्हीं ब्रह्मात्माओंका हृदय परमात्माका धाम है.


निसान लिखे कयामत के, फुरमान हदीसों दरम्यान ।
सो भी खोले एही उमत, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।१४

कुरान और हदीसोंमें अन्तिम (कयामत) समयकी निशानियाँ लिखी गइंर् हैं. उनके रहस्योंको भी ये ही ब्रह्मात्माएँ स्पष्ट कर सकतीं हैं, जिनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.


उठाई गिरो एक अदल से, कयामत बखत रेहेमान ।
देसी महंमद की साहेदी, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।१५

कयामतके समय परम कृपालु परमात्माने एक समुदायको न्याय देकर अर्थात् तारतम ज्ञाानसे खेल और परमधामकी पहचान करवा कर जाग्रत किया. वही समुदाय आखिरी मुहम्मदकी साक्षी देने वाला है. इन्हीं ब्रह्मात्माओंके हृदयमें ही परम कृपालु परमात्मा विराजमान हैं.

कहूं बेवरा मोमिन दुनी का, जो फुरमाया फुरमान ।
सक सुभे इनमें नहीं, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।१६

कुरानमें ब्रह्मात्मओं और दुनियाँका जो विवरण दिया है, उसके सन्दर्भमें ब्रह्मात्माओंको किसीभी प्रकारकी शङ्का नहीं है. उन्हीं ब्रह्मात्माओंके हृदयमें परमात्मा विराजमान हैं.

दिल मजाजी दुनी सरीयत, सो सके ना पुल हद भांन ।
याको तोड उलंघे ले हकीकत, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।१

विकारी दिलवाले दुनियाँके लोग कर्मकाण्डको ही महत्त्व देते हैं. वे इस नश्वरताकी सीमासे पार नहीं जा सकते. नश्वरताकी इस सीमाको लाँघकर यथार्थज्ञाान ग्रहण करनेवाली आत्माओंके हृदयमें ही परमात्मा विराजमान हैं.

दिल मुरदा मजाजी जुलमत से, पैदा कुंन केहेते कुफरान ।
क्यों होेए सरभर मोमिनों, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।१८

परमात्माके द्वारा 'हो जा' (कुन्न) कहने मात्रसे शून्य निराकारसे पैदा हुए विकारी दिलवाले स्वप्नवत् तुच्छ जीव ब्रह्मात्माओंके समान कैसे हो सकते हैं, जिन ब्रह्मात्माओंके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

ए जो कही गिरो मलकूती, पैदा जुलमत से दुनी फान ।
रूहें फिरस्ते उतरे अरस से, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।१९

इस प्रकार शून्य निराकार (जुलमत) से पैदा हुई झूठी दुनियाँके लोगोंको मलकूती गिरोह अर्थात् वैकुण्ठके अधिकारी कहा गया है. ब्रह्मात्माएँ तथा ईश्वरी सृष्टि (फरिश्ते) अपने-अपने धामसे उतरीं हैं. किन्तु ब्रह्मात्माओेंके हृदयमें ही परमात्मा विराजमान हैं.

दिल मजाजी गोस्त टुकडा, किया रसूलें मुख बयान ।
सो क्यों उलंघे जुलमत को, बिना दिल मोमिन अरस सुभान ।।२०

सांसारिक चित्तवृत्तिवाले नश्वर जीवोंके हृदयको कुरानमें रसूल मुहम्मदने मांसपिण्ड (गोश्तका टुकड.ा) कहा है. वे शून्य निराकारको लाँघकर पार नहीं जा सकते. केवल वे ही आत्माएँ पार जा सकतीं हैं, जिनके हृदयको परमात्माने अपना धाम बनाया है.

जो उतरे होवे अरस से, रूहें तौहीद के दरम्यान ।
सो लेसी अरस अजीम को, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।२१

जो आत्माएँ अद्वैत परमधामसे अवतरित हुइंर् हैं, वे ही परमधामका सुख प्राप्त कर सकतीं हैं. उनके ही हृदयमें परमात्मा विराजमान हैं.

जो मुरदार करी दुनी मोमिनों, सो दिल मजाजी खान पान ।
नूर बिलंद पोहोंचे पाक होए के, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।२२

ब्रह्मात्माओंने जिस दुनियाँको झूठी समझकर तुच्छ (मुरदार) माना है, उसी दुनियाँको सांसारिक चित्तवृत्ति वालोंने आहार (खान-पान)की भाँति अपनाया है. ब्रह्मात्माएँ पवित्र रहकर अपनी सुरतासे परमधाम (नूरबिलन्द) में विचरण करतीं हैं. ऐसी आत्माओंके हृदयमें ही परमात्मा विराजमान हैं.

कह्या पर जले जबराईल, चढ सक्या न चौथे आसमान ।
रूहें बसें तिन लाहूत में, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।२३

रसूल मुहम्मदने बताया कि परमधाम (चौथे आसमान) जाते हुए जिब्रिल फरिश्ताके पंख जलने लगे और वह वहाँ तक नहीं पहुँच पाया, जब कि ब्रह्मात्माएँ उस परमधाममें सर्वदा रहतीं हैं. उन्हीं ब्रह्मात्माओंके हृदयमें परमात्मा विराजमान हैं.

मुरग अंदर बैठा खाक ले चोंचमें, ना जबराईल तिन समान ।
ए माएने म्याराज रूहें जानहीं, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।२४

कुरानमें कहा है, परमात्माके दर्शनके लिए जाते हुए मुहम्मद साहेबने परमधाममें देखा कि अपनी चोंचमें खाक लेकर एक मुर्गा बैठा हुआ है और यह भी कहा है कि जिब्रिल फरिश्ता उस मुर्गेके समान नहीं है. इस रहस्यको भी परमधामकी आत्माएँ ही जान सकतीं हैं, जिनके हृदयमें परमात्मा विराजमान हैं.

पोहोंचे महंमद म्याराजमें, दो गोसे फरक कमान ।
इत रूहें रहें दरगाह मिने, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।२५

जब मुहम्मद साहेब दर्शनके लिए आगे बढे. तो उस समय उनके और परमात्मा (खुदा)के बीच दो कमानकी दूरी थी. इधर ब्रह्मात्माएँ तो सर्वदा उसी परमधामके अन्दर रहनेवाली हैं और इनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

नबे हजार हरफ कहे नबी को, तामें कछू गुझ रखाए रेहेमान ।
सो माएने जाहेर किए, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।२६

दर्शनके समय परमात्माने रसूल पैगम्बरको नब्बे हजार शब्दों (हर्फों)में उपदेश दिया और कहा कि उनमें-से कुछ गुह्य रखना. उन गुह्य रहस्योंको वही आत्माएँ प्रकट करतीं हैं, जिनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

किए आपसमें रूहें गवाही, हकें अपनी जुबान।
याको जाने दिल हकीकी, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।२

परमधाममें प्रेम सम्वादके समय श्रीराजजीने अपनी जिह्वासे ब्रह्मात्माओंको कहा था कि हे ब्रह्मात्माओ ! खेलमें जानेके बाद तुम एक दूसरेकी साक्षी बनना. इस रहस्यको सच्चे हृदयवाली ब्रह्मात्माएँ ही जान सकतीं हैं, जिनके हृदयमें परब्रह्म परमात्माका वास है.

दिया जवाब रूहों हक को, ए सुकन दिल बीच आन ।
ए रूहें रहें हक हजूर, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।२८

श्री राजजीके इन वचनोंको हृदयमें ग्रहण करते हुए ब्रह्मात्माओंने उनको अपना स्वीकारात्मक उत्तर दिया था (कि आप ही हमारे सर्वस्व हैं और हम आपको नहीं भूलेंगी). ये ही ब्रह्मात्माएँ सदैव धामधनीके शरणमें रहतीं हैं, क्योंकि उनका हृदय ही श्रीराजजीका धाम बना हुआ है.

कह्या मोतिन के मुंह कुलफ, ए माएने तोडत पढों गुमान ।
ए अरस तन रूहें जानहीं, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।२९

कुरानमें ऐसा कहा है कि हजरत मुहम्मद साहेबने दर्शनके समय परमधाममें देखा कि ब्रह्मात्माओं (मोतियों)के मुखपर ताला (कुलफ) पड.ा है. कुरानके इस वाक्यका अर्थ स्वयंको विद्वान कहलाने वाले लोगोंका गर्व (गुमान) भी तोड. देता है, अर्थात् वे इसे स्पष्ट नहीं कर सकते. इस रहस्यको परमधामकी आत्माएँ ही जान सकतीं हैं, जिनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

पोहोंच्या म्याराजमें गुनाह मोमिनों, ए सुन उरझे मुसलमान ।
ठौर गुन्हें न पोहोंच्या जबराईल, ए जाने दिल मोमिन अरस सुभान ।।३०

म्याराजके प्रसंगमें रसूलने कहा कि (कुरानमें कहा है- म्याराजके समयमें खुदाने रसूल मुहम्मदको कहा कि तेरी रूहोंने गुनाह किया है इस प्रकार) ब्रह्मात्माओं तक गुनाह पहुँच गया है, ये वचन सुनकर मुसलमान उलझ रहे हैं. जिस स्थान पर स्वयं जिब्रील फरिश्ता भी नहीं पहुँचा, ऐसे स्थान पर गुनाह कैसे पहुँच सकता है ? इस रहस्यको वही आत्माएँ जान सकतीं हैं, जिनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

हकें हाथ हिसाब लिया मोमिनों, तोडया गुमान दे नुकसान ।
तित बैठे अपना अरस कर, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।३१

परमात्माने ब्रह्मात्माओंका न्याय (हिसाब) अपने हाथमें लिया एवं उनको प्रेमकी परीक्षामें असफल दिखाकर उनके अहङ्कारको भी तोड. दिया. फिर भी उनके हृदयमें वे स्वयं अपना आसन बनाकर बैठ गए. ऐसी ब्रह्मात्माओंके हृदयको ही परमधाम कहा है.

पोहोंची तकसीर रूहें अरस में, हके फुरमाया फुरमान ।
तित दूजा कोई न पोहोंचिया, बिना दिल मोमिन अरस सुभान ।।३२

कुरानमें परमात्माकी ओर से ऐसा कहलाया है कि परमधाममें आत्माओंके मध्य तकसीर (जगतमें आकर भूल जानेका दोष) पहुँची है. वस्तुतः वहाँ पर उन ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त अन्य कोई भी नहीं पहुँच सकता. इस रहस्यको केवल वे ब्रह्मात्माएँ ही जान सकतीं हैं, जिनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं

आसिक नाचे अरस अजीममें, दूजा नाच न सके इन तान ।
और राहैमें जले आवते, बिना दिल मोमिन अरस सुभान ।।३३

ऐसा भी कहा गया है कि परमधाममें आशिक ब्रह्मात्माएँ सर्वदा प्रेम-आनन्दमें मस्त होकर नाचती-झूमती रहतीं हैं, अन्य कोई भी इस मस्तीमें नहीं आ सकता. जिन आत्माओंके हृदयको परमात्माने परमधाम बनाया है, उनके अतिरिक्त कोई भी जीव इस ओर जाने लगे तो वह मार्गमें ही जल जाता है.

जो गिरो भाई कहे महंमद के, ताको इसकै में गुजरान ।
वाको एही फैल एही बंदगी, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।३४

जिस समुदायको रसूल मुहम्मद साहेबने अपना भाई कहा है, वे ब्रह्मात्माएँ सर्वदा प्रेममय वातावरणमें रहतीं हैं. उनकी दिनचर्या एवं उनकी पूजा भी प्रेम ही है, इसलिए उनका हृदय ही परमात्माके लिए परमधाम बन जाता है.

एही खासल खास गिरो महंमदी, जाकी बंदगी इसक ईमान ।
इनों फैल ऊपरका ना रहे, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।३५

यही सर्वोत्तम (खासल-खास) समुदाय श्यामाजीका समुदाय (मुहम्मदी गिरोह) कहलाता है. जिनकी पूजा-पाठ सब प्रेम और विश्वास ही है. ये आत्माएँ बाह्याचरण अथवा कर्मकाण्डको महत्त्व नहीं देतीं, क्योंकि इनके हृदयको परमात्माने परमधाम बनाया है.

दूजा जले इन राहमें, ए वाहेदत का मैदान।
तीन सूरत महंमद या रूहें, ए एकै दिल मोमिन अरस सुभान ।।३६

इन ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त अन्य लोग इस प्रेमके मार्गमें चल ही नहीं सकते, वे तो बीचमें ही जल जाते हैं क्योंकि यह तो अद्वैत भूमिकाका मार्ग है. कुरानमें यह भी कहा है कि परमात्माका आदेश (हुकम) लेकर संसारमें आने वाले तीन स्वरूप (बशरी, मलकी और हकीकी) तथा ब्रह्मात्माएँ ये सब परमधाममें एक ही दिल (रूप) हैं. पूर्णब्रह्म परमात्मा उनके अन्दर ही विराजमान हैं.

महंमद क्यों ल्याए खासी उमत, इन बीच जिमी हैवान ।
ए उमत जाने इन स्वाल को, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।३

पाशविक वृत्तियोंसे भरी हुई इस दुनियाँ (हैवान जिमीं) में श्रीश्यामाजी (मुहम्मद) अपनी आत्माओंके समुदायको क्यों लाई हैं, इस प्रश्नका उत्तर भी ये ही ब्रह्मात्माएँ जान सकतीं हैं, जिनके हृदयको परमात्माने अपना धाम बनाया है.

गलित गात अंग भीगल, ए दिल हकीकी गलतान ।
ए वाहेदत हक हादी गिरो, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।३८

सच्चे और पवित्र हृदयवाली ब्रह्मात्माएँ अपने धनीके प्रेममें गलितगात्र (भीगी हुई) रहतीं हैं. ऐसी आत्माएँ, श्यामाजी तथा पूर्णब्रह्म परमात्मा वस्तुतः अद्वैत स्वरूप हैं. ऐसा अनुभव वही आत्माएँ कर सकतीं हैं, जिनके हृदयमें स्वयं श्रीराजजी विराजमान हैं.

बका तरफ कोई न जानत, पढे ढूंढ ढूंढ हुए हैरान ।
सो बका हदें सब बेवरा किया, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।३९

परमधामके सन्दर्भमें कोई भी नहीं जान पाता. पढे. लिखे विद्वान लोग भी ढूँढ.-ढूँढ.कर दुःखी हो गए हैं. इस सीमित जगतमें रहकर भी परमधामका वर्णन करनेकी क्षमता उन्हीं ब्रह्मात्माओंमें है, जिनके हृदयमें पूर्णब्रह्म परमात्मा विराजमान हैं.

अरस बका के बयान की, हुती न काहूं सुध सान ।
सो जरे जरा जाहेर करी, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।४०

परमधामके वर्णन करनेकी बुद्धि व क्षमता किसीके पास नहीं थी, किन्तु ब्रह्मात्माओंने वहाँके कण-कणका वर्णन कर बताया, उनके ही हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

लिखी हकें इसारतें रमूजें, सो किन खोली न फिरस्ते इनसान ।
सो दुनी सब बेसक हुई, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।४१

कुरानमें लिखे गए संकेत तथा रहस्यकी बातें अभी तक अवतारों अथवा मनुष्योंने स्पष्ट नहीं कीं. परमात्माको अपने हृदयमें बैठाने वाली ब्रह्मात्माओंने उसे स्पष्ट किया, तो सबके सन्देह मिट गए और सभी सन्देह रहित (बेशक) हो गए.

रूहअल्ला की किल्ली से, खुले बका द्वार देहेलान ।
ए तीन सूरत कही महंमद की, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।४२

श्यामाजी (रूहअल्ला) के अवतार श्री देवचन्द्रजी महाराजको प्राप्त कुञ्जी (तारतम ज्ञाान) के द्वारा परमधामके सभी द्वार खुल गए हैं. इसलिए ब्रह्मात्माओंने मुहम्मदके तीनों स्वरूपों (बशरी, मलकी और हकीकी) के रहस्यको भी प्रकट किया है, उनके ही हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

तो हुई दुनी सब हैयाती, जो उडाए दिया उनमान ।
पट खोले महंमद भिस्त के, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।४३

जब श्यामाजी (मुहम्मद)ने मेरे हृदयमें प्रकट होकर तारतम ज्ञाानके द्वारा परमात्मा विषयक अनुमानको उड.ा दिया और मुक्तिस्थलों (बहिश्तों)के द्वार खोल दिए, तब सारी दुनियाँ अखण्ड हो गई. इस रहस्यको जाननेवाली ब्रह्मात्माओंके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

सब जिमी पर सेजदा, किया फिरस्ते घस पेसान ।
पर होए न हकीकी दिल बिना, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।४४

अजाजील फरिश्ताने सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपना सिर घिसकर दण्डवत प्रणाम किया, किन्तु इस रहस्यको सच्चे हृदयवाली ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जान सकता. इन ब्रह्मात्माओंके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.

कलमा निमाज रोजा दिल से, दे जगात आप कुरबान ।
करे हज बका हमेसगी, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।४५

जिन आत्माओंके हृदयमें प्रियतम परमात्मा विराजमान हैं, ऐसी आत्माएँ अपने दिलसे ही कलमा, निमाज अथवा रोजा करतीं हैं. वे अहंभावको सर्मिपत (त्याग) कर दान (जकात) देतीं हैं, तथा परमधामका ही तीर्थाटन (हज) किया करतीं हैं.

Repeatation of mantra, prayer, fasting the celestial souls do from their heart and their donation/giving is surrendering the self to Supreme (दे जगात आप कुरबान), their pilgrimage is eternal imperishable Paramdham, in the heart of the soul is abode =aras of the Supreme.

जिन चांद नूर देख्या महंमदी, सोई रोजे रमजान ।
न जाने दिल मुरदा मजाजी, ए जाने दिल मोमिन अरस सुभान ।।४६

जिन ब्रह्मात्माओंने आखिरी मुहम्मदके मुख चन्द्रका नूर देख लिया, वे ही रमजानके महीनेमें
रोजा रखनेका गूढ.ार्थ जानतीं हैं. सांसारिक वृत्तिवाले मायावी जीव इस रहस्यको नहीं जान सकेंगे. इसे तो वही आत्माएँ जानती हैं, जिनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.
The one who has seen the enlightening of the moon of the prophet will know the meaning of Ramjaan. The worldly people as good as dead will not know but the soul whose heart is abode (Aras Subhan ) of Supreme will know.

सुध ना रोजे रमजान की, ना चांद सूरज पेहेचान ।
करें सरीकी गिरो रबानी, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।४

जिनको रमजानके महीनेमें व्रत (रोजा) रखनेका ज्ञाान नहीं है, वे चाँद तथा सूर्यको नहीं पहचानते हैं. ऐसे लोग अपनी समानता उन ब्रह्मात्माओंसे करना चाहते हैं, जिनके दिलमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं. (यहाँ पर चाँद और सूर्यका तात्पर्य श्रीदेवचन्द्रजी तथा श्रीप्राणनाथजीसे है).
They are not conscious about the fasting Roja and Ramjaan neither they know the sun and moon (Remember sun (Mihiraj means sun), Devachandra means moon). Such people try to be equal to the soul whose heart is the abode of Supreme.

जब ले उठसी रूहें लुदंनी, तब होसी सब पेहेचान ।
दै हैयाती सबन को, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।४८

जब ब्रह्मात्माएँ जागृत हो कर तारतम ज्ञाानका प्रकाश फैलाएँगी, तब सबको उनकी पहचान हो जाएगी. ऐसी आत्माएँ, जिनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं, ही सबको अखण्ड स्थल प्रदान करेंगी.
When these souls awaken by the tartam gyaan then all will be able to know and thus all will gain the eternity by the souls whose heart is the abode of the Supreme.

ईसें आब हैयाती पिलाइया, काढया कुफर जिमी आसमान ।
दीन एक किया सब इसलाम, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।४९

सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजी महाराजने तारतम ज्ञाानके रूपमें दिव्य अमृत (हैयाती आब) पिलाकर धरतीसे लेकर आकाशतक अर्थात् पातालसे लेकर सत्यलोक तक फैले हुए अज्ञाानरूपी अन्धकारको मिटा दिया. सबको एक ही परमात्माके प्रति विश्वास रखने वाले इस विश्वधर्ममें एकत्रित किया. इस रहस्यको वे ही ब्रह्मात्माएँ जान सकती हैं, जिनके हृदयमें स्वयं परमात्मा विराजमान हैं.
Dhani Devachandraji Isa gave this ambroisa of eternity and remove the darkness of atheism from earth and other heavens. He unified the path of God because of the soul whose heart is the dwelling of Supreme.

सेहेरग से हक नजीक, कह्या खासल खास मकान ।
इत हिसाब इत कयामत, जो दिल मोमिन अरस सुभान ।।५०

परमधाम दिलवाली आत्माओंके लिए ही ऐसा कहा गया है कि परमात्मा उनके लिए हृदयकी मुख्य धमनी (सहरग) से भी अधिक निकट हैं. अन्तिम समय-कयामतके दिन ये ही आत्माएँ सबका लेखा कर उन्हें अखण्ड मुक्ति देंगी.

कहे महंमद सिफत उमत की, करें अपने मुख मेहेरबान ।
सोई जाने जामें हक इलम, ए दिल मोमिन अरस सुभान ।।५१

रसूल मुहम्मद साहेबने कहा है कि परमकृपालु परमात्मा इन ब्रह्मात्माओंके समूहकी प्रशंसा करते हैं. इस रहस्यको वे ही जान सकतीं हैं, जिनके हृदयमें ब्रह्मज्ञाान (हक इलम) है. ऐसी ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमात्माने अपना धाम बनाया है.

दिल मोमिन अरस कह्या, ए जो असल अरसमें तन।
ए लिख्या फुरमानमें जाहेर, पर किया न बेवरा किन।।३५

ब्रह्मात्माओंके हृदयको परमधाम कहा गया है. उनका चिन्मय शरीर पर-आत्मा परमधाममें है. इस प्रकार कुरानमें स्पष्ट कहा है किन्तु किसीने भी उनका विवरण नहीं दिया कि वे ब्रह्मात्माएँ कौन हैं ?

और दिल हकीकी अरस मोमिन, हकें दिल अरस कह्या इन।
दिल मजाजी गोस्त टुकडा, और ऊपर कह्या दुसमन।।४०

परमधामकी ब्रह्मात्माएँ ही सत्य हृदया हैं. इनके हृदयको ही परमात्माने अपना धाम कहा है. संसारके जीवोंका हृदय तो मात्र
मांसपिण्ड है और उसमें भी दुष्ट शत्रु (इबलीस) बैठा हुआ है.

दुनियां दिल मजाजी इबलीस, दिल हकीकी पर हक।
एक गिरो दिल अरस कही, सोई अरस रूहें बुजरक।।४१

नश्वर जीवोंके झूठे हृदय पर दुष्ट इबलीस बैठा हुआ है एवं सत्य हृदय पर परमात्माकी बैठक है. जिस एक समुदायके हृदयको परमधाम कहा है वह परमधामकी श्रेष्ठ आत्माओंका ही समुदाय है.

वाहेदत निसबत अरस की, जब जाहेर हुई खिलवत।
ए सुकन सुन मोमिन, दिल लेसी अरस लज्जत।।४८

परमधामका अद्वैत सम्बन्ध एवं मूलमिलावाका अन्तरङ्ग रहस्य जब तारतम ज्ञाानके द्वारा स्पष्ट हो ही गया है तो इन वचनोंको सुनकर ब्रह्मात्माएँ अपने हृदयमें परमधामका आनन्द अनुभव करेंगी.

हम बंदे रूहें इन दरगाह के, कह्या दिल अरस मोमन।
यारों बुलावें महंमद, करो सेजदा हजूर अरस तन।।४

हम आत्माएँ इसी परमधामके वासी हैं और हम ब्रह्मात्माओंको धामहृदया भी कहा गया है. श्यामाजी अपने आत्माओंको बुलाकर कह रही हैं कि परमधामके अपने चिन्मय शरीरके द्वारा धामधनीके चरणोंमें प्रणाम करो.

कोई पांच बिने की दस करो, पालो अरकान लग आखर।
पर अरस बका हक का, दिल होए न मोमिन बिगर।।३०

कोई इन पाँच नियमोंके स्थान पर धर्मके दस नियमोंका पालन अन्तिम समय (कयामतकी घड.ी) तक क्यों न करे किन्तु ब्रह्मात्माओंके हृदयके अतिरिक्त अन्य किसी भी जीवका हृदय परमात्माका धाम नहीं बन सकता.

हक हादी रूहें लाहूतमें, ए महंमद रूहों वतन।
इसक हकीकत मारफत, तो हक अरस दिल मोमन।।५५

परब्रह्म परमात्मा श्रीराजजी, श्यामाजी तथा ब्रह्मात्माएँ इसी परमधाममें हैं. यही तो ब्रह्मात्मा तथा श्यामाजीका मूल घर है. इन्हीं ब्रह्मात्माओंमें अपने धनीका अखण्ड प्रेम, यथार्थ ज्ञाान तथा पूर्ण पहचान है. इसीलिए इनके हृदयको परमात्माका धाम कहा गया है.

अरस दिल इनका कह्या, और कह्या हकीकी दिल।
एती बडाई इनको दै, जो वाहेदत इनों असल।।६४

इन्हीं आत्माओंके हृदयको परमधाम कहा गया है. ये ही आत्माएँ सत्यहृदया कही गइंर् हैं. इनको इतनी महत्ता इसीलिए दी गई है कि ये स्वयं परब्रह्मसे अभिन्न तथा अद्वैत हैं.

चौदे तबक की जहानमें, किन तरफ न पाई अरस हक।
सो किया अरस दिल मोमिनों, ए निसबत मेहेर मुतलक।।६९

चौदह लोकोंकी सृष्टिमें किसी भी जीवको परमधाम तथा परमात्मा (परब्रह्म) का मार्ग प्राप्त नहीं हुआ. जबकि परमात्माने ब्रह्मात्माओंके हृदयको अपना परमधाम बनाया. वस्तुतः अद्वैत सम्बन्धके कारण ही उन पर यह विशेष कृपा हुई है.

जो मोमन बिने पांच अरसमें, सो होत बंदगी बातन।
जिन विध होत हजूर, सो करत अरस दिल मोमन।।२

ब्रह्मात्माओंके लिए कहे गए धर्मके पाँच नियम तो वस्तुतः परमधाममें ही अध्यात्मिक रूपसे सम्पन्न होते हैं. धामधनीके सान्निध्यमें जैसी उनकी दिनचर्या होती है उसीके अनुरूप धामहृदया आत्माएँ नश्वर संसारमें भी आचरण करती हैं.

दिल अरस हकीकी तो कह्या, जो हक कदम तले तन।
रसूल उमती उमती तो कहे, जो हक खिलवत बीच रूहन।।३

ब्रह्मात्माओंको इसीलिए धामहृदया कहा है कि उनकी परआत्मा परमधाममें धामधनीके चरणोंमें है. रसूलने वारंवार इनको ब्राह्मी समुदाय इसीलिए कहा कि ये आत्माएँ परमधाम मूलमिलावामें धामधनीके चरणोंमें ही हैं.

तिन हकें मोमिन दिल को, अपना कह्या अरस।
कह्या तुम भी उतरे अरस से, यों दै सोभा अरस परस।।३२
धामधनीने ब्रह्मात्माओंके हृदयको अपना परमधाम कहा है तथा यह भी कहा है कि तुम स्वयं परमधामसे इस संसारमें आई हो. इस प्रकार धामधनीने हमारा अद्वैत सम्बन्ध स्पष्ट कर परस्पर शोभा बढ.ाई है.
ए इलम लिए ऐसा होत है, रूह अपनी साहेदी देत।
बैठ बीच ब्रह्मांड के, अरस बका में लेत।।४९
इस तारतम ज्ञाानको प्राप्त करने पर इस प्रकार अन्तर्दृष्टि खुल जाती है और आत्मा अपनी ही साक्षी देने लगती है. तब इस नश्वर संसारमें रहते हुए भी अखण्ड परमधामका अनुभव होने लगता है.
असल आराम हिरदे मिने, अरस को अखंड।
तब ए झूठे ख्वाब को, रहे न पिंड ब्रह्मांड।।९
जब हृदयमें परमधामके वास्तविक आनन्दका अनुभव हो जाएगा तब इस स्वप्नवत् खेलके पिण्ड तथा ब्रह्माण्डका अस्तित्व भी मिट जाएगा.
कायम हक के अरसमें, बैठे अपने ठौर।
हक के इत वाहेदतमें, कोई नाहीं काहूं और।।१०
धामधनीके अखण्ड घर परमधामके मूलमिलावामें हम सब आत्माएँ बैठी हैं. धामधनीके इस अद्वैत भूमिमें उनके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है.
महामत कहे ऐ मोमिनो, इसक लीजे हक।
असल अरस के बीचमें, हक का नाम आसिक।।११
महामति कहते हैं, हे सुन्दरसाथजी ! इस प्रकार धामधनीका अखण्ड प्रेम प्राप्त करो. क्योंकि अखण्ड परमधाममें श्रीराजजीको प्रेमी (आशिक) कहा गया है.

एक हक बिना कछू ना रखें, दुनी करी मुरदार।
अरस किया दिल मोमिन, पोहोंचे नूर के पार।।१
ऐसी ब्रह्माङ्गनाएँ अपने दिलमें धामधनीके अतिरिक्त कुछ भी नहीं रखतीं. उन्होंने नश्वर संसारको मृतक तुल्य (तुच्छ) माना है. इसलिए धनीजीने ऐसी ब्रह्माङ्गनाओंके हृदयको परमधाम बना दिया. वे ही अक्षरके परे परमधाममें पहुँच सकीं हैं.
दिल दिलगीरी छोड दे, होत तेरा नुकसान।
जानत है गोविंद भेडा, याको पीठ दिए आसान।।४
तुम हृदयकी हताशाको छोड. दो, इससे तो तुम्हें हानि हो रही है. यह संसार गोविन्द भेड.ा (भूतनगरी) के समान है. इसको पीठ देनेसे ही परमधामका मार्ग सरल बनेगा.

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Hindi translation is from Shri 108 Krishnamani Maharaj ,Shri 5 Navtanpuri Dham, Jamnagar.