हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Read this to end the confusion!

First question why the name Shri Krishna Pranami? let me clear this first and then we begin to clear all the confusions.
चौदह लोक को तारने वाला धर्म श्री कृष्ण प्रणामी शुद्ध सनातन धर्म निजानंद संप्रदाय है। यह किसी धर्म का एक शाखा नहीं बल्कि सभी धर्म इसके शाखा हैं। सभी धर्म के ग्रंथो के रहष्य इस में जाहेर हुआ है।
Shri Krishna Pranami Sudh Sanatan Dharma Nijanand Sampraday is truly Universal Spiritual and all religions are its sects and not vice versa!
mahamad = shri krishna deen = true spirituality islaam means submission which shri krishna pranami sudh sanatan dharm

कुरान का खुलासा महंमद दीन इसलाम श्री खुलासा वाणी महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन जो बची गिरोह कोहतूर तले, और तोफान किस्ती पर।
बेर तीसरी लैलत कदरमें, जिन रोज कयामत करी फजर।।२३
सोई गिरोह इसलाम की, खेल लैल देखा दो बेर।
तीसरी बेर फजर की, जाके इलमें टाली अंधेर।।२४
सिर बदले जो पाइए, महंमद दीन इसलाम।
और क्या चाहिए रूहन को, जो मिले आखर गिरोह स्याम।।२५ प्र ३ इन महंमद के दीन में, सक सुभे जरा नाहें।
सो हकें दिया इलम अपना, ए सिफत होए न इन जुबांएं।।१० प्र ४ आखर आए रूहअल्ला, सो लीजो कर यकीन।
ए समझेगा बेवरा, सोई महंमद दीन।।१९
जो कछू कह्या महंमदें, ईसे भी कह्या सोए।
ए माएने सो समझही, जो अरवा अरस की होए।।२०
श्रीठकुरानीजी रूहअल्ला, महंमद श्रीकृस्नजी स्याम।
सखियां रूहें दरगाह की, सुरत अक्षर फिरस्ते नाम।।५३ प्र १२ महंमद =श्रीकृस्नजी स्याम दीन =सत्य धर्म इस्लाम=समर्पण पथ श्री कृष्ण प्रणामी शुद्ध सनातन धर्म निजानंद संप्रदाय
85. After this, it is you who kill one another and drive out a party of you from their homes, assist (their enemies) against them, in sin and transgression. And if they come to you as captives, you ransom them, although their expulsion was forbidden to you.

Then do you believe in a part of the scripture and reject the rest? Then what is the recompense of those who do so among you, except disgrace in the life of this world, and on the Day of Resurrection they shall be consigned to the most grievous torment. And Allah is not unaware of what you do.
85 Sura 2: Holy Quran

The light of soul uniting together as soul sat together along with Beautiful divine couple in the center, what can be said of the splendour by this tongue! The splendour of Moolmilava, soul and RajShyamaji at center cannot be described!
Remember sundarsathji (from mind of our soul), ShyamShyama ji in the center we all sitting together holding one another tightly, so we do not forget ourselves and one another in the game!

एह जोत जो जोतमें, बैठियां ज्यों सब मिल।
क्यों कहूं सोभा इन जुबां, बीच सुंदर जोत जुगल।।४/2 marfatsagar granth

सभी ब्रह्मात्माएँ एक ज्योतिके साथ दूसरी ज्योतिकी भाँति परस्पर मिलकर बैठी हुइंर् हैं. इनके बीचमें युगलस्वरूप श्रीराजश्यामाजी विराजमान हैं. उनकी दिव्य शोभाका वर्णन जिह्वाके द्वारा कैसे करूँ ?

गिरदवाए तखत के, कै बैठियां तलें चरन।
जानों जिन होवें जुदियां, पकड रहें हम सरन।।१०/2 marfatsagar granth

अनेक ब्रह्मात्माएँ सिंहासनके चारों ओर धामधनीके चरणोंमें बैठीं हुइंर् हैं. वे चाहतीं हैं कि धामधनीसे अलग न हो कर उन्हींके श्रीचरणोंको पकड.कर उनकी ही शरणमें रहें.
Surrounding the throne, some of the soul are sitting under the feet of Lord, so as not be separated from Him holding His feet so as to remain under His shelter.

चबूतरे लग कठेडा, रहियां चारों तरफों भराए।
ज्यों मिल बैठियां बीच में, यों ही बैठियां गिरदवाए।।११/2 marfatsagar granth

ब्रह्मात्माएँ पूरे चबूतरेमें किनारे पर लगे हुए कटहराके साथ भरकर बैठीं हुइंर् हैं. वे जिस प्रकार मिलकर मध्यमें बैठीं हैं उसी प्रकार चारों ओर बैठीं हैं.
Moolmilava is surrounded by rails in all directions and inside of the railings all the soul are sitting surrounding in all four directions.

First remember our Lord (who is He), Shyama, Sundarsath and our relationship our paramdham our moolmilava our love. Why are we here? Is coming to this world a punishment from Lord or His grandeur grace?
What is budh jagrit, what is tartam, who is Indrawati and Who is Mahamati? Try to understand this first if you can!

तुम मांगी धनीपें करके खांत, ए जो धनिएं करी इनायत ।
याद करो सोई साइत, ए जो बैठके मांग्या जित ।।१९०

तुमने स्वयं इच्छा व्यक्त कर धामधनीसे इस खेलकी माँग की. धामधनीने भी तुम्हें अपनी अङ्गना समझकर तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण की है. इसलिए अब उस घड.ीको याद करो जब तुमने मूलमिलावेमें बैठकर यह खेल देखनेकी माँग की थी.
We desired for this game and Lord has mercifully granted us. Remember the same moment where sitting in the moolmilava we asked Lord to show us this game of illusion!

स्यामस्यामाजी साथ सोभित, क्यों न देखो अंतरगत ।
पीछला चार घड.ी दिन जब, ए सोई घडी है अब ।।१९१

वहाँ पर श्रीश्यामश्यामाजी तथा सखियाँ शोभायमान हैं. तुम इस दृश्यको अपनी अन्तरात्मासे क्यों नहीं देखते ? जब हमने खेल माँगा था उस समय चार घड.ी दिन शेष था, अब भी वही घड.ी है.
Why cannot you see from the eye of the soul the splendor of Shyam, Shyama and sundarsath? The time of the day where last 4 ghadi time is left and it is still the same time. Not even a moment has passed!

याद करो जो कह्या मैं सब, नींद छोडो जो मांगी है तब ।
याद करो धनीको सरूप, श्रीस्यामाजी रूप अनूप ।।१९२

मैंने जो कुछ कहा है उसे अब याद करो, उस समय तुमने जो माँगा था उस नींद (माया) को त्याग दो. अब अपने धनीके स्वरूपको याद करो, श्रीश्यामाजीका स्वरूप अनुपम है.
Remember what I have said everything, let go this sleep which we begged at that time. Remember our Lord and Shri Shyamaji's beautiful swaroop (looks)!

याद करो सोई सनेह, साथ करत मिनों मिने जेह ।
सुख सैयां लेवें नित, अंग आतम जो उपजत ।।१९३

उस अलौकिक प्रेमका भी स्मरण करो जो सखियाँ परस्पर किया करतीं हैं. वहाँ पर एक आत्माके हृदयमें जो इच्छा उत्पन्न होती है उसका सुख सभी ब्रह्मात्माएँ नित्यप्रति प्राप्त करतीं हैं.
Remember the same affection which we had together and the bliss that we eternally experienced which originated from the soul.

रस प्रेम सरूप है चित, कै विध रंग खेलत ।
बुध जाग्रत ले जगावती, सुख मूल वतन देखावती ।।१९४

श्री राज श्यामाजीका प्रेम रस स्वरूप है. उसे हृदयङ्गम करो. परमधाममें तुम सभी आनन्दमयी क्रीड.ाएँ करतीं हो. इस प्रकार इन्द्रावती जागृत बुद्धिके द्वारा ब्रह्मात्माओंको जगाती है एवं उन्हें परमधामके अखण्ड सुख दिखाती है.
The nectar of love is our consciousness(chit) and various types of sport we play. Indrawati sakhi of Paramdham with the awakened mind of Akshar(cosmic consciousness-The mind of Akshar plays a key role in our intelligence) is waking you up to show the bliss of original abode.

प्रेम सागर पूर चलावती, संग सैयौं को भी पिलावती ।
पियाजी कहें इन्द्रावती, तेज तारतम जोत करावती ।।१९५

सद्गुरुकी आज्ञाानुसार इन्द्रावती प्रेमका प्रवाह चलाती है. सभी सखियोंको प्रेम रसका पान कराती है तथा तारतम ज्ञाानकी ज्योतिसे सभीकी अन्तरात्माको आलोकित करती है.
Indrawati the celestial soul residing in Paramdham is waving the ocean of nectar of love and also sharing it with all the other celestial souls (intoxicating them in the love of Lord). Our beloved Lord has say it is Indrawati who is enlightening the souls with the light of Tartam (tartam knowledge is the leela of Shyam, Shyama and sath and their sport of love in Paramdham this wisdom is brought by RoohAllah Shyama in Devachandraji) !

(It is Indrawati who is saying here (the love of Lord in Paramdham can be expressed only by her) please and giving the details of our original abode hence believe it as absolute truth)

तासों महामत प्रेम ले तौलती, तिनसों धाम दरवाजा खोलती ।
सैयां जाने धाममें पैठियां, ए तो घरहींमें जाग बैठियां ।।१९६

महामति इसी तारतम ज्ञाानके द्वारा प्रेमकी तुलना करते हैं एवं उससे परमधामके द्वार खोलते हैं. तब सभी ब्रह्मात्माएँ परमधाममें प्रवेश कर रही अनुभव करतीं हैं. वस्तुतः वे तो अपने घरमें ही जागृत होकर बैठीं हुइंर् हैं.

Uniting with this understanding of love in paramdham and the consciousness of Akshar (jagrit budhi) -- Mahamati(the greater intelligence) can measure the love and with this will open the doors of Paramdham. Only the celestial souls are feeling they are entering the Paramdham but in fact they are residing there and getting awakened.

प्रकरण ३ parikrama
In Paramdham eternally there is oneness, yet in one moment one can get milllions of embellishment. Whatever heart desires the soul sees it, it is not like we wear new ones and take off the old ones.!

अरस में सदा एक रस, करें पलमें कोट सिनगार।
चित चाहे अंगों सब देखत, नया पेहेन्या न जूना उतार।।३५ pr 10 sagar

परमधाममें सदैव एकरस स्थिति होती है तथापि पलमात्रमें करोड.ों शृङ्गार हो जाते हैं. वे सभी इच्छा अनुसार अङ्ग-प्रत्यङ्गोंमें सुशोभित दिखाई देते हैं. वहाँ पर न नये शृङ्गारको धारण करनेकी आवश्यकता होती है और न ही पुरातनको उतारनेकी

कंठ हार नंग सब चेतन, देख सोभा सब चढती देत।
ए सुख रूह सोई जानहीं, जो सामी हक इसारत लेत।।४५ pr 10 sagar

कण्ठमें धारण की हुई रत्नोंकी ये सभी मालाएँ चेतन हैं एवं एक दूसरेसे बढ.कर अधिक सुन्दर हैं. इस अपार शोभाका आनन्द वही ब्रह्मआत्मा अनुभव कर सकती है जो श्रीराजजीके सम्मुख रह कर उनके नेत्रोंका सङ्केत समझ लेती है.

If you are convinced about above and want to know how to remember Lord then proceed!
Can I do meditation and realize all that is above without tartam? What is the cause of this amnesia?


ना इसक ना अकल, ना सुध आप वतन।
ना सुध रेहेसी हक की, ए भूलोगे मूल तन।।१९

वहाँ पर न प्रेम होगा और न ही विवेक-बुद्धि होगी, तुम्हें अपने घर तथा अपने धामधनीकी भी सुधि नहीं रहेगी. तुम तो अपने मूल तन (पर आत्मा) को भी भूल जाओगी.
Neither love nor intellect and nor consciousness of the self and the abode, no consciousness about the Lord and will forget the original soul in the Paramdham. The souls dwelling in Paramdham will not experience the following attributes of Paramdham
love,
intelligence,
self consciousness,
abode,
awareness of beloved Lord ,
and the original soul.


खेल देखाऊं इन भांत का, जित झूठैमें आराम।
झूठे झूठा पूजहीं, हक का न जानें नाम।।२२

************>
मैं तुम्हें ऐसा खेल दिखाने जा रहा हूँ जहाँ पर लोग नश्वर वस्तुओंके संग्रहमें ही सुख-चैन मानते हैं. वे स्वयं भी नश्वर होनेसे नश्वर जगतके देवोंकी ही पूजा करते हैं, वे सत्य परमात्माका नाम तक नहीं जानते.
I will such a game that you will forget even the name of the Lord and will worship all that is false!
khilwat

पेहेलें कह्या मैं तुम को, भूलोगे खेल देख।
जहां झूठे झूठा खेलहीं, उत मुझे न पाओ एक।।३३

पहले ही मैंने तुम्हें कहा था कि तुम मायाका खेल देखकर मुझे भूल जाओगी. जहाँ पर नश्वर जगतके जीव नश्वर वस्तुओंको सत्यमानकर खेल रहे हैं वहाँ पर तुम मुझ एक परमात्माको कैसे प्राप्त कर सकोगी ?
First you will forget me totally in the world of illusion where all is temporary, perishable, timely and false and in that you will never find me.

ए हकें अव्वल कह्या, भूल जाओगे तुम।
ना मानोगे फुरमान को, ना कछू रसूल हुकम।।३४

हे ब्रह्मात्माओ ! इस प्रकार धामधनीने पहलेसे ही कह दिया था कि मायामें जाकर भूल जाओगी. उस समय तुम रसूल द्वारा भेजे गए मेरे आदेश एवं सन्देशको भी नहीं मानोगी.
In the beginning Lord warned, you will forget everything and you will not listen to messages that I send and also the messenger that I send to awaken you!

ना मानोगे संदेसे, ना मुझे करोगे याद।
झूठा कबीला करोगे, लगसी झूठा स्वाद।।३५

तुम मेरे सन्देश पर भी विश्वास नहीं करोगी और मुझे भी याद नहीं करोगी. मिथ्या परिवार रचाकर उसीमें मग्न हो जाओगी और वही तुम्हें अच्छा लगेगा.
You will not agree to the messages, you will not remember me. You will create a new group and you will enjoy the taste of false relationship.

अब सो क्योंए आप को, काढ न सकें तिलसम।
फुरमान ले पोहोंच्या रसूल, तो भी न आवे सरम।।४१

अब ये ब्रह्मात्माएँ इस तुच्छ मायाके बन्धनोंसे स्वयंको किसी भी प्रकारसे मुक्त नहीं कर पा रही है. ऐसेमें रसूल मुहम्मद सन्देश लेकर आए तथापि उन्हें लज्जा नहीं आई.

With the messages from Lord and the messenger who has brought is non other than Rooh Allah (Shyama) and you still do not believe! Aren't you ashamed of yourself?
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Do sakhiyan talk in Paramdham?

एक देखें धनी रूप अदभुत सरूप, कहा कहंू नूरजमाल ।
एक पीउसों बातें करें अख्यातें, रंग रस भरियां रसाल ।।८

प्रकरण ४२ parikrama
कोई सखी धामधनीके दिव्य, अद्बुत छविको देखती है. धामधनीके अनिर्वचनीय शोभाके विषयमें क्या कहा जाए ? कोई सखी प्रियतम धनीके साथ गुह्य वार्तालाप करती हुई प्रेममग्न हो जाती है.

Who gave the mantra and what me must follow?

पिया जो पार के पार हैं, तिन खुद खोले द्वार।
पार दरवाजे तब देखे, जब खोल देखाया पार।।३

जो अक्षरसे भी परे अक्षरातीत परमात्मा हैं उन्होंने ही स्वयं आकर परमधामके द्वार खोल दिए. पारके द्वार मुझे तब प्रत्यक्ष हुए जब उन्होंने इस प्रकार खोलकर दिखाए.
The beloved Lord who is beyond of beyond(Akshar), he Himself (Khud) opened the door. I could see the door of beyond when he opened and showed the door!
(There were many gyani dhyani tapaswi, intelligent beings, researchers who tried hard to find God but none could find living in this dream world. Only Lord can make Himself known and that is what He did. )
प्रकरण ९ kalash

किए विलास अंकूर थें, घर के अनेक परकार।
पिया सुंदरबाई अंग में, आए कियो विस्तार।।३६

परमधामके सम्बन्धी होनेके कारण हम ब्रह्मात्माओंने इस जगतमें रहते हुए भी परमधामके अनेक प्रकारके अखण्ड सुखोंमें विलास किया. सुन्दरबाई (सद्गुरु) के स्वरूपमें स्वयं प्रियतम परमात्माने मेरे हृदयमें विराजमान होकर धाम लीलाका विस्तार किया.
Due to relationship, we enjoyed in many ways the unlimited(abundance) sport of original home. Beloved Lord came in the soul of Sundarbai and spread the revelations.

ए बीज बचन दो एक, पिया बोए किओ परकास।
अंकूर ऐसा उठिया, सब किए हांस विलास।।३7

सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजी महाराजने मेरे हृदयमें तारतम ज्ञाानके बीज वचन बोकर ही यह प्रकाश किया है. उसका ऐसा अङ्कुर फूटा (तारतम वाणी प्रकट हुई) कि इसके द्वारा सभीने परमधामके अपार सुखोंका अनुभव किया.
By the word of seeds, beloved Lord sowed and enlightened. The seed sprouted so well (tartam vani) all are able to enjoy the union with the beloved.
प्रकरण २४ श्री कलश ग्रन्थ (हिन्दुस्तानी)


श्री सुंदरबाई स्यामाजी अवतार, पूरन आवेस दियो आधार ।
ब्रह्मसृष्ट मिने सिरदार, श्री धाम धनीजी की अंगना नार ।।१

सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजी (सुन्दरबाई) श्रीश्यामाजीके अवतार हैं. धामधनीने उनको अपना पूर्ण आवेश दिया है. वे ब्रह्मसृष्टियोंमें शिरोमणि हैं और धामधनीकी अर्धाङ्गिनी हैं.
Shri Sundarbai is avataar of Shyama to whom the Supreme Lord gave complete (whole) inspiration. She is the head of the Brahmshristi leader and She is part of beloved Master of Paramdham.
prakaran 5 Prakash Hindi

देऊं कुरान की साहेद, बिना फुरमान न काढों सबद ।
छठे सिपारे में एह सनंध, ईसा नुस्खेका खावंद ।।१०

मैं कुरानकी साक्षी देकर कहता हूँ, उसकी साक्षीके अतिरिक्त अन्य कोई बात नहीं करूँगा. कुरानके छठ्ठे सिपारेमें इस प्रकार उल्लेख है कि ईसा रूहअल्लाह मन्त्र (नुस्खा) के स्वामी कहलाएँगे.
Keeping the holy Quran as the witness, I will not utter a word which is not in the message, in the sixth sipare(section) of Holy Quran it is given that the Isa Roohallah Shyama (Devachandraji) will be the soul owner and master of the mantra.
प्रकरण ४ श्री कयामतनामा (बडा)

Remember Isa(Dhani Devachandraji) and Imam Mehadi (Meheraj Thakur) are the last Isa and Imam.
निसान बडा ईसा आखरी, और एही आखरी किताब ।
महंमद मेहेदी आखरी, इमाम आखरी खिताब।।८०

कयामतके सङ्केतोंमें सबसे बड.ा सङ्केत ईसा रूहअल्लाह (सद्गुरु) के प्राकटयका है और उनके द्वारा व्यक्त किया गया ग्रन्थ (श्री तारतम सागर) ही अन्तिम ग्रन्थ कहा गया है. वे ही अन्तिम मुहम्मद अर्थात् महदी मुहम्मद कहलाएँगे और अन्तिम सद्गुरुकी शोभा प्राप्त करेंगे.

The sign of coming of Satguru Isa Roohallah is greatest sign of Kayamat and the Tartamsagar is only the last scriptures! Mohamad Mehadi (Mahamati Prananth Indrawati sakhi) is the last prophet and he will be honoured as the last Imam (Satguru).
chaupai 80 prakaran 9 marfatsagar


रूह अल्ला चौथे आसमान से, आए खोली सब हकीकत।
ल्याए इलम लुंदनी, कही सब हक मारफत।।३०

श्रीश्यामाजीने परमधामसे सद्गुरुके रूपमें अवतरित होकर परमधामकी सम्पूर्ण यथार्थता प्रकट कर दी एवं जागृत बुद्धिका तारतम ज्ञाान लाकर अक्षरातीत परब्रह्म परमात्माकी पहचान करवा दी.
Roohallah Shri Shyamaji revealed all the reality. Brought the tartam gyan(loondni) and gave the knowledge/wisdom of the Lord.


जो कही महंमद ने, हक जात सूरत।
सोई कही रूहअल्ला ने, यामें जरा न तफावत।।३१

रसूल मुहम्मदने परमात्माके जिस स्वरूपकी चर्चा की थी, श्रीश्यामाजीने भी प्रकट होकर उसी स्वरूपका वर्णन किया है. इसमें कोई भी अन्तर नहीं है.
Rasool Mohamad had seen God and has described Him. The same description RoohAllah(Devachandraji) said and there is no difference between the two description.

जो अमरद कह्या महंमदें, सोई कही ईसें किसोर सूरत।
और सब चीजें कही बराबर, दोऊ मकान हादी उमत।।३२

रसूल मुहम्मदने परमात्माको अमरद सूरत कहा था. सद्गुरु श्री देवचन्द्रजीने परमात्माको किशोर स्वरूप कहा है. इतना ही नहीं अक्षरधाम, परमधाम, श्रीश्यामाजी तथा ब्रह्मआत्माओं सहित परमधामका सम्पूर्ण वैभव समान रूपसे व्यक्त किया है.

Rasool Mohamad said the Lord is (Amarad) and Isa(Devachandraji) said Kishor(young) and all the things they said were same too Akshardham, Aksharateet Paramdham, RoohAllah Haadi(Shyama) and the Umat(Brahmshristi).

हौज जोए बाग अरस के, जो कछू अरस बिसात।
कहूं केती अरस साहेदियां, इन जुबां कही न जात।।३३

इस प्रकार हौजकौसर ताल, यमुनाजी, वन-उपवन आदि परमधामकी अपार सम्पदाओंका वर्णन किया है. उन्होंने परमधामकी अनेक साक्षियाँ दीं हैं जो जिह्वाके द्वारा व्यक्त नहीं हो सकतीं.

And Mohmad Rasool saw the Hauj garden of Arash(Paramdham) and all the places of Arash(Paramdham) and also gave many proofs of Paramdham that he indeed witnessed it, I cannot express everything from my speech.


बरकत कुंजी रूहअल्ला, हुआ बेवरा तीन उमत।
पूरी उमेदें सबन की, जाहेर होते हक सूरत।।३४

इस प्रकार सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी द्वारा प्रदत्त तारतम ज्ञाानके प्रकाशसे ब्रह्मसृष्टि, ईश्वरीसृष्टि तथा जीवसृष्टिका विवरण दिया गया है. श्रीराजजीके स्वरूपके प्रकट होनेसे सभीकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो गईं हैं.

Roohallah(Devachandraji) blessed us with the key(kunji) and gave the details of three types of creation(Brahmshristi,Ishwari and Jeev). And also fulfilled everyone's wishes by revealing the appearance of the Lord.


ले ग्वाही दोऊ हादियों की, किया हक वरनन।
सब कौल किताबों के, हक हुकमें किए पूरन।।३५

सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजी एवं रसूल मुहम्मद दोनोंकी साक्षी लेकर मैंने परमात्माके स्वरूपका वर्णन किया है. श्रीराजजीके आदेशने ही सभी आप्त ग्रन्थोंमें दिए गए वचन पूर्ण किए हैं.

Keeping witness both Hadi (sadguru Devachandraji and Rasool Mohamad), I have described the Lord. All the promises in all the scriptures, thus Lord fulfilled completely.
प्रकरण ३ Shri Singaar

Shri Krishna and our supreme abode is essence of Tartam, no one must doubt this (accepting these words without doubt in mind will bring the light which is infinite)

घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३

हमारा घर अखण्ड परमधाम तथा हमारे धनी श्रीकृष्ण यही तारतमका सार फल है. इस तारतम ज्ञाान द्वारा अत्यन्त प्रकाश फैलता
है. जिससे मनमें किसी भी प्रकारकी शंका नहीं रहती है.
Our real home is Paramdham and Shri Krishna, this is the extract of the fruit of Tartam. The light of this Tartam is so much not a doubt should you have in mind. One must believe this without creating confusion and doubts in the mind. No matter for whom this message is meant for (Jeev or brahm) the statement is a truth.
The brahmvasana is residing in the jeev aatma which must be awakened and once awakened the jeev will also know the Supreme truth and get introduced to the Aksharateet Shri Krishna.
श्री प्रकास (गुजराती)

Braj

वसुदेव गोकल ले चले, ताए न कहिए अवतार।
सो तो नहीं इन हद का, अखंड लीला है पार।।१४

वसुदेव जिन श्रीकृष्ण (दो भुजास्वरूप) को गोकुल ले गए वे भगवान विष्णुके अवतार नहीं है. वे इस क्षरब्रह्माण्डके नहीं हैं अपितु अखण्ड लीला-परमधामके स्वरूप हैं.

ए कही सब तुम समझावने, भांनने मनकी भ्रांत।
बेहद विस्तार है अति बडा, या ठौर आडा कलपांत।।१५

हे ब्रह्मात्माओ ! इस रहस्यको समझकर अपने मनकी भ्रान्तिको मिटानेके लिए तुम्हें यह समझाया जा रहा है. श्री कृष्णजीकी बेहद लीलाका विस्तार बहुत बड.ा है. इस भूमिकाको समझनेमें कल्पान्त भेद अवरोधक बन जाता है.

भी कहूं तुमें समझाए के, तुम भांनो धोखा मन।
अवतार सो अक्रूर संगे, जाए लई मथुरा जिन।।१६

मैं तुम्हें और भी रहस्य स्पष्ट कह देता हूँ, जिससे तुम अपना मनका सन्देह मिटा सको. अक्रूरके साथ मथुरामें जाकर (कंसादिका वध कर) मथुराको अधीन करनेवाले श्री कृष्णको अवतार कहा है.

इनमें भी है आंकडी, बिना तारतम समझी ना जाए।
सो तुम दिल दे समझियो, नीके देऊं बताए।।१7

इन लीलाओंमें भी एक गुत्थी (आँकडी) है. तारतम ज्ञाानके बिना यह रहस्य समझमें नहीं आता है. इसलिए हे ब्रह्म आत्माओ ! तुम दिल लगाकर मेरी बात सुनो. इन सभी गुत्थियोंको खोलकर मैं तुम्हें समझाता हूँ.

सात चार दिन भेष लीला, खेले गोवालों संग।
सात दिन गोकल मिने, दिन चार मथुरा जंग।।१८

अखण्ड रासलीलाके बाद गोपियों तथा ग्वालोंके साथ की गई ग्यारह दिनकी लीलाको वेश (भेष) लीला कहा गया है. उसमें सात दिन गोकुलमें लीला की तथा चार दिन मथुरामें युद्ध किया. (यह अक्षर ब्रह्म स्वरूप गोलोकीनाथकी लीला मानी गई है.)

धनुष भान गज मल मारे, तब हुए दिन चार।
पछाड कंस वसुदेव छोडे, या दिन थें अवतार।।१९

उन्होंने मथुरा पहुँचकर धनुष भङ्ग किया. कुबलयापीड. हाथीको मारा तथा चाणूर एवं मुष्टिक आदि पहलवानोंका संहार किया. कंसको मारकर वसुदेव तथा देवकीको बन्धन मुक्त किया, इतनेमें चार दिन व्यतीत हो गए. अब यहाँसे विष्णु भगवानके अवतार कहलाए.

अब आई बात हदकी, हिसाब चौदे भवन।
सब बात इत याही की, कहे अटकलें और वचन।।२०

अब यहाँसे क्षर ब्रह्माण्ड (हद) का प्रसङ्ग है. क्षर ब्रह्माण्डके चौदह लोकोंका तो मूल्याङ्कन किया गया है. अब होनेवाली सभी लीलाएँ इसी ब्रह्माण्डकी हैं. लोग (तारतम ज्ञाानके अभावमें) अटकलों द्वारा इन लीलाओंकी बात करते हैं.

जुध किया जरासिंधसों, रथ आउध आए छिन मांहिं।
तब कृस्न विस्नुमय भए, वैकुंठ में विस्नु तब नांहिं।।२१

मथुरामें श्री कृष्णजीने जरासन्धके साथ युद्ध किया, उस समय वैकुण्ठसे रथ तथा अस्त्र-शस्त्र क्षणमात्रमें आए. तब श्री कृष्ण विष्णुमय बन गए (उस समय वैकुण्ठसे विष्णु भगवानकी सोलह कलाएँ यहाँ चलीं आईं). उस समय वैकुण्ठमें विष्णु भगवान नहीं रहे.

वैकुंठ थें जोत फिर आई, सिसपाल किया हवन।
मुख समानी श्रीकृस्न के, यों कहे वेद बचन।।२२

जब श्री कृष्णजीने सुदर्शन चक्र द्वारा शिशुपालके मस्तकको काट डाला तब उसकी आत्मा वैकुण्ठमें जाकर पुनः लौट आई और श्री कृष्णके मुखमें समाहित हो गई. इसकी साक्षी शास्त्रोंमें दी गई है. (इसीसे सिद्ध होता है कि उस समय विष्णु भगवान वैकुण्ठमें नहीं थे, अपितु सम्पूर्ण कलाओंके साथ मृत्युलोकमें आए थे.)

किया राज मथुरा द्वारका, वरस एक सौ और बार।
प्रभास सब संघार के, जाए खोले वैकुंठ द्वार।।२३

इस प्रकार श्री कृष्णजीने मथुरा तथा द्वारकामें एक सौ बारह वर्ष तक राज्य किया और प्रभास पाटणमें यादवोंका संहार कर वैकुण्ठ प्रस्थान किया.

गोप हुता दिन एते, बडी बुध का अवतार।
नेक अब याकी कहूं, ए होसी बडो विस्तार।।२४

इतने दिनों तक (रासलीलाके बाद अभी तक) अक्षर ब्रह्मकी महान बुद्धिका अवतार गुप्त था. अब इस (बुद्धजीके) अवतारका अति संक्षेपमें वर्णन करता हूँ. भविष्यमें इसका विस्तारपूर्वक वर्णन होगा.
प्रकरण १८ kalash hindustani

This braj leela is eternal(akhand) and goes on day and night(continuous) we are playing with our Lord.
The पूरे पीउजी (the absolute(whole) beloved) is fulfilling our wishes!
ए सदा नवले रंग In color of novelty (there is always freshness) and which is eternal (the Brahmic bliss is eternal and everlasting)!

अखंड लीला अहेनिस, हम खेलें पिया के संग।
पूरे पीउजी मनोरथ, ए सदा नवले रंग।।४४

हम सब सखियाँ रात-दिन श्री कृष्णजीके साथ अखण्ड लीला करतीं हैं. प्रियतम श्री कृष्णजी सदैव नई नई रंग द्वारा हमारे मनोरथ पूर्ण करते हैं.

श्रीराज व्रज आए पीछे, व्रज वधू मथुरा ना गई।
कुमारका संग खेल करते, दान लीला यों भई।।४५

श्री राजजी (श्री कृष्णजी) जबसे व्रजमें आए, तबसे व्रजवधु (गोपिकाएँ) दूध-दधि बेचनेके लिए मथुरा नहीं गइंर्. कुमारिकाएँ (अक्षरकी सुरताकी सखियाँ) गोपियोंकी देखादेखी दूध दधि बेचनेका बहाना बनाकर श्री कृष्णजी के साथ खेल करतीं थीं. (उनका दूध-दधि लूटकर श्री कृष्णजी ग्वालोंको देते थे) इस प्रकार उनके साथ दानलीला होती थी.
When Shri Raaj Shri Krishna arrived at Braj, the Gopis did not go to Mathura even the Kumarikas(24000 Ishwari Shristi-Akshar's astral figures) also joined the Brahmshristi and they all enacted the daan leela (the sport where Shri Krishna pretended to be tax officer and would rob all the butter from the gopis and distribute it to his gwaal baal friends )
प्रकरण १९ चौपाई
श्री कलश
(हिन्दुस्तानी)

Raas

इत खेलत स्याम गोपियां, ए जो किया अरस रूहों विलास।
है ना कोई दूसरा, जो खेले मेहेबूब बिना रास।।१३

इस रासमण्डलमें अक्षरातीत श्री कृष्ण एवं परमधामकी ब्रह्मात्माओं (गोपियों) ने लीला-विलास किया. वस्तुतः प्रियतम धनी अक्षरातीत श्री कृष्णके अतिरिक्त अन्य कौन रासलीला रचा सकता है ?

Here the Shyam and Gopiya are playing, this is the sport/recreation of the soul of Arash(Paramdham). And non but our beloved is playing the Raas.
The celestial souls played Raas with no one but the beloved Mehboob the Shyam!

ए हमारी अरस न्यामतें, याके हम पें सहूर।
कह्या कतरा नूर का, चुआ है अंकूर।।१४

यह रासलीला हमारी परमधामकी सम्पदा है. इसलिए इसकी समझ भी हमारे पास ही है. यह रास मण्डल अक्षरब्रह्मके तेजका अंश होनेसे इसका सम्बन्ध भी अक्षरब्रह्मसे ही अङ्कुरित है.

This is the treasures of celestial soul and only we can only contemplate, this Raas is sprouted from Akshar brahm’s splendourous power (a droplet) and hence is extremely splendours.Only celestial souls can contemplate this Raas sport as a soul's treasure in yogmaya brahmand.

इत सबद न पोहोंचे दुनी का, नेक इन की देऊं खबर ।
कायम हुआ सायत में, जो आया नूर नजर।।१५

संसारकी वैखरी (वाक शक्ति) वाणीके शब्दोंसे रासलीलाका वर्णन नहीं हो सकता, तथापि मैं इसका थोड.ा-सा वर्णन कर रहा हूँ. यह लीला अक्षरब्रह्मकी दृष्टिमें आनेसे उसी समय अखण्ड हो गई.

The speech cannot describe it (unspeakable), let me inform you first, since Akshar brahm witnessed the Raas and hence it became eternal.
Those who have not experience the raas must understand by what is explained but it cannot be explained or described this Mahamati is clearly telling, so how will duni understand it?
Hence I can understand the misunderstanding amongst dunis!


ए जो बात बका अरस नूर की, सो केहेनी या जिमी माहें ।
क्यों सुनसी दुनी इन कानों, जो कबहूं ना सुनी क्यांहें ।।१६

अखण्ड धामोंके प्रकाशकी बात इस नश्वर जगतमें करनी है, इसलिए नश्वर जगतके जीव इन बातोंको, जो कभी कहीं भी नहीं सुनी हैं, अपने कानोंसे कैसे सुन सकेंगे ?

To speak the splendour and light of the eternal Arash(Paramdham) in this physical world, why would the world pay attention to these words which was never spoken before (unheard to them)?
They cannot grasp it and cannot realize it. It is sometimes frustrating too! But those souls from Paramdham will immediately understand it and remember it!


कोट हिसे एक हरफ के, हिसाब किया मीहीं कर ।
एक हिसा न पोहोंच्या इन जिमी लग, ए मैं देख्या दिल धर ।।१7

मैंने इस लौकिक वचनोंके एक-एक शब्दकी सूक्ष्मरूपसे गणना करते हुए करोड.ों भाग किए. उनमें-से एक भाग भी रास मण्डलका स्पर्श नहीं कर सका अर्थात् रास मण्डल तक पहुँच नहीं पाया. यह मैंने भलीभाँति विचार कर लिया.

I will divide my one word in millions and calculated it microscopically and not even a single piece could touch the jogmaya brahmand of Raas and pondering about it deep in my heart I have seen this.
Trying to speak the Jogmaya brahmand of Raas, there is no word which can make express it. Mahamati is trying to speak the unspeakable.


इत खेलत रूहें अरस की, जो स्यामें उतारी किस्ती पर ।
सो रूहें पोहोंची इन बाग में, और तोफाने डूबे काफर ।।२६

इस चिन्मय भूमिमें परमधामकी आत्माएँ लीला करती हैं, जिनके लिए कतेब ग्रन्थोंमें कहा गया है कि श्याम (शाम) ने (नूह तूफानके समय) उन आत्माओंको नाव (किश्ती) में बैठाया और सबको बागमें पहुँचाकर उतारा. शेष सभी नास्तिक (काफर) लोग चक्रवातमें डूबकर मर गए. (तात्पर्य यह है कि ब्रह्मात्माओंको श्री कृष्णजीने वंशीनाद कर वृन्दावनमें बुलाया, तब शेष समग्र जीव प्रलय होने पर नष्ट हो गए).
Here are playing the soul belonging to Arash(Paramdham) whom Shyam saved in the boat they reached in these soul reached in this garden and the non believers were drowned in the storm.

ए नूह तोफान कह्या रसूलें, और गुझ रह्या रूहों रोसन ।
किस्ती पार उतारी सबों सुनी, सुध ना परी पोहोंची बाग किन ।।२7

रसूल मुहम्मदने कुरानमें इस घटनाको 'नूह तूफान' कहा है, किन्तु ब्रह्मात्माओंके दिव्य प्रकाशकी बात गुप्त ही रखी थी. तूफानके समय आत्माओंको नावमें बैठाकर पार उतारा, यह बात तो सभीने सुनी किन्तु किसीको भी ज्ञाात नहीं हुआ कि वे आत्माएँ कौन-से बागमें पहुँचीं अर्थात् उन्हें कौन-से बागमें उतारा गया.

The messenger Rasool said this is Noah storm but the details of the soul that were saved is kept secret, everyone has heard about the boat but no one knows which garden they were alighted.

बात बडी इन नूर की, ए तो नेक कह्यो प्रकास ।
इत खेलें रूहें हकसों, विध विध के विलास।।२८

इस चिन्मय रासमण्डलका महत्त्व तो अति अधिक है. यह तो इसके प्रकाशका मात्र संक्षिप्त वर्णन हुआ है. यहाँ पर ब्रह्मात्माएँ पूर्णब्रह्म परमात्मा श्री कृष्णजीके साथ विभिन्न प्रकारसे लीला विलास करतीं हैं.

Great is value of this garden(divinity) this is revealed very little (little is spoken about it) where the soul played with the Hak(Supreme Master) in various sports.

The celestial soul are playing with the Supreme Master!

कह्या जाए ना नूर इन बाग जिमी, हुआ सब रोसन भरपूर ।
जिन ऐसा रोसन किया पलमें, सिफत क्यों कहूं असल नूर ।।२९

इस चिन्मय रास मण्डलके वन तथा भूमिके प्रकाशका वर्णन नहीं हो सकता. यहाँ सर्वत्र (कण-कणमें) प्रकाश भरा हुआ है. जिन अक्षरब्रह्मने पलभरमें ऐसे चिन्मय रासमण्डलकी रचना की, उनकी महिमाका वर्णन कैसे किया जा सकता है.

One cannot speak about the divinity and enlightening about this garden. The one who created such a enlightening garden in a moment, how can I find words to praise such Akshar Brahm the real Enlightened one.

हद सबद दुनीमें रह्या, पोहोंच्या नहीं नूर रास ।
तो क्यों पोहोंचे असल नूर को, जिन की ए पैदास ।।३०

संसारके शब्द तो क्षर ब्रह्माण्ड तक ही सीमित रहते हैं. वे चिन्मय रासमण्डलका भी वर्णन नहीं कर सकते, तो जिन्होंने पल मात्रमें इस रासमण्डलकी रचना की है, ऐसे अक्षरब्रह्मके वर्णनके लिए ये शब्द कैसे समर्थ हो (पहुँच) सकते हैं ?

The words of the perishable world are limited to perishable entity it cannot grasp the light of the Raas, how can they ever reach the Creator Akshar Brahm.

प्रकरण ३९ सनंध

Read the following statement does it mean Shri Krishna is a body!

Remember, in Raas the celestials souls were partly awakened but Lord wanted them and Akshar’s budhi to be fully awakened and that is why the leela of disappearance took place, The souls got the following chaupai as the realization and as soon they realized the Lord appeared and now the Raas was played with awakened souls and Akshar also witnessed it with wakeful mind.


सखी जोइए आपण वनमां, एम रे थैयो तमे कांय।
जेनुं नाम श्री क्रस्नजी, ते बेठा छे आपण मांय।।२३

हे सखियो ! चलो हम सब मिलकर उन्हें वनमें ढूँढंे.. तुम सब इस प्रकार निराश क्यों हो रही हो ? जिनका नाम श्रीकृष्ण है वे तो हमारे बीच (हृदय) में ही विराजमान हैं.

O dear sakhi, let us find Him in this forest, why are you so sad. The one whose name is Shri Krishna, is residing within us.
O Dear sakhi, lets first search Him in the forest(without) Why you feel so empty? The one with the name Shri Krishna lives in our heart (within). Seek the one whose name is Krishna within the self. (Remember Nijnaam). The realization that Lord is residing within is called full awakening. How can one find a body within?
श्री रास प्रकरण ३२

They were looking everywhere externally in the forest first and realized the truth(the purpose of becoming antardhyan).
They knew how exactly they were behaving in Braj and were close to the Lord so they enacted the whole braj leela in which Radha became the Shri Krishna.
We contemplate on His leela with Gopis at Braj(kalmaya uninverse) and Raas (Yogmaya universe).


कहे महंमद सुनो मोमिनों, ए उमी मेरे यार।
छोड दुनी ल्यो अरस को, जो अपना वतन नूर पार।।7३

हे ब्रह्मात्माओ ! सुनो, श्यामाजी (सद्गुरु) ने भी यही कहा है कि ये अनपढ. (उभी-चातुर्यपूर्ण लौकिक ज्ञाानसे अनभिज्ञा)) आत्माएँ ही मेरे श्रेष्ठ मित्र हैं. इसलिए नश्वर संसारको छोड.कर अखण्ड धामका मार्ग ग्रहण करो, अक्षरसे भी परे हमारा अक्षरातीत परमधाम है.
O my celestial souls, Satguru also has said these less knowledgeable souls are my true friends and not those who think themselves very street smart (loaded with extra knowledge), Reject the world and accept our original abode the Paramdham -Aras (that is beyond Noor Akshar where resides Tajalla Noor Aksharateet)
प्रकरण ३ श्री खुलासा
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आए देव फुरमाए हक के, बीच हिंदुस्तान।
करो सबों पर अदल, मार दूर करो सैतान।।४३

परब्रह्म परमात्माके आदेशसे देवोंके देव सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी भारतभूमि (हिन्दुस्थान) में प्रकट हुए. उन्होंने अपने उत्तराधिकारी (मुझ) को कहा, अब सबका न्याय करो और दुष्ट कलियुगरूपी नास्तिकताको दूर भगाओ.
By the will of the Lord, Devchandraji came in Hindustan(where hindus live) and he ordered Mahamati Prannathji to do justice to all and chase away the Satan(residing within the heart of the people)!
Those who read Mahamati's vani please follow it as it is and accept Lord in their heart and reject the Satan(that allures you to enjoy the forbidden fruit)!
प्रकरण ३ श्री खुलासा

Who is Shyama's var, the truth?

मंगल गाइए दुलहे के, आयो समे स्यामा वर स्याम।
नैनों भर भर निरखिए, विलसिए रंग रस काम।।१०

इसलिए अब प्रियतम परमात्माके शुभगुणोंका गायन करो, क्योंकि सुन्दरवर श्याम-श्यामाको मिलनेका समय आ गया है. अब नयन भरकर युगल स्वरूपके दर्शन करो और प्रेमानन्द लेते हुए उनके साथ विलास करो.
प्रकरण ८० श्री किरन्तन
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Remember it is the Aksharateet Shyam Shri Krishna of Paramdham who is first was in Braj and then in Raas and now in Jaagani too who ended the darkness of ignorance and brought the spiritual morning in this third time.

जो बची गिरोह कोहतूर तले, और तोफान किस्ती पर।
बेर तीसरी लैलत कदरमें, जिन रोज कयामत करी फजर।।२३
सोई गिरोह इसलाम की, खेल लैल देखा दो बेर।
तीसरी बेर फजर की, जाके इलमें टाली अंधेर।।२४

आत्माओंके जिस समुदायको इन्द्रकोपके समय व्रजमें गोवर्धन पर्वतके नीचे रखकर बचाया गया एवं जिनको योगमायाकी नौका पर बैठाकर वृन्दावनमें पहुँचाया गया तथा जिन्होंने महिमामयी ब्रह्मरात्रि (लैलतुलकद्र) के तृतीय चरणमें (जागनीलीलाके समय) संसारमें आकर तारतम ज्ञाानके द्वारा अज्ञाानरूपी अन्धकारको मिटाकर आत्म-जागृतिका प्रकाश फैलाया. सत्य (धर्म) मार्ग पर चलनेवाले यही समुदाय ब्रह्मात्माओंका है. इन्होंने ही महिमामयी ब्रह्मरात्रि (लैलतुलकद्र) के प्रथम और द्वितीय चरणमें व्रज और रासकी लीलाओंका अनुभव किया है और इस तीसरे चरण आत्म-जागृति (जागनीलीला) के प्रभातमें भी इन्होंने ही तारतम ज्ञाानके द्वारा अज्ञाानरूपी अन्धकारको मिटाया है.

It is the same Lord who was in Braj and the same in Raas and again at Jagani He has eliminated all the darkness of ignorance.

The next chaupai explains who is the Lord!
Can a soul seek Supreme or a body?

सिर बदले जो पाइए, महंमद दीन इसलाम।
और क्या चाहिए रूहन को, जो मिले आखर गिरोह स्याम।।२५

अपना सिर देने पर भी यदि सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी द्वारा र्नििदष्ट सत्य (धर्म) मार्ग एवं अपने धामधनी श्याम (श्रीकृष्ण) प्राप्त हो जाएँ तो इन आत्माओंको और क्या चाहिए ?
Offering your head -surrendering totally to Shri Devachandraji satguru who brought the true path what else does the celestial souls seek when the could unite with Shyam (soul unite with Supreme soul Shri Krishna!)

The Shyam - Shri Krishna is not the external physical body (Krishna, Mohamad, Devachandraji and Mahamati Prannath ) it is the Master living within the soul. He is the Supreme Intelligence residing within that Prannath ji's heart.
प्रकरण ३ खुलासा

Who is in Paramdham?

चलो चलो रे साथजी, आपन जैए धाम।
मूल वतन धनिएं बताया, जित ब्रह्म सृष्टि स्यामाजी स्याम ।।१

हे सुन्दरसाथजी ! चलो, हम सब साथ मिलकर परमधाम जाएँ. परमधामकी बात सद्गुरुने हमें बताई है, जहाँ ब्रह्मसृष्टि और श्यामाजी सहित श्री श्याम (अक्षरातीत श्रीकृष्णजी) विराजमान हैं.

O Sundarsath, lets all go to the Paramdham. The original abode our Lord has shown where dwells the celestial souls (brahmshristhi),Shyamaji and Shyam.
The mool means original that our Lords has shown where resides Shyam,Shyama and celestial souls only. This is very clear statement about Paramdham and the Lord.
प्रकरण ८९ Kirantan


रास मांहें रमाडयां जेणे, प्रगट लीला कीधी तेणे।
श्री धामतणां धणी कहेवाए, ते आवी बेठा आपण मांहें।।५

जिस स्वरूपने वृन्दावनमें अखण्ड रासकी लीला खेलाई उन्होंने ही यहाँ (नवतनपुरीमें) आकर उस लीलाको प्रकट किया. वे ही परमधामके धनी कहलाते हैं. वे ही अभी हम सबके बीच आकर बैठे हैं.
The beloved Lord who sported Raas with us in Vrindavan, the same appeared and revealed us the sport(The raas played in the yogmaya brahmand), He is called the Lord of the paramdham who came and resided within us.

प्रकरण २९ prakash gujarati

our Lord in Paramdham is Shyam

सोई चाल गत अपनी, जो करते माहें धाम।
हंसना खेलना बोलना, संग स्यामाजी स्याम।।११

हम परमधाममें जिस प्रकार चलते थे तथा श्याम-श्यामाजीके साथ हँसते, खेलते व बोलते थे, उन प्रसङ्गोंको याद करो.
How was our actions and how we behaved in Paramdham. How we laughed, played and talked along with Shyamaji and SHYAM!
This is the description of Paramdham and this is the last instruction to us by Mahamati Prannath.

प्रकरण ९३ kirantan

क्यों न होए प्रेम इनको, जाके घर यह धाम ।
स्याम स्यामाजी साथ में, जाको इत विश्राम ।।१८

जिन ब्रह्मात्माओंका निवास ही अखण्ड परमधाममें है एवं जो स्वयं श्रीश्यामश्यामाजीके साथ वहाँ पर विश्राम करतीं हैं, उनके हृदयमें प्रेम कैसे अङ्कुरित नहीं होगा ?


क्यों न होए प्रेम इन को, जो बैठत पीउ के पास ।
निस दिन रामत रमूज में, होत न वृथा एक स्वास ।।३८

जो ब्रह्मात्माएँ सर्वदा धामधनीके सान्निध्यमें रहतीं हैं एवं उनके साथ ही हास-परिहास करती हुई एक श्वासको भी व्यर्थ जाने नहीं देतीं हैं, उनके हृदयमें प्रेम कैसे अङ्कुरित नहीं होगा.

महामत कहे मेहेबूबजी, अब दीजे पट उडाए।
नैना खोल के अंग भर, लीजे कंठ लगाए।।८४

महामति कहते हैं, हे धामधनी ! अब अज्ञाानरूपी आवरणको उड.ाकर हमारी आँखें खोल दीजिए एवं हमें प्रेमपूर्वक अपने गले लगा लीजिए.
प्रकरण ३९
shri parikrama

स्याम स्यामाजी आए देखो खेल बनाए, सब उठियां हंसकर ।
खेले महामति देखलावे इंद्रावती, खोले पट अंतर ।।१०

उस समय श्रीश्यामश्यामाजीने वहाँ पर आकर सखियोंकी यह लीला देखी तो सभी सखियाँ हँसती हुईं उठ गइंर्. इस प्रकार इन्द्रावती आदि सखियोंके इन खेलोंको दिखाते हुए महामति सभी सुन्दरसाथके अन्तर पटको खोल रहे हैं.
प्रकरण ४०
shri parikrama

कहियत नेहेचल नाम, सदा सुख दाई धाम।
साथजी स्यामाजी स्याम, विलसत आठों जाम री ।।१

अखण्ड परमधाम सदा शाश्वत एवं आनन्दमय है. यहाँ पर श्रीश्यामश्यामाजी एवं ब्रह्मात्माएँ आठों प्रहर आनन्द विलास करते हैं.

नित इत विश्राम, पूरन है प्रेम काम।
हिरेदें न रहे हाम, इसक आराम री।।२

यहाँ पर नित्य विश्राम है एवं सभी मनोरथ प्रेमपूर्वक पूर्ण होते हैं. जहाँ पर कोई भी कामनाएँ शेष नहीं रहती है ऐसे दिव्यधाममें प्रेम और शान्तिके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है.
प्रकरण ४२ shri parikrama

For those who keep saying Raas, Prakash and Kalash are not complete and does not holds truth or are sarcastic to sundarsath about these books and try to lead sundarsath away from it Check what Mahamati Prannath has warned for those.

dil arash

तो नूर रांग पार की क्यों कहू, जाको सुमार नहीं वार पार ।
वह मोमिन देखें दिल अरस में, जो दिल अरस परवरदिगार ।।२५

इस प्रकाशमय दुर्गके आसपासकी भूमिकी शोभाका वर्णन कैसे करंे जिसका कोई पारावार ही नहीं है. ब्रह्मात्माएँ ही अपने हृदयधाममें इसका अवलोकन कर सकतीं हैं, जिनका हृदय स्वयं परब्रह्म परमात्माका धाम बना हुआ है.
प्रकरण ४३ shri parikrama

मेरे मीठे बोले साथ जी, हुआ तुमारा काम।
प्रेमैं में मगन होइयो, खुल्या दरवाजा धाम।।१
सखी री धाम जैये ।। टेक ।।

हे सुन्दरसाथजी ! मेरे (सद्गुरुके) मीठे वचनोंके द्वारा तुम्हारे सब कार्य (मनोरथ) पूर्ण हो गए हैं. तुम अपने धनीके प्रेममें मग्न रहो. तुम्हारे लिए परमधामके द्वार खुल गए हैं. इसलिए हे सुन्दरसाथजी ! अब परमधाम चलें.

दौड सको सो दौडियो, आए पोहोंच्या अवसर।
फुरमानमें फुरमाइया, आया सो आखर।।२

जागनीके लिए अन्तिम समय आ पहुँचा है, इसलिए जितना दौड. सकते हो उतना दौड.ो (अज्ञाानको छोड.कर जागृत हो जाओ). आत्म-जागृतिका शास्त्रोक्त समय आ गया है.

वरनन करते जिनको, धनी केहेते सोई धाम।
सेवा सुरत संभारियो, करना एही काम।।३

सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजी महाराज जिस मूलघरका वर्णन करते थे, वही अपना परमधाम है. इसलिए तुम धनीजीकी सेवा करते हुए अपनी सुरताको परमधामकी ओर केन्द्रित करो, क्योंकि हमें यही कार्य करना है.

वन विसेखे देखिए, माहें खेलन के कै ठाम।
पसु पंखी खेलें बोलें सुन्दर, सो मैं केते लेऊं नाम ।।४

परमधामके विभिन्न वन-उपवनकी शोभाको देखो. वहाँ पर अनेक क्रीड.ास्थल हैं. उनमें असंख्य पशु-पक्षी विभिन्न प्रकारके खेल करते हुए सुन्दर कलरव करते हैं. मैं उनमेंसे कितनोंका नाम लूँ ?

स्याम स्यामाजी सुन्दर, देखो करके उलास।
मनके मनोरथ पूरने, तुम रंग भर कीजो विलास।।५

अपने हृदयमें प्रेम और उल्लास भरकर अपने प्राणाधार श्याम-श्यामाजीके सुन्दर स्वरूपके दर्शन करो और अपने मनोरथोंको पूर्ण करनेके लिए उनके साथ आनन्द-विलास करो.

इसक आयो पीउ को, प्रेम सनेही सुध।
विविध विलास जो देखिए, आई जागनी बुध।।६

अब हमारे हृदयमें धामधनीका प्रेम प्रकट हुआ है, उसीसे हमें परमधामके प्रेमकी सुधि हुई. अब परमधामके विभिन्न प्रकारके प्रेम विलासको देखो, क्योंकि तारतम ज्ञाानरूपी जागृत बुद्धि प्रकट हो गई है.

आनंद वतनी आइयो, लीजो उमंग कर।
हंसते खेलते चलिए, देखिए अपनों घर।।7

परमधामका आनन्द प्रकट हो गया है, उसे उत्साह पूर्वक ग्रहण करो. हँसते-खेलते चलो और अखण्ड परमधामको देखो.

सुख अखंड जो धाम को, सो तो अपनों अलेखें।
निपट आयो निकट, जो आंखा खोलके देखे।।८

परमधामके अखण्ड सुख तो असीम हैं. अब वे हमारे निकट आ चुके हैं. तुम उन्हें अन्तर्दृष्टिसे देखो एवं अन्तरात्मामें उनका अनुभव करो.

अंग अनभवी असल के, सुखकारी सनेह।
अरस परस सबमें भया, कछू प्रेमें पलटी देह।।९

तुम्हारी आत्मा तो परमधामके वास्तविक प्रेमका अनुभव कर रही है जो अखण्ड सुख देनेवाला है. वह प्रेम तुम सबमें आत्मा-परात्माके सम्बन्ध द्वारा जागृत हो चुका है. इसके कारण तुम्हारे शरीरका व्यवहार ही बदल गया है.

मंगल गाइए दुलहे के, आयो समे स्यामा वर स्याम।
नैनों भर भर निरखिए, विलसिए रंग रस काम।।१०

इसलिए अब प्रियतम परमात्माके शुभगुणोंका गायन करो, क्योंकि सुन्दरवर श्याम-श्यामाको मिलनेका समय आ गया है. अब नयन भरकर युगल स्वरूपके दर्शन करो और प्रेमानन्द लेते हुए उनके साथ विलास करो.

धामके मोहोलों सामग्री, माहें सुखकारी कै विध।
अंदर आंखें खोलिए, आई है निज निध।।११

परमधामके महल और मन्दिर विभिन्न प्रकारकी आनन्ददायी सामग्रियोंसे परिपूर्ण हैं. इसलिए अन्तःदृष्टिको खोलकर देखो, वह अखण्ड निधि स्वरूप तारतम ज्ञाान यहाँ आ पहुँचा है.

विलास विसेखें उपज्या, अंदर कियो विचार।
अनभव अंगे आइया, याद आए आधार।।१२

इस प्रकार अन्तर हृदयसे विचार करो, प्रियतम धनीके साथ विशेष आनन्द-विलास करनेकी कामना उत्पन्न हुई है. अब धामधनीका स्मरण होते ही परमधामके अखण्ड सुखोंका अनुभव होने लगा.

दरदी विरहा के भीगल, जानों दूरथें आए विदेसी।
घर उठ बैठे पलमें, रामत देखाई ऐसी।।१३

इस संसारमें आकर हम सबके हृदय धनीजीके प्रेम और विरहके कारण रो रहे हैं. मानों हम दूर आकर विदेशी बन गए हैं. परन्तु धनीजीने ऐसा खेल दिखाया कि हम क्षणभरमें ही जागृत होकर परमधाममें बैठ जाएँगे.

उठके नहाइए जमुनाजी, कीजे सकल सिनगार।
साथ सनमंधी मिलके, खेलिए संग भरतार।।१४

इसलिए अब भ्रमकी निद्राको छोड.कर जागृत हो जाओ तथा यमुनाजीके शीतल जलमें स्नान करो. तत्पश्चात् परमधामके सम्पूर्ण शृङ्गार धारण कर सभी ब्रह्मात्माएँ एक साथ मिलकर प्रियतम धनीके साथ रमण करो.

महामत कहें मलपतियां, आओ निज वतन।
विलास करो विध विध के, जागो अपने तन।।१५

महामति कहते हैं, प्रेममें मस्त रहने वाली हे आत्माओ ! तुम सब साथ मिलकर परमधाम आओ और परात्मामें जागृत होकर प्रियतम धनीके साथ विभिन्न प्रकारके आनन्द-विलास करो.
प्रकरण ८० श्री किरन्तन

साथ जी सोभा देखिए, करें कुरबानी आतम।
वार डारों नख सिख लों, ऊपर धाम धनी खसम।।१

हे सुन्दरसाथजी ! धामधनीकी शोभायुक्त छविके दर्शन कर अपनी आत्माको उनके चरणकमलोंमें सर्मिपत कर दो. इतना ही नहीं, नखसे शिख तक सभी अङ्गोंको धामधनीके चरणोंमें सर्मिपत कर दो.

लिख्या है फुरमान में, करसी कुरबानी मोमिन।
अग्यारे सै साल का, सो आए पोहोंच्या दिन।।२

कुरानमें भी बताया गया है कि आत्म-जागृति (कयामत) की घड.ीमें ब्रह्मात्माएँ परमात्माके मार्ग पर न्योछावर होंगी. ग्यारहवीं शताब्दीका वही शुभ दिन आ पहुँचा है.

देख्या मैं विचार के, हम सिर किया फरज।
बडी बुजरकी मोमिनो, देखें कौन क्यों देत करज।।३

विचार करने पर मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि सद्गुरु धनीने सुन्दरसाथको जगाकर परमधाम ले जानेका उत्तरदायित्व मुझे सौंपा है. धर्मग्रन्थोंमें सुन्दरसाथकी अत्यधिक प्रशंसा की गई है. अब देखते हैं कि धर्मके मार्ग पर चलकर जागनीका कार्य करते हुए कौन कितना कर्तव्य निभाता है.

करी कुरबानी तिन कारने, परख्या सबकी होए।
करे कुरबानी जुदे जुदे, सांच झूठ ए दोए।।४

इसलिए जागनीके कार्यमें मैंने स्वयंको सर्मिपत किया है. अब सबकी परीक्षा होगी. सत्य आत्माएँ तथा मायाके जीव विभिन्न प्रकारसे सर्मिपत होंगे (इसीसे ब्रह्मसृष्टि तथा जीवसृष्टिके रूपमें सबकी पृथक्-पृथक् पहचान हो जाएगी).

कस न पाइए कसोटी बिना, रंग देखावे कसोटी।
कची पकी सब पाइए, मत छोटी या मोटी।।५

जिस प्रकार कसोटीके बिना किसी भी वस्तुकी परख नहीं हो सकती, उसी प्रकार धनीजीके प्रति ब्रह्मात्माओंका प्रेम रङ्ग कच्चा है अथवा पक्का, इसकी परख समर्पण (कुर्बानी) की कसोटी द्वारा ही होती है.

कसोटी कस देखावहीं, कसनी के वखत।
अबहीं प्रगट होएसी, जुदे झूठ से निकस के सत।।६

परीक्षाके समय ब्रह्मात्माएँ साधना (सर्मिपत हो) कर दिखाएँगी. झूठसे पृथक् होकर सत्य किस प्रकार बाहर आता है (ब्रह्मात्माएँ अन्य जीवोंसे कैसे श्रेष्ठ हैं), वह परिणाम अभी प्रकट हो जाएगा.
At the time of crisis, the souls of Paramdham will show her dedication. From


करत कुरबानी सकुचे, मोमिन करे न कोए।
तिन गिरोकी परख्या, अब सो जाहेर होए।।7

ब्रह्मात्माएँ धर्म (परमधाम) के मार्ग पर स्वयंको सर्मिपत करनेमें सङ्कोचका अनुभव नहीं करेंगी. इसी समय जीवसृष्टि, ईश्वरीसृष्टि और ब्रह्मसृष्टि, इन तीनोंकी परीक्षाके परिणाम प्रसिद्ध हो जाएँगे.

कहा कहूं वतन सैयां, जो मगज लगे अरथ।
कुरबानी समे देख्या चाहिए, सांचे सूर समरथ।।८

परमधामकी ब्रह्मात्माओंके विषयमें मैं क्या कहूँ ? वे तो सदैव गूढ.ार्थ समझकर ही सर्मिपत होती हैं (इसके द्वारा ही उनकी कसौटी होती है). इसलिए समर्पणके समय शूरवीर ब्रह्मात्माओंके सामर्थ्यका परिचय प्राप्त हो जाता है.

कुरबानी को नाम सुन, मोमिन उलसत अंग।
पीछे हुते जो मोमिन, दौड लिया तिन संग।।९

समर्पण (कुरबानी) का नाम सुनते ही ब्रह्मात्माओंके अङ्ग-प्रत्यङ्ग उत्कण्ठित होते हैं. जो ब्रह्मात्माएँ सर्मिपत होनेमें पीछे रह गईं, वे भी दौड.कर सुन्दरसाथमें सम्मिलित हो रही हैं.

मोमिन एही परख्या, जोस न अंग समाए।
बाहेर सीतलता होए गई, माहें मिलाप धनीको चाहे।।१०

ब्रह्मात्माओंकी यही परीक्षा है कि उनके अङ्गोंमें समर्पणका उमङ्ग समाता नहीं है. वे बाहरसे अर्थात् गुण, अंग, इन्द्रियोंसे भले शान्त प्रतीत होती हों, किन्तु अन्दरसे धनी मिलनके लिए तड.पती हैं.

सुनत कुरबानी मोमिन, होए गए आगे से निरमल ।
इत एक एक आगे दूसरा, जाने कब जासी हम चल ।।११

समर्पणकी बात सुनते ही ब्रह्मात्माएँ पहलेसे ही निर्मल हृदय होकर आतुर रहती हैं. वे एक-दूसरेसे आगे रहती हैं कि कब हम चलकर धनीके पास पहुँचें.

मोमिन बडा मरातबा, सो अब होसी जाहेर।
छिपे हुते दुनियां मिने, सो निकस आए बाहेर।।१२

ब्रह्मात्माओंका पद बहुत ऊँचा है, वह अब प्रकट हो जाएगा. अभी तक ब्रह्मात्माएँ संसारमें छिपी हुई थीं, वे सब अब (समर्पणके समयमें) बाहर निकल आई हैं.

सांचे छिपे ना रहें, अपने समे पर।
दोस्त कहे धनी के, सो छिपे रहें क्यों कर।।१३

सच्ची ब्रह्मात्माएँ अपने (समर्पणके) समय पर छिपी नहीं रहेंगीं. जो धामधनीकी अङ्गना (सखियाँ) कहलातीं हैं, वे (ऐसे समय पर) कैसे छिपी रहेंगीं ?

जो होए आतम धाम की, सो अपने समे पर।
अपना सांच देखावहीं, भूले नहीं अवसर।।१४

जो परमधामकी आत्मा होगी, वह अपने समय पर अपनी सत्यता अवश्य दिखाएगी. समर्पणके इस समयको नहीं भूलेगी.

जो भूले अब को अवसर, सो फेर न आवे ठौर।
नेहेचे सांचे ना भूलहीं, इत भूलेंगे कोई और।।१५

जो इस अमूल्य अवसरको भूल जाएँगीं, उन्हें पुनः ऐसा समय प्राप्त नहीं होगा. निश्चय ही सत्य ब्रह्मात्माएँ नहीं भूलेंगीं. ऐसे समयपर भूलनेवाले तो कोई अन्य (जीवसृष्टि) ही होंगे.

आया दरवाजा धाम का, सांचो बाढया बल।
आए गए छाया मिने, धनी छाया निरमल।।१६

परमधामके द्वार खुले हुए देखकर सच्ची ब्रह्मात्माओंका आत्मबल बढ. गया. वे सब सद्गुरु धनीकी निर्मल (शीतल) छत्रछायामें आ गइंर्.

साफ सेहेजे हो गए, करने पडया न जोर।
रात मिटी कुफर अंधेरी, भयो रोसन वतनी भोर।।१7

वे सरलतासे निर्मलहृदया हो गइंर्. इसके लिए उन्हें प्रयत्न करना नहीं पड.ा. अज्ञाान-अन्धकार रूपी रात मिट गई. परमधामके (तारतम) ज्ञाानके प्रकाशका प्रभात हो गया.

कुरबानी सुन सखियां, उलसत सारे अंग।
सुरत पोहोंची जाए धाम में, मिलाप धनी के संग।।१८

समर्पण (कुरबानी) की बात सुनते ही ब्रह्मात्माओंके अङ्गोंमें उमङ्ग भर जाता है. उनकी सुरता परमधाममें पहुँचकर धामधनीके साथ मिल जाती है.

मोमिन बल धनीय का, दुनी तरफ से नाहें।
तो कहे धनी बराबर, जो मूल सरूप धाम माहें।।१९

ब्रह्मात्माओंके पास धामधनीका आवेश बल है, उनको सांसारिक शक्तिकी आवश्यकता नहीं होती. इसलिए उनको धामधनीके समान माना गया है, क्योंकि उनके मूलस्वरूप (परआत्मा) परमधाममें सदैव धामधनीके साथमें ही हैं.

लडकपने सुध ना हुती, तो भी मोमिन मूल अंकूर।
कोई कोई बात की रोसनी, लिए खडे थे जहूर।।२०

भले ही ब्रह्मात्माओंको सद्गुरुके सान्निध्यमें भी अज्ञाानावस्थाके कारण परमधामकी सुधि न रही हो, किन्तु उनका मूल सम्बन्ध (अङ्कुर) तो परमधामका ही हैं. इसलिए उस समय भी ज्ञाानका कुछ प्रकाश लेकर तो वे सद्गुरुकी शरणमें खड.ी ही थीं.

अब तो किए धनिएं जागृत, दई भांत भांत पेहेचान।
तोड दई आसा छल की, क्यों सकुचें करत कुरबान।।२१

अब तो सद्गुरुने मेरे हृदयमें बैठकर सब सुन्दरसाथको जागृत कर दिया है तथा विभिन्न प्रकारसे पहचान भी करवाई है. उन्होंने मायाकी झूठी आशाएँ भी तोड. दीं. इसलिए अब सर्मिपत होनेमें क्यों सङ्कोच करें ?

अब तो धनी बल जाहेर, आयो अलेखें अंग।
ए जिन दिया सो जानहीं, या जिन लिया रस रंग।।२२

अब तो सद्गुरु धनीकी अपार आवेश शक्ति मेरे हृदयमें आकर प्रकट हो गई है. धनीजीकी इस कृपाको या तो स्वयं धनीजी ही जानते हैं जिन्होंने प्रदान की है अथवा इसे अनुभव करनेवाली मेरी आत्मा ही जानती है.

ए दुनी न जाने सुपन की, न जाने मलकूती फिरस्तन ।
ए अक्षर को भी सुध नहीं, जाने स्याम स्यामा मोमिन ।।२३

धामधनीकी आवेश शक्तिको स्वप्नकी दुनियाँ (जीवसृष्टि) तथा वैकुण्ठके देवता (फरिश्ते) भी नहीं जानते हैं. अक्षरब्रह्मको भी इसकी सुधि नहीं है. स्वयं श्याम-श्यामाजी तथा ब्रह्मात्माएँ ही इस रहस्यको जानती हैं.

मैं मेरे धनीय की, चरन की रेन पर।
कोट बेर वारों अपना, टूक टूक जुदा कर।।२४

ऐसे कृपालु सद्गुरुधनीकी चरण रज पर मैं अपने शरीरको टुकड.े-टुकड.े कर करोड.ों बार सर्मिपत कर दूँ.

अंग अंग सब उलसत, कुरबानी कारन।
जरे जरे पर वार हूं, ए जो बीच जरे राह इन।।२५

समर्पणके लिए मेरे अङ्ग-प्रत्यङ्ग उल्लसित हो रहे हैं. धामधनीके मार्गमें कण-कण पर मैं मेरे तनको सर्मिपत कर दूँ.
जिन दिस मेरा पीउ बसे, तिन दिस पर होऊं कुरबान ।
रोम रोम नख सिख लों, वार डारों जीव से प्रान।।२६

जिस दिशामें मेरे धनी रहते हैं, मैं उस दिशा पर सर्मिपत हो जाऊँ. नखसे लेकर शिख तक शरीरके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्ग, रोम-
रोमको प्राणों सहित सर्मिपत कर दूँ.

सूरा तन सखियन का, मुखथें कह्यो न जाए।
महामत कहें सो समया, निपट निकट पोहोंच्या आए।।२7

ब्रह्मात्माओंकी शूर-वीरताका वर्णन इस मुखसे नहीं हो सकता. महामति कहते हैं, समर्पणका वह समय अति निकट आ पहुँचा है.
प्रकरण ९० श्री किरन्तन

सखी री मेहेर बडी मेहेबूब की, अखंड अलेखे।
अंतर आंखा खोलसी, ए सुख सोई देखे।।१

हे आत्माओ ! प्रियतम धनीकी कृपा असीम, अखण्ड और अवर्णनीय है. जो हृदयकी आँखें खोलकर देखेगा, वही धनीजीकी कृपाके इन अपरिमित सुखोंका अनुभव कर पाएगा.

न था भरोसा हम को, जो भवजल उतरें पार।
इन जुबां केती कहूं, इन मेहेर को नहीं सुमार।।२

हमें विश्वास नहीं था कि हम इस भवसागरसे पार उतर पाएँगे. इस जिह्वा द्वारा कितनी प्रशंसा की जाए, परन्तु धनीकी इस कृपाका कोई पारावार नहीं है.

मेरे दिल की देखियो, दरद न कछू इसक।
ना सेवा ना बंदगी, एह मेरी वीतक।।३

मेरे हृदयकी स्थितिको तो देखो इसमें न धनीजीके विरहकी पीड.ा थी तथा न ही उनके प्रति प्रेम ही था. न सेवा भावना थी और न ही भक्तिभाव था, ऐसी मेरी आपबीती है.

मेहेरें हमको ऐसा किया, करी वतन रोसन।
मुक्ति दे सचराचर, हम तारे चौदे भवन।।४

परन्तु धनीजीकी कृपाने ऐसा चमत्कार किया कि हमारे हृदयमें परमधाम प्रकाशित होने लगा. उनकी कृपाके कारण ही हमने चौदह लोकोंके सचराचर जीवोंको मुक्ति देकर पार उतारा.

क्यों मेहेर मुझ पर भई, ए थी दिल में सक।
मैं जानी मौज मेहेबूब की, वह देत आप माफक।।५

मेरे मनमें यह शङ्का रहती थी कि इन सभी ब्रह्मात्माओंमें-से धनीजीकी कृपा मुझपर ही अधिक क्यों हुई ? उन्हींकी कृपासे मुझे उनकी सदिच्छा (उमङ्ग) ज्ञाात हुई कि वे अपनी इच्छानुसार किसीको भी अपने समान महत्त्व दे सकते हैं.

बढत बढत मेहेर बढी, वार न पाइए पार।
एक ए निरने मैं ना हुई, वाको वाही जाने सुमार।।६

मुझ पर धनीजीकी कृपा बढ.ते-बढ.ते इतनी बढ. गई कि उसकी कोई सीमा ही न रही, परन्तु इतनी अधिक कृपाका कारण मेरी समझमें न आया. स्वयं धनीजी ही अपनी कृपाका पार पा सकते हैं.

और मेहेर ए देखियो, कर दियो धाम वतन।
साख पुराई सबों अंगों, यांे कै विध कृपा रोसन।।7

उनकी कृपाको और देखो, उन्होंने हमारे हृदयको परमधाम बना दिया. उन्होंने वेद, कतेबकी साक्षी देकर हमारे मन, चित्त, बुद्धि आदि अङ्गोंको जागृत कर दिया. इस प्रकार उनकी कृपा अनेक प्रकारसे प्रकट हुई है.

अंदर सब मेरे यों कहे, धाम से आए माहें सुपन।
है सनमंध धनी धामसों, ए साख मेहेर से उतपन।।८

मेरा अन्तःकरण यह मानता है कि हम ब्रह्मसृष्टि परमधामसे इस स्वप्नवत् संसारमें आई हैं. धनीजीकी कृपा द्वारा ही यह सिद्ध हुआ कि हमारा सम्बन्ध धामधनीके साथ है.

मेरे सतगुरु धनिएं यों कह्या, और कह्या वेद पुरान।
सो खोल दिए मोहे माएने, कर दई आतम पेहेचान।।९

मेरे सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजीने हमें यह सम्बन्ध बताया तथा वेदों और पुराणोंमें भी इसी प्रकार कहा गया है. उन्होंने वेद, पुराणके इन सब सङ्केतोंका स्पष्टीकरण कर मुझे मेरी आत्माकी पहचान करवाई.

सब मिल साख ऐसी दई, जो मेरी आतम को घर धाम ।
सनमंध मेरा सब साथसों, मेरो धनी सुन्दर वर स्याम ।।१०

इन सबने मिलकर ऐसी साक्षी दी कि हमारी आत्माका घर परमधाम है. सब ब्रह्मात्माओंके साथ हमारा सम्बन्ध है तथा हमारे आत्माके धनी पूर्णब्रह्म परमात्मा सुन्दरवर श्याम-श्री कृष्ण हैं.

इत अक्षर आवें नित्याने, मेरे धनी के दीदार।
ए निसबत भई हम गिरोह की, क्यों कहूं इन सुख को पार ।।११

अखण्ड परमधाममें अक्षरब्रह्म मेरे प्रियतम धनीके दर्शन करनके लिए नित्यप्रति आया करते हैं. ऐसे धामधनीके सम्बन्धकी पहचान प्राप्त करके ब्रह्मसृष्टियाँ धन्य हुई हैं. इन अपार सुखोंका वर्णन किस प्रकार हो सकता है ?

ए आतम को नेहेचे भयो, संसे दियो सब छोड।
पर आतम मेरी धाम में, तो कही सनमंध संग जोड।।१२

इस वास्तविकताका ज्ञाान होने पर मेरी आत्माको विश्वास हुआ तथा सभी शङ्काएँ दूर हो गईं. मेरी पर-आत्मा परमधाममें है, अतः सद्गुरु धनीने मुझे आदेश दिया कि तुम उस परात्माके साथ अपना सम्बन्ध जोडो.

पर आतम के अन्तसकरन, जेती वीतत बात।
तेती इन आतम के, करत अंग साख्यात।।१३

पर-आत्माके हृदयमें जो बीत रहा है, सद्गुरुकी कृपा द्वारा वह सम्पूर्ण मेरी आत्मामें प्रत्यक्ष अनुभव होने लगा.

ए भी धनिएं श्रीमुख कह्या, और दई साख फुरमान ।
ए दोऊ मिल नेहेचे कियो, यों भई द्रढ परवान।।१४

धनी श्रीदेवचन्द्रजीने अपने श्रीमुखसे यही बातें कहीं और कुरान आदि धर्मग्रन्थोंने भी यही साक्षी दी. इस प्रकार दोनों ओरसे साक्षी मिलने पर मेरे मनमें दृढ. निश्चय हुआ कि हमारी आत्माका सम्बन्ध अक्षरातीत धनीके साथ है.

और मेहेर ए देखियो, ऐसा कर दिया सुगम।
बिन कसनी बिन भजन, दियो धाम धनी खसम।।१५

सद्गुरु धनीकी इस अपार कृपाको देखो, उन्होंने मेरे लिए इतना सरल बना दिया कि तप या भजन जैसी कठोर साधना किए बिना ही मुझे परमधाम तथा धामधनीका अनुभव होने लगा.

ना जप तप ना ध्यान कछू, ना जोगारंभ कष्ट।
सो देखाई व्रज रास में, एही वतन चाल ब्रह्मसृष्ट ।।१६

मैंने जप, तप तथा ध्यान कुछ भी नहीं किया था, योग साधनाके कष्ट भी सहन नहीं किए. तथापि सद्गुरुने मुझे व्रज और रासलीलाकी प्रेमलक्षणा भक्तिका दृष्टान्त देकर परमधामकी ब्रह्मात्माओंकी रीति समझाई.
Neither you need to do jap(repetition of God's name), nor penance nor Dhyana(part of yoga practice) nor you have pain yourself by becoming a jogi.
What Krishna-Gopi taught in Braj and Raas leela, the brahmashrithi (celestial souls) will take the same path to Abode.

चलत चाल घर अपने, होए न कसाला किन।
आयस कछू न आवहीं, सब अपनीमें मगन।।१7

अब अपने परमधामके मार्ग पर चलते हुए किसीको भी किसी प्रकारका कष्ट नहीं होगा, कोई परिश्रम भी नहीं होगा, सभी अपने में ही मस्त होकर चल सकेंगे.

सोई गुन पख इन्द्रियां, धाम वतन की देह।
सोई मिलना पर आतम का, सब सुखै के सनेह।।१८

सद्गुरुकी कृपासे हमें ऐसा अनुभव होने लगा कि हमारी गुण, अंग तथा इन्द्रियाँ भी वही हैं जो परमधाममें परआत्मा की हैं और हमारी देह भी वही है जो परमधाममें परआत्माके रूपमें है. इसी प्रकार, जैसे परमधाममें परआत्मा धामधनीसे मिलकर अपार सुखोंका अनुभव करती है, वैसे ही हम भी यहाँ अपने सद्गुरु धनीसे मिलकर अपार स्नेहका अनुभव करने लगीं.

सोई सेहेज सोई सुभाव, सोई अपना वतन।
सोई आसा लज्या सोई, सोई करना न कछू अन।।१९

अब हम ब्रह्मात्माओंका स्वभाव भी वैसा ही सरल बन गया, जैसा परमधाममें परआत्माका है. हमारी आशा, लज्जा तथा आचरण भी सब परमधामके अनुरूप ही होने लगे इसलिए हमें अब और कुछ करना शेष ही न रहा.

सोई लोभ सोई लालच, सोई अपनो अहंकार।
सोई काम प्रेम करतब, सोई अपना बेहेवार।।२०

परआत्माके समान अब हमें भी वही धनीके दर्शनका लोभ-लालच तथा स्वयंको धनीकी अंगना होनेका अहंभाव जागृत होने लगा. अब तो धनीके प्रेममें मग्न रहना ही हमारा कार्य तथा व्यवहार होने लगा.

सोई मन बुध चितवन, सोई मिलाप सैयन।
सोई हांस विलास अपना, करते रात दिन।।२१

हमारे मन, चित्त, और बुद्धिमें भी वही परमधामका चिन्तन होने लगा और सुन्दरसाथका मिलन भी वैसा ही प्रेममय हो गया. हम परमधाममें दिन-रात जिस प्रकारका आनन्द लेते थे, उसी प्रकारका आनन्द यहाँ भी लेने लगे.

धाम लीला जाहेर करी, विध विध की रोसन।
दिया सुख अखंड दुनी को, और कायम किए त्रिगुन ।।२२

इस प्रकार सद्गुरुने परमधामकी सम्पूर्ण लीलाओंको प्रकट कर संसारमें प्रकाशित किया तथा संसारके जीवोंको अखण्ड सुख देकर त्रिगुणको भी अखण्ड कर दिया.

जो जागो सो देखियो, ए लीला सबदातीत।
मेहेरें इत प्रगट करी, मूल धाम की रीत।।२३

जो आत्माएँ जाग्रत होंगी, वे इसका अनुभव कर पाएँगी, यह लीला परमधामकी लीलाके समान साक्षात् शब्दातीत है. सद्गुरु धनीकी कृपाके द्वारा ही परमधामकी यह रीति इस संसारमें प्रकट हुई है.

हुकम सरत आए मिली, जो फुरमाई थी फुरमान।
महामत साथ को ले चले, कर लीला निदान।।२४

धर्मग्रन्थोंमें निश्चयपूर्वक जो कहा गया था, वह समय आ पहुँचा है. अब महामति जागनी रास पूर्ण कर सुन्दरसाथको परमधाम ले कर चल रहे हैं.
प्रकरण ८२ श्री किरन्तन

धन धन ए दिन साथ आनंद आयो ।। टेक ।।
अखंड में याद देने, ए जो बेन बजायो।
चित दे साथ को ले, आप में समायो।।१

हे सुन्दरसाथजी ! ऐसी आनन्दमयी धन्य घड.ी आ गई है कि अखण्ड परमधामको याद दिलानेके लिए सद्गुरुने यह ज्ञाानकी वंशी बजाई. इस प्रकार सद्गुरुने अपना प्रेम देकर सुन्दरसाथको अपनी ओर खींच लिया तथा स्वयंमें समाहित किया.

अखंड में याद देने, ए जो खेल बनायो।
व्रज रास जागनी में, ए जो खेल खेलायो।।२

अखण्ड परमधाममें इसकी स्मृति दिलानेके लिए ही इस अनित्य संसाररूप खेलकी रचना की और इसमें व्रज, रास एवं जागनीकी ये लीलाएँ कीं.

पीउने प्रकास्यो पेहेले, आयो सो अवसर।
व्रज ले रास में खेले, खेले निज घर।।३

सद्गुरु धनीने पहले ही कहा था अब वही आत्म जागृतिका अवसर आ पहुँचा है. जैसे ही हम परमधाममें जागृत होंगे, तब वहाँ तो खेलेंगे ही किन्तु व्रज एवं रासमें भी खेलते हुए दिखाई देंगे.

विध विध विलास हांस, अंग थें उतपन।
नए नए सुख सनेह, हुए हैं रोसन।।४

विभिन्न प्रकारके लीला-विलासका आनन्द हमारे अङ्गोंमें प्रकट हुआ है. इसी प्रकार नवीन सुख और स्नेह भी प्रकाशित होने लगा.

चेहेन चरित्र चातुरी, व्रज रास की लई।
अनभव असलू अंग में, आए चढी धाम की सही ।।५

व्रज एवं रासकी लीलाओंके विभिन्न लक्षण हृदयङ्गम करने पर परमधामके अखण्ड आनन्दका अनुभव हृदयमें उभरने लगा.

बढत बढत प्रीत, जाए लई धामकी रीत।
इन विध हुई है इत, साथ की जीत।।६

परमधामके प्रति प्रेम बढ.ते-बढ.ते इतना बढ.ा कि हमने परमधामकी पद्धति, नीति-रीतिको सहज रूपसे ग्रहण कर लिया. इस प्रकार जागनी लीला द्वारा इस संसारमें हमारी विजय हुई है अर्थात् इस झूठे खेलमें फँसनेके बाद भी हम जागृत हो सकें.

झूठी जिमी में बैठाए के, देखाए सुख अपार।
कौन देवे सुख दूजा ऐसे, बिना इन भरतार।।7

इस प्रकार झूठी मायामें बैठाकर भी हमें अपरिमित सुखोंका अनुभव करवाया. सद्गुरु धनीके अतिरिक्त इस प्रकारके सुख अन्य कौन दे सकता है ?

मैं सुन्यो पीउजीपें, श्री धामको बरनन।
सो भेद्यो रोम रोम माहें, अंग अंतसकरन।।८

मैंने सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी महाराजसे परमधामका दिव्य वर्णन सुना एवं वह वर्णन मेरे अन्तःकरण सहित रोम-रोमको बींध गया.

छक्यो साथ प्रेम रस मातो, छूटे अंग बिकार।
पर आतम अंतसकरन उपज्यो, खेले संग आधार।।९

अब उन्हीं सद्गुरुकी कृपा द्वारा समस्त सुन्दरसाथ धामधनीके प्रेमानन्दमें मग्न हो गया है. सबके हृदयसे झूठी मायाके विकार हट गये हैं, उनके अन्तःकरणमें पर आत्माका भाव जागृत हुआ तथा सुन्दरसाथ अपने धनीके साथ आनन्द विलास करने लगा.

दुलहेने दिल हाल दे, खैंच लिए दिल सारे।
कहा कहूं सुख इन विध, जो किए हाल हमारे।।१०

इस प्रकार अक्षरातीत धनीने अपना दिल देकर हमारा दिल अपनी ओर खींच लिया. सद्गुरुने हमें जिस स्थितिमें पहुँचा दिया, अब उन सुखोंका वर्णन किस प्रकार किया जाए ?

मद चढयो महामत भई, देखो ए मस्ताई।
धाम स्याम स्यामाजी साथ, नख सिख रहे भराई।।११

मेरी मस्तीको तो देखो, यह प्रेममद चढ.ने पर मैं महामति कहलाया. अब परमधाम, श्याम-श्यामाजी एवं सुन्दरसाथका स्वरूप मेरे रोम-रोममें अङ्कित हो गया है.

अंतसकरन निसान आए, ले आतम को पोहोंचाए।
इन चोटें ऐसे चुभाए, नींद दई उडाए।।१२

मेरे हृदयमें परमधामके सभी सङ्केत उभर आए और वे मेरी आत्मा तक पहुँचे. परमधाम तथा धामधनीके विरहकी चोट हृदयमें ऐसी लगी कि मेरी अज्ञाानरूपी निद्रा सदाके लिए उड. गई.

चढते चढते रंग सनेह, बढयो प्रेम रस पूर।
वन जमुना हिरदें चढि आए, इन विध हुए हजूर ।।१३

प्रेम रसका प्रवाह इतना अधिक बढ.ने लगा कि परमधामके कुञ्जवन, यमुना तट आदि मेरे हृदयमें अङ्कित हो गए. इस प्रकार मैं प्रियतम धनीके अति निकट पहुँच गया.

पिए हैं सराब प्रेम, छूटे सब बंधन नेम।
उठ बैठे माहें धाम, हंस पूछे कुसल छेम।।१४

अब तो हमने धनीजीकी प्रेम-सुराका पान कर लिया है. इसके कारण संसारके सब बन्धन छूट गए हैं. अब हम परमधाममें जागृत हो कर बैठ गए और हँसते हुए परस्पर कुशल-क्षेम पूछने लगे.

महामत महामद चढयो, आयो धाम को अहंमद।
साथ छक्यो सब प्रेम में, पोहोंचे पार बेहद।।१५

महामति कहते हैं, अब धनीजीके प्रेमका महामद इस प्रकार चढ.ा कि परमधामका अहंभाव जागृत हो गया. जिससे सब सुन्दरसाथ भी प्रेममग्न हो गए और इस हदके संसारको छोड.कर बेहदभूमि परमधाममें पहुँच गए.
प्रकरण ८३ श्री किरन्तन

धंन धंन सखी मेरे सोई रे दिन, जिन दिन पियाजीसों हुओ रे मिलन ।
धंन धंन सखी मेरे हुई पेहेचान, धंन धंन पीउ पर मैं भई कुरबान ।।१

हे ब्रह्मात्माओ ! जिस दिन सद्गुरु धनीके साथ मेरा मिलाप हुआ, वह दिन धन्य है. वह दिन भी धन्य है जिस दिन मैंने अपने धनीको पहचाना तथा उनपर स्वयंको सर्मिपत कर दिया.
O Souls, the day I united with my beloved is extremely blessed. The moment that I identified my beloved Lord is also very blessed and I am so grateful that I totally surrender myself to beloved Lord.


धंन धंन सखी मेरे नेत्र अनियाले, धंन धंन धनी नेत्र मिलाए रसाले ।
धंन धंन मुख धनीको सुन्दर, धंन धंन धनी चित चुभायो अंदर ।।२

मेरी नुकीली आँखें धन्य हैं क्योंकि उन्हें धनीजीके दिव्य चक्षुके दर्शन प्राप्त करनेका सद्बाग्य मिला. धनीजीका सुन्दर मुख कमल धन्य है क्योंकि वह मेरे हृदयमें स्थायीरूपसे अङ्कित हो गया है.
Blessed are my sharp eyes which met the blessed eyes of the Master which were full of nectar of love. I am so grateful that the beautiful face of the Master has impressed within my mind. I am so grateful that the heart within is pierced by the beauty of the face of Master.


धंन धंन धनी के वस्तर भूषन, धंन धंन आतम से न छोडूं एक खिन ।
धंन धंन सखी मैं सजे सिनगार, धंन धंन धनिएं मोकों करी अंगीकार ।।३

धनीजीके वस्त्राभूषण धन्य हैं, जिनकी शोभाका आनन्द लेनेके एक क्षणको भी मैं भूल नहीं सकती. हे सखी ! प्रियतम धनीको प्रसन्न करनेवाले मेरे शील, सन्तोष आदि शृङ्गार भी धन्य हैं और वह क्षण भी धन्य है, जब धामधनीने मुझे स्वीकारा है.
Blessed are the clothes/ornaments of the Master (atributes of the Master), my blessed soul will not forget for a moment. I am all adorned with such beauty(the real ornaments of within) that the Master has accepted me.


धंन धंन सखी मैं सेज बिछाई, धंन धंन धनी मोकों कंठ लगाई ।
धंन धंन सखी मेरे सोई साइत, धंन धंन विलसी मैं पीउसों आईत ।।४

धन्य है, धनीजीने मेरे हृदयरूपी शय्यामें विराजमान होकर मुझे कण्ठसे लगाया और धन्य बनाया. वह घड.ी भी धन्य है, जब मैंने अपने धनीसे मिलनका अपार सुख प्राप्त किया.
Oh Sakhi, I made bed and my beloved Master embraced me. (I prepared myself to surrender, got ready for the union and my beloved Lord accepted me). That moment is so auspicious and blessed when got I drenched in the joy that originated from the beloved Lord.


धंन धंन सखी मेरी सेज रसभरी, धंन धंन बिलास मैं कै विध करी ।
धंन धंन सखी मेरे सोई रस रंग, धंन धंन सखी मैं किए स्याम संग ।।५

हे सखी ! मेरी प्रेम-रससे भरी हुई हृदयरूपी शय्या धन्य है, जिस पर मैंने अपने प्रियतम धनीके साथ विभिन्न प्रकारके विलास किए. मैंने अपने रङ्गीले प्रियतम धनीके साथ रस-रङ्ग, आनन्द-विनोदके अखण्ड सुखोंका अनुभव किया, वे सभी खेल धन्य हैं.

How grateful my bed(heart within) is now full with nectar of love and how fortunate that Lord amused me in various ways. Now O my Sakhi I am colored in the color of beloved, How fortunate O my Sakhi that I united with Shyam.


धंन धंन सखी मोकांे कहे दिलके सुकन, धंन धंन पायो मैं तासों आनंदघन ।
धंन धंन मनोरथ किए पूरन, धंन धंन स्यामें सुख दिए वतन ।।६

धन्य है, सद्गुरु धनीने मुझसे अपने दिलकी बातें कीं जिससे मुझे अपार आनन्द हुआ. ऐसे श्यामसुन्दर स्वरूप सद्गुरु धन्य हैं, जिन्होंने मुझे परमधामके सुखोंका अनुभव करवा कर मेरी सम्पूर्ण मनोकामनाएँ पूर्ण कीं.

How grateful I am O Sakhi the beloved master opened His heart and I receieved extreme bliss. How blessed it is all my wishes are fulfilled as Shyam gave me the bliss of original abode.


धंन धंन सखी मेरे पीउ कियो विलास, धंन धंन सखी मेरी पूरी आस ।
धंन धंन सखी मैं भई सोहागिन, धंन धंन धनी मुझ पर सनकूल मन ।।7

हे सखी ! प्रियतम धनीने मेरे साथ आनन्द-विलास कर मेरी सभी आशाएँ पूरी कीं. इस प्रकार धनीने प्रसन्न चित्तसे मुझे सुहागिनी बनाया जिससे मैं धन्य-धन्य हो गई.
How blessed is my sports with my beloved and all my hopes and aspirations are fulfilled. O my Sakhi, I am so fortunate that I became the bride of the beloved Lord as the Master was pleased with me. I got united with the Master.


धंन धंन सखी मेरे मन्दिर सोभित, धंन धंन सरूप सुन्दर प्रेम प्रीत ।
धंन धंन चौक चबूतरे सुन्दर, धंन धंन मोहोल झरोखे अंदर ।।८

हे सखी ! सद्गुरुकी कृपासे मेरे हृदय मन्दिरमें अङ्कित श्याम-श्यामाका सुन्दर स्वरूप, उनका प्रेम, प्रीति, परमधामके चाँदनी चौक, लाल चबूतरा, रङ्गमहल एवं अन्दरके झरोखे ये सभी धन्य हैं.
O Sakhi, How fortunate that in my mind within enshines the epitomy of beauty, love and affection. Blessed are all the beautiful meeting places, assemblies and the windows, the palaces of within.


धंन धंन जवेर नकस चित्रामन, धंन धंन देखत कै रंग उतपन ।
धंन धंन थंभ गलियां दिवाल, धंन धंन सखियां करें लटकती चाल ।।९

जवाहरातोंसे भरी रङ्गमहलकी नक्काशी और चित्रकारीके दर्शन हमारे हृदयमें धनीजीके अपरिमित प्रेम सुखका अनुभव कराते हैं. रङ्गमहलके स्तम्भ, गलियाँ, हवेलियोंकी दीवारें आदिके बीच नृत्य करती हुई, मटकती चालसे चलनेवाली सखियाँ सभी धन्य हैं.
The intricate designs, artitechs, paintings seeing which creates many colors. Blessed are the pillars, alleys, walls and blessed are all the Sakhis who walk these places.


धंन धंन सखी मेरे भयो उछरंग, धंन धंन सखियों को बाढयो रस रंग।
धंन धंन सखी मैं जोवन मदमाती, धंन धंन धामधनीसों रंगराती ।।१०

हे सखी ! मेरे मनमें प्रियतमके प्रति प्रेम उमड. रहा है. उसमें आनन्द रसका आवेग छलक रहा है. अपने यौवनकी मस्तीमें मग्न होकर प्रियतमके रङ्गमें रंगी हुई मैं धन्य हो गई.
O my dear Sakhi, it is very fortunate that I overflowed with joy and thus how grateful I am to be able to share this nectar of love. I am grateful for this youth (eternal youthfulness of the soul) which is such intoxicating which is colored in the color of the Master.


धंन धंन साथ मुख नूर रोसन, धंन धंन सुख सदा धाम वतन ।
धंन धंन सखी मेरे भूषन झलकार, कौन विध कहूं न पाइए पार ।।११

ब्रह्मात्माओंके मुखारविन्दकी अनुपम शोभा एवं परमधामके अखण्ड सुख धन्य हैं. मेरे देदीप्यमान आभूषणोंकी शोभाका भी कोई पारावार नहीं है.
How blessed are the sundarsath whose face is enlightened with beauty and blessed is the eternal original abode. Blessed are my clothes and ornaments (attributes of the soul) how can I describe the unlimited of beyond.


धंन धंन नूर सबमें रह्यो भराई, देखे आतमसों मुख कह्यो न जाई ।
धंन धंन साथ छक्यो अलमस्त, धंन धंन प्रेम माती महामत ।।१२

सभी ब्रह्मआत्माओंमें धामधनीका एक-सा ही प्रकाश विद्यमान है, आत्मा ही उसका अनुभव कर सकती है, मुखसे वर्णन नहीं हो सकता. सभी ब्रह्मात्माओंके साथ महामति भी धनीजीके प्रेममें मस्त होकर धन्य-धन्य हो गई.
Great are all the souls where the light of beauty is filled in all which can be seen only by the eyes of the soul and cannot be described. All the souls totally immersed has tasted this delight, blessed is the Mahamat (the greater intelligence) who got intoxicated in this love.
प्रकरण ८४
श्री किरन्तन

Shri Rajji ka naam hai ya nahi? Does Lord has a name or not? Let us see what Mahamati Prannath the final prophet, Budhnishkalank avtaar has to say.

जो ना कछू गाम नाम ना ठाम, सो सत सांई निराकार ।
भरम को पिंड असत जो आपे, सो आप होत आकार ।।८

अज्ञानीजन सत्य परमात्माको निराकार कहते हैं जिनका न कोई गाँव, नाम तथा ठिकाना ही है. ऐसे लोग भ्रान्तिवश (देहाध्यासके कारण) नश्वर शरीरको ही अपना मान कर स्वयंको साकार मानते हैं.
प्रकरण ४ श्री किरन्तन
The ignorant believe Lord is one who has no village(abode),no name or no destination and true(ever existing never changing) God is formless. Such ignorant is body conscious (considers oneself as the body)- the body is false. Such people are nothing but the mass of ignorance and are untrue when they consider themselves as having form.

The body which seems to have form is not true when the soul leaves the body unites with the formless (water with water, air with air, soil with soil and the energy is back into the energy field), hence this body cannot be considered as a true form. One who considers this body as a form and real is untrue and such a person considers the true Lord who has no abode, no name no destination and no form. Mahamati says they are wrong.
Lord has name, abode and form but can be known only when one becomes soul conscious.

पढे तो हम हैं नहीं, ए जो दुनियां की चतुराए।
कहूं माएने हकीकत मारफत, जो ईसा रसूल फुरमाए।।१
महामति कहते हैं, मैंने संसारका चातुर्य्यपूर्ण ज्ञाान पढ.ा नहीं है किन्तु सद्गुरु प्रदत्त तारतम ज्ञाानके द्वारा परमधामकी यथार्थता एवं पूर्ण पहचानकी बात स्पष्ट कर रहा हूँ जिसे सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी एवं रसूल मुहम्मदने कहा है.

रूहअल्ला अरस अजीम से, मोसों आए कियो मिलाप।
कहे तुम आए अरस से, मोहे भेजी बुलावन आप।।३७
श्री श्यामाजी परमधामसे सद्गुरुके रूपमें यहाँ आकर मुझे मिली हैं. उन्होंने इस प्रकार कहा, तुम ब्रह्मात्माएँ अखण्ड परमधामसे यहाँ पर आईं हो. तुम्हें बुलानेके लिए धामधनीने मुझे यहाँ भेजा है.

तुम आए खेल देखनको, सो किया कारन तुम।
ए खेल देख पीछे फिरो, आए बुलावन हम।।३८
तुम यहाँ पर मायाजन्य खेल देखनेके लिए आइंर् हो. इस खेलकी रचना तुम्हारे लिए ही की है. इसे देखकर अब परमधाम लौट जाओ. तुम्हें बुलानेके लिए ही मेरा यहाँ पर आना हुआ है.

तुम बैठे अपने वतन में, खेल देखत मिने ख्वाब।
हम आए तुमें देखावने, देख के फिरो सिताब।।३९

वस्तुतः तुम अपने घर (परमधाम) में ही बैठकर यह स्वप्नका खेल (सुरता मात्रसे) देख रही हो. मैं तुम्हें यह खेल दिखानेके लिए आया हूँ , अब शीघ्र ही इसे देखकर अपने घर लौट चलो.

इलम लुदंनी देय के, खोल दई हकीकत।
सदर तुल मुंतहा अरस अजीम, कही कायम की मारफत।।४०
इस प्रकार सद्गुरुने तारतम ज्ञाान देकर जगतकी नश्वरता स्पष्ट कर दी और अक्षरधाम (सदरतुलमुंतहा) तथा परमधाम (अर्शे अजीम) की अखण्डताकी पहचान करवाई.
दे साहेदी किताब की, खोल दिए पट पार।
ए खेल लैल का देखिया, तीसरा तकरार।।४१
विभिन्न धर्मग्रन्थोंकी साक्षियाँ देकर पारके द्वार खोल दिए. तब मुझे ज्ञाात हुआ कि इस महिमामयी रात्रि (लैलतुलकद्र) के तीसरे खण्डमें हम जागनी लीला देख रहे हैं.
साहेदी खुदाय की, रूह अल्ला दई जब।
खुले अंदर पट अरस के, पाई सूरत खुदाय की तब।।४६
इस प्रकार सद्गुरु श्री देवचन्द्रजीने जब पूर्णब्रह्म परमात्माकी साक्षी दी तब अन्तरसे अज्ञाानके आवरण दूर होकर परमधामके द्वार खुल गए और परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार हुआ.
अंदर मेरे बैठके, खोले पट द्वार।
ल्याए किल्ली अरस अजीम से, ले बैठाए नूर के पार।।४७
सद्गुरुने मेरे अन्तर्हृदयमें विराजमान होकर परमधामके द्वार खोल दिए. इस प्रकार उन्होंने परमधामसे तारतम ज्ञाानरूपी कुञ्जी लाकर मानों हमें अक्षरसे परे अक्षरातीत परमधाममें बैठा दिया.
हक सूरत ठौर कायम, कबहूं न पाया किन।
रूह अल्ला के इलम से, मेरी नजर खुली बातन।।४८
आज तक किसीने भी परमात्माका स्वरूप तथा अखण्ड परमधामका साक्षात्कार नहीं किया था. सद्गुरुके दिव्य ज्ञाानके प्रतापसे अब मेरी अन्तर्दृष्टि खुल गई है.
ए इलम लिए ऐसा होत है, रूह अपनी साहेदी देत।
बैठ बीच ब्रह्मांड के, अरस बका में लेत।।४९
इस तारतम ज्ञाानको प्राप्त करने पर इस प्रकार अन्तर्दृष्टि खुल जाती है और आत्मा अपनी ही साक्षी देने लगती है. तब इस नश्वर संसारमें रहते हुए भी अखण्ड परमधामका अनुभव होने लगता है.

प्रकरण १० खुलासा


श्री देवचन्दजीसों हम मिले, मुझ अंग हुआ रोसन ।
सो बातें सब इनमें लिखी, निसान नाम सोई दिन ।।२८

श्रीदेवचन्द्रजी से जब मैं मिला तो मेरा हृदय तारतम ज्ञाानसे प्रकाशित हुआ. फिर (शरीर छोड. कर) वे स्वयं मेरे हृदयमें विराजमान हुए, इत्यादि सभी घटनाओंके संकेत नाम और समयके साथ उसमंे लिखे गए हैं.
प्रकरण ४१ सनंध

ना गिनती नाम जो हक के, सो हर नामें करे जिकर ।
मुख चोंच सुंदर सोहनें, बोलें बानी मीठी सकर ।।३२

धामधनीके नामोंकी कोई गणना नहीं हो सकती. इसलिए ये सभी पशुपक्षी अलग-अलग नामोंसे उनका गुणगान करते हैं. इनके मुख, चोंच अति सुन्दर एवं प्रिय हैं. ये पशुपक्षी विभिन्न प्रकारसे मीठी वाणी बोलते हैं.
प्रकरण ४३ shri parikrama

प्यारा नाम खुदाए का, फेरे तसबी लगाए तान।
रात दिन लहे बंदगी, या दीन मुसलमान।।३०

जो परमात्माके नामको प्रिय मानकर उसमें ही मन लगाकर माला फेरतीं हैं एवं रात-दिन उपासनामें ही मग्न रहतीं हैं, वे ही सच्ची र्धािमक आत्माएँ हैं.
Lovely is the name of God, those who contemplate on it and day and night pray that person is true spiritual soul.
प्रकरण २१ सनंध

धिक धिक पडो मेरी बुध को।
मेरी सुधको, मेरे तन को, मेरे मन को, याद न किया धनी धाम ।
जेहेर जिमीसों लग रही, भूली आठों जाम।।१

मेरे मन, बुद्धि, चित्त तथा इस शरीरको धिक्कार है, जिन्होंने धामधनीको याद नहीं किया एवं संसारके विषतुल्य विषयोंमें रत होकर आठों प्रहर अपने धनीको भूलती रही.

मूल वतन धनिएं बताइया, जित साथ स्यामाजी स्याम ।
पीठ दई इन घर को, खोया अखंड आराम।।२

धामधनी सद्गुरुने वह मूलघर (परमधाम) बताया, जहाँ श्याम-श्यामाजी तथा सुन्दरसाथ हैं. ऐसे अखण्ड घरको पीठ देकर हमने अखण्ड सुखोंको गँवा दिया.

सनमंध मेरा तासों किया, जाको निज नेहेचल नाम।
अखंड सुख ऐसा दिया, सो मैं छोडया बिसराम।।३

सद्गुरुने मेरा सम्बन्ध उन अनादि अक्षरातीत श्रीकृष्णजीके साथ जोड. दिया जिनका नाम ही अखण्ड है. उन्होंने तो मुझे ऐसा अखण्ड सुख प्रदान किया, किन्तु मैंने मायावी सुखोंमें रत होकर उन अखण्ड सुखोंको छोड. दिया.

खिताब दिया ऐसा खसमें, इत आए इमाम।
कुंजी दई हाथ भिस्त की, साखी अल्ला कलाम।।४

सद्गुरुने यहाँ आकर मुझे निष्कलङ्क बुद्ध (इमाम महदी) की उपाधि प्रदान की. उन्होंने कतेब ग्रन्थोंकी साक्षी देकर जीवोंके मुक्तिस्थलों (बहिस्तों) के द्वारकी कुञ्जी मेरे हाथ सौंप दी.

अखंड सुख छोडया अपना, जो मेरा मूल मुकाम।
इसक न आया धनीय का, जाए लगी हराम।।५

तथापि मैंने परमधामके उन अखण्ड सुखोंको छोड. दिया, जो अपना मूल स्थान है. मुझे धामधनीके प्रति प्रेम भी उत्पन्न नहीं हुआ एवं मैं झूठे विषयसुखोंकी ओर लग गया.

खोल खजाना धनिएं सब दिया, अंग मेरे पूरा न ईमान ।
सोए खोया मैं नींद में, करके संग सैतान।।६

धामधनीने अखण्ड निधिका भण्डार खोलकर मुझे लुटा दिया, तथापि मेरे हृदयमें पूर्ण श्रद्धा उत्पन्न नहीं हुई. मैंने दुष्ट मायाका सङ्गकर उस अखण्ड निधिको अज्ञाानरूपी नींदमें गँवा दिया.

उमर खोई अमोलक, मोह मद क्रोध ने काम।
विषया विषे रस भेदिया, गल गया लोहू मांस चाम ।।7

मैंने अपना अमूल्य जीवन काम, क्रोध, मद एवं मोहकी ओर लगकर गँवा दिया. विषयोंके विषमय रसने मेरे शरीरको इतना प्रभावित किया कि रक्त, माँस, चमड.ी सब गल गए.

अब अंग मेरे अपंग भए, बल बुध फिरी तमाम।
गए अवसर कहा रोइए, छूट गई वह ताम।।८

अब मेरे सभी अङ्ग शिथिल हो गए हैं तथा मेरा सम्पूर्ण बल एवं बुद्धि भी मायाकी ओर लग गई. अवसर बीत जाने पर रोनेसे क्या लाभ ? सद्गुरुके धामगमनके साथ-साथ अब तो आत्माका आहार ही छूट गया.

पार द्वार सब खोल के, कर दई मूल पेहेचान।
संसे मेरे कोई ना रह्या, ऐसे धनी मेहेरबान।।९

ऐसे कृपालु सद्गुरु धनीने पार (बेहद) के सभी द्वार खोल कर मुझे अपने मूल (पर-आत्मा) की पहचान करवाई, जिसके कारण अब मेरा कोई भी संशय शेष नहीं रहा.

बोहोत कह्या घर चलते, वचन न लागे अंग।
इन्द्रावती हिरदे कठिन भई, चली ना पीउजी के संग ।।१०

सद्गुरुने परमधाम जाते समय मुझे बहुत समझाया, किन्तु उनका एक भी वचन मेरे हृदयमें नहीं चुभा. इन्द्रावती ऐसी कठोरहृदया हो गई कि वह सद्गुरुधनीके साथ परमधाम नहीं जा सकी.

तब हारके धनिएं विचारिया, क्यों छोडूं अपनी अरधंग ।
फेर बैठे माहे आसन कर, महामति हिरदें अपंग।।११

तब हताश होकर धनीने विचार किया कि मैं अपनी अङ्गनाको अकेली कैसे छोड. दूँ ? पश्चात् वे महामतिके अपङ्ग हृदयमें विराजमान हो गए.
प्रकरण ९९ श्री किरन्तन

Read this very carefully, my dearest Sundarsathji

दुनी नाम सुनत नरक छूटत, इनोंपें तो असल नाम।
दिल भी हकें अरस कह्या, याकी साहेदी अल्ला कलाम।।८४

इस नश्वर जगतके जीव भी अपने स्वामी (ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि) का नाम सुनते ही नरकसे छुटकारा प्राप्त करते हैं तो इन ब्रह्मात्माओंके पास तो अपने स्वामी पूर्णब्रह्म परमात्माका मूल नाम अनादि अक्षरातीत श्रीकृष्ण है. स्वयं परब्रह्म परमात्माने इनके हृदयको परमधामकी संज्ञाा दी है. कुरान आदि धर्मग्रन्थ भी इन्हीं ब्रह्मात्माओंकी साक्षीके लिए हैं.

Taking the name of masters of this world(Brahma, Vishnu, Mahesh) one gets relieved from the suffering of the hell and this NAME is the real one. The Lord has said the heart of the celestial souls is the Arash (Paramdham) and witness is given in the Holy Quran.

इलम भी हकें दिया, इनमें जरा न सक।
सो क्यों न करें फैल वतनी, करें कायम चौदे तबक।।८५

स्वयं अक्षरातीत श्रीकृष्णने प्रकट होकर इन ब्रह्मात्माओंको तारतम ज्ञाान दिया है, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं है. इसलिए ब्रह्मात्माएँ इस जगतमें परमधामका व्यवहार कैसे नहीं करेंगी ? जिन्होंने इन चौदह लोकोंको भी अखण्ड कर दिया है.
The wisdom about the Supreme Master given by the Lord, the celestial souls will never ever doubt. Why wouldn't their action show the path of Paramdham(their behaviour will reflect the essence of Paramdham i.e. they will walk the talk) and its they who will make all the 14 planes eternal.

प्रतिबिंब के जो असल, तिनों हक बैठे खेलावत।
तहां क्यों न होए हक नजर, जो खेल रूहों को देखावत।।८६

इन्हीं पूर्णब्रह्म परमात्माने इन ब्रह्मात्माओंके मूल स्वरूप (परआत्मा) को अपने निकट बैठाकर यह नश्वर खेल दिखाया है. इन पर-आत्माके ऊपर उनकी कृपादृष्टि क्यों नहीं होगी जिनको वे अपने चरणोंमें बैठाकर यह खेल देखा रहे हैं.
The reflection of the original, the Akshar and the souls are under the Supreme and He is programming this game. Then why would He not see the game that He is showing to the souls. He is aware of our every actions.

आडा पट भी हकें दिया, पेहेले ऐसा खेल सहूरमें ले।
जो खेल आया हक सहूर में, तो क्यों न होए कायम ए।।८7

सर्वप्रथम पूर्णब्रह्म परमात्माने ऐसा नश्वर खेल दिखानेका विचार कर इन ब्रह्मात्माओंके हृदयमें भ्रम (फरामोशी) का आवरण डाल दिया. जो नश्वर खेल सर्वप्रथम पूर्णब्रह्म परमात्माके हृदयमें आ गया है, वह कैसे अखण्ड नहीं होगा ?
First Lord thought of this game and then he gave the veil between Him and the souls. What game that crossed the mind of Supreme how can that be not eternal!

हुए इन खेल के खावंद, प्रतिबिंब मोमिनों नाम।
सो क्यों न लें इसक अपना, जिन अरवा हुजत स्यामा स्याम।।८८
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इन ब्रह्मात्माओंके प्रतिबिम्बके नाम भी स्वप्नवत् जगतके खेलके स्वामीके रूपमें माने गए हैं. जिनको अपने श्यामाश्यामका अधिकार प्राप्त है ऐसी आत्माएँ अपने हृदयमें अपने स्वामीका प्रेम क्यों धारण नहीं करेंगी ?

The image of the name of celestial souls will be the master of this game. Then why wouldn't the souls grace the love on whose heart resides Shyama and Shyam (The name of our Lord Shyam and Shyama is ceaselessly repeated in the heart of the souls and where there is contemplation of the Lord, He makes it His abode and resides there!)

बडी बडाई इनकी, जिन इसकें चौदे तबक।
करम जलाए पाक किए, तिन सबों पोहोंचाए हक।।८९

इन ब्रह्मात्माओंकी महिमा अत्यन्त श्रेष्ठ है. इनके प्रेमके प्रभावने चौदह लोकोंके जीवोंके कर्मबन्धन भस्मीभूत कर उनके हृदयको पवित्र बनाया एवं उन सभीको अखण्ड मुक्ति प्रदान की है.

It is the greatness of celestial souls who introduced the divine love in this 14 planes of existence. All the karma(fruits of good/bad deeds) is burnt and the souls are purified and all take them to the Supreme.
The brahmashristhi will show the path of Paramdham, will destroy all the karma(fruits of action) and purify the souls and take them to the Lord. Thus brahmashrishthi are very praiseworthy.

इनों धोखा कैसा अरस का, जिन सूरतें खेलावें असल।
खेलाए के खैंचें आपमें, तब तो असलै में नकल।।९०

इन ब्रह्मात्माओंको अपने मूल घर परमधामके विषयमें कैसे सन्देह हो सकता है जिनके मूल स्वरूप (पर-आत्मा) को अपने चरणोंमें बैठाकर श्रीराजजी यह नश्वर खेल दिखा रहे हैं. जब श्रीराजजी इस नश्वर खेलको दिखाकर इसे अपने हृदयमें संवरण कर लेंगे तब ब्रह्मात्माओंकी सुरताएँ भी अपने मूल स्वरूपमें ही जागृत होंगी.

How can the celestial souls(arvahen,chosen souls , brahmashristhi, friend of Lord) of Arash, Paramdham Supreme abode can ever be mistaken about the abode when Lord Supreme keeping the souls closely with him is showing this game of the perishable world.
After the sport is over, Lord will take back his attention from this and take back the celestial soul's astral body will return to the original self.

प्रकरण २१ सिनगार

एक नूर और नूर तजल्ला, कहे ठौर दोए।
ए नाहीं जुदे वाहेदत से, हैं बका बीच सोए।।३१
वैसे तो अक्षरधाम तथा परमधाम दोनोंका भिन्न-भिन्न उल्लेख है किन्तु दोनों अक्षरातीत परब्रह्म परमात्माके अद्वैत स्वरूपसे भिन्न नहीं है. इसलिए दोनों ही अखण्ड हैं.
एक जाहेर आम खास ज्यों, और अंदर खिलवत।
ए सोई जाने हक अरस की, जाए खुली मारफत ।।३२
इस जगतमें आए हुए जीवोंमें एक सामान्य जीव हैं, जिनको जीवसृष्टि कहा गया है. दूसरी विशिष्ट आत्माएँ ईश्वरीसृष्टि हैं. तीसरी परमधाम मूलमिलावेमें विराजमान ब्रह्मात्माएँ कलातीं हैं. इनमें जिनकी ब्राह्मीदृष्टि खुल गई है वे ही अक्षरातीत परब्रह्म परमात्मा एवं परमधामको जान सकतीं हैं.
जिनों खुले मगज मुसाफके, माएने हकीकत।
सकसुभे तिन को नहीं, जिनों हुई हक हिदायत।।३३
जिन आत्माओंको धर्मग्रन्थोंके गूढ. रहस्य यथार्थरूपमें स्पष्ट हुए हैं और जिनको परब्रह्म परमात्माका मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ है, उनके हृदयमें किसी भी प्रकारका सन्देह नहीं है.
सक सुभे क्योंए भाजे नहीं, हक इलम बिन।
ना तो मिलो सब आदमी, या देव फिरस्ते जिन।।३४
ब्रह्मज्ञाानके बिना हृदयके सन्देह दूर नहीं हो सकते, भला मनुष्य देवी-देवता, अवतार तथा जिन आदि सभी मिलकर क्यों न प्रयत्न करें.
असराफील के अमल में, सकसुभे नहीं कोए।
कयामत फल पाया इतहीं, मगज मुसाफी सोए ।।३५
इस्राफील फरिश्ताके प्रकट होने पर किसीके भी संशय शेष नहीं रहे. धर्मग्रन्थके गूढ रहस्य स्पष्ट होने पर सभीको कयामतका लाभ प्राप्त हुआ.
आखर फल जो पावहीं, कहे सोई कुरान।
दिन होवे तिन मारफत, हक अरस पेहेचान।।३६
कुरानके अनुसार कयामतके समयका लाभ उसीको प्राप्त होगा जिनके हृदयमें ब्रह्मज्ञाानका प्रभात हुआ और जिनको परब्रह्म परमात्माकी पहचान हुई है.
एही लुदंनी हक इलम, करसी फजर।
देखसी मोमिन अरस कांे, रूह की खोल नजर।।९२
यह ब्रह्मज्ञाान ही अज्ञाानरूपी अन्धकारको मिटाकर ज्ञाानका प्रभात करेगा. तब ब्रह्मात्माएँ अपनी अन्तर्दृष्टि खोलकर दिव्य परमधामके दर्शन करेंगी.

प्रकरण १४ श्री मारफत सागर

वृन्दावन तो जुगते जोयुं, स्याम स्यामाजी साथ।
रामत करसुं नव नवी, कांई रंग भर रमसुं रास।।२

हे सखी ! हमने श्याम और श्यामाजीके साथ समस्त वृन्दावनकी शोभा भलीभाँति देख ली. अब हम विभिन्न प्रकारकी रामतें करेंगी और हृदयमें उल्लास भरकर रास खेलेंगी.
प्रकरण ११ श्री रास

We saw the splendour of the Vridavan along with Shyam Shyama and we will be playing new games and colorful plays of (variety of colors and types) Raas(that is full with nectar that is not dry)!

सिणगार सरवे सोहे, वालोजी खंत करी जुए।
जाणिए मूलगां रे होय, तारतम विना नव कोय, जाणे एह धन ।।४

सखियोंका शृङ्गार अति शोभायुक्त है. प्रियतम भी उन्हें उत्सुकतावश देख रहे हैं. मानों मूल (परमधाम) से ही यह प्रेम सम्बन्ध है किन्तु तारतम ज्ञाानके बिना कोई भी इस अखण्ड निधि (ब्रह्मात्माओं तथा श्रीकृष्णका प्रेम सम्बन्ध) को नहीं जान सकता.

The Brahmshritis are adorned beautifully and our beloved is looking with attention. This is relationship is original, without tartam, how can one understand this treasure!
प्रकरण १३ श्री रास


उलास दीसे अंगों अंगे, श्री स्यामाजीने आज।
ठेक दई ठकुराणीजीए, जैने झाल्या श्री राज।।१५

आज श्रीश्यामाजीका अङ्ग-प्रत्यङ्ग उल्लसित दिखाई देता है. उन्होंने छलांग मारकर बड़ी चतुराईसे प्रियतम श्रीराजजीको पकड. लिया.
प्रकरण १५ श्री रास

Shri Thakurani is Shri Shyamaji and Shri Raaj is Shri Krishna ji. This is a chaupai from Shri Raas granth. The above chaupai is taking place at Yogmaya Raas mandal. The names Indravati sakhi who already has Tartam gyaan is narrating us the games the Brahmshritis are playing in Raas.

Please the words of Indravati Mahamati Prannath we are enjoying because of inspiration of our beloved Lord Shri Krishna who gave us the nijnaam mantra.

With whom does Mahamati Prannath unite and became one with?

इन्द्रावतीसुं अतंत रंगे, स्याम समागम थयो।
साथ भेलो जगववा, इन्द्रावतीने में कह्यो।।१३५

इन्द्रावतीकी अन्तरात्मामें धामधनीका समागम हो गया है. सद्गुरु कहते थे कि समस्त ब्रह्मसृष्टिको एकसाथ जागृत करनेके लिए मैंने इन्द्रावतीसे कहा है अर्थात् जागनीका उत्तरदायित्व इन्द्रावतीको सौंपा है.
प्रकरण १२ श्री कलस (गुजराती)

Lord Shyam has united with Indrawati and to asked her to awaken other sundarsath. Indrawati is bhramvasana residing in Meharaj Thakkar. Brahmvasana unites with with Lord Shyam of Paramdham. This is the last chaupai of Shri Kalash Gujrati Granth.

All soul from Paramdham ran says Mahamati, the veil could not be removed without Sundarbai no one else could remove it!

महामत केहेवे यों कर, हम सैयां दौडी धाए।
पर ए पट सुंदरबाई बिना, किनहूं न खोल्यो जाए।।२२

महामति कहते हैं, इस प्रकार हम ब्रह्मात्माएँ भी पार जानेकी दौड.में लगी हुइंर् थीं, परन्तु अज्ञाानताका आवरण (परदा) सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी (सुन्दरबाई) के बिना किसीसे भी नहीं खुल पाया अर्थात् सर्वप्रथम सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी महाराजने परमधामका मार्ग प्रशस्त किया.

बात सुंदरबाई और है, और उनकी और रवेस।
गत मत उनकी और है, हम लिया सब उनका भेस।।२३

क्योंकि सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजी महाराज (सुन्दरबाई) की बात ही कुछ विशिष्ट है, उनका रहन-सहन, बुद्धि-विवेक भी और ही महत्त्व रखते हैं. हमने तो उनका वेश ही धारण किया है अर्थात् हम उनके चलाए हुए मार्ग पर चल रहे हैं.
Sundarbai is special and her living is also different and her mind and intelligence is also very special and we all are taken her dressing (imitating her and thus following her)

मोहे सिखापन उनकी, दे फुरमान करी रोसन।
इन्द्रावती तो केहेवहीं, जो दोऊ विध करी चेतन।।२४

मुझे तो उनके ही उपदेश प्राप्त हुए हैं. उनके ही आदेशसे कुरान तथा पुराणका रहस्य मैंने स्पष्ट किया है. इन्द्रावती इसीलिए ऐसा कह रही है कि सद्गुरुने ही उसे व्यवहारिक तथा आध्यात्मिक ज्ञाान देकर (अथवा वेद और कतेबकी समझ देकर) दोनों प्रकारसे जागृत किया है.
She gave me her teachings and also revealed me the secrets of Holy Quran, thus Indrawati is thus saying who is conscious in both ways.

प्रकरण ६३ kirantan
Mahamati Prannath assimilated the entire scriptures(Ved, Quran, Toret, Bible) and revealed the truth and also gave the tartamgyaan he received from Budhavtaar Sundarbai in vani which we called as Kuljam Swaroop saheb(Absolute Master of the self). Can we tear apart our vani by Mahamati says and Indrawati says when in the same prakaran both are mentioned?


महंमद आया ईसे मिने, तब अहंमद हुआ स्याम।
अहंमद मिल्या मेहेदी मिने, ए तीन मिल हुए इमाम।।२१

कुरानके अनुसार रसूल मुहम्मदमें विद्यमान ब्राह्मीशक्ति जब ईसा रूहअल्लाह श्री देवचन्द्रजीमें प्रविष्ट होती है तब वे अहमद स्वरूप कहलाते हैं. जब ये अहमद स्वरूप महदीमें प्रविष्ट होते हैं तब ये तीनों स्वरूप एक होकर इमाम कहलाते हैं.
प्रकरण १५ श्री खुलासा

When Devachandraji united with the Shyam residing in Mahamad and became Ahmad, when Ahmad united with Mehadi and thus became Imam. This is how Mahamati Prannathji has become Imam Mehadi.

Can one be saved if they read the holy Book 100s of times?

कुरान पढें चलें सरियत, करें दावा मोमिनों राह।
पर क्या करें कुंजी बिना, पावें ना खुलासा।।६

इसलिए ये लोग कुरान पढ.कर भी कर्मकाण्डका मार्ग ग्रहण करते हैं और ब्रह्मसृष्टिके मार्गका दावा करते हैं. किन्तु क्या करें, तारतम ज्ञाानरूपी कुञ्जीके बिना ये लोग गूढ. रहस्यका स्पष्टीकरण नहीं कर सकते.
Reading the Holy Quran (scriptures) but following the Sariyat(rituals), they claim themselves to be the celestial soul(Momin, Brahmashrishti), but what can they do without the key, the secrets of it can never be revealed.
(Tartam is the key to all scriptures and also the heart of the beloved. Without the key the intelligence is locked too and reading a million times also, the secret is not revealed!)

prakaran 1 Khulasa
जोंलों मुसाफ हकीकत, खोले नहीं वारस।
कोई पावे ना बिना लुदंनी, हक महंमद रूहें अरस ।।२०-प्रकरण १ श्री मारफत सागर

जब तक कुरानके गूढ. रहस्योंको उसके उत्तराधिकारी ब्रह्मात्माएँ स्पष्ट नहीं करेंगी तब तक तारतम ज्ञाानके बिना श्री राजजी, श्री श्यामाजी, ब्रह्मात्माएँ एवं परमधामकी जानकारी नहीं हो सकती.

Should the mantra or Kalma must be said loudly ?
जुबां से कलमा केहेना, सिर फरज रोजा निमाज।
जगात हिसा चालीसमा, कर सके न हज इलाज।।२८

शराअके लोग अपनी जिह्वासे कलमा पढ.ते हैं, अपने कर्तव्य पालनके लिए नमाज तथा रोजा रखते हैं, अपनी आयके चालीसवाँ भागका दान करते हैं तथा यथाशक्ति तीर्थयात्रा करते हैं परन्तु इतने कर्तव्य पालन मात्रसे आत्म-कल्याण नहीं हो सकता (यह सब तो बाह्य आचरण मात्र हैं).
Mahamati says those who say the kalma from their lips and follow all other rituals(Namaj,fasting roja,donating 40th part of thier earning,visit pligrimage) as their duty, cannot treat their souls the real Haj. All these are external.

कलमा निमाज दोऊ दिल से, और दिलसों रोजा रमजान।
दे जगात हिसा उन्तालीसमा, हज करे रसूल मकान।।४०

ऐसे लोग कलमा, नमाज तथा रमजान महीनेमें व्रत रखना आदि कार्य हृदयपूर्वक करते हैं और अपनी आयका उनतालीसवाँ भाग दानमें देकर मक्का (रसूलके घर) की यात्रा करते हैं.
Mahamati says those who do Kalma and nimaj both from the heart and all the fasting (roja of Ramjan) and giving the 49th part in charity (almost half the earning), so they do benefit the true haj of abode of Rasool.
प्रकरण ४ shri khulasa
Mahamati has clearly stated all spiritual activities must be done from heart and thus one reaches the real abode.

How one must pray by Mahamati Prannath?

Mahamati Prannath ji has clearly given the instructions to us how to remember Lord.

छिपके साहेब कीजे याद, खासलखास नजीकी स्वाद ।
बडी द्वा माहें छिपके ल्याए, सब गिरोहसों करे छिपाए ।।१

परमात्माकी उपासना गुप्त रूपसे करनी चाहिए. श्रेष्ठ आत्माएँ इस प्रकारकी उपासनासे उनकी निकटताका आनन्द प्राप्त करतीं हैं. सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजीने परब्रह्म परमात्मासे जो प्रार्थना की थी उसे उन्होंने ब्रह्मात्माओंके समुदायसे भी गुप्त रखा था.

One must pray to Lord secretly. The supreme souls pray in this manner and tastes the union with the Lord. The Master when prayed to Lord, he would even keep it secret from the other celestial souls.

प्रकरण १५ बड़ा क़यामतनामा


बंदगी रूहानी और छिपी, जो कही साहेदी हजूर।
ए दोऊ बंदगी मारफत की, बीच तजल्ला नूर।।४२

आत्मभावसे तथा गुप्तभावसे की जानेवाली उपासना परब्रह्म परमात्माके सान्निध्यकी कही जाती है. ये दोनों प्रकारकी उपासना आत्म-अनुभव अथवा परमधामकी पूर्ण पहचानकी है.
The souls that are from Paramdham they do not display their devotion and do it secretly and find themselves closer to the Lord.
श्री मारफत सागर
हकीकत सों समझावना, समझें इसारतसों मोमन।
हक सूरत द्रढ कर दई, तब दिल अरस हुआ वतन।।६३

यह भी कहा है कि ब्रह्मात्माओंको यथार्थ ज्ञाानके द्वारा समझाना, वे सङ्केत मात्रसे ही समझ जाएँगी. उन ब्रह्मात्माओंने जब परब्रह्म परमात्माके स्वरूपको अपने हृदयमें दृढ. कर लिया तभी उनका हृदय परमधाम कहलाया.
The celestial souls of Supreme abode will understand the reality by sign and they will immediately determine the Lord within thus their heart becomes the Arash(Paramdham) the original abode. One do not have to yell to awaken a momin, they will get it by one sign!
प्रकरण १ khulasha
Our prayer with Lord must be a secret affair between Him and us.

आसिकके गुनाह
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सुनो रूहें अरस की, जो अपनी बीतक।
जो हमसे लटी भई, ऐसी करे न कोई मुतलक ।।१

हे परमधामकी आत्माओ ! हमारे अपने वृत्तान्तको सुनो. हमसे जो विपरीत कार्य हुआ है निश्चय ही ऐसा किसीसे नहीं हुआ है ।
O the celestial souls our memoir those follies that we did, certainly no one else will ever do!

कहूं तिनका बेवरा, सुनियो कांनों दोए।
ए देख्या मैंं सहूर कर, तुम भी सहूर कीजो सोए ।।२

मैं उसका विवरण देती हूँ । तुम दोनों कानोंसे सुनो. इस पर मैंने विचार पूर्वक देखा है. तुम भी इस पर विचार करना ।
I will describe all those, listen with your two ears attentively, I have pondered over it and realized it after contemplation , you also must think over it.

पिछे जो दिल में आवे साथ के, आपन करेंगे सोए ।
भूली रोवे तेहेकीक, गए हाथ पटकते रोए।।३

पश्चात् सब सुन्दरसाथके हृदयमें जो बात आएगी उसीके अनुरूप हम कार्य करेंगे । जिसने भूल की होगी वह निश्चय ही हाथ पटकते हुए रोएगी ।
Later, what all sundarsath feel in their heart, we will agree to work accordingly. All those who made the mistake shall weep over their action.

तिसवास्ते क्यों भूलिए, हाथ आए अवसर ।
जो पीछे जाए पछतावना, क्यों आगे देख न चलंे नजर ।।४

इसलिए हाथमें आए हुए सुन्दर अवसरको क्यों भूलें । यदि बादमें जाकर पछताना पडे. तो पहलेसे ही आँखें खोल कर क्यों न चलें ।

Hence why to fool around with such beautiful opportunity and repent later on, so why not keep your goal in sight before hand.

अपनी गिरो आसिक, कहावत हंै मिने इन ।
चलना देख कहत हों, ए अकल दई तुमें किन ।।५

इस नश्वर जगतमें हम ब्रह्मात्माओंका समुदाय अनुरागी (आशिक) कहलाता है । किन्तु हमारे व्यवहारको देखकर मैं कहता हूँ कि यह बुद्धि तुम्हें किसने दी है ।
In this perishable world our group is called the lover of the Lord but look at our deed, who gave you such wrong mind?

लेनी हकीकत हक की, और देनी इन लोकन ।
आसिक को ए उलटी, जो करत हैं आपन ।।६

अपने धामधनीके यथार्थ सुखको लेकर नश्वर जगतके लोगोंको कहना, यह विपरीत कार्य अनुरागिणियोंका नहीं है, जो हम कर रहे हैं ।

Understanding the reality of Supreme Lord and giving this to such people, we are doing it all wrong.

मिठा गुझ मासूक का, काहूं आसिक कहे न कोए ।
पडोसी भी ना सुने, यों आसिक छिपी रोए ।।

अनुरागिणी आत्माएँ अपने प्रियतम धनीकी गुप्त मधुर बातें किसीसे नहीं कहतीं हैं । इतना ही नहीं वह पडोसी भी न सुने इस प्रकार छिप कर रोती है ।

The sweet secret of our beloved, no loving soul will ever say, even the neighbor must not hear, thus the soul in love cries!

आसिक कहिए तिनकों, जो हक पर होए कुरबान ।
सौ भांतें मासूक के, सुख गुझ लेवे सुभान।।८

अनुरागिणी आत्माएँ उन्हींको कहा जाता है जो अपने प्रियतम धनी पर सर्मिपत हो जातीं हैं और सैंकड.ों रीतिसे अपने धनीके गुह्य सुख प्राप्त करतीं हैं ।
The lover of God are those who will sacrifice themselves for Supreme Lord and from various techniques and ways enjoy the bliss of the Beautiful beloved.

जो पडे कसाला कोटक, पर कहे न किनको दुख ।
किसीसों ना बोलहीं, छिपावे हक के सुख।।९

करोड.ों कठिनाइयाँ क्यों न आएँ वह अपना दुःख किसीको भी नहीं कहती है । वह अपने प्रियतम धनीके सुख भी किसीसे नहीं कहती है अपितु छिपा कर रखती है ।

Millions of sorrow,difficulties they will face but shall not say anyone or complain about it to anyone. They will not say anything to anybody and hide the love and bliss that they receive from Lord.

गुझ सुख लेवे हक के, रहे सोहोबत मोमिन।
अपना गुझ मासूक का, कबूं कहें न आगे किन।।१०

वह ब्रह्मात्माओंके साथ रहते हुए भी अपने प्रियतमका एकान्त सुख प्राप्त करती है एवं अपने धनीकी गुह्य बातोंको किसीसे भी नहीं कहती है ।
They will always seek the company of the other celestial souls and secretly they will enjoy the bliss of the Lord. this secret relationship with Supreme beloved they will not reveal to anyone.

तिन आगे भी ना कहे, जो हक के खबरदार ।
पर कहा कहूं मैं तिनकांे, जो बाहेर करे पुकार ।।११

वह इन गुह्य बातोंको उन आत्माओंके समक्ष भी नहीं कहती है जो धामधनीके प्रति सावचेत हैं । किन्तु मैं उन आत्माओंके विषयमें क्या कहूँ जो बाहर जाकर (दूसरोंको) ऐसी बातोंको प्रकट करतीं हैं ।
They will not reveal even to those who do know the presence of Lord and act cautiously and what can I say about those who go out among strangers -outsiders and speak loudly about the whole affairs!

प्रकरण १४ श्री सिंधी

After Death :

फेर आए रसूल स्याम मिल, सोई फेर आए यार ।
देख निसबत पांचों दुनीमें, क्यों छोडें असल अरस प्यार ।।३५

अब पुनः रसूल मुहम्मद श्यामसुन्दर श्रीकृष्णके साथ मिलकर मेरे हृदयमें अवतरित हुए हैं. श्रीश्यामाजीकी अङ्गस्वरूपा ब्रह्मात्माएँ भी इस जगतमें पुनः अवतरित हुइंर् हैं. इस नश्वर जगतमें भी पाँचों शक्तियों (श्रीधनीजीका जोश, श्रीश्यामजीकी आत्मा, अक्षरकी बुद्धि, श्रीराजजीका आदेश, परमधामकी मूलबुद्धि तारतम ज्ञाान) को एक साथ सम्मिलित देख कर ब्रह्मात्माएँ अपने मूल स्नेहको कैसे छोड. सकतीं हैं ?
Again came Rasool Mohamad united with Shyam Shri Krishna and again came the all the friends(souls). Seeing the 5 treasures(power of inspiration of the Supreme Lord, the soul of Shyama, the mind of the Creator cosmic mind, Will of the Lord, wisdom of the Supreme, souls and abode –tartam gyaan ) of Supreme abode in this world how can the celestial souls forget the original love?
prakaran 1 chhota kayamatnama


जो कदी वह आगे चली, जिमी बैठी वह जिमी माहें ।
पांचों पहोंचे पांचोंमें, रूह अपनी असल छोडे नाही ।।८7

जो आत्माएँ जागृत होकर नश्वर शरीरको छोड. कर परमधामकी ओर आगे बढ.तीं हैं तो वे परमधामकी चिन्मय भूमिकामें अपनी परआत्मामें जागृत हो जातीं हैं. उनका पाँच तत्त्वका नश्वर शरीर पाँचों तत्त्वोंमें मिल जाता है एवं चेतन आत्मा अपने मूल स्वरूपको नहीं छोड.ती है.

prakaran 1 chhota kayamatnama

Why all cannot understand these fundamental truths?
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मोमिन दुनी ए तफावत, ज्यों खेल और देखनहार।
मोमिन मता हक वाहेदत, दुनियां मता मुरदार।।६८

ब्रह्मसृष्टि और सांसारिक जीवोंमें यही अन्तर है, जैसे खेलके पात्र और दर्शकमें होता है. ब्रह्ममुनियोंका धन अद्वैत पूर्णब्रह्म परमात्मा है तथा सांसारिक जीवोंका धन नश्वर संसार है.
There is difference between the celestial souls and the worldly is just like the actors and the audience. The momin(celestial souls) treasures union with the beloved Lord which is eternal, the Master and for the worldly the treasure is( momentous pleasure, temporary(wealth) or worldly(name, fame, glory) ) all that is perishable.
prakaran 1 khulasa


ए जो पैदा जुलमत से, सो कुंन केहेते उपजे।
मगज मुसाफ न पावत, लेत माएने ऊपर के।।२६

मायाके अन्धकार (निराकार) से उत्पन्न संसारके जीव परमात्माके द्वारा हो जा (कुन) कहनेसे उत्पन्न हुए हैं. इसलिए कुरानका गूढ. रहस्य न समझकर वे मात्र बाह्य अर्थ ही ग्रहण करते हैं.

Those born out of nothingness(Kun, nirakaar) formless, those people do not have intelligence to understand this and they just see the outer meaning (see Krishna as body cannot surrender to Him!)

कौल हमारे नूर पार के, सो क्यों समझें जुलमत के।
कुंन केहेते पैदा हुए, ला मकान के जे।।२7

अक्षरसे भी परे अक्षरातीतके हमारे वचनों (तारतम ज्ञाान) को ये अज्ञाानी जीव कैसे समझ पाते ?
ये तो मात्र हो जा (कुन) कहनेसे उत्पन्न हुए शून्य-निराकारके जीव हैं.
The words are from beyond how can these ignorant people ever understand?
They are created out of Nothingness,formlessness from the Nirakaar (Kun).

Please read Khulasa granth and understand the value of Holy Quran and Shyam-Shri Krishna


रबद करंे औरन को निंदें, आपको आप बढावंे।
ग्यान कथंे गुन गाए आपके, हो हो कार मचावंे।।८

इस प्रकार अलग-अलग सम्प्रदायके लोग परस्पर वादविवाद करते हुए एक दूसरेकी निन्दा करते हैं और अपने सम्प्रदायको अन्य सम्प्रदायोंसे अधिक श्रेष्ठ भी कहते हैं. अपने सम्प्रदायके सिद्धान्तोंकी चर्चा कर सम्प्रदायके गुणोंकी प्रशंसा करते हुए हो-हल्ला भी मचाते हैं.
Involve in discussion and criticize others and say that their's is the best. They discuss the discourses and praise themselves and create ruccus.

दुबिधा दिलमें अवगुन ढूंढे, गुन चितसों न लगावे।
भटकत फिरें भरममें भूलें, अंगमें आग धखावे।।९

इस प्रकार दिलमें संशय लेकर चलने वाले दूसरोंके अवगुण ही ढूँढ.ते रहते हैं किन्तु उनके गुणोंकी ओर ध्यान ही नहीं देते. ऐसे भ्रममें फँसे हुए लोग भवसागरमें ही भटकते रहते हैं. उनके अङ्गोंमें भ्रमरूपी आग धधकती रहती है.
The heart filled with confusions (doubts, irresolution) seeks defects only on others. It does not consider the merits. Such a person wonders in confusion and forgetfulness and the body is burning with fiery desires of the world. Without true knowledge the soul is languished and the ego takes over.

सास्त्र सबदको अरथ न सूझे, मत लिए चलत अहंकार ।
आप न चीन्हें घर न सूझे, यों खेलत मांझ अंधार।।११

ऐसे लोगोंको शास्त्रोंके वचनोंका अर्थ ही नहीं सूझता, वे मात्र अहंकार बुद्धिको लेकर ही चलते हैं. उन्हें न स्वयंकी पहचान है और न ही अपना घर-परमधामकी सुधि है. इस प्रकार वे अज्ञाानके अन्धकारमें फँसे हुए मिथ्या खेल खेल रहे हैं.

People do not understand the true meaning of the scriptures and have distorted view out of the ego consciousness. Neither they know themselves nor their original abode and they continue the game of ignorance amidst darkness.
• The worldly people do not understand the meanings of the scriptures and they have their own opinion which is based on their perception or ego. Such a person neither knows the self, nor the destination of the soul, and is playing in the middle of darkness.

Please understand one simple fact that those who are against any scriptures have not realized the truth. Mahamati Prannath found truth in Toret/Angir/Holy Quran/Ved/Shrimad Bhagavat/Kabir Vani. Where in Holy Kuljam Swaroop he has criticized the various prophets,tirthankars or anybody? He assimilated the truth from all the scriptures.

बिना पुरान प्रकास न होई, सास्त्र बिना कौन माने।
एक अक्षर को अर्थ न आवे, तो ब्रह्म भरममें आने ।।५

शास्त्रों और पुराणोंके सिद्धान्तोंको समझे बिना ब्रह्मज्ञाानका प्रकाश प्राप्त नहीं हो सकता और शास्त्रोंके प्रमाण बिना मानेगा भी कौन ? जिन्हें शास्त्रोंके सिद्धान्तोंके एक भी अक्षरका गूढ.ार्थ समझमें नहीं आता, वे लोग भ्रममें पड.कर ब्रह्मको मायामें घटाते हैं.
Without the scriptures one cannot spread the light of Supreme, without Scriptures who will agree (All scriptures from all religion have come from God) and those who do cannot understand a single letter of scriptures then they are confused and bring Lord in the illusion!
प्रकरण ३२ चौपाई ३९ kirantan

सास्त्र ले चले सतगुरु सोई, वानी सकलको एक अरथ होई ।
सब स्यानांेकी एक मत पाई, पर अजान देखे रे जुदाई ।।४

धर्मग्रन्थोंके प्रमाणभूत सिद्धान्तोंके अनुरूप चलने वाले ही सद्गुरु हो सकते हैं. सब धर्मग्रन्थोंकी वाणी समान अर्थ धारण करती है (अर्थात् एक ही पूर्णब्रह्म परमात्माकी ओर संकेत करती है). वास्तवमें सब ज्ञाानीजनोंका अभिप्राय भी एक है, किन्तु धर्मग्रन्थोंके सिद्धान्तोंको न समझने वाले अज्ञाानीजन उनमें भिन्नता देखते हैं.

Remember the true Guru is the one who approves all the scriptures as all the teaching of all the scriptures of all the religions has one and one reality. And all the wise also hold one and only one truth it is the ignorant who sees the differences and create conflicts.
Mahamti Prannathji finds no conflict in any shastra scriptures, holy Quran and Bible. He said they all point to one Lord but they have hidden the Reality so only a true seeker could see. He tried hard to clarify the mysticism in all the shastras but look at Dunis!


माएना ऊपर का पोहोंचे नहीं, बीच अर्स बका।
नजर बांध फना मिनें, हुए जिद कर तफरका।।३६

धर्मग्रन्थोंके मात्र बाह्य अर्थ ग्रहण करनेसे परममधाम तक पहुँचा नहीं जा सकता. जिनकी दृष्टि स्वप्नवत् जगतकी अनित्य वस्तुओं पर ही टिकी है वे अपनी हठर्धिमताके कारण भिन्न-भिन्न समुदायोंमें विभक्त हो गए हैं.
The accepting the external meaning of the scripture one cannot see the reality and cannot reach the imperishable eternal (baka arash) paramdham. They have not realized the soul within and thus cannot realize the eternal bliss and witnessing the perishable through their senses they divide in different groups.


ए भरम बाजी रची रामत, बहु विधें संसार।
ए जो नैन देखे श्रवन सुनें, सब मूल बिना विस्तार ।।५

इस संसारमें विभिन्न प्रकारके भ्रमपूर्ण खेल रचे गए हैं. इसमें जितना आँखोंसे दिखाई देता है और कानोंसे सुनाई देता है, वह सब बिना आधार (मूल) का ही विस्तार है.

Thus Sundarsathji listen to Mahamati and Sadguru and reject the worldly behaviour and accept that of Arash Ajeem Paramdham of beyond the Noor Jalal which is our original abode.

There is confusion in the name of Lord. Has Mahamati tried anything to solve it?

Yes in Khulasa granth. One can read whole granth but the below chaupais will make one understand the truth.
साखी ढाल
दौड करी सिकंदरे, ढूंढया हैयाती आब।
बका अरस पाया नहीं, उलंघ न सक्या ख्वाब।।१

सिकन्दरने अमरत्व (हैयाती आब) पानेके लिए दौड. लगाई परन्तु वह अखण्ड परमधामको प्राप्त नहीं कर सका, इतना ही नहीं इस स्वप्नवत् संसारको भी वह पार नहीं कर सका.
Alexander the Great tried hard to gain the immortality but never found the eternal Paramdham(बका अरस) and never could cross the dream. He never tasted the reality, eternity!

हारे ढूंढ ऊपर तले, खुदा न पाया किन।
तब हक का नाम निराकार, कह्या निरंजन सुन।।२

इसी प्रकार अनेक लोग ब्रह्माण्डके ऊपर तथा नीचे परमात्माकी खोज करते हुए थक गए परन्तु किसीको भी परमात्मा प्राप्त नहीं हुए. तब उन लोगोंने परमात्माको निराकार, निरञ्जन तथा शून्य कह दिया.
Many tried to search God(Khuda) high and low but no one could ever find Him. Then they said Lord is formless,nothingness, and qualityless!

और नाम धरया हक का, बेचून बेचगून।
कहे हक को सूरत नहीं, बेसबी बेनिमून।।३

इसी प्रकार अन्य लोगोंने भी परमात्माको बेचूँ तथा बेचगूँ कह दिया. वे लोग यह भी कहने लगे कि परमात्माकी कोई आकृति नहीं है इसलिए वह बेशब्बीह तथा बेनिमून है.
Thus they said Lord is formless and nothingness and He has no face and He has no form.

इत थें आए महंमद, ल्याए फुरमान हकीकत।
देखो खोल माएने, अरस हक सूरत।।४

ऐसी स्थितिमें अविनाशी धामसे रसूल मुहम्मद परमात्माके यथार्थ ज्ञाानका सन्देश लेकर आए. उसके गूढ. रहस्योंको स्पष्ट करके देखो, वहाँ पर परमात्माके स्वरूप (आकृति) का वर्णन है.
Then from the imperishable abode came Mohmad and brought the message of the reality. Open the meanings of the message, it has described the form of Lord of Arash(Paramdham).

मैं आया हक का हुकम, हक आवेगा आखरत।
कौल किया है मुझसों, मैं ल्याया हक मारफत।।५

रसूलने यह कहा कि मैं परमात्माका आदेश लेकर आया हूँ. स्वयं परमात्मा अन्त समयमें आएँगे. उन्होंने मुझे अपने आनेका वचन दिया है. मैं उनकी पूर्ण पहचानके लिए सङ्केत वचन लेकर आया हूँ.
Rasool Mohamad said, I have come by the command of Lord and Lord has promised me or given me word that He will come in the end. I have brought the wisdom of the Lord.

उतरी अरवाहें अरस से, रूहें बारे हजार।
और उतरीं गिरो फिरस्ते, और कुन से हुआ संसार।।६

उन्होंने यह भी कहा कि अखण्ड परमधामसे ब्रह्मात्माएँ इस खेलमें अवतरित हुई हैं. उनकी संख्या बारह हजार है. अक्षरधामसे भी ईश्वरीसृष्टिका समूह अवतरित हुआ है तथा परमात्माके द्वारा 'हो जा' (कुन) कहने मात्रसे संसारके समस्त जीव भी उत्पन्न हुए हैं.
He said that 12000 celestial soul have appeared from eternal imperishable Paramdham and also the angels have appeared and also the world begin with the word(kun - so be it)

महंमद कहे मैं उमत पर, ल्याया हक फुरमान।
जो लेवे मेरी हकीकत, ताए होवे सब पेहेचान।।7

रसूल मुहम्मदने कहा कि मैं ब्रह्मात्माओंके लिए परमात्माका सन्देश लेकर आया हूँ, जो मेरे इस यथार्थ ज्ञाानको ग्रहण करेंगे उन्हें सब प्रकारकी पहचान हो जाएगी.
Mohamad said for the soul of Paramdham, I have brought the message of Lord who will accept my reality and they will only understand (recognise reality).

सात तबक तले जिमी के, तिन पर है नासूत।
तिन पर हैं कै फिरस्ते, तिन पर है मलकूत।।८
ला हवा मलकूत पर, ला पर नूर मकान।
नूर पार नूर तजल्ला, मैं तहां से ल्याया फुरमान।।९

उन्होंने यह भी कहा कि मृत्युलोकके नीचे सात पाताल लोक हैं. उनके ऊपर यह मृत्युलोक है. इस लोकके ऊपर कई देवलोक हैं. उनके ऊपर मलकूत (वैकुण्ठ) है. वैकुण्ठके ऊपर शून्य-निराकार है. उससे परे अक्षरधाम है. अक्षरधामसे भी परे अक्षरातीत परमधाम है. मैं वहींसे सन्देश लेकर आया हूँ.
There are seven plane of existence below and above it is this perishable world. Above are many planes of angels and above all is the Malkoot(Baikunth) and above it La(nothing) hava formless and above it is home of Enlightening (Noor Akshardham). Beyond Noor is Noor Tajjala (Aksharateet) from there I have brought the message.

जबराईल पोहोंच्या नूर लग, मैं पोहोंच्या पार हजूर।
मैं वास्ते उमत के, बोहोत करी मजकूर।।१०

उन्होंने यह भी कहा कि जिब्रील फरिश्ता भी अक्षरधाम तक ही पहुँचा है किन्तु मैं अक्षरसे परे अक्षरातीतके निकट पहुँचा हूँ. मैंने ब्रह्मात्माओंके लिए अक्षरातीतसे अनेक बातें भी की हैं.
Gabriel could reach till Noor(Akshardham) but I went to Lord of beyond for the sake of celestial soul and I spoke with Lord for them a lot.

कह्या सुभाने मुझ को, हरफ नबे हजार।
कह्या तीस जाहेर कीजियो, और तीस तुम पर अखत्यार।।११
बाकी जो तीस रहे, सो राखियो छिपाए।
बका दरवाजे खोलसी, आखर को हम आए।।१२

अक्षरातीत परमात्माने मुझे ९० हजार शब्द कहते हुए कहा कि इनमें-से ३० हजार शब्दोंको प्रकट करना तथा अन्य ३० हजार शब्द तुम अपनी इच्छानुसार प्रकट करना. शेष ३० हजार शब्दोंको गुप्त रखना. अन्तिम समयमें आकर मैं अखण्डके द्वार खोल दूँगा.
Lord spoke to me and gave 90.000 words and said 30,000 I could reveal and keep 30,000 for the end and rest 30,000 you keep it hidden and the eternal door will be opened when I come at the end.

कौल किया हकें मुझसे, हम आवेंगे आखर।
ज्यों आवे ईमान उमत को, तुम जाए देओ खबर।।१३

परमात्माने मुझे वचन दिया कि वे अन्त समयमें आएँगे. उन्होंने यह भी कहा हा कि ब्रह्मात्माओंको विश्वास उत्पन्न हो जाए इसलिए तुम पहले ही जाकर उन्हें यह समाचार दे दो.
Lord has promised me that He will come in the end. Give this message to soul so they will gain faith.

होए काजी हिसाब लेयसी, दुनी को होसी दीदार।
भिस्त देसी कायम, रूहें लेसी नूर के पार।।१४

रसूलने यह भी कहा कि अन्तिम समयमें परमात्मा न्यायाधीशके रूपमें आकर सबके कर्मोंका लेखा-जोखा रखेंगे तब सभी जीवोंको उनके दर्शन होंगे. वे सभी जीवोंको मुक्तिस्थलोंमें स्थान देंगे तथा ब्रह्मात्माओंको अक्षरसे परे अक्षरातीत परमधाम ले जाएँगे.
Lord will judge all the actions and the world will be able to see Him (witness). He will grant bhist(eternal home) which is imperishable and the celestial soul will travel back home beyond Noor.

ईसा मेहेदी जबराईल, और असराफील इमाम।
मार दजाल एक दीन करसी, खोलसी अल्ला कलाम।।१५

उस समय सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी अन्तिम समयके धर्मगुरु (महदी) के रूपमें धर्मका नेतृत्त्व करेंगे. जिब्रील एवं इस्राफील फरिश्ता उनके साथ होंगे. वे नास्तिकतारूपी दज्जालको मारकर एक धर्मकी स्थापना करेंगे और कुरानादि धर्मग्रन्थोंके रहस्योंको स्पष्ट करेंगे.
Isa, Mehadi, Gabriel, Asrafeel and Imam will kill the Dajjal(non-believer) and make one spiritual path(ek deen= ek dharma ) and will reveal the words of God the holy Quran.

सोए कौल माने नहीं, हिंदू मुसलमान।
महंमद कहे जाहेर, पर ए ल्यावें ना ईमान।।१६

इस प्रकार रसूल मुहम्मद द्वारा कहे हुए वचनोंको हिन्दू तथा मुसलमान दोनोंने ही स्वीकार नहीं किया. रसूल मुहम्मदने तो स्पष्ट कहा है किन्तु ये लोग उनके वचनों पर विश्वास नहीं करते.
What Rasool Mohamad said neither hindu nor muslim agree to this promise. Mohamad has clearly said still they are not believing. Faith is lacking.

तो भी न माने हक सूरत, पातसाह इबलीस दिलों जिन।
कहे हक न किनहूं देखिया, खुदा निराकार है सुन।।१7

इतना कहने पर भी बाह्य दृष्टिवाले ये लोग परमात्माके स्वरूपको नहीं मानते हैं. क्योंकि इनके हृदय पर दुष्ट इबलीसका शासन है. उनका कहना है कि परमात्माको किसीने देखा ही नहीं है, इसलिए वह शून्य अथवा निराकार है.
They do not agree that Lord had a face because in their heart rules the Iblish. They say no one has seen God, he is formless and nothingness!

सोई कौल सरीयतने, पकड लिया इनों से।
कौल तोडत रसूल के, दुसमन बैठा दिलमें।।१८

शराअके लोगों ने भी निराकार वादियोंके इन्हीं वचनोंको शिरोधार्य किया है. इसलिए वे रसूलके वचनोंको भङ्ग करते हैं. क्योंकि उनके हृदयमें भी दुष्ट इबलीस शत्रु बनकर बैठा हुआ है.
The same the followers of Sariyat (ritualistic) accepted from them and they broke the promise of Rasool because the enemy is sitting in their heart.

आखर आए रूहअल्ला, सो लीजो कर यकीन।
ए समझेगा बेवरा, सोई महंमद दीन।।१९

यह निश्चित मान लो कि इस अन्तिम (कयामतके) समयमें सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी (रूहअल्लाह) प्रकट हो गए हैं. जो इन वचनोंका रहस्य समझेगा वही इन सद्गुरु द्वारा उपदिष्ट धर्ममें माना जाएगा.
In the end(day of awakening) came Roohallah, who accepted the words of Mohamad with complete faith. He understood the description and that will be the true path of Mahamad (true spiritual path given by Mohamad).

जो कछू कह्या महंमदें, ईसे भी कह्या सोए।
ए माएने सो समझही, जो अरवा अरस की होए।।२०

परमात्माके विषयमें रसूल मुहम्मदने जो बातें की हैं, उन सभीकी स्पष्टता सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी महाराजने की है. परन्तु जो परमधामकी आत्माएँ होंगी वे ही इन वचनोंको समझ पाएँगी.
Whatever Mohamad said same Isa(Dhani Devachandraji) said the same but only the soul from imperishable abode will be able to understand it.

सात लोक तले जिमी के, मृतलोक है तिन पर।
इंद्र रुद्र ब्रह्मा बीचमें, ऊपर विस्नु वैकुंठ घर।।२१
निराकार वैकुंठ पर, तिन पर अक्षर ब्रह्म।
अक्षरातीत ब्रह्म तिन पर, यों कहे ईसे का इलम।।२२

इस पृथ्वीके अधोभागमें सात पाताल हैं. उनके ऊपर मृत्युलोक है. इसके ऊपरके लोकोंमें इन्द्र, रुद्र, ब्रह्मा आदि रहते हैं. इन चौदह लोकोंमें सबसे ऊपर भगवान विष्णुका वैकुण्ठ धाम है. वैकुण्ठसे परे निराकार है. उससे परे अक्षरब्रह्म हैं. उनसे भी परे अक्षरातीत परब्रह्म हैं. इस प्रकार सद्गुरु देवचन्द्रजी प्रदत्त तारतम ज्ञाान स्पष्ट कहता है.
The seven planes below and above is perishable plane (mrityu lok). Indra, Rudra, Brahm are in the middle and on the top is Vishnu's home Baikunth. Beyond Baikunth is Nirakaar, and on top of it is Akshar BRahm. Aksharateet Brahm is beyond it so says the wisdom of Isa(Satguru Dhani Devachandraji)

ए बेवरा वेद कतेब का, दोनों की हकीकत।
इलम एकै विध का, दोऊ की एक सरत।।२३

यह विवरण वेद और कतेब दोनों ग्रन्थोंकी यथार्थता प्रकट करता है. दोनोंके ज्ञाानमें साम्यता है तथा दोनों एक ही लक्ष्यकी बात कह रहे हैं.
This is the detail description of Ved and Kateb and reality of both. The wisdom is one and both are speaking about same Lord.

ईसे महंमद मेहेदी का, इन तीनों का एक इलम।
हक नहीं ब्रह्मांड में, ए हुआ पैदा जिनके हुकम।।२४

ईसा, मुहम्मद और महदी इन तीनोंका ज्ञाान एक ही लक्ष्यकी ओर है. उनका तात्पर्य यह है कि इस नश्वर ब्रह्माण्डमें परमात्मा नहीं है तथा यह उनकी आज्ञाा मात्रसे बना हुआ है.
Isa, Mohamad and Mehadi, of three there is only one wisdom. Supreme Lord is not in the world which is created by His command.

दुनियां बीच ब्रह्मांड के, ऐसा होए जो इलम लिए ए।
हक नजीक सेहेरग से, बीच बका बैठावें ले।।२५

इस ब्रह्माण्डके लोगोंमें जिनको भी यह दिव्य तारतम ज्ञाान प्राप्त होगा उन्हें परमात्मा अपनी प्राण नलीसे भी निकट प्रतीत होंगे. यह ज्ञाान उन्हें इस स्वप्नवत् जगतसे जागृतकर अखण्ड परमधाममें पहुँचाएगा.
In the middle of this universe, anyone who accept this wisdom of beyond, that will witness the Supreme Lord nearer than wind pipe(within) and will be awakened in the eternal imperishable abode.

करमकांड और सरीयत, ए तब मानें महंमद।
जब ईसा और इमाम, होवें दोऊ साहेद।।२६

कर्मकाण्ड अथवा शराअमें मग्न हुए लोग रसूल मुहम्मदको तभी समझेंगे जब सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी और इमाम महदी दोनों ही उनकी साक्षी देंगे.
Those who follow the rituals and the sariyat will know Mohamad only when Isa(Dhani Devachandraji) and Imaam(Mahamati Prannath) will prove it by witnessing the same.

हिंदू न माने कौल महंमद, ना सरीयत मुसलमान।
यों जान चौथे आसमान से, आया ईसा देने ईमान।।२7

रसूल मुहम्मदके वचनोंको हिन्दू लोग भी स्वीकार नहीं करते और शराअमें पड.े हुए मुसलमान भी स्वीकार नहीं करते. ऐसा समझकर सबको परमात्माके प्रति विश्वास दिलानेके लिए सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी महाराज चौथे आसमान (परमधाम) से इस जगतमें अवतरित हुए.
Hindus are not accpeting the words of Rasool Mohamad neither the Muslims who follow the Sariyat. Hence understand this, from the fourth heaven Isa (Dhani Devachandraji) came to bestow the faith.

और आए इमाम, ऊपर अपनी सरत।
दे साहेदी महंमद की, करे इमामत।।२८

कुरानमें कहे हुए वचनोंके अनुरूप इमाम महदी भी इस संसारमें अवतरित हुए हैं. उन्होंने रसूल मुहम्मदके वचनोंकी साक्षी देकर धर्मका नेतृत्व किया.
Then came the Imaam(Mahamati Prannath) and on him came the Lord. He gave the proof of Mohamad he lead the true spiritual path.

ईसा इमाम उमत को कहे, चलो हुकम माफक।
दे साहेदी महंमद की, दूर करे सब सक।।२९

इस प्रकार ईसा और इमाम अपने समुदायको कहते हैं कि तुम परमात्माके आदेशके अनुरूप आचरण करो. उन्होंने रसूल मुहम्मदके वचनोंकी साक्षी देते हुए कहा कि तुम मनके सभी सन्देहोंको दूर करो.
Dhani Devachandraji and Mahamati Prananthji are saying to celestial soul, walk the path as said by Lord and also gave the witness of Mohamad and eliminated all the doubts.

पेहेलें लिख्या फुरमानमें, आवसी ईसा इमाम हजरत।
मारेगा दजाल को, करसी एक दीन आखरत।।३०

रसूल मुहम्मदने कुरानमें पहलेसे ही लिख दिया था कि महान् आत्मा सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी भविष्यमें प्रकट होंगे. वे नास्तिक भावना (दज्जाल) को दूर कर अन्तमें सभी लोगोंको एक ही धर्ममें प्रतिष्ठित करेंगे.
First he gave the message in holy Quran that Isa and Imaam the great will come in the end (awakening) and kill the Dajjal(non believer) and make one spiritual path.

वेदों कह्या आवसी, बुध ईस्वरों का ईस।
मेट कलिजुग असुराई, देसी मुक्त सबों जगदीस।।३१

वैदिक धर्म ग्रन्थोंमें भी इस प्रकार कहा गया है कि कलियुगमें सभी ईश्वरोंके ईश बुद्धजी प्रकट होंगे. वे कलियुगकी आसुरी वृत्तिको मिटाकर जगतके जीवोंको मुक्ति प्रदान करेंगे.
Ved said the supreme intelligence of Lord, who is lord of all the lords, the incarnation of Intelligence (Budh avataar) the Lord of the universe, will erase the demoness of Kaliyug and will free everyone.

बुध ब्रह्मसृष्टि वास्ते, आवसी कह्या वेद।
ए बात है उमत की, कोई और न जाने भेद।।३२

इस प्रकार वैदिक धर्मग्रन्थोंमें कहा गया है कि ब्रह्मसृष्टियोंके लिए बुद्धजी प्रकट होंगे. यह ब्रह्मात्माओंकी बात है इसलिए इस रहस्यको अन्य कोई भी नहीं समझ सकते.
The Budh avataar (Dhani Devachandraji) will come for the celestial soul so says the Ved. This is matter of celestial soul and no one will ever know the mystery.

जो नेत नेत कह्या निगमे, सब लगे तिन सबद।
माएने निराकार पार के, क्यों समझे दुनियां हद।।३३

वेदोंने भी ब्रह्मको नेति-नेति (यही नहीं इससे भी आगे) कहा इसलिए सभी लोगोंने ब्रह्मके विषयमें ये ही शब्द ग्रहण किए. अतः निराकारसे परेका रहस्य इस नश्वर संसारके लोग कैसे समझ पाएँगे ?
Even Ved also said Neti Neti (not this but there is beyond) and said we could not know and thus they accepted the sound. The mystery that is beyond nothingness and formlessness, the perishable world could never understand.

पेहेले हवा कही मलकूत पर, सब सोई रहे पकड।
पाई ना हकीकत कुरान की, तो कोई सक्या न ऊपर चढ।।३४

कुरानमें भी यही कहा गया है कि वैकुण्ठसे परे शून्य निराकार है इसलिए सब लोग शून्य-निराकारको ही परमात्मा मानने लगे. कुरानमें र्विणत यथार्थताका ज्ञाान भी उन्हें नहीं हुआ इसलिए कोई भी शून्यको पार नहीं कर सके.
There is formlessness after Malkoot and everyone took this path(Accepted Lord as formless and nothingness) and never got the reality mentioned in Holy Quran and thus no one could ever reach the top.

वेद कहे उत दुनी की, पोहोंचे ना मन अकल।
कहे कतेब छोड सुरैया को, आगे पोहोंचे ना अरस असल।।३५

वेदोंमें भी कहा गया है कि शून्य-निराकारसे परे मनुष्यकी बुद्धि अथवा मनकी गति नहीं है. इसी प्रकार कतेब ग्रन्थों में भी कहा है कि ज्योति स्वरूप (शून्य सुरैया) को छोड.कर संसारके लोगोंकी बुद्धि अनादि ब्रह्मधाम तक नहीं पहुँच सकती.
Ved says, the physical mind and its intelligence of the world cannot conceive the realm of beyond. And also holy Quran has said, the worldly mind cannot cross the Suraiya(jyotiswaroop) formless and thus cannot reach the real abode!

निगमें गम कही ब्रह्म की, क्यों समझे ख्वाबी दम।
सोए करूं सब जाहेर, रूहअल्ला के इलम।।३६

वेदोंने ब्रह्मको प्राप्त किया जा सकता है ऐसा स्पष्ट कहा है किन्तु स्वप्नके जीव उस रहस्यको कैसे समझ सकते ? अब मैं सद्गुरु प्रदत्त तारतमज्ञाानके द्वारा इस रहस्य (परब्रह्मका स्वरूप एवं धाम) को स्पष्ट करता हूँ.
One that cannot be known said is Brahm thus the existence of dream how can they understand. Let me reveal the reality by the wisdom of Roohallah(Shyama).

कहूं ईसे के इलम की, जो है हकीकत।
हक बका अरस उमत, जाहेर करी मारफत।।३7

सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी प्रदत्त तारतम ज्ञाानकी यथार्थता कहता हूँ, वह यह है कि उसने पूर्णब्रह्म परमात्मा, अखण्ड परमधाम तथा ब्रह्मात्माओंकी पूर्ण पहचान प्रकट कर दी है.
Let me speak of wisdom of Isa(Dhani Devachandraji) that what is reality! He revealed the Supreme Lord, imperishable eternal Arash Paramdham Aksharateet, the soul through his wisdom

नाम सारों जुदे धरे, लई सबों जुदी रसम।
सबमें उमत और दुनियां, सोई खुदा सोई ब्रह्म।।३८

विभिन्न सम्प्रदायके अनुयायियोंने परमात्माको अलग-अलग नामोंसे पुकारा है तथा उसकी प्राप्तिके लिए भी अलग-अलग साधना पद्धति ग्रहण की है. इन विभिन्न सम्प्रदायोंके अनुयायियों तथा अन्य सामान्य लोगोंमें समानता यह है कि वे जिसको खुदा अथवा ब्रह्म कह कर पुकारते हैं वह एक ही परब्रह्म परमात्माके लिए किया गया सङ्केत है.
Everyone has got the different name and there is difference in rituals/customs/traditions but in all scriptures mention about soul and the world and Brahm and Khuda are ONE.

लोक चौदे कहे वेदने, सोई कतेब चौदे तबक।
वेद कहे ब्रह्म एक है, कतेब कहे एक हक।।३९

वेदोंने ब्रह्माण्डके चौदह लोकोंकी चर्चा की है, कतेब ग्रन्थोंमें उनको ही चौदह तबक कहा गया है. वेदोंमें कहा गया है कि ब्रह्म एक है इसी प्रकार कतेब ग्रन्थ भी कहते हैं कि परमात्मा (हक) एक है.
Ved says 14 lokas so says Kateb 14 tabak. Ved says there is only one Brahm and Kateb says there is one Lord.

तीन सृष्टि कही वेदने, उमत तीन कतेब।
लेने न देवे माएने, दिल आडा दुसमन फरेब।।४०

वेदोंमें तीन प्रकारकी सृष्टि (ब्रह्म, ईश्वरी, जीव) की बात की गई है तो कतेबोंमें भी उनको तीन उमत (समूह) कहा है. वेद तथा कतेब दोनोंके अनुयायियोंको उनके मनमें बैठा हुआ झूठा अहङ्कार सीधा अर्थ ग्रहण करने नहीं देता.
Three creations says Ved and three Umat(kind) says Kateb. People do not accept the true meanings because the enemy directs the heart to falsehood.

दोऊ कहे वजूद एक है, अरवा सबमें एक।
वेद कतेब एक बतावहीं, पर पावे न कोई विवेक।।४१

वेद तथा कतेब दोनों एक-सा ही ज्ञाान देते हैं कि सबका (नश्वर) शरीर एक ही प्रकार (पाँच तत्त्व) का बना हुआ है तथा सबके अन्दर आत्मा (चैतन्य) भी एक ही प्रकारकी है. किन्तु इस विवेकको कोई ग्रहण नहीं कर रहा है.
Both say the beings are one and the soul also is one. The Ved and Kateb say they are one but no one is getting the intelligence to understand it.


जो कछू कह्या कतेबने, सोई कह्या वेद।
दोऊ बंदे एक साहेब के, पर लडत बिना पाए भेद।।४२

जैसा कतेब ग्रन्थोंमें कहा गया है, वेदोंमें पहलेसे ही वही बात की गई है. वास्तवमें हिन्दू या मुस्लिम दोनों एक ही परमात्माके सेवक (बन्दे) हैं परन्तु इस रहस्यको न समझनेके कारण वे परस्पर लड.ते-झगड.ते हैं.
What Holy Quran has said so has said the Ved both the devotees(servant of Lord) worship One master(Saheb) but they are fight amongst themselve as they do not understand this secret.
Who is the Saheb? He is the one master that all scriptures are pointing to! Mahamati has further cleared who the Master is so please continue understanding!

बोली सबों जुदी परी, नाम जुदे धरे सबन।
चलन जुदा कर दिया, ताथें समझ ना परी किन।।४३

सबकी भाषाएँ भिन्न-भिन्न होनेके कारण उन्होंने परमात्माके नाम भी अलग-अलग रख दिए हैं. इस प्रकार आचरण तथा पूजा-पद्धति भी भिन्न प्रकारकी बनाई गई है. इसीलिए किसीको भी यथार्थ समझमें नहीं आया.
The language is different and the terminology is also different and their rituals are different hence they could not understand the reality.

ताथें हुई बडी उरझन, सो सुरझाउं दोए।
नाम निसान जाहेर करूं, ज्यों समझे सब कोए।।४४

इसलिए दोनोंमें परस्पर बड.ी उलझनें खड.ी हो गई. अब मैं उन दोनोंकी उलझनोंको सुलझा देता हूँ. वेद तथा कतेबोंमें परमात्माके लिए प्रयोग किए हुए नाम तथा सङ्केतोंको स्पष्ट कर देता हूँ जिससे सभी लोग यह रहस्य समझ सकें.
That is why was lots of confusion and conflict between them that I will the conflict between them. I will reveal the name,signs and symbols and explain it to everyone to make them understand.

विस्नु अजाजील फिरस्ता, ब्रह्मा मेकाईल।
जबराईल जोस धनीय का, रुद्र तामस अजराईल।।४५

कुरानमें भगवान विष्णुको अजाजील फरिश्ता तथा ब्रह्माजीको मेकाईल फरिश्ता कहा है. इसी प्रकार दुनियांको जोश प्रदान करने वाले फरिस्ताको जिब्रील एवं तामस स्वरूप रुद्रको इजराईल कहा है.
Vishnu is Ajajeel angel(firasta) and Brahma is the Mekail(firasta), Jabrail (inspiration of Lord- Josh Dhanidhaam), Rudra(Shankar) is the Azrail.

बुध ब्रह्मा मन नारद, मिल व्यासें बांधे करम।
ए सरीयत है वेद की, जासों परे सब भरम।।४६

बुद्धिरूप ब्रह्माजीने मनरूप नारदजीके साथ मिलकर व्यासजीके द्वारा विभिन्न शास्त्रोंकी रचना करवाई और कर्मोंके बन्धन बाँध दिए. इसीको वैदिक कर्मकाण्ड कहा जाने लगा जिसके बन्धनमें बँधकर सभी लोग भ्रमित हो रहे हैं.
The intelligence (Budh) is Brahma, mind(man) is Narad and along with Vyas(who wrote various hindu scriptures) created various bondage of Karma(action) and this is the rituals (discipline) from the Ved and because of which all are in the state of confusion(cannot find truth and reality)!

वेदें नारद कह्यो मन विस्नुको, जाको सराप्यो प्रजापत।
राह ब्रह्म की भांन के, सबों विस्नु बतावत।।४

वैदिक धर्मग्रन्थोंमें नारदमुनिको भगवान विष्णुके मनका स्वरूप माना है. जिनको प्रजापति (ब्रह्माजी) ने श्राप दिया था. इसलिए नारद सदृश अस्थिर मन परमात्माके मार्गसे साधकोंको विचलित कर भगवान विष्णुकी ही श्रेष्ठता दर्शाता है.
Ved has said the Narad is the mind of Vishnu who is cursed by Prajapati. The cursed mind(which is never stable) destracts everyone from the Lord and tells them to worship Lord Vishnu.

दम इबलीस अजाजील को, जाए कुरानें कही लानत।
सो बैठ दुनी के दिल पर, चलावे सरीयत।।४८

कतेब ग्रन्थोंमें भी इबलीस (मन) को अजाजीलका प्राणभूत मानकर धिक्कारा गया है. वही संसारके लोगोंके अन्तःकरण पर बैठकर उनको कर्मकाण्डकी ओर प्रेरित करता है.
Iblish -mind of the Ajaajeel is condemned in the holy Quran. That residing in the heart of worldly people distrancts them to perform the rituals only(sariyat).

अजाजील दम सब दिलों, बैठा इबलीस ले लानत।
बीच तौहीद राह छुडाए के, दांएं बांएं बतावत।।४९

इस प्रकार धिक्कारा गया अजाजीलका प्राणस्वरूप मन (इबलीस) संसारके जीवोंके अन्तःकरणमें बैठा हुआ है और सभीको अद्वैतके मार्गसे विचलित कर यत्रतत्र (दायें बायें) भ्रमित करता है.
Thus the condemned power of Ajajeel the Iblish is ruling the heart of the worldly people and distracts them the true path of One supreme Lord and creates lots of confusion.

सोई इबलीस सबन के, दिल पर हुआ पातसाह।
एही दुसमन दुनी का, जिन मारी सबों की राह।।५०

वही श्रापित इबलीस सबके हृदयका अधिपति बना हुआ है. वस्तुतः यह संसारके सभी प्राणियोंका शत्रु है जिसने सभीका सन्मार्ग अवरुद्ध कर दिया है.
This very Iblish in everyone became the ruler of the heart and this is the enemy of all the people which distracts them from the true path.

मलकूत कह्या वैकुंठ को, मोहतत्व अंधेरी पाल।
अक्षर को नूर जलाल, अक्षरातीत नूरजमाल।।५१

कुरानमें वैकुण्ठ धामको मलकूत तथा मोहतत्त्वको अन्धेरी पाल कहा है. इसी प्रकार अक्षरब्रह्मको नूरजलाल एवं अक्षरातीतको नूरजमाल कहा है.
Malkoot is the baikunth and Mohtatva(element of forgetfulness, attachment and unconsciousness) is the dark (paal) cave . Akshar is the Noor Jalal and Aksharateet is the Noorjamal.

ब्रह्मसृष्टि कहे मोमिन को, कुमारका फिरस्ते नाम।
ठौर अक्षर सदरतुल मुंतहा, अरस उल अजीम सो धाम।।५२

ब्रह्मसृष्टियोंको वहाँ पर मोमिन कहा है तथा ईश्वरीसृष्टिको फरिश्ता नाम दिया है. इसी प्रकार अक्षरधामको सदरतुलमुन्तहा एवं परमधामको अरश ए अजीम कहा है.
Brahmashristhi are said as Momin and Kumarika are the firaste as named.
The abode of Akshar is Sadartul Muntaha and the Arash Ul Ajeem is the Paramdham.

श्रीठकुरानीजी रूहअल्ला, महंमद श्रीकृस्नजी स्याम।
सखियां रूहें दरगाह की, सुरत अक्षर फिरस्ते नाम।।५३

इसी प्रकार श्रीठकुराणीजीको रूहअल्लाह एवं श्यामसुन्दर श्रीकृष्णजीको मुहम्मद कहा है तथा ब्रह्मात्माओंको दरगाहकी रूह एवं अक्षरब्रह्मकी सुरताको फरिश्ता नाम दिया है.
Shri Thakuranijee (Shyama) is the RoohAllah and Mahamad Shri Krishna Shyam.
All the sakhiyan(celestial souls) are the souls of Dargaah and the astral body of Akshar(Noor Jalal) is the named firaste.

बुधजीको असराफील, बिजिया अभिनंद इमाम।
उरझे सब बोली मिने, वास्ते जुदे नाम।।५४

अक्षरकी बुद्धिको इस्राफील तथा विजयाभिनन्दको इमाम महदीकी संज्ञाा दी है. इस प्रकार वेद तथा कतेबोंमें दिए गए भिन्न-भिन्न नामोंको लेकर सभी लोग अपनी-अपनी भाषामें ही उलझें हुए हैं.
The intelligence of Akshar(Noor Jalal) is Asrafeel and Vijayabhinandan Kalki avatar is the Imam Mehadi. All are confused because of the different language and the different name.

वाकी तो वेद कतेब, दोऊ देत हैं साख।
अंदर दोऊ के गफलत, लडत वास्ते भाख।।५५

अन्यथा वेद-कतेब दोनों एक ही परमात्माकी साक्षी दे रहे हैं. किन्तु उन दोनोंको मानने वाले हिन्दू तथा मुसलमान दोनोंके अन्दर अज्ञाानरूप अन्धकार भरा हुआ होनेसे दोनों ही भाषा भेदके कारण परस्पर लड. रहे हैं.
Rest if you check the Ved and the holy Quran both are giving the witness of the same Lord. There is confusion and darkness of ignorance present in both community are fighting because of the difference in language.

प्रकरण १२ shri Khulasa

पिया जो पार के पार हैं, तिन खुद खोले द्वार।
पार दरवाजे तब देखे, जब खोल देखाया पार।।३

जो अक्षरसे भी परे अक्षरातीत परमात्मा हैं उन्होंने ही स्वयं आकर परमधामके द्वार खोल दिए. पारके द्वार मुझे तब प्रत्यक्ष हुए जब उन्होंने इस प्रकार खोलकर दिखाए.
The beloved Lord who is beyond of beyond(Akshar), he Himself (Khud) opened the door. I could see the door of beyond when he opened and showed the door!
(There were many gyani dhyani tapaswi, intelligent beings, researchers who tried hard to find God but none could find living in this dream world. Only Lord can make Himself known and that is what He did.)
प्रकरण ९ kalash

श्री सुंदरबाई स्यामाजी अवतार, पूरन आवेस दियो आधार ।
ब्रह्मसृष्ट मिने सिरदार, श्री धाम धनीजी की अंगना नार ।।१

सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजी (सुन्दरबाई) श्रीश्यामाजीके अवतार हैं. धामधनीने उनको अपना पूर्ण आवेश दिया है. वे ब्रह्मसृष्टियोंमें शिरोमणि हैं और धामधनीकी अर्धाङ्गिनी हैं.

Shri Sundarbai avataar of Shyamaji whom the Master gave पूरन complete aavesh(inspiration). She is the head of all other Brahmshristi and she is the part of Master of Paramdham.
prakaran 5 Prakash Hindi


अवतार तले विस्नु के, विस्नु करे स्याम की सिफत।
इन विध लिख्या वेद में, सो आए स्याम बुधजी इत।।३६

शास्त्रोंमें सभी अवतार भगवान विष्णुके माने गए हैं किन्तु भगवान विष्णु भी श्रीकृष्णजीकी प्रशंसा करते हैं. वेदोंमें किए गए उल्लेखके अनुसार वे ही श्रीकृष्णजी बुद्धजीके रूपमें प्रकट हुए हैं.

Scriptures give details of all the Vishnu's avtar but Bhagvan Vishnu also praises Shri Krishna.
It is given in Ved, it is the same Shyam Shri Krishna will arrive as Budh nishkalank.

लिखी अनेकों बुजरकियां, पैगंमरों के नाम।
ए मुकरर सब महंमदपें, सो महंमद कह्या जो स्याम।।३7

कतेब ग्रन्थोंमें अनेक प्रकारसे पैगम्बरोंकी प्रशंसा की गई है. वस्तुतः वह सारी शोभा मुहम्दकी है. वे मुहम्मद श्रीकृष्णजीके ही स्वरूप कहे गए हैं.
In holy Quran and semitic scriptures, has praised many messengers(paigambars) but all the splendour came to Mohamad, Mohamad said that what Shyam said!


साहेब के संसार में, आए तीन सरूप।
सो कुरान यों केहेवही, सुंदर रूप अनूप।।7१

कुरानमें इस प्रकार कहा है कि इस संसारमें परब्रह्म परमात्मा तीन स्वरूपमें प्रकट हुए. जिनके सुन्दर स्वरूपकी उपमा नहीं दी जा सकती.
In Holy Quran it is mentioned the Master in the universe came in three forms whose beauty cannot be described.

एक बाल दूजा किसोर, तीसरा बुढापन।
सुंदरता सुग्यान की, बढत जात अति घन।।7२

परमात्माके इन तीन स्वरूपोंमें एक बालस्वरूप (व्रजलीला) दूसरे किशोर स्वरूप (रासलीला) तीसरे प्रौढस्वरूप (जागनी लीला) कहे गए हैं. उन स्वरूपोंमें ज्ञाानकी सुन्दरता उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है.
One as a child, another as youth and third as an adult. There is extreme rise in beauty and wisdom continuously.

ज्यों चढती अवस्था, बाल किसोर बुढापन।
यों बुध जागृत नूर की, भई अधिक जोत रोसन।।7३

जिस प्रकार बाल, किशोर और प्रौढ ये तीनों अवस्था उत्तरोत्तर विकसित होती हैं उसी प्रकार अक्षर ब्रह्मकी जागृत बुद्धिका प्रकाश भी इन तीनोंमें क्रमशः बढ.ता रहा है.
As there was rise in state from child, youth and adult there was great rise in brillance of the intelligence, awakening and enlightening.

ए केहेती हूं प्रगट, ज्यों रहे ना संसे किन।
खोल माएने मगज मुसाफ के, सब भांने विकल्प मन।।7४

मैंने इसलिए स्पष्टता की है कि जिससे किसीके मनमें लेशमात्र भी संशय न रहे. इस प्रकार कुरानके रहस्योंको स्पष्टकर सबके मनके सङ्कल्प-विकल्पोंको दूर कर दिया है.
This I am revealing you so you must not have any doubts. I have clarified the mystery of holy Quran and ended all the confusion and given the true solution.

श्री कृस्नजीएं व्रजरास में, पूरे ब्रह्मसृष्ट मन काम।
सोई सरूप ल्याया फुरमान, तब रसूल केहेलाया स्याम।।7५

श्रीकृष्णजीने व्रज और रासकी लीलामें ब्रह्मात्माओंकी मनोकामनाएँ पूर्ण कीं. वही स्वरूप कुरानका सन्देश लेकर आया है तब वे ही श्याम रसूल मुहम्मद कहलाए.
Shri Krishna in Braj Raas who fulfilled the wishes of BrahmShristi, it is the same form of the self(soul)(swa means self roop means form) brought the messages then Rasool Mohamad was called Shyam.

चौथा सरूप ईसा रूहअल्ला, ल्याए किल्ली हकीकत धाम।
पांचमा सरूप निज बुधका, खोल माएने भए इमाम।।7६

श्रीकृष्णजीका चतुर्थ स्वरूप श्री देवचन्द्रजी (ईसा रूहअल्लाह) का है जो परमधामकी यथार्थता स्पष्ट करने वाले तारतम ज्ञाानरूपी कुञ्जी लेकर प्रकट हुए हैं. पाँचवाँ स्वरूप निष्कलङ्क बुद्धका है जो वेद-कतेबके गूढ. रहस्योंको स्पष्ट कर इमाम महदी कहलाए.
Fourth form of the soul(swaroop) is of Isa(second Christ) Roohallah (Shyama) Devachandraji who brought the key of reality of the supreme abode (Nijnaam mantra). The fifth form of the soul is the intelligence of the Self, which revealed the mysteries of holy Quran and thus became Imam Mehadi.

ए भी पांच सरूप का, है बेवरा माहें कुरान।
जो कछू लिख्या भागवत में, सोई साख फुरमान।।77

इन पाँचों स्वरूपोंका विवरण भी कुरानमें दिया गया है. श्रीमद्बागवतमें जिस प्रकारका उल्लेख है उसकी साक्षी कुरानमें दी गई है.
These are the five form of the soul (Shri Krishna Shyam) details given in holy Quran. Whatever is written in Bhagavat the same is witnesses the message of holy Quran.
प्रकरण १३ khulasa

फेर आए रसूल स्याम मिल, सोई फेर आए यार ।
देख निसबत पांचों दुनीमें, क्यों छोडें असल अरस प्यार ।।३५

अब पुनः रसूल मुहम्मद श्यामसुन्दर श्रीकृष्णके साथ मिलकर मेरे हृदयमें अवतरित हुए हैं. श्रीश्यामाजीकी अङ्गस्वरूपा ब्रह्मात्माएँ भी इस जगतमें पुनः अवतरित हुइंर् हैं. इस नश्वर जगतमें भी पाँचों शक्तियों (श्रीधनीजीका जोश, श्रीश्यामजीकी आत्मा, अक्षरकी बुद्धि, श्रीराजजीका आदेश, परमधामकी मूलबुद्धि तारतम ज्ञाान) को एक साथ सम्मिलित देख कर ब्रह्मात्माएँ अपने मूल स्नेहको कैसे छोड. सकतीं हैं ?
Again, Mohamad Rasool along with Shyam and the same friends of Lord have come. Seeing the five treasures (inspiration of Aksharateet Shri Krishna, soul of Shyama -Roohalla, cosmic mind(mind of the Creator Akshar), Will of Shri Rajji, and the Reality of Arashajeem- Paramdham abode of the Self Nijdham ) how can celestial souls will be able to ignore the original love in the abode. In Paramdham there is all love and nothing but love, even the Supreme is Love and Love is Supreme, the souls coming from there seeing the 5 treasures will gain back their original nature.

prakaran 1 chhota kayamatnama

फुरमान ल्याया दूसरा, जाको सुकजी नाम।
दै तारतम ग्वाही ब्रह्मसृष्ट की, जो उतरी अव्वल से धाम।।५
खिलवत खाना अरसका, बैठे बीच तखत स्यामा स्याम।
मस्ती दीजे अपनी, ज्यों गलित होऊं याही ठाम।।६

तारतम ज्ञानकी दूसरी भी साक्षी है, उसे लेकर शुकदेवमुनि अवतरित हुए हैं.उन्होंने भी परमधामसे अवतरित हुई ब्रह्मआत्माओं तथा तारतम ज्ञानकी साक्षी दी है.
परमधाम रङ्ग भवनकी एकान्त स्थली मूलमिलावाके सिंहासन पर श्यामश्यामाजी विराजमान हैं. हे धनी ! आप मुझे प्रेमकी ऐसी मस्ती प्रदान करें जिससे मैं आपके श्रीचरणोंमें तल्लीन हो जाऊँ.
बाधीं पाग समार के, हाथ नरम उजल लाल।
इन पाग की सोभा क्यों कहूं, मेरा साहेब नूरजमाल।।५२

प्रकरण ८ sagar
श्रीराजजीने अपने लालिमायुक्त उज्ज्वल हाथोंसे सुव्यवस्थित ढ.ँगसे पाग बाँधी है. इस पागकी शोभाका वर्णन कैसे हो सकता है, जिसको स्वयं मेरे धनी श्रीराजजीने बाँधी है.
Lord has carefully tied the head scarf(pagadi) with his bright red beautiful and soft hand.How can I ever describe the splendour, my Master is Noorjamal(Aksharateet Shri Krishna)
प्रकरण ८ सागर महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

निसान बडा ईसा आखरी, और एही आखरी किताब ।
महंमद मेहेदी आखरी, इमाम आखरी खिताब।।८०

कयामतके सङ्केतोंमें सबसे बड.ा सङ्केत ईसा रूहअल्लाह (सद्गुरु) के प्राकटयका है और उनके द्वारा व्यक्त किया गया ग्रन्थ (श्री तारतम सागर) ही अन्तिम ग्रन्थ कहा गया है. वे ही अन्तिम मुहम्मद अर्थात् महदी मुहम्मद कहलाएँगे और अन्तिम सद्गुरुकी शोभा प्राप्त करेंगे.

The sign of coming of Satguru Isa Roohallah is greatest sign of Kayamat and the Tartamsagar is only the last scriptures! Mohamad Mehadi (Mahamati Prananth Indrawati sakhi) is the last prophet and he will be honoured as the last Imam (Satguru).
chaupai 80 prakaran 9 marfatsagar
What happens when one brings distrust and spreads confusion, divides the followers! What is the will of Lord?
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इन महंमद के दीन में, सक सुभे जरा नाहें।
सो हकें दिया इलम अपना, ए सिफत होए न इन जुबांएं।।१०

इन सद्गुरु (श्री देवचन्द्रजी) द्वारा र्नििदष्ट धर्म (निजानन्द सम्प्रदाय) में सन्देहका लेशमात्र भी स्थान नहीं है. स्वयं परब्रह्म परमात्माने प्रकट होकर उन्हें तारतम ज्ञाान दिया है, जिसकी प्रशंसा इस जिह्वासे नहीं हो सकती.
There is no confusion or doubt in this Deen of our Satguru because Lord appeared before him and gave the knowledge about Himself this cannot be described in speech.
प्रकरण 4 श्री खुलासा

Those who doubt the last prophet and his words

सो काफर पडे माहें दोजक, आखर को जो ल्यावें सक ।
जो मोमिन हैं खबरदार, डरते रहें परवरदिगार ।।६

ऐसे अविश्वासी लोग नारकीय यातनाओंको भोगते हैं जो अन्तिम समयमें अवतरित परमात्माके प्रति सन्देह करते हैं. जो ब्रह्मात्माएँ धर्ममें सचेत रहतीं हैं वे परमात्माके प्रति अपना विश्वास कम न हो इस लिए डरती रहतीं हैं.
The non-believers will fall in hell who doubt or bring confusion about the last prophet (akhari Isa Dhani Devachandraji and Akhari Imam Mahamati Prannathji ). Those who are Momin/Brahmshristi/celestial soul will be alert and cautious, fear the Master(parwardigar)
प्रकरण ३ bada Kayamatnama

एक कुरान का माजजा, दूजी नबी की नबुवत।
एक दीन जब होएसी, कह्या तब होसी साबित।।३२

कुरानमें यह भी कहा है कि कुरानके चामत्कारिक रहस्योंका स्पष्टीकरण तथा रसूल मुहम्मदका महत्त्व (पैगम्बरकी पैगम्बरी) एक धर्मकी स्थापना होने पर ही सत्य सिद्ध होंगे.
Holy quran has said that the miraculous secrets of Holy Quran will be revealed when whole world follows one Universal Religion and the truth and reality will be established.

हादी किया चाहे एक दीन, ए कौल तोड जुदे जात।
सो क्यों बचे दोजख से, जाए छोडे ना पुल सरात।।३३

उनके मार्गदर्शक (हादी) रसूलने तो सभी मत मतान्तरके लोगोंको एक ही धर्म पर लानेके लिए प्रयत्न किया किन्तु मोहग्रस्त जीव उनके वचनोंका उल्लंघन कर भिन्न-भिन्न मार्ग पर चलने लगे. ऐसे लोग नरकाग्निसे कैसे बच सकते जिनके भाग्यमें ही पुलेसिरात (तलवारके धारके समान तीक्ष्ण कर्ममार्ग) पर कटना लिखा है.

Hadi Roohallah Shyma Rasool wants one universal religion, those who try to divide the religion established by Him why would they be saved from Dojhak who is destined to cut in the bridge of sword (pulsirat)
कहे महंमद मिस्कातमें, दुनी दिल पर सैतान।
वजूद होसी आदमी, होसी फिरकों ए ईमान।।३४

मिस्कात नामक ग्रन्थमें रसूल मुहम्मदने कहा है कि सांसारिक जीवोंके हृदय पर शैतानका वास है. वे शरीर मात्रसे मनुष्य होंगे किन्तु उनका विश्वास विभिन्न पन्थोंमें बँटा हुआ होगा.

पर मैं डरों इमामों से, करसी गुमराह ऐसी उमत।
करसी लडाई आपमें, छूटे ना लग कयामत।।३५

उन्होंने यह भी कहा है, मैं उन तथाकथित धर्मगुरुओं (स्वयंभू इमाम) से डरता हूँ क्योंकि वे ऐसे (विभक्त श्रद्धावाले) लोगोंको पथभ्रष्ट करेंगे. इसके कारण वे परस्पर कलह करते रहेंगे जो अन्त समय तक नहीं छूटेगा.
प्रकरण 4 श्री खुलासा


दुनियां दिल पर इबलीस, तो राह पुल सरात कही।
वजूद न छोडे जाहेरी, तो दस भांत दोजख भई।।९५

सांसारिक जीवोंके हृदयमें तमोगुणी इबलीस बैठा हुआ है इसलिए उनका धर्म मार्ग पर चलना तलवारके धार (पुलसिरात) पर चलनेके समान कहा गया है. ऐसे बाह्य दृष्टिवाले लोग नश्वर पदार्थों (तन) का मोह नहीं छोड.ते इसलिए उनके लिए दस प्रकारके नरक (दोजख) बतलाए गए हैं.
(कुरानमें र्विणत दस प्रकारके नरक(दोजख)-१. अविश्वासीलोग बन्दरके मुखवाले होंगे. २. हरामखोर सुअर बनेंगे. ३. बूरे कर्म करनेवाले गधे बनेंगे. ४. सूद खानेवाले अन्धे होंगे. ५. पुकार न सुननेवाले बहरे होंगे. ६. अत्याचारका आदेश देनेवाले गूँगे होंगे. . मिथ्याको सत्य कहनेवाले पठितोंकी जिह्वा काटी जाएगी और उससे रक्त और पीब बहेगा. ८. दूसरोंको रञ्ज पहुँचानेवाले सूली पर चढ.ाए जाएँगे. ९. चुगलखोरके हाथ-पाँव कटेंगे. १०. कठोर हृदय वालोंको आघात पहुँचाया जाएगा.)

The Iblish(mind) rules worldly people's heart and they take the path of bridge of sword, they will never let go the external personality (ego body conscious : such people will identify themselves by where they are born, status, position, caste, sex etcs) (in fact even consider Lord Shri Krishna as ego-body personality) and thus shall dive in the 10 types of Hell.

Who is the Saheb mentioned in Holy Kuljam Swaroop saheb?

फुरमान ल्याया दूसरा, जाको सुकजी नाम।
दै तारतम ग्वाही ब्रह्मसृष्ट की, जो उतरी अव्वल से धाम।।५
खिलवत खाना अरसका, बैठे बीच तखत स्यामा स्याम।
मस्ती दीजे अपनी, ज्यों गलित होऊं याही ठाम।।६

तारतम ज्ञानकी दूसरी भी साक्षी है, उसे लेकर शुकदेवमुनि अवतरित हुए हैं.उन्होंने भी परमधामसे अवतरित हुई ब्रह्मआत्माओं तथा तारतम ज्ञानकी साक्षी दी है.
परमधाम रङ्ग भवनकी एकान्त स्थली मूलमिलावाके सिंहासन पर श्यामश्यामाजी विराजमान हैं. हे धनी ! आप मुझे प्रेमकी ऐसी मस्ती प्रदान करें जिससे मैं आपके श्रीचरणोंमें तल्लीन हो जाऊँ.
बाधीं पाग समार के, हाथ नरम उजल लाल।
इन पाग की सोभा क्यों कहूं, मेरा साहेब नूरजमाल।।५२

प्रकरण ८ sagar
श्रीराजजीने अपने लालिमायुक्त उज्ज्वल हाथोंसे सुव्यवस्थित ढ.ँगसे पाग बाँधी है. इस पागकी शोभाका वर्णन कैसे हो सकता है, जिसको स्वयं मेरे धनी श्रीराजजीने बाँधी है.
Lord has carefully tied the head scarf(pagadi) with his bright red beautiful and soft hand.How can I ever describe the splendour, my Master is Noorjamal(Aksharateet Shri Krishna)
प्रकरण ८ सागर महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन

गिरो बचाई साहेब ने, तले कोहतूर हूद तोफान ।
बेर दूजी किस्ती पर, चढाए उबारी सुभान।।१२

इसी व्रज मण्डलमें इन्द्रकोपके समय श्रीकृष्णजीने ब्रह्मात्माओंको गोवर्धन पर्वतके नीचे सुरक्षित रखा था. इस प्रसङ्गको कुरानमें हूद तूफान कहा गया है. उस समय हूद पैगम्बरने अपने समुदायके लोगोंको कोहतूर पर्वतके नीचे सुरक्षित रखा था. दूसरी बार नूह तूफानके समय भी उन्होंने ही योगमायाकी नावमें चढ.ाकर उन्हें पार किया था.

प्रकरण १ छोटा क़यामतनामा
----The truth ShyamShyam in Paramdham----
->gain the confidence of abode->can judge all others-> even Shyam, Shyama and sundarsath and their value
जो सैयां हम धाम की, सो जानें सब को तौल।
स्याम स्यामाजी साथ को, सब सैयोंपे मोल।।६
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परमधामकी हम ब्रह्मात्माएँ ही सबका मूल्याङ्कन कर सकतीं हैं. श्याम-श्यामाजी एवं ब्रह्मसृष्टिका मूल्याङ्कन (महत्त्व) भी हम ब्रह्मात्माओंको ही ज्ञाात है.
The souls from Paramdham can judge all, Shyam Shyama and Sundarsath. Then they will gain the confidence that we belong to Supreme abode, they can judge all others.
They can only understand the value of Shyam, Shyamaji and all the sundarsath that is in Paramdham. A brahmashristi will get the message what Mahamati is trying to reveal.
साथ अंग सिरदार को, सिरदार धनी को अंग।
बीच सिरदार दोऊं अंग के, करे न रंग को भंग।।९

सभी ब्रह्मात्माएँ श्यामाजीकी अङ्गरूपा हैं तथा श्यामाजी श्रीराजजीकी अङ्गरूपा हैं. इसीलिए श्रीश्यामाजी दोनों अङ्गों (श्रीराजजी एवं ब्रह्मात्माओं) के प्रेम रसको न्यून (कम) होने नहीं देतीं.

All the sundarsath(souls) are the body parts of the chief soul (Roohallah, Shyama) and Shyama is part of the Lord. The chief soul between two beings does not allow the love to diminish.
(Remember this chaupai is cue, Shyama Devachandraji is only between the souls and the Supreme Lord who never shall disrupt the affection between the souls a...nd the Supreme. For us only tartam gyaan brought by Shri Devachandraji presented to us by Mahamati Prannath is Shyama and nothing else. We must not allow anybody to intervene in between us.
He has also warned us that the danger of people misguiding us and taking us away from Lord exists in his later chaupai.)
The souls realize that the chief soul has very soft corner for all the souls and she unites the soul with Lord (as there is some sort of amnesia in the souls which keeps them away from Lord.) The soul is awakened by the chief soul.
साथ धाम के सिरदार को, मोमिन मन नरम।
मिलावे और धनीय की, दोऊ इनके बीच सरम।।१०

सुन्दरसाथके लिए श्यामाजीका हृदय द्रवित (नरम) रहता है. सभी सुन्दरसाथको जागृतकर धामधनीकी पहचान करवानेके दायित्वको निभानेमें ही श्यामाजीका गौरव है.

The leader of the souls (Shyma Roohallah) has very soft corner for the souls and she is trying to unite them with the Lord as there is some sort of shyness/shamefulness between them.

WARNING: Those who take souls away from the master how can such be the leader souls.
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जो कोई उलटी करे, साथी साहेब की तरफ।
तो क्यों कहिए तिन को, सिरदार जो असरफ।।१४
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जो व्यक्ति धामधनीकी ओर उन्मुख आत्माओंको उनसे विमुख करनेका प्रयत्न करता है, तो ऐसे व्यक्तिको प्रतिष्ठित अथवा अग्रणी कैसे माना जाए?

And those who create confusion and make sundarsath away from the Saheb(the master), so how can one call such a person leader?

Big or Small will have to follow the true leader the chief soul Roohallah Shyama avtar Devachandraji who brought the knowledge of abode.
कह्या कुराने बंद करसी, इन के जो उमराह।
आधीन होसी तिन के, जो होवेगा पातसाह।।१५

कुरानमें कहा है कि ऐसे अग्रणी (प्रतिष्ठित) व्यक्ति ही धनीके आदेशकी अवहेलना करेंगे. धर्मके सम्राटको भी ऐसे लोगोंके अधीन रहना पडे.गा.

The holy Quran has said that the people who are rich and respected will not obey its command (the innocent, humble and downtrodden will obey). Such disobedient people also must follow the souls of Paramdham (otherwise they will not get God)

लटी तिन से न होवहीं, जो कहे सिरदार।
सबों सिरदार एक होवहीं, मिने बारे हजार।।१६

सभी ब्रह्मात्माओंमें शिरोमणि कहलाने वाली श्यामाजीसे किसी भी प्रकारकी भूल नहीं होगी, क्योंकि सभी ब्रह्मात्माओंके शिरोमणि तो एक श्यामाजी ही हैं.

There will be no mistake from Shyama-RoohAllah the leader of the souls, because she is the supreme leader of all the 12,000.
The celestial souls will never doubt the RoohAllah Shyama who has come to earth as Devachandraji Maharaj.

लिख्या है कुरान में, छिपी गिरो बातन।
सो छिपी बातून जानही, ए धाम सैयां लछन।।१७
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कुरानमें लिखा है कि ब्रह्मात्माएँ छिपी हुईं हैं. वे ही कुरानके गूढ. रहस्योंको समझेंगी. परमधामकी आत्माओंके ये ही लक्षण हैं.

The holy Quran has written that these group of souls of Arsh Ajeem (Paramdham) is hidden but they will understand the secret message in the holy Quran. They will decipher the code of scriptures and this is the trait of the celestial souls (arvaahen).

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भी लिख्या कुरान में गिरो की, सोहोबत करसी जोए ।
निज बुध जागृत लेय के, साहेब पेहेचाने सोए।।१८
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कुरानमें और भी लिखा है कि जो ऐसी आत्माओंका सङ्ग करेंगे, वे भी उनसे जागृत बुद्धि प्राप्त कर अपने धनीको पहचानेंगे.

It is written in holy Quran that those who support or accompany this group of celestial souls the intelligence their self (nij budh) will be awakened (self illumination) and they will know the same Saheb the master.
प्रकरण ९५ किरंतन
Mahamati has first make us known the master is Shyam Shyama in Paramdham, He is the Saheb our master.
First awaken your inner self's intelligence and recognize the same Master that the celestial souls have come to show.

(Check Mahamati is asking nijbudh means the intelligence of the self(aatma) and not somebody else’s interpretation)!
Sundarsathji if you only contemplate the vani given in the picture you will know the truth!

When Shri Shyama (Dhani Devachandraji) who is the head of all soul and there is only one leader among 12000 celestial soul and she cannot go wrong! Mahamati Prannathji has clearly stated it above.
The one who takes sundarsath away from Saheb, how can that person be called leader?
Beware of this person who defies Lord Prannath and creates confusion about Shyama avtaar!
Mahamati PRannath ji has said the hidden group has the signs of celestial souls and not those who are working for duni trying hard to get recognition (jaheri)!
Know the Saheb from the hidden group, they will take you to Paramdham.
Some people have defected and have created a new group?
-------------------------------------------------
Mahamati Prannathji have foretold about it so we are facing what he says over here.

हम दोऊ बंदे रूहअल्ला के, दोऊ गिरो जुदी भई।
तीसरी सृष्ट जो जाहेरी, सब मजकूर इनकी कही।।६

हम दोनों (विहारीजी और मैं) रूहअल्लाह-सद्गुरुके सेवक (बन्दे) हैं. धर्मके प्रचारमें मत-भेदके कारण हम दोनोंके समूह पृथक्-पृथक् हो गए. इसके अतिरिक्त बाह्य अर्थको ग्रहण करने वाली तीसरी सृष्टिका वर्णन भी कुरानमें किया गया है.
प्रकरण १२२ श्री किरन्तन
It is already stated in Holy Quran that the third group will be created who will gain the outer meaning of the Mahamati's wani. So this what is happening now. This confusion and conflict is also the will of our Lord and it His divine plan. We have to accept it.
The holy Quran has predicted a third group who will not be able to dive into the deeper meanings of Prannath vani and shall create a new group. We accept this group as will of the Lord.


और तफरका भए, चलें कौल तोड कर।
दांए बांए चलाए दुसमने, मारे गए हक बिगर।।३९

शेष सभी लोग रसूल मुहम्मदके वचनोंको भङ्ग कर भिन्न-भिन्न समुदायोंमें बँट गए. दुष्ट इबलीसने इनके हृदयमेें बैठकर इनको सन्मार्गसे विपरीत यत्र-तत्र भटकाया. इसलिए सत्यको प्राप्त किए बिना ये सब हताश होकर मारे गए.
Chhota Qayamatnama
The Iblish sitting in their heart they will not pay heed to the words of truth and will get divided in many groups and in the end will die without Lord.

कोई आप बडाई अपने मुखथें, करो सो लाख हजार ।
परमेस्वर होएके आप पुजाओ, पर पाओ नहीं भव पार ।।५

कोई अपने मुँहसे अपनी प्रशंसा हजारों या लाखों गुना भी कर ले एवं स्वयंको परमेश्वर घोषित कर अपनी पूजा भी करवाने लगे, तथापि वह आत्म-ज्ञाानके अभावमें भवसागरसे पार नहीं हो सकता.
One might speak great of oneself and have a following of millions also make people worship one as God but will not cross the ocean of illusion. See, this is being done right now but what counts is whether one finds the Supreme in the end!


केते आप कहावें परमेस्वर, केते करत हैं पूजा।
साध सेवक होेए आगे बैठे, कहें या बिन नहीं कोई दूजा ।।१०

कई लोग स्वयंको परमेश्वर मान कर बैठते हैं, कई लोग उनकी पूजा भी करते हैं. कई साधक सेवक बनकर अग्रिम पंक्तिमें बैठकर उनकी कथा सुनते हैं और कहते हैं कि ये ही हमारे परमात्मा हैं, इनके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं.

Many people call themselves as God and many worship them as God too. Many become their slaves and many sit in the very first row to listen to them and say this person is only our Lord and no one else.

All the messages are truth one cannot break truth and create confusion. But that is what is happening, what happens when one does not pay heed to the words of God.

जो कोई होसी बे फुरमान, नेहेचे सो दोजखी जान ।
ताको ठौर ठौर लानत लिखी, सो जाहेरियों हिरदेमें रखी ।।२१

जो लोग इस प्रकार खुदाके आदेशसे विपरीत आचरण करते हैं, उनको निश्चय ही नरकगामी समझना चाहिए. ऐसे लोगोंको विभिन्न स्थानोंमें धिक्कारा गया है. बाह्यदृष्टिवाले लोगोंने उन्हीं बातोंको अपने हृदयमें अङ्कित किया (इसलिए वे इमाम महदीके रूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए परमात्माको नहीं पहचानते हैं).

Those who do not believe the message of Lord and go against it, it is certain for them to go in hell(dojhakh). They are repeatedly condemned those who understand the outer meaning of the scriptures and do not dive into the deeper meanings.
प्रकरण ५ श्री कयामतनामा (बडा)


फेर आए रसूल स्याम मिल, सोई फेर आए यार ।
देख निसबत पांचों दुनीमें, क्यों छोडें असल अरस प्यार ।।३५

अब पुनः रसूल मुहम्मद श्यामसुन्दर श्रीकृष्णके साथ मिलकर मेरे हृदयमें अवतरित हुए हैं. श्रीश्यामाजीकी अङ्गस्वरूपा ब्रह्मात्माएँ भी इस जगतमें पुनः अवतरित हुइंर् हैं. इस नश्वर जगतमें भी पाँचों शक्तियों (श्रीधनीजीका जोश, श्रीश्यामजीकी आत्मा, अक्षरकी बुद्धि, श्रीराजजीका आदेश, परमधामकी मूलबुद्धि तारतम ज्ञाान) को एक साथ सम्मिलित देख कर ब्रह्मात्माएँ अपने मूल स्नेहको कैसे छोड. सकतीं हैं ?
श्री कयामतनामा (छोटा) प्रकरण १

Again, Mohamad Rasool along with Shyam and the same friends of Lord have come. Seeing the five treasures (inspiration of Aksharateet Shri Krishna, soul of Shyama -Roohalla, cosmic mind(mind of the Creator Akshar), Will of Shri Rajji, and the Reality of Arashajeem- Paramdham abode of the Self Nijdham ) how can celestial souls will be able to ignore the original love in the abode. In Paramdham there is all love and nothing but love, even the Supreme is Love and Love is Supreme, the souls coming from there seeing the 5 treasures will gain back their original nature.

सब साहेदी दै जो हदीसों, और अल्ला कलाम ।
सो साहेदी ले पीछा रहे, तिन सिर रसूल न स्याम ।।77

जब कुरान, हदीस आदि कतेब ग्रन्थ तथा परब्रह्म परमात्माके वचन तारतम ज्ञाानने साक्षी दे दी है तो इस साक्षीको लेकर भी जो आत्माएँ स्वयं सर्मिपत होनेमें पीछे रहेंगी उन्हें सद्गुरु तथा परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णका संरक्षण प्राप्त नहीं होगा.
All the proofs and witnesses from Hadish, Quran and the words of the Lord Allah Kalaam is given in the tartamsagar(Kuljamswaroopr), taking these witnesses those who stay behind and do not surrender themselves to Lord will be blessed by neither the Rasool(satguru) nor Shyam. Those who do not believe these words cannot be saved by the Satguru or Shyam.
श्री कयामतनामा (छोटा) प्रकरण १

For those who keep saying Raas, Prakash and Kalash are not complete and does not holds truth or are sarcastic to sundarsath about these books and try to lead sundarsath away from it Check what Mahamati Prannath has warned for those.

हक तालाने किया फुरमान, डांटत हैं कीने कुफरान ।
अंजीर तौरेत से जो फिरे, सोई काफर हुए खरे ।।३

कुरानके अनुसार खुदाने जो कुछ कहा है अवज्ञााकारी लोग उसे कपट भावसे छिपाते हैं. जो लोग अंजील तथा तौरातसे विमुख होंगे उनको ही विशेष रूपसे अवज्ञााकारी (काफिर) कहा गया है. (इधर परब्रह्म परमात्माके आदेश स्वरूप रास, प्रकाश, कलश आदि ग्रन्थ श्रीप्राणनाथजीके द्वारा अवतरित हुए उनको विहारीजीने कपट भावसे छिपानेका प्रयत्न किया. जो इन ग्रन्थोंसे विमुख होंगे वे ही वास्तवमें नास्तिक कहलाएँगे).
Lord Supreme has sent this message and he is scolding at those who are cynical about Anjir/Toret (Raas, Prakash and Kalash) as Athiest(non-believers). Those who go against these scriptutes are in true sense the non-beleivers.
(Remember there is penalty for non-believing the original truth for me not becoming closer to God itself is severe punishment but some people care less about it for them there is dojhakh!)

काफर दिलमें कीना आने, अंजीर तौरेत पर मारे ताने ।
जो खुदाएका पैगंमर, तिनसे फिरे सो हुए काफर ।।४

ऐसे अवज्ञााकारी लोग हृदयमें कपट भाव रखकर अंजील एवं तौरातके (रास, प्रकाश, कलश ) वचनों पर ताना मारते हैं. परमात्माका सन्देश लेकर आनेवालोंसे जो विमुख होते हैं उनको ही अवज्ञााकारी (काफिर) कहा है.
इस प्रकार हृदयमें कपट भाव होनेके कारण विहारीजी रास, प्रकाश, कलश आदि ग्रन्थोंको देख कर दुःखी हुए और उन्होंने सुन्दरसाथको उन ग्रन्थोंके ज्ञाानसे वञ्चित रखनेका प्रयास किया.

The people who do not have faith in the heart because of their vested interest speak sarcastically about the Angil and toret(Raas, Prakash, Kalash) which are the messages from the Lord but they turn against it and hence they are the infidels.
(Many of Ahuja devotees do this at regular basis!)

जुबां यकीन क्यामत न माने, ऊपर इसलाम के कीना आने ।
उनसे जो हुए मुनकर, सोई गिरो कही काफर।।५

ऐसे लोग मुखसे तो रसूलके प्रति विश्वास करते हैं किन्तु उनके बताए हुए कयामतके सङ्केतोंके प्रकट होने पर विश्वास नहीं करते हैं एवं धर्मके वचनोंके प्रति कपट भाव रखते हैं. जो लोग ऐसे वचनोंसे विमुख होते हैं उनको ही कुरानमें काफिर कहा है.
Every one by the lips say they do believe in the messenger of the Lord (Mahamati Prannath) but in deeds actually they do not, they go against the essence of the religion, such group is called infidel.

मुनकर हुकम और क्यामत, हुए नाहीं नेक बखत ।
फंद माहें हुए गिरफतार, भमर हलाकी पडे कुफार ।।६

जो लोग परमात्माके आदेश एवं कयामतकी घड.ीसे विमुख होते हैं उनके भाग्य कभी नहीं खुले हैं. ऐसे लोग माया-मोहके बन्धनोंमें ही फँसे हुए हैं और भवसागरकी भँवरीमें पड.कर जन्म-मरणरूपी दुःख भोग रहे हैं.
Those who do not believe the command of the Lord and this moment of awakening(Qayamat) it is their misfortune. They will be caught in the noose of the maya and they will end themselves in the world of misery and shall not be out of the cycle of birth and death.
prakaran 10 badakayamatnama

कुरान हकीकत न खुली, ना स्याम रसूल पेहेचान।
ना पावें महंमद गिरोह को, जो सौ साल पढे कुरान।।१८

आज तक कुरानका गूढ.ार्थ स्पष्ट नहीं हुआ. श्याम (कृष्ण) और रसूल स्वरूपकी पहचान भी किसीको नहीं हुई. परमात्मा द्वारा प्रशंसित (मुहम्मद) श्यामाजी तथा उनके समुदायकी पहचान भी किसीको न हो सकी भले ही वे सौ वर्ष तक कुरान पढ.ते रहे.
प्रकरण २ खुलासा
It is amazing even after the Tartam is here and also Kuljamswaroop still I find people who have read it so many times and some started giving talim to others also do not know the reality(hakikat) of holy Quran, Shyam and the Rasool.

सो काफर पडे माहें दोजक, आखर को जो ल्यावें सक ।
जो मोमिन हैं खबरदार, डरते रहें परवरदिगार ।।६

ऐसे अविश्वासी लोग नारकीय यातनाओंको भोगते हैं जो अन्तिम समयमें अवतरित परमात्माके प्रति सन्देह करते हैं. जो ब्रह्मात्माएँ धर्ममें सचेत रहतीं हैं वे परमात्माके प्रति अपना विश्वास कम न हो इस लिए डरती रहतीं हैं.
The infidels will go in dojhak(hell) the ones who doubt the last appearance of Lord. Those who are the celestial souls beware, always have fear of the Lord.
प्रकरण ३ bada Kayamatnama


देखाई राह तौरेत कुरान, कुफर सबोंका दिया भान ।
ल्याया नहीं जो यकीन, सो जल दोजख आए मिने दीन ।।८

उन्होंने तौरात और कुरानका मार्ग प्रशस्त करते हुए कलश और सनन्ध ग्रन्थके द्वारा उपदेश दिया और सभीके हृदयकी भ्रान्तिको मिटा दिया. जिन्होंने उन पर विश्वास नहीं किया वे नरककी अग्निमें जलकर शुद्ध होकर सत्यधर्ममें प्रविष्ट हुए.
प्रकरण २ श्री कयामतनामा (बडा)
Lord has directed the path of living through Toret Kalash and Kuran Sanandh and has given the right consciousness to all. Those who do not believe they will suffer the fire of hell which will purify them and they will gain the truth(true religion= deen)

जो कहे हैं नेकोंकार, पाया छिपा भला दीदार ।
जो फुरमान के बरदार, सोई नेक गिरो सिरदार ।।११

जिन आत्माओंको कुरानमें श्रेष्ठ कार्य करनेवाली कहा है, उनको कयामतके समयमें अवतरित सद्गुरुमें परमात्माके दर्शन प्राप्त हुए हैं. जो उनके आदेशका पालन करती हुइंर् चलतीं र्है उन श्रेष्ठ आत्माओंके समुदायको शिरोमणि कहा है.
Those who are said as the performer of great deeds they got glimpse of Lord who was in the veil(in human form) and those who follow the message of the Lord(furman) shall be called the leader of such great souls.

ए जो कहीं किताबें तीन, तिनपर है हक का यकीन ।
सिफत जमाने पैगंमर, रखना बीच खुदाए का डर ।।१२

जो तीन पुस्तकें (अंजील, तौरात एवं कुरान) ब्रह्मज्ञाान सम्बन्धी कही गईं हैं, उनमें परमात्माके प्रति विश्वास रखनेका उपदेश दिया है. उनमें अन्तिम समयमें आनेवाले पैगम्बरकी प्रशंसा लिखी गई है और यह भी कहा है कि तुम सदैव परमात्माका डर रखते रहना.
These three books (Angil, Torah, holy Quran) are related to the Supreme and contains message for those who have faith in Lord. These books have appreciated the last messenger of Lord (Imam mehdi) and also has warned everyone to always have the fear of Lord.

अंजीर तौरेत और कुरान, इन पर होए आया फुरमान ।
जो हबसे का पातसाह, पाई इन किताबों से राह।।१३

अंजील तौरात और कुरान इन तीनों ग्रन्थोंमें खुदाका सन्देश आया है. कुरानमें जिनको हब्साका बादशाह कहा है वे श्रीप्राणनाथजी हैं. उनके द्वारा अभिव्यक्त रास, कलश एवं सनन्ध आदि धर्मग्रन्थोंसे ब्रह्मात्माओंको परमधामका मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है.
Angil,Tohra and Holy Quran brought the message of the Lord. Holy Quran has said it is the Lord of Habsa that is none other but Shri Prannathji who through Raas(Angil), Torah(Kalash) and Sanandh(Holy Quran) showed the way to Paramdham the Supreme Abode.

इनकी जो करे उमेद, मुराद इसलाम पावेे भेद ।
जो कहे दोस्त साहेब महल, नजीक खुदाए के खासे फैल ।।१४

जो ब्रह्मात्माएँ इन धर्मग्रन्थोंके गूढ. रहस्योंको समझनेकी अभिलाषा रखतीं हैं उनको ही धर्मका गूढ. रहस्य प्राप्त होता है. जिन आत्माओंको परमात्माके मित्र कहा है एवं जिनके हृदयमें परमात्माका सिंहासन है, वे ही परमात्माकी निकटताका अनुभव कर शुभ कार्योंमें प्रवृत्त होतीं हैं.
Only those who desire to understand the deeper meaning only those souls are graced with secrets. Those who are companions of the Master in the supreme abode only those souls will find Lord closer to them through their good deeds.
प्रकरण ३ श्री कयामतनामा (बडा)

Can people do whatever they want, speak ill of Lord, confuse the devotees, ignore the truth and accept that is what is forbidden?
Beware, the hell is meant for those who do not follow the messengers sent by Lord and the last messenger is Swami Prannathji who united all the messages from all the scriptures. Do not be in the impression that nothing gonna happen. Follow the true path.

महंमद की जो उमत भई, दस बिध दोजख तिनकों कही ।
यामे फिरके कहे बहत्तर, तामे एक मोमिन लिए अंदर ।।२५

रसूल मुहम्मदके जितने अनुयायी हुए हैं, उनके लिए भी दस प्रकारकी नारकीय यातनाएँ लिखी गई हैं. इन अनुयायियोंके बहत्तर समुदाय इन यातनाओंको भोगने वाले कहे गए हैं, मात्र एक समुदायको ही परमात्माने अपनी शरणमें लिया.

कौन गिरो जो अंदर लई, और कौन काफर हुए सही ।
वाही सूरत में कही पुल सरात, कौन गिरो चली बिजली की न्यात ।।२६

विचार करो, कौन-से समुदायको परमात्माने अपनी शरणमें रखा और कौन-कौन-से समुदाय अवज्ञााकारी कहलाए ? उसी अमेतसालुन अध्यायमें पुलेसिरातकी चर्चा है. वह कौन-सा समुदाय था जो विजलीकी भाँति तीव्र गतिसे उसको पार कर गया ?

Think it over which group is towards the Lord and which one is the group of infidels. Which group that is mention in the holy book that crossed this world with speed of light?

को निकसी घोडे ज्यों पार, और कौन कटी पुल सरात की धार ।
खास गिरो साहेबें सराही, गिरो दुजी पीछे लगी आई ।।२

कौन-सा समुदाय घोड.ेकी भाँति दौड.कर पार हो गया और कौन-सा समुदाय पुलेसिरातकी तीक्ष्ण धारमें कट गया ? स्वयं परमात्माने ब्रह्मात्माओंके श्रेष्ठ समुदायकी प्रशंसा की है. उनके साथ लग कर दूसरा ईश्वरीसृष्टियोंका समुदाय भी पार उतर आया.

Which one crossed like riding in a horse and which one were cut in the bridge by its blade and fell down. The celestial and the divine souls crossed the world without difficulty.

और सैताने पीछी फिराई, सो सब दोजखको चलाई ।
ऐसे उलमा सबहीं कहें, पर माएना बातून कोई ना लहें ।।२८

जिस समुदायके हृदयमें बैठकर दुष्ट इबलीसने उनकी मतिको विपरीत कर दिया वह (जीवसृष्टियोंका)
समुदाय नरककी ओर धकेला गया. कुरानके विद्वान् (उलमा) कुरान पढ.ते हुए इन प्रसङ्गोंका उल्लेख करते हैं किन्तु इनके गूढ. रहस्योंको ग्रहण ही नहीं करते.

And which one fell into hell because of the Satan residing in their heart. The knowledgeable tell this to all but they do not understand the true meaning themselves.
प्रकरण ५ श्री कयामतनामा (बडा)

न पावंे ऊपर माएने जाहेरी, ए मगजोंसों इसारत करी ।
एक सरूप अवस्था तीन, ज्यों लडका जवान बुढापन कीन ।।४६

बाह्यदृष्टि वाले लोग इन रहस्योंका मर्म नहीं जान पाते हैं. ये तो सङ्केतोंके द्वारा कहे गए हैं. जैसे कुरानमें एक ही स्वरूपकी तीन अवस्थाएँ-बाल्यावस्था, युवावस्था तथा प्रौढावस्था कही गईं हैं.
The people who take the external meaning can never understand the scriptures where the message is given in hints/signs/symbols. One swaroop(mool swaroop) but there are three phases childhood, youth and adulthood is said.

तीन सरूप चढती उतपनी, बढती बढती कही रोसनी ।
खोली राह आखर बागकी, तंग सेंती पोहोंचे बुजरकी ।।४7

इन तीनों स्वरूपोंका ज्ञाानका प्रकाश उत्तरोत्तर बढ.ता हुआ फैलता गया. अन्तिम स्वरूपने अन्तिम समयमें प्रकट होकर परमधामके वन, उपवनोंका मार्ग स्पष्ट कर दिया और वे सामान्य अवस्थासे श्रेष्ठ अवस्थामें पहुँच गए.
And in all three swaroop there is rise in understanding and wisdom, continous increase in enlightening. The last swaroop opened the doors of the eternal garden and this is the greatest understanding.
प्रकरण ८ श्री कयामतनामा (बडा)


बुजरकों धोखा क्यों ए न जाए, तो बखत ऐसा दिया देखाए ।
फितुए इनोंके जावें तब, ऐसा कठिन बखत देखंे जब ।।३४

तथाकथित ज्ञाानियोंका भ्रम किसी भी प्रकार दूर नहीं होता है. इसीलिए कयामतके समयको इस प्रकार कठिनाई पूर्ण कहा गया है. इन लोगोंके मनकी भ्रान्तियाँ तभी दूर होंगी जब वे ऐसी कठिन घड.ीको प्रत्यक्ष देखेंगे.
Those who think oneself very learned and proficient will betray such is the time I can foresee.
The confusion from the mind of the one who consider oneself knowledgeable cannot go away. Very difficult time is seen. The confusion from their mind will be removed when they see the time of difficulty.


ठंडे बजूद होवें वर पाए, तब हकीकत देखे आए ।
सब दुनिायां हुई गुन्हेगार, यों देख्या बखत दोजखकार ।।३५

नरककी अग्निमें जल कर शुद्ध होने पर इनके मनमें शीतलता छा जाएगी तभी वे यथार्थताको समझ पाएँगे. सभी अभिमानी लोग अपराधी बन गए. ऐसे नरकगामी लोगोंने ही इस कठिन समयको देखा.

After facing difficult time or experiencing the hell, these souls will understand the truth and reality. All the worldly people are sinners and at this time these sinners who experience the hell will see the difficult time.

After cooling down from the pride of the existence they will get the master(वर) and then they will see the reality(हकीकत). The world is called sinners can see such time of the hell dwellers.


अब जो सुनो खास उमत, खडे रहो दोजक एक बखत ।
जिन भागो गोसे रहो खडे, देखो दोजकियों खजाने बढे ।।३६

जो श्रेष्ठ आत्माएँ हैं वे अब सुनें, उनको अपने प्रेम और विश्वासमें दृढ. रहना चाहिए. सब अधर्मी लोगोंके लिए नरककी अग्निकी लपटें चारों ओर छा जाएँगी. ऐसे समयमें अपने धैर्य एवं विश्वास पर खड.े रहो. अपने कर्तव्य पथसे विचलित नहीं होना. देखो, नरकगामियोंके लिए यातनाएँ बढ. रहीं हैं.
Those who are celestial souls listen now and be alert at this time. Do not let the love and faith for Lord falter because of the sinners. Be patient and trust the Lord and continue the path of truth and reality. Behold the pains for the sinners in the hell is rising.

भिस्त रजवान मोमिन निगेहवान, दोजख खजाना पोहोंचे कुफरान ।
तहां ताहीं बखत पोहोंचे सबन, पैदरपें जले अगिन ।।३7

जिन जीवोंके ऊपर ब्रह्मात्माओंकी कृपा होती है उनको सबसे उच्च बहिश्त प्राप्त होगी. जो लोग अवज्ञााकारी होंगे उन्हें नरककी यातनाएँ प्राप्त होंगी. वे लोग जब तक परमात्मा पर विश्वास नहीं लाएँगे तब तक नरककी अग्निमें बार-बार जलते रहेंगे.
Those who do not understand and belief that is truth and reality they will suffer.


गुजरे हैं हदसों काफर, दूर दराज जानी थी आखर ।
दुख लंबे हुए तिन कारन, यों मता पाया दोजखीयों हाल इन ।।३८

ऐसे अवज्ञााकारी लोग पापकी सीमाएँ पार कर चुके हैं. उनको कयामतकी घड.ी दूर लग रही थी. इसीलिए उनके दुःख दीर्घ काल तक चलते रहे. इस प्रकार अवज्ञााकारी लोगोंने नरककी अनेक सम्पदाएँ (यातनाएँ) प्राप्त कीं हैं.

Those who think the day of judgement is far away and do not have faith that it does exist, their suffering will continue for very long time, because of their belief they attain such state.
प्रकरण २२ श्री कयामतनामा (बडा)


किनको नफा न देवे कोए, तब कोई न किसीके दाखिल होेेए ।
कूवत तिन समें कहूंए जाए, तो कोई नफा किसी को न सके पोहोंचाए ।।7

न्यायकी इस घड.ीमें कोई भी किसीको लाभ नहीं पहुँचा पाएगा एवं कोई भी किसीके दुःख सुखमें सहयोगी नहीं हो पाएगा. उस समय किसीका भी चातुर्य अथवा अहङ्कार कहींका कहीं उड. जाएगा. इसलिए कोई भी किसीको लाभ नहीं पहुँचा सकेगा (सबको अपने ही शुभाशुभ कर्मोंका यथायोग्य फल प्राप्त होगा).
At the time of judgement no one can recommend anyone or help one another, the cunningness cannot work either, each and everyone will reap what they have sowed.


हुकम हादिका साहेब फुरमान, करे सिफायत खुदा मोमिनों पेहेचान ।
मोमिन यकीनदारोंको चाहंे, हकमें भी उन ही को मिलाए ।।८

सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजीके आदेशसे इमाम महदी श्रीप्राणनाथजी सभीको यहाँ सन्देश दे रहे हैं और ब्रह्मात्माओंको परमात्माकी पहचान करवा कर उनकी अनुशंसा (सिफारिश) कर रहे हैं. परब्रह्म परमात्मा (उनके प्रति) विश्वास करने वाली ब्रह्मात्माओंसे प्रेम करते हैं और उनको ही दिव्य परमधामकी अपनी लीलाओंमें सम्मिलित करते हैं.
Our master Prannathji is giving us the command of Hadi(Devchandraji maharaj) who reminded and recommened the celestial souls of our Supreme Lord. The firm faith is expected from these souls.
Lord loves those who has firm belief in Him and He only unites with them.
प्रकरण २३
श्री कयामतनामा ग्रन्थ (बडा)

how to awaken the jeev
जो जाणो जीवने जगवुं रे आहीं, तो तां जो जो ते रास प्रकास जी ।
एम कहेजो जीवने आ कह्युं सरव तुंने, त्यारे जीवने थासे अजवास जी ।। ४२
एणे अजवाले जहेर उतरसे, त्यारे जीव ते करसे जोर जी।
पर आतमने आतम जोसे, त्यारे टलसे ते तिमर घोर जी।।४३
एणी पेरे तमे जीव जगवसो, त्यारे थासे ते जोत प्रकास जी ।
प्रेमतणां पूर प्रघल आवसे, थासे अंधकारनो नास जी।।४४
कोमल चित करी वचन रुदे धरी, जो जो ते सरव संभारी जी ।
खरा जीवने वचन कह्या छे, माया जीवने थासे अति भारी जी।।४५
माया जीव आहीं टकी न सके रे, तेणे नहीं लेवाय ए वचन जी ।
ए वचन घणुंए लागसे मीठां, पण रहेवा न दे खोटानुं मन जी ।।४६
ब्रह्मांड मांहेलो जीव जे होय रे, ते तां जाजो पोतानी वाट जी ।
बेहद जीव जे होय रे अमारो, आ वचन कह्यां ते माटे जी ।।४
वासनाने तां जीव न कहेवाय, घणुंए दुख मुने लागे जी।
खोटानी संगते खोटुं कहुं छुं, पण सुं करुं मान केमे जागे जी ।।४८
कठण वचन हुं तो ज कहुं छुं, नहीं तो केम कहुं वासनाने जीव जी ।
रखे दुख देखे वासना ते माटे, ए प्रगट वाणी में कही जी ।।४९
प्रकास वाणी तमे जो जो जोपे करी, रखे मूको ते एक वचन जी ।
द्रढ थई तमे देजो जीवने, लेजो ते मांहेलुं धन जी।।५०
ए धननो ते लेजो अरथ, त्यारे प्रगट थासे प्रकास जी।
एणे अजवाले जीव जागसे, त्यारे वृथा न जाय एक स्वास जी।।५१
प्रगट वाणी प्रकासी कही छे, इन्द्रावती चरणे लागी जी।
ते लाभ लेसे बंने ठामनो, जेहनो जीव आहीं जागे जी।।५२
प्रकरण ३०
श्री प्रकाश ग्रन्थ (गुजराती)

Are the heart of the dream existence and the celestial soul different? What Mahamati has to say about it?

ख्वाब वजूद दिल मोमिन, हकें कह्या अरस सोए।
अरस तन मोमिन दिलसे, ए केहेने को हैं दोए।।२४

ब्रह्म आत्माओंके स्वप्नके शरीरके हृदयको श्रीराजजीने अपना परमधाम कहा है. वस्तुतः उनकी पर-आत्मा तथा इस स्वप्नके शरीरका हृदय कहने मात्रके लिए दो हैं, मूलतः एक ही हैं.

The dream existence of heart of the celestial souls Momin, Lord has said is the Paramdham(Arash), the heart of celestial soul in Paramdham(Arash) and that of the dream are called two but originally they are one!

मोमिन असल तन अरस में, और दिल ख्वाब देखत।
असल तन इन दिलसे, एक जरा न तफावत।।२५

ब्रह्मात्माओंका मूल तन (पर-आत्मा) परमधाममें है और उसीका हृदय यह स्वप्न देख रहा है. इसीलिए मूल तन एवं स्वप्नके तनके हृदयमें लेशमात्र भी अन्तर नहीं है.

The celestial souls(Momin brahmshristi) real self is in Arash and they are watching this dream. The original self and the heart of this soul are not even slightly different. They are one.
Commentary:
(
The gopis were soul conscious and they were playing with their beloved Lord Shri Krishna of Arash who resided within their heart and what was within they saw without!
Thus when one becomes soul conscious one can realize beloved Lord residing within the heart and the veil between the soul and super soul are lifted.
Please ponder over this chaupai and understand that the Lord resides in the heart of the celestial souls along with his abode(Arash) and forget all kinds of confusion, conflict of ego body consciousness.)
Singaar

One must be out of confusion of body-mind-soul(jeev, aatma, paratma and paramatma) I found two people have brought this confusion probably they never understood anything.

Mihiraj is name by parents to a person who has a consciousness and is a living being. You cannot call him body. Body with no consciousness is nothing and is called dead. But Mihiraj is a living human being.
First the body has a brain and mind which operates taking input from senses, the jeeva powers this body yet stays unknown about itself. On top of jeeva is the aatma which is astral form(surta) of Paratma witnessing the world drama.
Hence Mihiraj is the person who is a living human being powered by jeeva and witnessing it is aatma of Indrawati(paratma)who is sitting under the feet of Aksharateet Shri Krishna Paramatma.
Now understand what jaagani means?

साधो या जुगकी ए बुध।
दुनियां मोह मदकी छाकी, चली जात बेसुध।।

हे साधुजन ! इस युगकी बुद्धि ही ऐसी तुच्छ हो गई है कि लोग मोह (स्वार्थ) और मद (अभिमान) में मस्त होकर बेसुध बने हुए चले जाते हैं.
O Seekers. Behold the mind of this era. The world is intoxicated by the attachment , pride (me,myself,mine) they are going towards unconsciousness.
kirantan
The Body conscious person is the one who assumes oneself as the body although the power to animate the body 'chetan shakti' is of jeev. In Body consciousness, the person derives the input from external senses and all the actions are to fulfil the pleasures of the senses. The body and mind also keeps changing and reacting to the external world. There is constant fear of death, sense of lacking due to competition and thus stress and anxiety and the senses continue to create physical and materialistic desires. Having not having both creates greed, lust, anger, frustation, attachments and make the living miserable. Hence body consciousness is called disorder Vikar.

कोई आप न चीनहीं, ना चीन्हे हक वतन।
ना चीन्हे तिन जिमीय को, ऊपर खडा है जिन।।

यहाँ पर न कोई स्वयंको पहचानता है और न ही श्री राजजी तथा परमधामकी पहचान कर सकता है. यहाँके लोगोंको इतनी भी पहचान नहीं है कि जिस पर वे खड.े हैं वह भूमिका अस्तित्व क्या है.
In this world the beings neither know themselves nor they know the Lord and the supreme abode. Also they do not know the world on which they exist.

एक वजूद होए बैठियां, खेलें ऐसी दई भुलाए।
कौल फैल हाल सब जुदे, दिल ऐसे दिए फिराए।।

ब्रह्मात्माएँ एक तन होकर बैठीं थीं परन्तु इस मिथ्या खेलमें आते ही वे भूल गइंर्. इस खेलने उनका हृदय ऐसा उलटा दिया कि उनके मन, वचन एवं कर्म सब अलग ही हो गए.
The celestial souls have come to this play(the world of dream) and have totally forgotten their original selves. The play has turned their speech, thoughts, deeds and their state of living(unconscious) all different. There heart also is focused towards the world and not toward themselves (soul) and the Master within.

नींद निगोडी ना उडी, जो गई जीवको खाए।
रात दिन अगनी जले, तब जाए नींद उडाए।।

यह दुष्ट (निगोडी) नींद टलती नहीं है. यह तो जीव (पूरे जीवन) को ही निगल गई है (पूरा जीवन इसी नींदमें व्यर्थ व्यतीत हो रहा है). जब रात-दिन विरहकी अग्नि जलेगी, तभी यह नींद उड. जाएगी.
This unconsciousness does not perish but eats up the whole life.
When one suffers day and night then this unconsciousness is lifted.

When a person says one thing, thinks another and acts all together separately. Disorientation of words, thoughts and action is seen that person is not awakened.
The person draws input from senses, the mind reacts to it and that person acts as per the situation. Eg. a person says he is devotee of Mahamati Prannath and says follows Vani, but in mind there is some other person he is following and in action goes against the vani. Hence vani chaupai praman does not work to such person. The intelligence of such a person is called Mudhmati or nich mati.
This happens when a person is not awakened.
When a persons words, thoughts and action are in harmony, this person is awakened. When one awakens the intelligence of the jeeva (badi mat) starts working and understanding itself. It takes control of the body and its senses and guides the mind. The senses no more trouble the person.Without tartam awakened jeeva can go till sunya niraakar from where it originated.

धिक धिक परो मेरे सब अंगों, जो न आए धनीके काम ।
बिना पेहेचाने डारे उलटे, ना पाए धनी श्री धाम।।१०

मेरे सभी अंगोंको धिक्कार है जो धनीजीके काम कभी नहीं आए. पहचाने बिना ही प्रतिकूल मार्ग पर चलनेसे धामधनीको पानेसे वे वञ्चित रह गए.
श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)
Damn all these senses and this body which loved the world and could not accept Shyam(Shri Krishna) our Lord. Damn this body which is not useful to our Master in anyway. Without recognising Him one cannot ever attain Him.
(When a person is body conscious, one is driven by the body senses which also affects one's mind and this is a kind of disorder which prevents the person to focus on higher goals that is to realize the beloved Lord. The senses of body conscious person work against the purpose of the soul as the envy,anger,greed,pride etcs. reside in their heart and they are forever miserable. Those who are suffering from this disorder unfortunately have darkness in their heart and also one cannot experience the supreme by these external senses. All the senses must unite, focused and concentrate within and then by surrendering oneself to the Supreme and seeking his divine assistance with complete FAITH and making oneself the intrument of His Will, the person gains control over oneself, achieves divinity and becomes soul conscious and using the intelligence and the senses of the soul one can experience the Supreme or the Divine Love.)
आवेस अंग आपी आधार, दई तारतम उघाडयां बार।
घर थकी वचन लई आवियां, ते तां सुंदरबाईने कह्यां।।
२० प्रकरण ३७ श्री प्रकास ग्रन्थ (गुजराती)
अपने अङ्गस्वरूपा श्री सुन्दरबाईको श्रीराजजीने अपनी आवेश शक्ति दी. तारतम ज्ञाान देकर परमधामके अखण्ड सुखोंका द्वार खोल दिया. वे स्वयं अखण्ड परमधामसे तारतमके वचन लेकर आए और सुन्दरबाईको वे वचन कहे.
The Supreme Lord Shri Krishna is the source of all the consciousness (chetan). The eternal absolute Supreme Brahm of Aksharateet (beyond Akshar) , the epitomy of Love, dwells in the heart of the soul along with splendour of abode of the self is revealed as Shri Krishna to Sundarbai(celestial soul) and Shyama(consort of Shyam Shri Krishna).
Sundarbai received the inspiration of our beloved Lord and revealed her tartam and opened the doors of bliss. He from the original home brought the words and told Sundarbai and later he resided in her heart.

मूल वतन धनिएं बताइया, जित साथ स्यामाजी स्याम ।
पीठ दई इन घर को, खोया अखंड आराम।।२
सनमंध मेरा तासों किया, जाको निज नेहेचल नाम।
अखंड सुख ऐसा दिया, सो मैं छोडया बिसराम।।३

प्रकरण ९९ श्री किरन्तन
धामधनी सद्गुरुने वह मूलघर (परमधाम) बताया, जहाँ श्याम-श्यामाजी तथा सुन्दरसाथ हैं. ऐसे अखण्ड घरको पीठ देकर हमने अखण्ड सुखोंको गँवा दिया.
सद्गुरुने मेरा सम्बन्ध उन अनादि अक्षरातीत श्रीकृष्णजीके साथ जोड. दिया जिनका नाम ही अखण्ड है. उन्होंने तो मुझे ऐसा अखण्ड सुख प्रदान किया, किन्तु मैंने मायावी सुखोंमें रत होकर उन अखण्ड सुखोंको छोड. दिया.
Master said the Original abode is where Shyam Shyama and sundarsath dwell. Giving back to original abode, we lose the everlasting relaxation and comfort. Master tied our relationship with whose name of the Self is eternal (Shri Krishna anadi is name of the self Nijnaam) is everlasting bliss which I lost it being attached to the world.
Shri Krishna is absolute Supreme (PurnBrahm) consciousness He is the granter of paramanand ultimate Bliss which is akhand indivisible, and Sat- Truth that is never changing. He is the soverign ruler of the entire creation(universes) and also rules our heart hence is called Shri Raaj. He is extremely loving and adorable hence called Vallabh. He is our beloved hence Piyu. He is master (groom) of Shyama and He is the truth. He is the one who sustains the Brahmshristis hence Bhartaar!
Aksharateet eternal,indivisible, permanent abode of Shri Krishna is called Paramdham (the ultimate abode) it is beyond the creation and the Creator Akshar hence called Aksharateet, it is situated in the abode of the soul (Nij-dham).
Thus the name of the Self is Shri Krishna from Eternal and beyond imperishable creator Akshar , this is what is now revealed along with the splendour of our original abode. The purnaBrahm (Whole Truth)reveals the name of the Self as Shri Krishna which has neither beginning nor the end and is beyond the creation, creator and is imperishable.
जीवको प्रबोध
सुन मेरे जीव कहूँ बरतांत, तोकों एक देऊं द्रष्टांत।
सो तूं सुनियो एकै चित, तोसों कहत हों करके हित ।।१
हे मेरे जीव ! तू सुन, तुझे मैं एक दृष्टान्त देकर अपना वृत्तान्त कहती हूँ. तू एकचित्त होकर उसे सुन. मैं तुझे स्नेह पूर्वक यह बात कह रही हूँ.
Listen my Jeev(the life source), narrate you an episode and give you the insight, you listen with rapt attention, this I am telling you out of compassion.
परीछतें यों पूछयो प्रस्न, सुकजी मोंको कहो वचन।
चौदे भवनमें बडा जोए, मोंको उत्तर दीजे सोए।।२
राजा परीक्षितने श्री शुकदेवमुनिसे इस प्रकार प्रश्न पूछा, मुनिजी मुझे कहिए कि चौदह लोकोंमें सबसे बड.ा कौन है ?
King Parikshit asked Sukhdev Muni this question, that kindly explain to me O muni this, in all the 14 lokas (planes) who is the greatest and answer my query.
तब सुकजी यों बोले परमान, लीजो वचन उत्तम कर जान ।
चौदे भवनमें बडा सोए, बडी मतका धनी जोए।।३
तब शुकदेवजीने प्रमाण देकर इस प्रकार कहा, मेरे इन वचनोंको तुम अति उत्तम समझकर ग्रहण करो. चौदह लोकोंमें वही व्यक्ति बड.ा है जो महान बुद्धि (मति) का धनी (स्वामी) है.
Then Sukhdev Muni providing the proofs(witness) said, that take my these words as the best of all that in the 14 lokas the greatest is the one who is the owner of the superior intelligence(mat).
भी राजाऐ पूछा यों, बडी मत सो जानिए क्यों ।
बडी मतको कहूं विचार, लीजो राजा सबको सार।।४
राजा परीक्षितने पुनः पूछा, हे मुनिजी ! बड.ी मति (बुद्धि) वालेको कैसे जाना जाए ? तब शुकदेवजीने कहा, हे परीक्षित ! मैं बड.ी मतकी बात विवेकपूर्वक कहता हूँ, तुम उन सब वचनोंका सार ग्रहण करो.
Then the King asked how to know the superior intelligence. O King Parikshit, the superior intelligence I will say thinking deeply over it, O King understand the essence of it.
बडी मत सो कहिए ताए, श्रीकृस्नजीसों प्रेम उपजाए ।
मतकी मत तो ए है सार, और मतको कहूं विचार ।।५
हे राजन ! महान बुद्धि (बड.ी मति) वाला उसे ही कहा जाए जिसके मनमें श्री कृष्णजीके प्रति प्रेम उत्पन्न हो. सबसे बड.ी बुद्धिका सार यही है. अब मैं अन्य बुद्धिकी बात करता हूँ.
The superior intelligence is said the one which sprouts love for Shri Krishna. This is the essence of intelligence of all intelligence and all other intelligences I will narrate you too.
बिना श्रीकृस्नजी जेती मत, सो तूं जानियो सबे कुमत ।
कुमत सो कहिए किनको, सबथें बुरी जानिए तिनको ।।६
श्रीकृष्णजीके बिना जितनी भी मति हैं उन सबको तुम कुमति ही जानो. कुमति उसीको कहना चाहिए जो सबसे बुरी (निन्दित)होती है.
Without Shri Krishna all the intelligence, understand that all are stupidity, the stupidity(कुमत) also that one which is of worst kind.
ऐसो तिनको कहा बरतांत, सो भी राजा तोकों कहूं द्रष्टांत ।
सुन राजा कहूं सो जुगत, जासों पेहेचान होवे दोऊ मत ।।7
श्री शुकदेवजीने राजा परीक्षितको एक वृत्तान्त सुनाते हुए कहा, हे राजा ! मैं तुझे एक और दृष्टान्त देता हूँ. मैं तुझे ऐसी युक्ति कहता हूँ, जिससे दोनों प्रकारकी मतिकी पहचान हो जाए.
Sukhdev Muni said, I will give you one technique, O king, by which you will understand both intelligence(one superior intelligence or negative intelligence =stupidity कुमत).
श्रीकृस्नजीसों प्रेम करे बडी मत, सो पोंहचावे अखंड घर जित ।
ताए आडो न आवे भवसागर, सो अखंड सुख पावे निज घर ।।८
श्रीकृष्णजीसे प्रेम करने वाली बुद्धि बड.ीमति (महामति) है. वह जीवको अखण्ड घरमें पहुँचा देती है. उसकी राहमें भवसागर बाधा नहीं बनता. नित्य ही वह अपने घरका अखण्ड सुख प्राप्त करती है.
The beings with higher intelligence will love Shri Krishna which will take them to the eternal home, there the world (ocean of emotions) will not obstruct, and they will get the bliss of eternal home of the self.
Nij means the self Nijghar means the home of the self it is also called Nijdham or Paramdham. The one with higher intelligence can love Shri Krishna, which will take one to eternal imperishable abode, the ocean of world (ignorance) will not obstruct and that will attain the eternal, everlasting bliss of the abode of the Nij. Remember the name of the Nij (the soul the self) is Shri Krishna which is eternal and from Aksharateet! This is the revelation of tartam gyaan Do not waste even a single breath and accept the enlightening of the beloved of Nijghar (abode of the self), accept it this with your nature and the senses you will not get this opportunity again.These words must eliminate all the confusion, greater intelligence those who accept shall become praiseworthy. End this confusion and recognise the beloved better! My soul is very wise, has given the path of Aksharateet says Mahamati! Do not take this as a mere poem!
ए सुख या मुख कह्यो न जाए, याको अनभवी जाने ताए ।
ए कुमत कहिए तिनसे कहा होए, अंधकूपमें पडिया सोए ।।९
इन सुखोंका वर्णन इस मुखसे नहीं हो सकता. अनुभवी व्यक्ति ही इस सुखको जान सकते हैं, जिसे कुमति कहा गया है उसके वशीभूत होनेसे क्या होता है ? ऐसी बुद्धि वाला अन्धकूप (नामक नरक) में पड. जाता है.
This bliss one cannot describe with this tongue, only those who have experienced it can understand and those who are stupid(कुमत) they will end in the Andh koop named hell.
सब दुखोंमें बुरा ए दुख, कुमत करे धनीसों बेमुख ।
केतो कहूं या दुख को विस्तार, जाके उलटे अंग इंद्री विकार ।। १०
सब दुःखोंसे बुरा दुःख यही है कि कुमति परमात्मासे विमुख कर देती है. इस दुःखका मैं विस्तारसे कितना वर्णन करूँ ? इसके कारण सभी गुण अंग इन्द्रियाँ उलटी होकर विकारी हो जातीं हैं.
Out of all the sufferings, this is the worst one, the stupidity(कुमत) makes them go against the supreme. What can I say about the sufferings of this, their senses go against the soul and thus will be a vikaar(disorder)!
The person with disorder forever looks for sense gratification which is momentary (does not last long) and hence never satisfied this creates dissatisfaction which further creates frustration which is followed by anger, anger creates forgetfulness, confusion in mind, which creates lack of consciousness(does not what one is saying or doing) and thus further destruction which leads to misery and sufferings!
दोऊ मतको कह्यो प्रकार, ए ब्रह्मसृष्टि करें विचार ।
जाको जाग्रत है बडी बुध, चेते अवसर जाके हिरदे सुध ।।११
मैंने दोनों प्रकारकी मतिका विवेचन कर दिया है. ब्रह्मसृष्टि उन पर विचार करेंगी. जिसमें बड.ी बुद्धि (महामति) जागृत हो जाएगी वह हृदयमें सुधि प्राप्तिकर इस सुअवसरमें सचेत हो जाएगी.
The two kind of intelligence(बडी मत superior intelligence and stupidity कुमत ), I have described, brahmshristi(celestial souls of Paramdham) must think over it those whose greater mind(connected with the cosmic intelligence) is awakened and their heart is purified, they will consciously grasp this opportunity. Only the brahmshristi will understand the distinction between the superior intelligence (understanding) and the stupidity!
This is a request by Indrawati(celestial souls of Paramdham) who is sitting before Lord Supreme to those celestial souls who are still wondering in the world to pay attention to these two differences in the intelligence.
The beloved Lord she is talking about is Shri Krishna of nijghar(Paramdham).
ए सुकजीके कहे वचन, नीके फिकर कर देखो मन ।
बोहोत फिकरकी नहीं ए बात, ए समया हाथ ताली दिए जात ।।१२
शुकदेवमुनिके कहे हुए ये वचन हैं. इनको भली-भाँति विचार कर आत्मसात् करो. इस पर अत्यधिक सोचनेकी भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि समय तो हाथ ताली देकर (थोड.ा-थोड.ा कर) बीतता जा रहा है.
These are the words of Sukhdev muni, kindly keep in mind very consciously. One must not worry too much over this matter as every moment is killed like clapping of hands.
One need not worry too much too and look for further more information and lose this precious opportunity.
तेरी गिनती बांधी स्वांसों स्वांस, तिनको भी नाहीं विस्वास ।
केते रहे बाकी तेरे स्वांस, एक स्वांसकी भी नाहीं आस ।।१३
तेरी आयुकी गिनती श्वासोंसे बँधी हुई है. इन श्वासोंका भी भरोसा नहीं है. अब तेरे श्वास कितने बचे हैं ? जबकि अगले एक श्वासकी भी आशा नहीं है.
Remember you are accounted to the fixed number of breath and till now you do not have faith. How many more is left do you have any idea? And one has no hope for the one more breath. No one knows whether one can breath one more again any moment of time.
स्वांस तो छिनमें कै आवे जाए, गए अवसर पीछे कछू न बसाए ।
तिन कारन सुन रे जीव सही, बडी मत मैं तोकों कही ।।१४
श्वास तो एक क्षणमें कितनी ही बार आते जाते हैं परन्तु अवसर बीत जाने पर किसीका वश नहीं चलता. इसलिए हे जीव ! तू सुन, मैंने तुझे बड.ी बुद्धि (वाला) कहा है.
In one moment you breathe so many times but the moment that you spent can never come back. One cannot have any control over the past moments. That is why listen O jeev(soul which is yet to be awakened!) I have told you about the superior intelligence.
जो जोगवाई है तेरे हाथ, सो या मुखथें कही न जात ।
एते दिन तें ना करी पेहेचान, तैसी करी ज्यों करे अजान ।।१५
तेरे हाथमें मानव जीवनरूप साधन है, उनका महत्त्व इस मुखसे कहा नहीं जाता. इतने दिनों तक तूने नहीं पहचाना. तूने ऐसा आचरण किया जैसे कोई अनजान व्यक्ति करता हो.
You have a very precious opportunity (जोगवाई the human birth where one has intelligence to understand the Supreme) in your hand which cannot be described by this mouth. All these days you did not understand and recognize it and behave like a simpleton.
अब ए वचन विचारो मन, साख दई सुकजीके वचन ।
भी वचन कहूं सुन मेरे जीउ, जिन छोडे चरन छिन पीउ ।।१६
अब तू इन वचनों पर मनसे विचार कर. मैंने तुझे शुकदेवजीके वचनोंकी साक्षी दी है. हे मेरे जीव ! तू सुन, तुझे मैं और भी वचन कह रही हूँ. एक क्षणके लिए भी धामधनीके चरणोंको छोड.ना नहीं.
Now these words contemplate in your mind, I have given the witness of Sukhdev Muni’s words. O listen my Jeev(soul), I will add one more that never let go the feet of our beloved(Shri Krishna)!
निजघर पीउको लीजे प्रकास, ज्यों बृथा न जाए एक स्वांस ।
ग्रह गुन इन्द्री भर तूं पाओ, ऐसा फेर न पाइए दाओ ।।१7
परमधाम और धामधनीका प्रकाश धारण करो ताकि एक श्वास भी व्यर्थ न जाए. अपने गुण, अंग, इन्द्रियोंको वशीभूत करके आगे कदम बढ.ाओ. इस प्रकारका अवसर (दाव) पुनः हाथ नहीं आएगा.
Accept the illumination of the beloved of the abode of the self(निजघर) and let not one single breath go in vain. Then you will control the nature(gun),senses(indriya), you will not get this opportunity again.
भरम भानके कहे वचन, बडी मत ले ज्यों होए धन धन ।
ए भरमकी नींद उडाएके दे, पेहेचान पीउकी नीके कर ले ।।१८
भ्रमका निवारण करके मैंने तुझे ये वचन कहे हैं. बड.ी मतको ग्रहण कर धन्य बन जा. इस भ्रमकी निद्राको उड.ा दे और भली-भाँति परमात्माकी पहचान कर ले.
Ending all the confusion I have said these words to you. One who accepts the superior intelligence will be very fortunate and praiseworthy. By rising out of this unconsciousness, awakening out of the slumber, recognize the beloved Lord well.
Indrawati is again suggesting us to know our beloved Lord again in this prakaran.
मुखथे वचन कहे तो कहा, जो छेदके अजूं ना निकस्या ।
अगलोंने किव करी अनेक, तें भी कछुक करी विसेक ।।१९
मुखसे वचन कहने मात्रसे क्या होगा जब तक वे हृदयको बेधकर न निकल जाएँ. पूर्वके लोगोंने भी अनेक कविताएँ लिखीं हैं. यदि तूने भी इसीमें कुछ विशेषता (विशिष्ट काव्य रचना) की तो यह कौन-सी बड.ी बात हो गई?
The words I spoke goes in vain if cannot pierce the heart. The many ahead have composed many poems and if you compose one too, then how does it matter?
(The words of Indrawati must pierce the heart making one to surrender to Lord completely and not just sing songs out of it.)
पर सांचा तो जो होए गलतान, तो भले मुख निकसी ए बान ।
ए बानी मेरी नाहीं यों, और किव करत हैं ज्यों।।२०
परन्तु सत्य तो यह है कि इन वचनोंको सुनकर यदि जीव द्रवित हो जाए तब मेरे मुखसे विनिसृत यह वाणी सार्थक मानी जाएगी. यह मेरी वाणी ऐसी (बुद्धिकी उपज) नहीं है जैसा कि अन्य लोग काव्योंकी रचना करते हैं.
The true words if it can melt you, then my saying will be called effective (or better it came forth my mouth). Do not consider my words as a poem composed from the mind like other poets do!
Indrawati the celestial soul is giving us the understanding of reality!
ए गुसा किया मेरे जीवके सिर, ना तो और किवकी भांत कहूं क्यों कर ।
आतम मेरी है अति सुजान, अक्षरातीत निध करी पेहेचान ।।२१
इस प्रकारके रोषपूर्ण वचन मेरे जीवके लिए कहे गए हैं, अन्यथा अन्य कवियों (उपदेशकों) की भाँति मैं क्यों कहती ? मेरी आत्मा तो अति विज्ञा है. उसने अक्षरातीत निधि (धामधनी) को पहचान लिया है.
Scolding the head of the jeev (the life force) Indrawati says, these words are why would I compose like other poets? My soul is very intelligent and knowledgeable, who has recognized her Lord of Aksharateet! The soul is extremely wise but the jeev needs to be brought in track(jeev does not know the Supreme but the soul is experiencing as the jeev hence it is necessary to awaken the jeev and make it understand the truth. )
Indrawati who has recognized the Lord of Aksharateet.
The whole prakaran is giving us the introduction to the Lord of Indrawati, the superior intelligence, Shri Krishna, Nijghar, Aksharateet Lord giving us the proofs from scripture Bhagavat.
अब सांचा तो जो करे रोसन, जोत पहोंची जाए चौदे भवन ।
ऐ समया तो ऐसा मिल्या आए, चौदे भवनमें जोत न समाए ।।२२
सच्चा ज्ञाान वही है जो आत्माको प्रकाशित कर दे और उस ज्ञाानकी ज्योति चौदह लोकोंमें पहुँच जाए. यह समय तो ऐसा प्राप्त हुआ है कि चौदह लोकोंमें इस (तारतम) ज्ञाानकी ज्योति समाती नहीं है.
The true knowledge is that which will illumine the soul and the light of this illumination will spread in all the 14 lokas. This moment you have got which is so bright, that the light cannot be contained in all the 14 lokas. It is by the knowledge and understanding one can awaken the jeev and thus the soul and finally experience the Supreme. This knowledge and understanding will illumine whole 14 lokas!
यों हम ना करें तो और कौन करे, धनी हमारे कारन दूजा देह धरे ।
आतम मेरी निजधामकी सत, सो क्यों ना कर उजाला अत ।।२३
यदि हम ऐसा (इस तारतम ज्ञाानको फैलानेका) कार्य नहीं करेंगे तो अन्य कौन करेगा ? सद्गुरु धनीने हमारे लिए ही दूसरी बार शरीर धारण किया है. यदि मेरी आत्मा सचमुच परमधामकी है तो वह इस संसारमें परमधामके ज्ञाानका प्रकाश क्यों नहीं फैलाएगी ?
Illuminating the universe with light of supreme knowledge, if I do not do then who else will do. Out of compassion our beloved Lord has taken the human form twice. My soul is truth of abode of the self(निजधामकी सत), then why will it not illuminate the universe extremely.
This reference धनी हमारे कारन दूजा देह धरे
Means Lord first came in Shyama-Sundarbai and then again He united with Indravati.
श्री सुन्दरबाईके चरन प्रताप, प्रगट कियो मैं अपनों आप ।
मोंसों गुनवंती बाइएं किए गुन, साथें भी किए अति घन ।।२४
सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी (सुन्दरबाई) के चरणोंके प्रतापसे मैंने स्वयंको प्रकट किया है. मुझ पर श्रीगोवर्धन ठाकुर (गुणवन्तीबाई) ने बडे. उपकार किए हैं और सुन्दरसाथने भी मुझ पर बड.ा अनुग्रह किया है.
By the mercy of Sundarbai(celestial soul of Paramdham who resided in Devachandraji Maharaj), I could manifest myself(Indrawati). Gunvanti bai(a celestial soul residing in Govardhan Thakkar, Meheraj’s elder brother) have obliged me a lot and all other sundarsath also were extremely graceful towards me.
जोत करूं धनीकी दया, ए अंदर आएके कहया।
उडाए दियो सबको अंधेर, काढयो सबको उलटो फेर ।।२५
अब मैं धनीकी दयाको प्रकाशित करती हूँ. उन्होंने मेरे हृदयमें बैठकर ये वचन कहे हैं. उन्होंने इन वचनोंके द्वारा सबके अज्ञाानरूपी अन्धकारको दूर किया और संसारके समस्त जीवोंके जन्म-मरणके उलटे चक्रको समाप्त कर दिया.
The compassion of our beloved Lord let me throw light upon it, it is He who residing in me, has spoken these words. All the darkness of ignorance is eliminated. Salvaged all the beings from birth and death into eternity! (The world is a place of suffering, misery, always longing for happiness which never lasts, going through birth and death exactly opposite to the bliss, everlasting happiness and eternity.)
इन्द्रावती प्रगट भई पीउ पास, एक भई करे प्रकास ।
अखंड धाम धनी उजास, जाग जागनी खेले रास।।२६
इन्द्रावती पिया (सद्गुरु) के साथ प्रकट हुई है. वह उनसे एकाकार होकर इन वचनोंको प्रकाशित कर रही है. धामधनीके ज्ञाानके अखण्ड प्रकाशसे जागृत होकर जागनी रास खेल रही है.
Indrawati (celestial soul of Paramdham) is revealed and became near to beloved and united with the beloved is bringing this light (illuminating). Awakening in the light of the eternal Lord of the abode is playing the raas (one which is full of nectar of bliss) of awakening!
Indrawati united with the Aksharateet Lord is requesting all the brahmshriti to understand these words for which she has given the proof from the scriptures too and recognize the supreme Lord.
Those who fail to understand and follow their stupidity will end in the hell where the suffering is indescribable.
प्रकरण २१ prakash hindustani

Now, with tartam the awakened jeeva understands the purpose of the creation and Creator and Supreme Brahm and surrenders itself to aatma, the aatma when no more becomes the witnesser of the jeev's action and focuses on itself. And remembers its origin.

घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३

हमारा घर अखण्ड परमधाम तथा हमारे धनी श्रीकृष्ण यही तारतमका सार फल है. इस तारतम ज्ञाान द्वारा अत्यन्त प्रकाश फैलता है. जिससे मनमें किसी भी प्रकारकी शंका नहीं रहती है.
Our abode is Paramdham(akhand aksharateet) and Shree Krishna, this the fruit of Tartam sagar(dispeller of the ignorance brought by Shree Devachandraji). The light of this will be so great that all the confusion from mind will be removed.

पेहेलें भाई दोऊ अवतरे, एक स्याम दूजा हलधर।
स्याम सरूप है ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर।।२7

श्रीमद्बागवतके अनुसार व्रज मण्डलमें दो भाई अवतरित हुए. उनमें एक श्याम श्रीकृष्ण हैं और दूसरा हलधर बलभद्र हैं. उन दोनोंमें से श्याम ब्रह्मके स्वरूप हैं जिन्होंने रासलीला रचाई.
Shri Krishna - Shyam = Brahm! The Supreme being, the Master of the soul.
Two brothers took avtaar one is Shyam and another Haldhar. Shyam Shri Krishna is the appearance of the Supreme(Brahm) who out of sport(leela) played raas.
श्री खुलासा
This activates the aatma which remembers the entire Paramdham and Shri Rajji Shri Krishna, this awakens the Paratma and its moolbudhi starts working which is called Nijbudhi.
बुद्धि सु अक्षर ब्रह्म की जगी रास मधि सोई । ध्यान कार्यो ब्रज्रासको बहुबिध चेतन होई ।।
जाग्रत बुद्धि को तातें प्रयो जू नाम । श्यामा ताको संग ले प्रगटी नौतन ठाम ।।

(वृत्तान्त मु. ३४ )
The intelligence of Akshar was awakened at Raas. If you meditate on Braj and Raas you will become conscious. Shyama using this awakened mind appeared in Nautan place.
Akshar then provides the cosmic consciousness noor budhi so to understand the creation and also attracts the gyaan from moolbudhi to itself. Thus we see the creation/destruction laws of creation and Akshar sees the leela of Paramdham.

मेरी संगते ऐसी सुधरी, बुध बडी हुई अक्षर।
तारतमें सब सुध परी, लीला अंदर की घर।।१०३

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अक्षरब्रह्मकी बुद्धि मेरा सान्निध्य प्राप्त कर कुछ इस प्रकार प्रखर हुई (सुधरी) और महान बुद्धि (महामति) कहलाई. इस प्रकार तारतम ज्ञाानके द्वारा अक्षरब्रह्मको अखण्ड परमधामके अन्दर सम्पन्न हो रही लीलाकी जानकारी प्राप्त हुई.
Akshar's mind (intelligence) improved after receiving the Tartam wisdom (the sport of Lord and the celestial souls in Paramdham) and thus became greater intelligence.

बुध तारतम लेयके, पसरसी वैराट के अंग।
अक्षर हिरदें या विध, अधिक चढसी रंग।।१०५

अक्षरकी बुद्धि तारतम ज्ञाानको लेकर वैराटके प्राणियोंमें विस्तृत होगी अर्थात् संसारमें तारतम वाणीका प्रचार होगा. इस प्रकार अक्षर ब्रह्मके हृदयमें प्रेमका रङ्ग अधिक चढ.ेगा.
The intelligence of Akshar now loaded with tartam gyaan (knowledge of Paramdham) shall spread in entire cosmos, when entire cosmos is awakened and Lord revealed to all beings, the ectasy will rise in the heart of Akshar.
प्रकरण २३ kalash hindustani


मोमिन असल तन अरस में, और दिल ख्वाब देखत।
असल तन इन दिलसे, एक जरा न तफावत।।२५

ब्रह्मात्माओंका मूल तन (पर-आत्मा) परमधाममें है और उसीका हृदय यह स्वप्न देख रहा है. इसीलिए मूल तन एवं स्वप्नके तनके हृदयमें लेशमात्र भी अन्तर नहीं है.

The celestial souls(Momin brahmshristi) real self is in Arash and they are watching this dream. The original self and the heart of this soul are not even slightly different. They are one.

Awakened Paratma can see the Supreme and experience the unity consciousness (In Paramdham there is ek dili hence what is in the heart of Supreme is known to all), thus paratma and Paramatma unite.

अरस नाहीं सुमारमें, सो हक ल्याए माहें दिल मोमन।
बेसुमार ल्याए सुमार में, माहें आवने दिल रूहन।।५7/1 Sagar

परमधामकी कोई सीमा ही नहीं है. ऐसे परमधामको धामधनीने ब्रह्मात्माओंके हृदयमें अङ्कित कर दिया है. स्वयं ब्रह्मात्माओंके हृदयमें विराजमान होनेके लिए ही धामधनीने इस असीम परमधामको उनके हृदयमें अङ्कित कर दिया है.

This experience of unlimited is tasted in limited being thus besumar lyaaye sumar mein.

काटे विकार सब असुरों के, उडायो हिरदे को अंधेर ।
काढयो अहंकार मूल मोह मन को, भांन्यो सो उलटो फेर ।।२

बुद्धजीने आसुरीवृत्तिवालोंके हृदयके सब विकार (अज्ञाानान्धकार) दूर कर दिए. उनके मनमें स्थित अहङ्कार और स्वार्थको हटाकर, उनकी विपरीत प्रवृत्तियोंको सत्य मार्गकी ओर मोड. दिया.
Now with the help of tartam knowledge, Mahamati has has cut all the devilish vikaars and also has eliminated the darkness in the heart. Has removed the ego consciousness that originated from the attachment in the mind and also has directed the mind in the justopposite of it i.e towards purity in thoughts, words,actions and truth).
What is Ahankaar or ego that Mahamati removed?
Ego is attaching oneself with body thinking one is body is first ego which is called body consciousness. Such a person will hence pay attention to senses and respond to external world. The person will be categorised as male, female, caste, creed, financial status, qualifications, jobs etcs. and thus will be part of conflicts and divisions.
The soul consciousness is oneness with all soul, there is one consciousness that is Krishna Consciousness and nothing else.

होत नूर थें दूजा बोलते, दूजा नूर बिना कछू नाहिं ।
एक वाहेदत नूर है, सब हक नूर के माहिं ।।३०

परमधाममें प्रकाशके अतिरिक्त यदि कुछ होता तो उसके विषयमें कुछ कहा जा सकता. किन्तु वहाँ इसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, मात्र प्रकाशका ही अद्वैत स्वरूप है. इस प्रकार परमधामकी यावत् सामग्री श्रीराजजीके प्रकाशसे ओत-प्रोत हैं.

In Paramdham there is nothing other than Supreme(Brahm)’s light. The unity consciousness is the light and everything including the Supreme is one with it. The consciousness of the Supreme envelops everything in Paramdham and there is nothing else.

नूर कहे महामत रूहें, देखो नजरों नूर इलम ।
वाहेदत आप नूर होए के, पकडो नूर जमाल कदम ।।

महामति कहते हैं, हे ब्रह्मात्माओ ! धामधनीके प्रकाशस्वरूप इस तारतम ज्ञाानको देखो एवं स्वयं भी तेजोमय अद्वैत स्वरूपमें जागृत होकर धामधनीके चरण कमलोंको हृदयमें धारण करो.

Mahamati (Greater Intelligence) say O souls, See the sight by the divine light of wisdom (tartamgyaan) and awakening in the unity consciousness thus becoming the light yourself, hold tightly the feet of Aksharateet Lord (Noor Jamal).
३१ प्रकरण ३५ Shri parikrama


भई सोभा संसारमें, अति बडी खूबी अपार।
दुनियां उठाई पाक कर, ना जरा रह्या विकार।।२१

हे धनी ! आपके दिए हुए इस तारतम ज्ञाानके प्रभावसे संसारमें मेरी शोभा हुई. इसके कारण चारों ओर आपके नामकी अपार महिमा फैल गई. इस अखण्ड ज्ञाानके प्रभावसे संसारके जीवोंको भी र्नििवकार (पाक) बनाकर ऊँचा उठाया अर्थात् मुक्तिस्थलों (बहिश्तों) में स्थान दिलाया. अब उनमें अज्ञाानताका विकार लेशमात्र भी नहीं रहा.
The world has become splendorous with really great wonder of the beyond; the world raised, purified and eradicated all the ignorance (vikaar). What Mahamati means here is the mind of Akshar(cosmic mind) is now filled with knowledge of Brahm and His eternal leelas of divine love, this mind permeates all the mind of the creation, thus all the vikaar(disorders) are eliminated and the world is purified.

लिखी अनेकों बुजरकियां, पैगंमरों के नाम।
ए मुकरर सब महंमदपें, सो महंमद कह्या जो स्याम।।३7

कतेब ग्रन्थोंमें अनेक प्रकारसे पैगम्बरोंकी प्रशंसा की गई है. वस्तुतः वह सारी शोभा मुहम्दकी है. वे मुहम्मद श्रीकृष्णजीके ही स्वरूप कहे गए हैं.

Union of Mohamad came in Isa(Devachandraji) then Shyam(residing in the heart of Dhani Devachandraji) became Ahmad. Now, this Ahmad united with Imam Mehadi and thus became Imam.
So here also we have UNION!
महंमद आया ईसे मिने, तब अहंमद हुआ स्याम।
अहंमद मिल्या मेहेदी मिने, ए तीन मिल हुए इमाम।।२१

कुरानके अनुसार रसूल मुहम्मदमें विद्यमान ब्राह्मीशक्ति जब ईसा रूहअल्लाह श्री देवचन्द्रजीमें प्रविष्ट होती है तब वे अहमद स्वरूप कहलाते हैं. जब ये अहमद स्वरूप महदीमें प्रविष्ट होते हैं तब ये तीनों स्वरूप एक होकर इमाम कहलाते हैं.
प्रकरण १५ श्री खुलासा
When Devachandraji united with the Shyam residing in Mahamad and became Ahmad, when Ahmad united with Mehadi and thus became Imam. This is how Mahamati Prannathji has become Imam Mehadi.

Union of soul with Supreme! Samagam means Union

इन्द्रावतीसुं अतंत रंगे, स्याम समागम थयो।
साथ भेलो जगववा, इन्द्रावतीने में कह्यो।।१३५

इन्द्रावतीकी अन्तरात्मामें धामधनीका समागम हो गया है. सद्गुरु कहते थे कि समस्त ब्रह्मसृष्टिको एकसाथ जागृत करनेके लिए मैंने इन्द्रावतीसे कहा है अर्थात् जागनीका उत्तरदायित्व इन्द्रावतीको सौंपा है.
प्रकरण १२ श्री कलस (गुजराती)
Lord Shyam has united with Indrawati and to asked her to awaken other sundarsath. Indrawati is bhramvasana residing in Meharaj Thakkar. Brahmvasana unites with with Lord Shyam of Paramdham. This is the last chaupai of Shri Kalash Gujrati Granth.

मैं आग देऊं तिन सुख को, जो आडी करे जाते धाम ।
मैं पिंड न देखूं ब्रह्मांड, मेरे हिरदें बसे स्यामा स्याम ।।१०

परमधाम जाते हुए जो सुख मुझे बाधा डालते हैं, मैं उन सुखोंको प्रियतमके विरहकी आगमें जला देता हूँ. अब मुझे इस झूठे शरीर या झूठे ब्रह्माण्डकी ओर नहीं देखना है, क्योंकि मेरे हृदयमें तो अब श्यामा-श्याम ही बस गए हैं.
I will burn those pleasure/happiness which obstructs my path to the supreme abode(paramdham). This false body and the false universe I have no interest to see because in my heart resides ShyamShyam!

Brahmshriti and Brahm are one! Awakening means becoming conscious that we are soul and we one with the Supreme. In body consciousness we are separate entity but in soul consciousness we all are one.

ब्रह्म इसक एक संग, सो तो बसत वतन अभंग ।
ब्रह्म सृष्टि ब्रह्म एक अंग, ए सदा आनंद अति रंग ।।२

ब्रह्म और प्रेम दोनों एक साथ हैं तथा दोनों अखण्ड परमधाममें रहते हैं. ब्रह्मसृष्टि और परब्रह्म भी अङ्ग-अङ्गीभावसे रहते हैं तथा सदा आनन्दके रङ्गमें रङ्गे हुए हैं.
The Supreme Brahm and the love are together, which reside in the original abode which are indestructible(whole, imperishable, indivisible), soul of brahm and the Suprem Brahm are one soul, here there is eternal bliss of extreme colours (everlasting bliss but with freshness, novelty, variety and intensity).
श्री परिक्रमा

Now there is union of all consciousness and when Mahamati Prannath speaks its spoken in harmony with Indrawati's nijbudhi, Akshar's noor budhi, Shyama aatma (Indrawati is part of Shyama badi rooh, roohallah) and Shyama is part of Shyam the Supreme Brahm. There is complete harmony from body organs, senses, body mind, jeeva intelligence, aatma-paratma and paramatma. This is called awakening and enlightening. There is ONENess.
All this is given in Prakash grantha which deals with enlightening!
Remember the key is complete understanding and harmony with all body-mind-soul-super soul and God.
Tartamsagar is awakened vani all that is spoken from complete harmony of all beings. There is no conflict there is no confusion there is no desire too but complete understanding!
साहेब के हुकमें ए वानी, गावत है महामत।
निज बुध नूर जोस को दरसन, सबमें ए पसरत।।८
धामधनीकी आज्ञाासे महामति यह वाणी गा रहे हैं. निजबुद्धि, जागृत बुद्धिका ज्ञाान, तारतम ज्ञानका तेज एवं धामधनीके आवेश (जोश) का साक्षात्कार कर यह वाणी सबके हृदयोंमें प्रकाश फैला रही है.
At the command of the Master, Mahamat(The greater intelligence) is singing the above verses. The intelligence of the awakened self (nijbudhi), Enlightening (Noor), the inspiration of the Lord (witnessing the Lord within) will spread in all hearts.
प्रकरण ५९
shri kirantan
इत भेलें रूह नूर बुध, और आग्या दया परकास।
पूरूं आस अक्षर की, मेरा सुख देखाए साख्यात।।३२
मेरे हृदयमें श्री श्यामाजीकी आत्मा, तारतम (नूर), अक्षरकी जागृत बुद्धि (बुध), श्री राजजीकी आज्ञाा और कृपाका पूर्ण प्रकाश है. अब मैं इन सबके द्वारा मेरे घरका सुख दिखाकर परमधामकी लीला देखनेकी अक्षरब्रह्मकी इच्छाको पूर्ण कर दूँ.
All the five are UNITED in the soul of Indrawati!
Here unites in my soul(Shyama),light of Supreme knowledge(tartam gyaan), the cosmic mind of Akshar, will/command of the Lord, the grace and enlightening(realisation of the self). I will fulfill the desire of Akshar by showing the bliss of the real abode and supreme.
इत भी उजाला अखंड, पर किरना न इत पकराए।
ए नूर सब एक होए चल्या, आगूं अक्षरातीत समाए।।३३
तारतम ज्ञाानके अखण्ड प्रकाशसे यह संसार भी प्रकाशित हुआ है किन्तु इस दिव्य ज्ञाानकी किरणें यहाँ समा नहीं रहीं हैं. उपर्युक्त बुद्धि, आज्ञाा, दया सबके सब एक साथ अपना प्रकाश फैलाते हुए अक्षरातीत धाममें जाकर समा जाते हैं.
By the light of the supreme wisdom of indivisible true abode there is enlightening but one cannot contain the rays. These enlightening (all five described ahead)bound together enter into the heart of Aksharateet Paramdham.
ए नूर आगे थें आइया, अक्षर ठौर के पार।
ए सब जाहेर कर चल्या, आया निज दरबार।।३४
अक्षरसे परे अक्षरातीतके धामसे ही तारतमका प्रकाश इस संसारमें आया है. सम्पूर्ण क्षर ब्रह्माण्ड, अक्षरधाम और परमधाम इन सभी भूमिकाओंको प्रकट कर यह फिर अपने स्थान परमधाममें ही समा जाएगा.
This enlightening has come from beyond, beyond the abode of Akshar. All these are revealed and now we are at the palace of the self(where Indrawati resides).
वतन देख्या इत थें, सो केते कहूं परकार।
नूर अखंड ऐसा हुआ, जाको वार न काहूं पार।।३५
ब्रह्मात्माओंने इस तारतम ज्ञाानके प्रतापसे संसारमें रहते हुए भी परमधामके दर्शन किए, इसका विवरण कहाँ तक दूँ ? ज्ञाानका ऐसा अखण्ड प्रकाश फैला जिसका कोई पारावार ही नहीं है.
Living in this world, I saw my abode, how can I describe how it is!
The imperishable enlightening is such there is neither I can describe this side nor the other side (unbound and unlimited at all end)
किए विलास अंकूर थें, घर के अनेक परकार।
पिया सुंदरबाई अंग में, आए कियो विस्तार।।३६
परमधामके सम्बन्धी होनेके कारण हम ब्रह्मात्माओंने इस जगतमें रहते हुए भी परमधामके अनेक प्रकारके अखण्ड सुखोंमें विलास किया. सुन्दरबाई (सद्गुरु) के स्वरूपमें स्वयं प्रियतम परमात्माने मेरे हृदयमें विराजमान होकर धाम लीलाका विस्तार किया.
Due to relationship, we enjoyed in many ways the unlimited(abundance) sport of original home. Beloved Lord came in the soul of Sundarbai and spread the revelations.

ए बीज बचन दो एक, पिया बोए किओ परकास।
अंकूर ऐसा उठिया, सब किए हांस विलास।।३7

सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजी महाराजने मेरे हृदयमें तारतम ज्ञाानके बीज वचन बोकर ही यह प्रकाश किया है. उसका ऐसा अङ्कुर फूटा (तारतम वाणी प्रकट हुई) कि इसके द्वारा सभीने परमधामके अपार सुखोंका अनुभव किया.
By the word of seeds, beloved Lord sowed and enlightened. The seed sprouted so well (tartam vani) all are able to enjoy the union with the beloved.
The revelations which Lord spread through Sundarbai, the same knowledge is planted as seed in Indrawati which sprouts for us tartamsagar so we all can unite and sport with our beloved Lord.
प्रकरण २४ श्री कलश ग्रन्थ (हिन्दुस्तानी)

कृपानिध सुंदरवर स्याम, भले भले सुंदरवर स्याम।
उपज्यो सुख संसार में, आए धनी श्री धाम।।१
श्री श्यामाजीके वर श्याम-श्रीराजजी कृपाके सागर तथा अत्यन्त सुन्दर हैं. ऐसे धामके धनीके प्रकट होने पर संसारमें अखण्ड सुखका उदय हुआ.

Absolute Supreme Brahm appeared in all Brahmshriti and leader(Shyama) so Ishwari and Jeev can also see Him.
प्रगटे पूरन ब्रह्म सकल में, ब्रह्म सृष्टि सिरदार।
ईस्वरी सृष्टि और जीव की, सब आए करो दीदार।।२

ब्रह्मसृष्टियोंकी शिरोमणि श्यामाजी पूर्णब्रह्मका आवेश लेकर इस संसारमें सद्गुरुके रूपमें पधारी हैं. ईश्वरीसृष्टि एवं जीवसृष्टि सभी आकर उनके दर्शन करें.

बैठते उठते चलते, सुपन सोवत जागृत।
खाते पीते खेलते, सुख लीजे सब विध इत।।१६

इसलिए बैठते, उठते, चलते, फिरते, खाते, पीते, हँसते-खेलते, स्वप्नमें तथा जागृतिमें भी तुम यहाँ पर परमधामके उन सुखोंका अनुभव करती रहो.
Thus while sitting, standing, walking, in dreams while sleeping or when being awake! While eating, drinking, playing, experience the bliss of Paramdham while being over here.
एह बल जब तुम किया, तब अलबत बल सुख धाम ।
अरस परस जब यों हुआ, तब सुख देवें स्यामा स्याम ।।१7

इसके लिए यदि तुमने साहस किया तो तुम्हें निश्चय ही परमधामके अखण्ड सुखोंका अनुभव होने लगेगा. इस प्रकार जब आत्मा और पर-आत्मामें सुखोंका आदान-प्रदान होगा तब श्यामश्यामाजी तुम्हें अखण्ड सुखका अनुभव करवाएँगे.
You have been courageous that you determined to experience the bliss of Paramdham. Once you have soaked in the love completely, Shyama and Shyam will shower you with eternal bliss.
प्रकरण ४ parikrama
So we must remember the bliss of Paramdham, Shyam-Shri Krishna, Shyama, sundarsath, the oneness and thus sprout the love in the heart, be soul conscious, eliminate the ego-body consciousness and unite with our super soul.
The love in the heart of the soul, beloved residing in the heart one though physically here experiences the bliss of Paramdham.

What about name of Lord, importance of His name and How to contemplate His name?

खेल देखाऊं इन भांत का, जित झूठैमें आराम।
झूठे झूठा पूजहीं, हक का न जानेें नाम।।२२

श्रीठकुरानीजी रूहअल्ला, महंमद श्रीकृस्नजी स्याम।
सखियां रूहें दरगाह की, सुरत अक्षर फिरस्ते नाम।।५३

सब मिल साख ऐसी दई, जो मेरी आतम को घर धाम ।
सनमंध मेरा सब साथसों, मेरो धनी सुन्दर वर स्याम ।।

इन खसम के नाम पर, कै कोट बेर वारों तन।
टूक टूक कर डार हूं, कर मनसा वाचा करमन।। 7

ऐसे धामधनीके नाम पर मैं मन, वचन और कर्मसे अपने शरीरको करोड.ों बार टुकड.े-टुकड.े कर सर्मिपत कर दूँ.
प्रकरण ९१ kirantan

इन्द्रावतीसुं अतंत रंगे, स्याम समागम थयो।
साथ भेलो जगववा, इन्द्रावतीने में कह्यो।।१३५

यों चाहिए मोमिन को, रूह उडे सुनते हक नाम।
बेसक अरस से होए के, क्यों खाए पिए करे आराम।।१३९

नाम लेत इन सरूप को, सुपन देह उड जाए।
जोलों रूह ना इसक, तोलों केहेत बनाए।।११५

दुनी नाम सुनत नरक छूटत, इनोंपें तो असल नाम।
दिल भी हकें अरस कह्या, याकी साहेदी अल्ला कलाम।।८४

ए आतम को नेहेचे भयो, संसे दियो सब छोड।
पर आतम मेरी धाम में, तो कही सनमंध संग जोड।।१२

सखी जोइए आपण वनमां, एम रे थैयो तमे कांय।
जेनुं नाम श्री क्रस्नजी, ते बेठा छे आपण मांय।।२३

इत खेलत स्याम गोपियां, ए जो किया अरस रूहों विलास।
है ना कोई दूसरा, जो खेले मेहेबूब बिना रास।।१३

Shri Krishna - Shyam = Brahma!

पेहेलें भाई दोऊ अवतरे, एक स्याम दूजा हलधर।
स्याम सरूप है ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर।।२7

Mohamad = Shyam swaroop
लिखी अनेकों बुजरकियां, पैगंमरों के नाम।
ए मुकरर सब महंमदपें, सो महंमद कह्या जो स्याम।।३7

बडी मत सो कहिए ताए, श्रीकृस्नजीसों प्रेम उपजाए ।
मतकी मत तो ए है सार, और मतको कहूं विचार ।।५

बिना श्रीकृस्नजी जेती मत, सो तूं जानियो सबे कुमत ।
कुमत सो कहिए किनको, सबथें बुरी जानिए तिनको ।।६

मोटी मत वल्लभ धणी करे, ते भवसागर खिण मांहें तरे।
तेहने आडो न आवे संसार, ते नेहेचल सुख पामे करार।।८

मोटी मत ते कहिए एम, जेहना जीवने वल्लभ श्रीक्रस्न।
मतनी मत तां ए छे सार, वली बीजी मतनो कहुं विचार।।५

एह विना जे बीजी मत, ते तुं सर्वे जाणे कुमत।
कुमत ते केही कहेवाय, निछाराथी नीची थाय।।६

अक्षरातीत श्रीकृष्णमें प्रेम रखने वाली बुद्धिके अतिरिक्त जितनी भी अन्य मायावी बुद्धियाँ हैं उन्हें तुम कुबुद्धि समझना. कुबुद्धि उसे कहा जाता है जो सर्वाधिक नीच और हलके विचार वाली हो.
प्रकरण २१ श्री प्रकाश ((गुजराती))

नाम मेरा सुनते, और सुनत अपना वतन।
सुनते मिलावा रूहों का, याद आवे असल तन।।४९


पर न आवे तोले एकने, मुख श्रीक्रस्न कहंत।
प्रसिध प्रगट पाधरी, किवता किव करंत।।१

महामति कहते हैं, अपने मुखसे एक बार भी श्रीकृष्ण नामका उच्चारण करनेसे अथवा उनके यशोगान करनेसे जो लाभ प्राप्त होता है, उसकी तुलना अन्य किसी भी साधना, साधन एवं अमूल्य पदार्थोंसे नहीं की जा सकती. अनेक कवियोंने तथा सन्त-मनीषियोंने भी इस सत्यताका प्रमाण दिया है.

कोट करो नरमेध, अस्वमेध अनंत।
अनेक धरम धरा विषे, तीरथ वास वसंत।।२

यद्यपि करोड.ों नरमेध यज्ञा अथवा अनन्त अश्वमेध यज्ञा किए जाएँ, इस संसारमें प्रचलित अनेक धर्मोंका अनुपालन भी किया जाए तथा तीर्थ धामोंमें जाकर कल्पवास भी किया जाए तथापि श्रीकृष्ण नामके उच्चारणके साथ इनकी तुलना नहीं की जा सकती.

सिध करो साधना, विप्र मुख वेद वदंत।
सकल क्रियासुं धरम पालतां, दया करो जीव जंत।।३

चाहे जितनी साधना करके सिद्धियाँ प्राप्त की जाएँ, कुलीन ब्राह्मण बनकर वेदोंको कण्ठस्थ करके उनका पाठ किया जाए, सब प्रकारकी उपासना करके सर्वधर्म पालन किया जाए, प्राणी मात्र पर दया भाव रखा जाए परन्तु श्रीकृष्ण नाम स्मरणकी तुलनामें ये सब टिक नहीं सकते.

व्रत करो विध विधनां, सती थाओ सीलवंत।
वेष धरो साध संतना, गनानी गनान कथंत।।४

चाहे अनेक प्रकारके व्रत करो या पतिव्रता धर्मका पालन कर शीलवती सती बनो, साधु, महात्मा बनकर अनेक प्रकारके वेश धारण करो, पण्डित, वैरागी अथवा ज्ञाानी बनकर विभिन्न प्रकारसे ज्ञाान चर्चा करो, तथापि यह सब श्रीकृष्णनामके उच्चारणके समान नहीं हो सकता.

तपसी बहुविध देह दमो, सरवा अंग दुख सहंत।
पर तोले न आवे एकने, मुख श्रीक्रस्न कहंत।।५

चाहे तपस्वी बनकर विविध प्रकारकी साधनाओं द्वारा शरीर (इन्द्रियों) का दमन करो, शरीरके सभी अङ्गोंके द्वारा अनेक प्रकारके दुःख सहन करो, तो भी ये सब उपक्रम श्रीकृष्ण नामस्मरणके समान नहीं हैं.

मेहेराज कहे मुख ए धन, जो वली रुदे रमंत।
चौदे भवन ते जीतियो, धन धन ए कुलवंत।।६

मेहराज (महामति) कहते हैं, जो लोग मुखसे श्रीकृष्ण नामका उच्चारण करते हैं, वे तो भाग्यवान हैं ही किन्तु जिनके हृदयमें श्रीकृष्णजी सदैव रमण करते हों, ऐसे भक्तोंने तो चौदह लोकों पर विजय प्राप्त कर ली है और उनका सारा कुल (वंश) ही धन्य-धन्य हो गया है.

प्रकरण १२७ श्री किरन्तन

हवे रास तणो सार तमने कहुं, ते तां आपणुं तारतम थयुं ।
तारतम सार आ छे निरधार, जिहां वसे छे आपणां आधार।।२२

घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३

मन जीवने पूछे रही, त्यारे जीव फल देखाडे सही ।
ए अजवालुं कीधुं प्रकास, तारतमनां वचन मांहें रास।।२४

महंमद आया ईसे मिने, तब अहंमद हुआ स्याम।
अहंमद मिल्या मेहेदी मिने, ए तीन मिल हुए इमाम।।२१

सिर बदले जो पाइए, महंमद दीन इसलाम।
और क्या चाहिए रूहन को, जो मिले आखर गिरोह स्याम।।२५ Khulasa

सब साहेदी दै जो हदीसों, और अल्ला कलाम ।
सो साहेदी ले पीछा रहे, तिन सिर रसूल न स्याम ।।77 chhota kayamatnama


एक खुदा हक महंमद, हर जातें पूजें धर नाऊं।
सो दुनियां में या बिना, कोई नहीं कित काहूं।।२०

रसूल मुहम्मदने कहा कि एक ही पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं किन्तु विभिन्न जाति तथा सम्प्रदाय वाले उनको भिन्न-भिन्न नामसे पूजते हैं. वस्तुतः एक परमात्माके अतिरिक्त इस संसारमें अन्य कोई कहीं भी नहीं है.
There is one Supreme God (Khuda) but different sects worship keeping different name but in this world without Him there is nothing else.


सब जातें नाम जुदे धरे, और सबका खावंद एक।
सबको बंदगी याही की, पीछे लडे बिन पाए विवेक।।२२

सभी जातिके लोग एक ही परमात्माको भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारते हैं परन्तु परमात्मा (स्वामी) तो सबका एक ही है. वस्तुतः पूजा भी सभीको इन्हींकी करनी है परन्तु विवेकके अभावसे सभी परस्पर कलह करते हैं.

Different sects(race, caste,region) name Him by different name, but there is only one Master of all. All are worshiping only Him but they are fighting because they have no intelligence to understand.


सो पेहेचान क्यों कर सके, जो पकडे पुल सरात।
छोडे ना वजूद नासूती, जान बूझके कटात।।५१

जो लोग कर्मकाण्डको ही धर्ममार्ग समझकर उसीका अनुसरण करते हैं एवं मिथ्या देहाभिमान (नासूती वजूद) को छोड. नहीं सकते. वे ब्रह्मात्माएँ तथा परब्रह्म परमात्माको कैसे पहचान सकेंगे ? इसलिए वे जानबूझकर तलवारके धार (पूलेसिरात) से कटकर नरकगामी होते हैं.

How can one understand the reality who hold the body consciousness. They cannot let go the ego of physical existence (these people call themselves in worldly body, worldly relationship, status,sex, caste and creed) and (They will not believe Mahamati's wisdom ), they will knowingly accept to walk in the blade of sword!

प्रकरण २ khulasa
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कहे कुरान इन जिमीसे, तरफ न पाई अरस हक।
ए तेहेकीक किन ना किया, कै ढूंढ थके बुजरक।।२२

कुरान स्पष्ट कहता है कि संसारके जीवोंको पूर्णब्रह्म परमात्मा तथा अखण्ड परमधामका मार्ग नहीं मिला. यहाँ पर कई ज्ञाानीजन ढूढ.ते हुए थक गए किन्तु वे इस विषयमें निश्चय नहीं कर पाए.

Holy Quran makes it clear that the creatures of this world could not find the direction of Supreme God of Arash (Paramdham). Nobody could get definite answer while many knowledgeable people got tired after long searching.

जो बची गिरोह कोहतूर तले, और तोफान किस्ती पर।
बेर तीसरी लैलत कदरमें, जिन रोज कयामत करी फजर।।२३
सोई गिरोह इसलाम की, खेल लैल देखा दो बेर।
तीसरी बेर फजर की, जाके इलमें टाली अंधेर।।२४

आत्माओंके जिस समुदायको इन्द्रकोपके समय व्रजमें गोवर्धन पर्वतके नीचे रखकर बचाया गया एवं जिनको योगमायाकी नौका पर बैठाकर वृन्दावनमें पहुँचाया गया तथा जिन्होंने महिमामयी ब्रह्मरात्रि (लैलतुलकद्र) के तृतीय चरणमें (जागनीलीलाके समय) संसारमें आकर तारतम ज्ञाानके द्वारा अज्ञाानरूपी अन्धकारको मिटाकर आत्म-जागृतिका प्रकाश फैलाया. सत्य (धर्म) मार्ग पर चलनेवाले यही समुदाय ब्रह्मात्माओंका है. इन्होंने ही महिमामयी ब्रह्मरात्रि (लैलतुलकद्र) के प्रथम और द्वितीय चरणमें व्रज और रासकी लीलाओंका अनुभव किया है और इस तीसरे चरण आत्म-जागृति (जागनीलीला) के प्रभातमें भी इन्होंने ही तारतम ज्ञाानके द्वारा अज्ञाानरूपी अन्धकारको मिटाया है.

The group of souls saved under the Kohtoor mountain and again later saved the same group in boat from the storm, the third time in Lailat Kadar night (the time of awakening) brought the kayamat(waking the soul up from the body) and brought the morning of enlightenment. It is the same group of true spiritual path who saw game twice first and third in the morning of enlightenment and by the wisdom eliminated the darkness.

सिर बदले जो पाइए, महंमद दीन इसलाम।
और क्या चाहिए रूहन को, जो मिले आखर गिरोह स्याम।।२५

अपना सिर देने पर भी यदि सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी द्वारा र्नििदष्ट सत्य (धर्म) मार्ग एवं अपने धामधनी श्याम (श्रीकृष्ण) प्राप्त हो जाएँ तो इन आत्माओंको और क्या चाहिए ?

Giving your head, if one gets the true spiritual path suggested by Mahmad, what the souls need more when it meets Shyam Shri Krishna! The supreme souls that played in Braj and Raas, they need nothing more than uniting with Shyam Shri Krishna in the end!


ए जो पैदा जुलमत से, सो कुंन केहेते उपजे।
मगज मुसाफ न पावत, लेत माएने ऊपर के।।२६

मायाके अन्धकार (निराकार) से उत्पन्न संसारके जीव परमात्माके द्वारा हो जा (कुन) कहनेसे उत्पन्न हुए हैं. इसलिए कुरानका गूढ. रहस्य न समझकर वे मात्र बाह्य अर्थ ही ग्रहण करते हैं.

But beings from the formless and nothingness are created just by saying 'kun' hence they do not have intelligence to understand the mysticism and they take the external meaning. They will not understand the deeper meaning of the holy Quran and they will not accept the truth but formless and nothingness instead!


कौल हमारे नूर पार के, सो क्यों समझें जुलमत के।
कुंन केहेते पैदा हुए, ला मकान के जे।।२7

अक्षरसे भी परे अक्षरातीतके हमारे वचनों (तारतम ज्ञाान) को ये अज्ञाानी जीव कैसे समझ पाते ? ये तो मात्र हो जा (कुन) कहनेसे उत्पन्न हुए शून्य-निराकारके जीव हैं.
Our promise that was made beyond Akshar how these confused being ever understand. They are created by Kun (be it) from nothingness and formless.


लैलत कदरमें रूहें फिरस्ते, जो अरससे उतरे।
कौल किया हकें जिनसों, सो नूर बानी से समझेंगे।।२८

इस महिमामयी ब्रह्मरात्रिमें ब्रह्मात्माएँ एवं ईश्वरीयसृष्टि क्रमशः परमधाम एवं अक्षरधामसे अवतरित हुइंर् हैं. जिन ब्रह्मात्माओंको परब्रह्म परमात्माने अपना वचन दिया है. वे ही तारतमज्ञाानसे समझ सकेंगे.
In the Brahmic night (lailat kadar) when supreme souls and divine soulsl come from the Arash(Paramdham), they have given a promise to Master, they will understand the tartam(enlightening) vani.

प्रकरण ३ khulasa
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सब साहेदी दै जो हदीसों, और अल्ला कलाम ।
सो साहेदी ले पीछा रहे, तिन सिर रसूल न स्याम ।।77

जब कुरान, हदीस आदि कतेब ग्रन्थ तथा परब्रह्म परमात्माके वचन तारतम ज्ञाानने साक्षी दे दी है तो इस साक्षीको लेकर भी जो आत्माएँ स्वयं सर्मिपत होनेमें पीछे रहेंगी उन्हें सद्गुरु तथा परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णका संरक्षण प्राप्त नहीं होगा.


जान बूझके भूलिए, इलम पाए बेसक।
देखो दिल बिचार के, क्यों राजी करोगे हक ।।१०३

सन्देह निवारक तारतम ज्ञाान प्राप्त करने पर भी जान-बूझ कर क्यों भूल रहे हो ? अपने हृदय पर विचार करके देखो, ऐसे आचरणसे तुम अपने प्रियतम परमात्माको कैसे प्रसन्न कर पाओगे ?

You have received the Tartam wisdom which contains no confusion, there is no place of doubts and knowingly you forgo and do not follow. Think deeply from your heart, how are you going to convince the Master?


जीवते मारिए आपको, यों सबद पुकारत हक ।
जो जीवते न मरेंगे मोमिन, तो क्या मरेंगे मुनाफक ।।१०४

प्रियतम धनीने ऐसे वचन कहे हैं कि तुम जीवित रहते ही अपने अहङ्कारको नष्ट कर दो. यदि ब्रह्मात्माएँ शरीरके जीवित रहते ही अहङ्कारको नष्ट नहीं कर पाएँगी तो क्या अन्धविश्वासी जीव ऐसा कर पाएँगे ?
The words of our Supreme is such will end all the ego consciousness(knowing yourself as son/daughter, caste, sex, status, career, priest or related to so and so are ego consciousness, understanding that one is soul is true living) and bring the living of within (while livin will bring death unto you). If the celestial soul (Brahmshristi, Momin) do not die while living, then do the non-believers die?

1 prakaran chhota kayamatnama

Thank you for your post. I was thinking yesterday about being called Pandit, Maharaj etcs. These naming does not go well with our spiritual understanding where 'satguru tum deepak bhaye kiyo jo aap saman'! The endeavor of gurus must be afte...r getting enlightenment of the self enlighten others and thus eliminate all the differences! The consciousness that our physical being originated from one Aadi narayan who desired to multiply from one being, thus entire creation is related physically and consciousness of all living comes from Akshar who is truth (sat) embody of the Supreme but chaitan (chit) is Shri Krishna and aanand is Shyama. Supreme, Akshar and Shyama all are not three but part of the same Supreme as the consciousness is one. There is only one consciousness. The physical being is not conscious about itself. It does not know about the living within and assumes itself as the body this is ignorance. Once this ignorance is removed by understanding and knowledge and one starts experiences the consciousness within, it is called waking up.
To become pranami first. Pranam means obeisance to Shri Krishna with complete surrendering of the self and thus understanding the consciousness of the self is Shri Krishna. There is no individuality now, you are part of the consciousness Shri Krishna which is imperishable and is without begining and end, eternal. This was not known before and is revealed now. Shyama(Devchandraji)'s master is Truth (He is real) and bestower of eternal bliss and we accept this Tartam mantra.
Mind by nature follows the senses and responses to external stimulations. It is always busy remembering the past or worrying about future or reacting to senses. If one is not aware, the whole span of living goes away.
Now, mantra is a technique to quieten the mind that what you see is not real and make it pay attention to this wisdom which is real. Hence it is said 'swas swas nijnaam japo britha swas mat khoye' . Paying attention to your every breath and reminding the self about the reality is the key to awakening. Hence repeatition of mantra must be done sincerely and with complete awareness of the being in its doing. You are not taking for granted a single breath of your living. You are paying attention to yourself and your action. Breathing is connected to the jeeva the life force, the moment you stop breathing you are dead, the life force is out of the body and body becomes organic decay. Hence uniting the mantra with the breathing is a technique to awaken the self.
Once you are awakened, the jeeva's organs start working. With tartam it understands that it originated from formlessness and nothingness and surrenders itself to aatma the witnesser within.
The aatma who was witnessing the world now is witnessed by jeeva. This makes aatma to witness the self Nij. This activates its organs. Now aatma can see paratma and who is sitting at Paramdham. This awakens the paratma.
As you study from kg to masters level having the understanding of lower level classes does not interfere the higher knowledge, similarly
the higher consciousness rules and thus Paramdham is experienced being in this world 'itahee baithe jaage dham, sarva manorath puran kaam' Sitting in this world, you will awaken in Paramdham and all the desires will be fulfilled (desires to see the world with awakened mind of the self)

The new kaalmaya universe is continuation of the previous universe. Hence the same Ved Vyas and same Kansa, same Nand baba and Yashoda but the gopis do not have the same witnessing aatma but from Akshardham(ved richa) and Shri Krishna witnessing aatma is of Akshar same as before but the Supreme Krishna of Paramdham is not sporting. But we can never totally eliminate Supreme Shri Krishna as he is the consciousness powering all (Akshar, Shyama, Brahmatma,whole of pachis paksha). Thus there is nothing except Supreme Brahm.
Remember universe is a mental projection of Akshar and the consciousness to animate the beings comes from consciousness of Paramdham (This is why whole of beings will be eternalised in Akshar's antaskaran, Satguru and Mahamati gave us this revelations but soon science will also acquire this information as it is granted in cosmic mind for all beings.This is what is said in Kuljamswaroop.)
How braj raas sport called eternal and akhand!
The experience of the soul is always eternal as there is no past/furture but always present also even the mind of Supreme, Akshar, Shyama and Brahmatma are conscious (full of chaitanya), anything in their heart and mind is eternal and full of consciousness. If you check the scriptures, yogmaya whole universe was of consciousness, air,water, rocks, trees, animals everything is conscious and thus this conscious experiences is always part of the soul and supreme.
Ved Vyas has mentioned in Bhagavat about Braj of previous universe and little bit of Raas of Yogmaya universe which was interupted by Parikshit. This is akhand leela as it is experienced by the soul and witnessed by the awakened mind of Akshar the creator of the universe.He has continued to narrate the Raas of Vrindavan and later Krishna leela and Vishnu Krishna leela, and Mahabharat as well
Devachandraji's bhagavat listening time, I do not have any idea but it was done daily for 14 years, it went on over and over.
Prem pranam

This braj leela is eternal(akhand) and goes on day and night(continuous) we are playing with our Lord.
The पूरे पीउजी (the absolute(whole) beloved) is fulfilling our wishes!
ए सदा नवले रंग In color of novelty (there is always freshness) and which is eternal (the Brahmic bliss is eternal and everlasting)!

akhand leela ahenish ham khele piya ke sang
pure piyuji manorath, e sada navle rang!

अखंड लीला अहेनिस, हम खेलें पिया के संग।
पूरे पीउजी मनोरथ, ए सदा नवले रंग।।४४

हम सब सखियाँ रात-दिन श्री कृष्णजीके साथ अखण्ड लीला करतीं हैं. प्रियतम श्री कृष्णजी सदैव नई नई रंग द्वारा हमारे मनोरथ पूर्ण करते हैं.

श्रीराज व्रज आए पीछे, व्रज वधू मथुरा ना गई।
कुमारका संग खेल करते, दान लीला यों भई।।४५

श्री राजजी (श्री कृष्णजी) जबसे व्रजमें आए, तबसे व्रजवधु (गोपिकाएँ) दूध-दधि बेचनेके लिए मथुरा नहीं गइंर्. कुमारिकाएँ (अक्षरकी सुरताकी सखियाँ) गोपियोंकी देखादेखी दूध दधि बेचनेका बहाना बनाकर श्री कृष्णजी के साथ खेल करतीं थीं. (उनका दूध-दधि लूटकर श्री कृष्णजी ग्वालोंको देते थे) इस प्रकार उनके साथ दानलीला होती थी.
When Shri Raaj Shri Krishna arrived at Braj, the Gopis did not go to Mathura even the Kumarikas(24000 Ishwari Shristi-Akshar's astral figures) also joined the Brahmshristi and they all enacted the daan leela (the sport where Shri Krishna pretended to be tax officer and would rob all the butter from the gopis and distribute it to his gwaal baal friends )
प्रकरण १९ चौपाई
श्री कलश
(हिन्दुस्तानी)

ek prashn hai braj/raas Akshar ke antaskaran mein akhand hone ka matlab kya hai?
Akshar kaun hai? uska Dhamdhani se kya rista hai?
usmein chaitanya hai uska mool shrot kahan par hai?
Dhamdhani ko Akshar ki ichha purna karne ki kya avashyakta hai?

लीला दोऊ दोनों ठौर, भांत दोऊ पर नाहीं और ।
फिरते अक्षर के जो वन, लीला एकै देखियत भिंन ।।५८

दोनों स्थानों (अक्षरधाम तथा परमधाम) में दोनों प्रकारकी (बाल तथा किशोर) लीला होती है. लीलामें ही दोनों स्वरूप भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं किन्तु दोनों एक दूसरेसे भिन्न नहीं हंै. वस्तुतः दोनोंकी लीला एकही है मात्र भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है. अक्षर धामके चारों ओर भी वनप्रदेश है.
The sport of child and of youth is played at Akshardham and Paramdham but two are not separate.
Akshardham is surrounded by forest too, the sports are one but appear two!

प्रकरण ३ parikrama

एक नूर और नूर तजल्ला, कहे ठौर दोए।
ए नाहीं जुदे वाहेदत से, हैं बका बीच सोए।।३१

वैसे तो अक्षरधाम तथा परमधाम दोनोंका भिन्न-भिन्न उल्लेख है किन्तु दोनों अक्षरातीत परब्रह्म परमात्माके अद्वैत स्वरूपसे भिन्न नहीं है. इसलिए दोनों ही अखण्ड हैं.
We say one Akshar (Noor) and Noor tajalla (Aksharateet Paramdham) as two abode but in unity consciousness they are not two and both are eternal.
प्रकरण १४ श्री मारफत सागर ग्रन्थ

सखी एक निकसें एक पैठें, एक आवें उठें एक बैठें ।
इन समे भगवानजी इत, दरसन को आवें नित ।। ९

इस समय कोई सखी यहाँ पर प्रवेश करती है तो कोई यहाँसे बाहर निकलती है. इस प्रकार कोई सखी आकर बैठती है तो कोई यहाँसे उठकर चली जाती है. इसी समय अक्षरब्रह्म श्रीराजजीके दर्शनके लिए नित्य आते हैं.

झरोखे सामी नजर करें, परनाम करके पीछे फिरें ।
इत और न दूजा कोए, स्वरूप एक है लीलादोए ।। ९८

जैसे श्रीराजजी झरोखेकी ओर दृष्टि डालते हैं उस समय अक्षरब्रह्म उनको प्रणाम कर लौट जाते हैं. वस्तुतः ये अक्षरब्रह्म कोई अन्य नहीं हैं, स्वयं श्रीराजजीके ही स्वरूप हैं. मात्र इनकी लीला ही अन्य प्रकारकी होती है.

When Supreme Lord looks out of window, Akshar Bhagavan does Pranam and leaves. There is no two individual here, It is the form of the Self of Supreme Himself who performs different sport. Akshar Brahm is at soul level one with Aksharateet Shri Krishna but they are different in sports!

भगवानजी खेलत बाल चरित्र, आप अपनी इच्छा सों प्रकृत ।
कोट ब्रह्मांड नजरों में आवें, खिन में देखके पलमें उडावें ।। ९९

अक्षरब्रह्म बाल लीला करते हैं. वे अपनी प्रकृतिके अनुसार क्षण मात्रमें करोड.ों ब्रह्माण्डोंकी रचना करते हैं तथा दूसरे ही क्षण उन्हें उड.ा भी देते हैं.

Akshar Bhagvan has nature of a child and He plays as his nature to enjoy Himself. Billions of universe he creates in blink of eyes and destroys too!

प्रकरण ३ श्री परिक्रमा

The Grace brings inspiration, the will, the power of Akshar intelligence,supreme love and wisdom!

jyon meher tyon josh, jyo josh tyo hukum
mehar rahat noor bal liye, tahan hak isak ilam 28

ज्यों मेहेर त्यों जोस है, ज्यों जोस त्योंहुकम।
मेहेर रेहेत नूर बल लिएं, तहां हक इसक इलम।।२८

जैसे ही श्रीराजजीकी कृपा प्राप्त होती है वैसे ही उनका जोश तथा उनकी आज्ञाा प्राप्त होती है. वस्तुतः यह कृपा तेजोमय शक्तिके साथ ही रहती है उसके साथ श्रीराजजीका प्रेम तथा ज्ञाान भी रहते हैं.

Where there is grace there is Lord’s inspiration and where there is inspiration of the Lord,over there issues forth His Will. In the grace that sprouts from the power of the Supreme light (Noor bal) there also exist the ultimate love of/for the Lord and the absolute wisdom.

: 28 meharsagar

yadi ham sada apne piyu ke sang braj khel rahen hain tab ham yahan kya kar rahen hain?
akhand leela ka matlab hai jo kabhi khandit nahi hota kabhi khatam nahi hota, lekin braj ki leela to abhi nahi ho raha hai?
kya aatma ka bhi bhoot bhavishya bartamaan kaal hota hai? agar hota hain tab aatma sada aanand, akhandit, anadi kaise hogi?
isiliye yeh nashwar shareer kaal ke antargat hai aatma nahi hai.
sharir nast hota hai par iske dwara paya huwa anubhav nast nahi hota!

When we are playing eternally without any break at Braj then how are we here? Does soul has past or future? If that is true then how can soul be called eternal and beyond time?
The soul belong to the realm of timelessness while the world and the body is bound by time. The timelessness is witnessing the timeness! The unlimited is witnessing the game of limitedness. The body is bound by time, it is created and destroyed within a time period, it goes through changes. But the soul just witnesses it and experiences it. The body disappears but not the experiences.

तीन ठौर लीला करी, देखाए तीनों ब्रह्मांड।
सो तीनों एक पलमें, देखाए के उडावसी इंड।।३३

इस प्रकार धामधनी तीनों ब्रह्माण्डोंमें हुई व्रज, रास और जागनी इन तीनों लीलाओंको पल मात्रमें दिखाकर इस ब्रह्माण्डको भी उड.ा देंगे.
Lord Supreme played three sports in three different universes, showing all the three in ONE moment, this universe will be ended along with the body consciousness. (Entire living being will achieve soul consciousness)

खेले एकै रात में, व्रज रास जागन।
बेर साएत भी ना हुई, यों होसी सब सैयन।।३४

वास्तवमें एक ही महिमावान रात्रि (लैल-तुल-कद्र)के तीन खण्डोंमें ये तीनों लीलाएँ सम्पन्न हुईं हैं. इस खेलसे जागृत होने पर समस्त आत्माओंको अनुभव होगा कि इन लीलाओंको देखनेमें उन्हें पल भरका समय भी नहीं लगा.
All are played in one night Braj, Raas and Jaagani(Awakening). One moment also has not passed thus all the souls will experience.

बीच ब्रह्मांड ना जुग कोई, वरस मास ना दिन।
खिनमें सब देखाए के, दोए साखें करी जागन।।३५

इन तीनों ब्रह्माण्डोंकी लीलाओंको दिखानेमें न कोई युग बीता न ही वर्ष, महीना अथवा दिन व्यतीत हुआ, अपितु क्षणमात्रमें ही इन सब खेलोंको दिखाकर वेद और कतेब दोनोंकी साक्षी देते हुए ब्रह्मात्माओंकी जागनी की.
Three sports in three different universes (looks like eons have gone) but not even one era has passed, neither year nor month nor a day. In ONE moment all is shown both have witnessed it will awaken.
प्रकरण ४१ सनंध
The above says chaupai of sanandh says the eons of time that we experience are are of ONE single moment.

स्यामस्यामाजी साथ सोभित, क्यों न देखो अंतरगत ।
पीछला चार घड.ी दिन जब, ए सोई घडी है अब ।।१९१

वहाँ पर श्रीश्यामश्यामाजी तथा सखियाँ शोभायमान हैं. तुम इस दृश्यको अपनी अन्तरात्मासे क्यों नहीं देखते ? जब हमने खेल माँगा था उस समय चार घड.ी दिन शेष था, अब भी वही घड.ी है.
The splendour of Shyam and Shyamaji why cannot you see it within(heart of the soul), its the 4th hour of the day remaining, it is the same moment now!

प्रकरण ३ parikrama

Akshar creates and destroys millions of universes in a moment, he does this day and night.
नजरों होत अक्षर के, कोट चले जात माहें छिन ।
मैं सुन्या मुख धनी के, खेल पैदा फना रात दिन ।।८६

अक्षरब्रह्मकी दृष्टिके ऐसे करोड.ों ब्रह्माण्डोंका सर्जन एवं विसर्जन (लय) पल मात्रमें होता है. मैंने सद्गुरु श्री देवचन्द्रजीके मुखारविन्दसे ऐसा सुना है कि ऐसे ब्रह्माण्डोंका उदय और लय अर्हिनश होता रहता है.

एक इन वचन का बसबसा, तबका रेहेता था मेरे मन ।
लखमीजी का गुजरान, होत है विध किन।।८7

तभीसे मेरे मनमें एक उत्कण्ठा उत्पन्न हुई कि जब अक्षरब्रह्म अर्हिनश ब्रह्माण्डोंका सर्जन एवं विसर्जन करते हैं तो उनकी लक्ष्मीजी किस प्रकार निर्वाह करती होगी ?
Then I wondered how will Lakshmiji(consort of Akshar) might be spending her time when Akshar is so much busy in his play.
खेल दुनियां अरस खेलोंने, करें बाल चरित्र भगवान ।
या खेल या बिन साहेबी, होए लखमीजी क्यों गुजरान ।।८८

परमधामकी ब्रह्मात्माओंके लिए संसारका यह खेल खिलौनेके समान है. जिसको अक्षरब्रह्म अपनी बाल लीलाके द्वारा बनाते रहते हैं. जब अक्षरब्रह्म इतने व्यस्त होते हैं तो उनकी प्रभुता या लीलाके बिना अक्षरधाममें लक्ष्मीजीका निर्वाह कैसे होता होगा ?
This world is a game for soul of Paramdham (This is a virtual reality game) which the child character Bhagavan Akshar has created. When he is so busy and without the presence of Master how Lakshmi spend her time.

सो संसे मेरा मिट गया, हक इलमें किए बेसक ।
दिलमें संसे क्यों रहे, जित हकें अपनी करी बैठक ।।८९

अब मेरा यह संशय मिट गया है. धामधनीने अपना ब्रह्मज्ञाान देकर मुझे सन्देह रहित बना दिया. जिस हृदयको स्वयं धामधनीने अपना आसन बनाया है उसमें अब संशय कैसे रह सकते हैं.
But all my curiousity disappeared as Supreme wisdom of Lord made it clear(without a trace of doubt). How there will be any doubts when Master made a seat in my heart.

अरस कह्या दिल मोमिन, दिया अपना इलम सहूर ।
सक ना खिलवत निसबत, ताए काहे न होवे जहूर ।।९०

ब्रह्मात्माओंके हृदयको ही परमधाम कहा गया है. स्वयं धामधनीने सद्गुरुके रूपमें आकर मुझे ब्रह्मज्ञाान दिया एवं यह समझ दी. अब मुझे उनके साथका सम्बन्ध तथा मूलमिलावाके विषयमें कोई संदेह नहीं रहा. जिसको यह अमूल्य निधि मिल गई हो उसके हृदयमें ज्ञाानका प्रकाश कैसे नहीं होगा ?
The heart of Momin(soul of Paramdham) is said to be Arash (Paramdham) and granted the Supreme Wisdom of the Self(Shri Krishna) to contemplate. when there is no doubt about the original meeting place moolmilava and the treasures of Paramdham(unity consciousness and love) how can the heart not be enlightened then?

जैसी साहेबी रूहन की, विध लखमीजी भी इन ।
वाहेदत में ना तफावत, पर ए जाने रूहें अरस तन ।।९१

ब्रह्मात्माओंकी जैसी प्रभुता है वैसा ही ऐश्वर्य महालक्ष्मीका भी है. अद्वैत भूमि परमधाममें किसी भी प्रकारका अन्तर नहीं होता है किन्तु परमधामकी आत्माएँ ही इस तथ्यको समझ सकतीं हैं.
The greatness of soul the same is enjoyed by Lakshmiji(consort of Akshar). In unity consciousness(advait) there is no distinction but only the soul from Paramdham know it.

ए बातें बका अरस की, बिना रूहें न जाने कोए ।
ए बातें खुदाए की, और तो जाने जो दूसरा होए ।।९२

अखण्ड परमधामके इस रहस्यको ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त अन्य कोई भी नहीं जानता है. पूर्णब्रह्म परमात्माके इस रहस्यको ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त यदि कोई दूसरा होता तभी तो जान सकता.
These words of eternal abode Paramdham none can understand but the soul from Paramdham.
The wisdom of the Supreme, only soul from Paramdham know it as there is noone other than them.
प्रकरण १४ parikrama

जिमी जात भी रूह की, रूह जात आसमान।
जल तेज बाए सब रूह को, रूह जात अरस सुभान।।४०

यहाँ पर भूमिसे लेकर आकाश तक जल, तेज, वायु आदि सभी आत्माकी भाँति स्वयं प्रकाशमान तथा चैतन्यस्वरूप हैं. ब्रह्मात्माएँ तो स्वयं धामधनीकी अङ्ग स्वरूपा हैं.
The ground,sky, air,water,energy everything in Paramdham is of Rooh(soul) Consciousness and this Consciousness (soul) kind is that of beloved Lord of Paramdham (Arash)

पसू पंखी या दरखत, रूह जिनस हैं सब।
हक अरस वाहेदत में, दूजा मिले ना कछुए कब।।४१

यहाँके पशुपक्षी तथा वृक्ष आदि भी ब्रह्मात्माओंके समान स्वयं प्रकाशमान एवं चैतन्य स्वरूप हैं. धामधनीकी इस अद्वैत भूमिकामें चैतन्यके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है.
Animals, birds or trees all are of soul type(consciousness), in the unity consciousness(advait vahedat) nothing else is found!

दूजा तो कछू है नहीं, दूजी है हुकम कुदरत।
सो पैदा फना देखन की, फना मिले न माहें वाहेदत।।४२

चैतन्यके अतिरिक्त यहाँ पर अन्य कुछ भी नहीं है. यदि अन्य कुछ भी है तो वह श्रीराजजीके आदेशका ही चमत्कार है. उसने इसी अद्वैत भूमिकामें ब्रह्मात्माओंको नश्वर जगतका खेल दिखाया अन्यथा अद्वैत भूमिकामें नश्वरता होती ही नहीं है.
There is nothing else then the consciousness of the beloved Lord, if you find anything it is
जो कछुए चीज अरस में, सो सब वाहेदत माहिं।
जरा एक बिना वाहेदत, सो तो कछुए नाहिं।।४३

परमधामकी सभी सामग्रियाँ धामधनीके अद्वैत स्वरूपके अन्तर्गत ही आतीं हैं. अद्वैतके अतिरिक्त वहाँ पर अन्य कुछ भी नहीं है.

पेहेचान सबों वजूद की, नहीं रूह की दृष्टि।
वैराट का फेर उलटा, या विध सारी सृष्ट।।२४

किन्तु सबको नश्वर देहकी पहचान है. आत्म-दृष्टि किसीमें नहीं है. इस प्रकार वैराट (संसार) का सम्पूर्ण चक्र ही उलटा है तथा सारी सृष्टिकी ऐसी ही उलटी रीति है.

Maya means illusion the real soul (that is neither created nor destroyed, does not change) is not seen but the body and physical world made of 5 element that continuously changes (comes in existence and perishes) is seen. The real soul which is truth(has form,abode, consciousness, unchanging) cannot be seen but the body of 5 elements which appears to have form in the presence of soul is seen and looks real. After the soul leaves the body all the 5 elements unites with formless(earth with earth, fire-energy with energy, water with water, ether with ether aakash).

साधु बोले इन जुबां, गावे सबदातीत बेहद।
पर कहा करे बुध मोह की, आगे ना चले सबद ।।६

अनेक साधु जनोंने अपनी नश्वर जिह्वासे शब्दातीत अखण्ड भूमिकाका वर्णन करनेका प्रयत्न किया परन्तु उनकी बुद्धि मोहजगतकी होनेके कारण उनके शब्द क्षर जगतसे पारका वर्णन नहीं कर सके.

Many saints and seekers try to sing the song of unspeakable unbound universe throught their physical body conscious tongue but how can they ever with the mind of the body( budh moh ki- illusionary mind) and hence they cannot cross the limited.

मंगलाचरन प्रकरण २ parikrama

बानी जो अद्वैत की, सो कहावे सबदातीत।
सो जागृत बुध अद्वैत बिना, क्यों सुध पावे द्वैत ।।९

इन सबसे परे (अखण्ड भूमि) का वर्णन करनेवाली अद्वैत वाणी शब्दातीत कहलाती है. अतः जागृत बुद्धिके बिना यह द्वैतकी बुद्धि कैसे अद्वैत तत्त्वको जान सकती है ?
The wisdom of unity consciousness which is said to be unspeakable, without awakened mind and unity consciousness how can one with the mind of duality ever understand it.
मंगलाचरन प्रकरण २ parikrama

Every word said in Kuljamswaroop must be understood from awakened mind of the soul. The body senses and brain cannot understand anything and thus creates confusion and this confusion is well exploited by so called Swamis!

Some people are asking since when Shri Krishna Pranami name originated for Nijanand Sampraday ?
All shri krishna pranami sundarsath are aware that our sampraday name is Nijanand yet Shri Krishna Pranami became popular and well known.
Popularity comes not from sundarsath but from all people.
Since our Lord is Shri Krishna and we contemplate on His Leelas and greet each other by soul to Shri Krishna within each other by Pranam we are called Shri Krishna Pranami.
Nijanand is very personal affair. When one attains Nijanand generally such a person stays aloof from world. Once tasting Nijanand, Parmanand and union with the super soul the game of the world gets over and one would not speak about Nijanand to worldly.

Also, for sundarsathji it does not matter if we are called as Chandal/Pranami/Nijanandi as long as the name Krishna Shyam is residing in the heart.
With Shyam Krishna or without Shyam!


वेष जो विप्र का, दूजा भेष चंडाल।
जाके छुए छूत लागे, ताके संग कौन हवाल।।१८

इस प्रकारके नश्वर शरीरोंमें भी एक शरीर ब्राह्मणका है, तो दूसरा चण्डालका है. जिस चण्डालको छूने मात्रसे कोई अपवित्र हो जाए, तो उसके साथ रहने पर फिर क्या गति होगी ?
There is one person as scholar and second person as chandal (lowly being considered as untouchable). The one whose even touch can make one impure, then what if one has to be with such?

चंडाल हिरदे निरमल, संग खेलें भगवान।
देखावे नहीं काहूं को, गोप राखे नाम।।१९
अंतराए नहीं खिन की, सनेह सांचो रंग।
रात दिन नजर रूह की, नहीं वजूदसों संग।।२०
kalash and Sanandh

यदि वह चण्डाल निर्मल हृदयका हो और रात-दिन प्रभुके प्रेममें मस्त रहता हो एवं किसीको दिखाए बिना ही भजन (भक्ति) करता हुआ अपने हृदयमें प्रभुका नाम गुप्त रूपसे लेता हो, क्षण भरके लिए भी वह अपने इष्टसे दूर नहीं होता हो अपितु सदैव उसकी आत्म-दृष्टि बनी रहती हो और वह शरीरके मिथ्या सम्बन्धोंको भी महत्त्व नहीं देता हो.
But but the heart of Chandal sports with God and does not show anybody, secretly prays the name. For a moment does not part with the Lord and is colored with true love for Lord. Day or night one is soul conscious (witnesses by the eyes of soul) and has no relationship with the personality(physical body)!

पर न आवे तोले एकने, मुख श्रीक्रस्न कहंत।
प्रसिध प्रगट पाधरी, किवता किव करंत।।१ kirantan

Sundarsath worship in Aksharateet Lord who is beyond Akshar as Shri Krishna. He is the Master of our soul hence Sahebji. He is the life force of our life hence Prannath. Only He is the truth hence Satchidanand. He rules our heart and hence Shri Raaj. He is our beloved hence Piya or Piyu. He is very loving hence Vallabha. He is our Shyama var Shyam. He is the bestower of eternal bliss of ultimate abode (Paramdham) and hence Dhamdhani. We the soul from Paramdham rely only upon Him hence Aksharateet Bhartaar! Shri Krishna is AshiQ, Shri Krishna is our Vala.

अखंड लीला अहेनिस, हम खेलें पिया के संग।
पूरे पीउजी मनोरथ, ए सदा नवले रंग।।४४
श्रीराज व्रज आए पीछे, व्रज वधू मथुरा ना गई।
कुमारका संग खेल करते, दान लीला यों भई।।४५
kalash

पेहेलें भाई दोऊ अवतरे, एक स्याम दूजा हलधर।
स्याम सरूप है ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर।।२7khulasa


इत खेलत स्याम गोपियां, ए जो किया अरस रूहों विलास।
है ना कोई दूसरा, जो खेले मेहेबूब बिना रास।।१३
Sanandh

Shri Krishna Satchidanand, ParBrahma, Purnaparamatma isi naam ko bhaj bhaj ke sada sukh leu he aatma. dhamdhani Shri Krishna hamare!
Our soul is filled with this name.

इन खसम के नाम पर, कै कोट बेर वारों तन।
टूक टूक कर डार हूं, कर मनसा वाचा करमन।। 7

ऐसे धामधनीके नाम पर मैं मन, वचन और कर्मसे अपने शरीरको करोड.ों बार टुकड.े-टुकड.े कर सर्मिपत कर दूँ.
We sacrifice billions of physical body in the name of this Master. I cut the body into pieces by speech, thoughts and deeds!
प्रकरण ९१ kirantan

Also, nijnaam is our tartam mantra which is meant for the mind and it is also a kunji or key by which all the scriptures are unlocked, Nijnaam is a sacred sound uttered by our Master to introduce Himself to Shyama.

हवे रास तणो सार तमने कहुं, ते तां आपणुं तारतम थयुं ।
तारतम सार आ छे निरधार, जिहां वसे छे आपणां आधार।।२२
घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३
प्रकरण ३३ श्री प्रकास ग्रन्थ (गुजराती)

For us Kuljamswaroop saheb tartamsagar is an extension of Nijnaam mantra and Nijnaam mantra is saar essence of Tartamsagar.

श्रीकृस्नजीसों प्रेम करे बडी मत, सो पोंहचावे अखंड घर जित ।
ताए आडो न आवे भवसागर, सो अखंड सुख पावे निज घर ।।८

श्रीकृष्णजीसे प्रेम करने वाली बुद्धि बड.ीमति (महामति) है. वह जीवको अखण्ड घरमें पहुँचा देती है. उसकी राहमें भवसागर बाधा नहीं बनता. नित्य ही वह अपने घरका अखण्ड सुख प्राप्त करती है.
The beings with higher intelligence will love Shri Krishna which will take them to the eternal home, there the world (ocean of emotions) will not obstruct, and they will get the bliss of eternal home of the self.

One can call us stupid, rustic, urchin, backward and everything that Rajan and Ahuja's following are telling us!
We are traditional pranamis, we very conservative who do not like any changes in tartam mantra, grantha and lakshya.
आवेस अंग आपी आधार, दई तारतम उघाडयां बार।
घर थकी वचन लई आवियां, ते तां सुंदरबाईने कह्यां।।

२० प्रकरण ३७ श्री प्रकास ग्रन्थ (गुजराती)
अपने अङ्गस्वरूपा श्री सुन्दरबाईको श्रीराजजीने अपनी आवेश शक्ति दी. तारतम ज्ञाान देकर परमधामके अखण्ड सुखोंका द्वार खोल दिया. वे स्वयं अखण्ड परमधामसे तारतमके वचन लेकर आए और सुन्दरबाईको वे वचन कहे.
The Supreme Lord Shri Krishna is the source of all the consciousness (chetan). The eternal absolute Supreme Brahm of Aksharateet (beyond Akshar) , the epitomy of Love, dwells in the heart of the soul along with splendour of abode of the self is revealed as Shri Krishna to Sundarbai(celestial soul) and Shyama(consort of Shyam Shri Krishna).
Sundarbai received the inspiration of our beloved Lord and revealed her tartam and opened the doors of bliss. He from the original home brought the words and told Sundarbai and later he resided in her heart.

We want to follow the path of Nijanand Sampradaya founded by Satguru Dhani Devachandraji and Mahamati Prannathji that was established 400 years old. It does not matter to us what we are called as by the world!
By calling oneself Nijanandi one does not get Nijanand when Shyam is not even in dream.

विप्र भेष बाहेर द्रष्टि, षट करम पाले वेद।
स्याम खिन सुपने नहीं, जाने नहीं ब्रह्म भेद।।१८
उदर कुटुम्ब कारने, उतमाई देखावे अंग।
व्याकरन वाद विवाद के, अरथ करे कै रंग।।१९

इधर ब्राह्मणका वेश बनाया हुआ व्यक्ति बाह्य दृष्टि रखकर वेदानुसार शास्त्रोंका अध्ययन- अध्यापन, यजन-याजन (यज्ञा करना, कराना), ग्रहण-प्रतिग्रहण (दान लेना, देना) आदि षट्कर्मोंमें ही मग्न रहता है और परब्रह्म परमात्मा श्यामसुन्दरकी याद तो उसे स्वप्नमें भी न आती हो, तो वह ब्रह्मके वास्तविक रहस्यको नहीं जानता है. वह कुटुम्ब परिवार पोषण और अपनी उदर र्पूितके लिए ही कर्मकाण्ड और शारीरिक स्वच्छताका ढोंग रचता है. व्याकरणके वाद-विवादमें पड.कर एक-एक शब्दके अनेक अर्थ निकालता है

प्रकरण १६ श्री कलश
(हिन्दुस्तानी)
सनंध
The one who knows scriptures and vedas is known as vipra(scholar). (I will take those who proclaim that they know the Supreme Brahma.) The vipra who does not dive deep into the deeper and hidden meanings of scriptures just understands it literally and performs all sorts of rituals, such person cannot even in dream attain Shyam the beautiful Lord and shall never know the Brahma(Supreme). He shall engage himself in the grammar, linguistics and shall derive various meanings(not the truth). The truth is the Soul consciousness and those who see Krishna as body will never ever even see Him in the dream.

मोटी मत ते कहिए एम, जेहना जीवने वल्लभ श्रीक्रस्न।
मतनी मत तां ए छे सार, वली बीजी मतनो कहुं विचार।।५
एह विना जे बीजी मत, ते तुं सर्वे जाणे कुमत।
कुमत ते केही कहेवाय, निछाराथी नीची थाय।।६

Who is Mohamad?

जो रूह अरस महंमद की, तिन को न सक्या पेहेचान ।
तो न आया बडे नूर में, छोड्या न नूर मकान।।१7 प्रकरण ४ मारफतसागर


यह जिब्रील फरिश्ता भी रसूल मुहम्मदकी पहचान नहीं कर सका कि इनकी आत्मा परमधामकी है. इसलिए वह अक्षर धामको छोड. कर परमधामकी ओर जा नहीं सका.
The Angel Gibrail could not recognize that Mohamad's soul belonged to Paramdham hence he could not go beyond Akshardham.

चल न सक्या जबराईल, रह्या हद जबरूत।
मासूक कह्या महमद कांे, तो पोहोंच्या बका हाहूत।।१८

प्रकरण ४ मारफतसागर
इस प्रकार जिब्रील फरिश्ता अक्षरधामकी सीमामें रह गया, उससे आगे नहीं बढ. सका. श्री राजजीने श्री श्यामाजीको अपनी प्रियतमा कहा है. उनकी शक्तिस्वरूप मुहम्मद अक्षर धामको पारकर परमधाम मूल मिलावामें पहुँचे.
Where Gibrail could not go beyond Akshardham Jabaroot, Mahmad is called the beloved of Lord, who reached the eternal Moolmilava (original meeting place) Hahoot.

बीच बका लाहुत में, जो हैं रूहें मोमन।
तीन सूरत महंमद की, सो कहे एक तन।।१7

दिव्य परमधाममें जितनी भी ब्रह्मात्माएँ हैं वे सभी एवं रसूल मुहम्मद द्वारा र्नििदष्ट तीनों (बशरी, मलकी एवं हकी) स्वरूपोंमें कोई अन्तर नहीं है वे सभी एक ही अद्वैत स्वरूपमें हैं.

अव्वल सूरत एक बसरी, पीछे सूरत मलकी।
कही तीसरी आखर, सूरत जो हकी।।१८

इस जगतमें श्री श्यामाजीकी सुरता सर्वप्रथम बशरीके रूपमें तदुपरान्त मलकीके रूपमें एवं अन्तमें हकी स्वरूपमें अवतरित हुई है.

ए तीनों बातूनमें एक हैं, जो देखिए हकीकत।
तब सबे सुध पाइए, होए बका मारफत।।१९

यदि यथार्थको देखें तो ये तीनों स्वरूप मूलतः एक ही हैं. जब दिव्य परमधामकी पहचान होगी तब इस सम्बन्धकी सम्पूर्ण सुधि प्राप्त होगी.

ए सबे बीच अरस के, कहावें वाहेदत।
एक तन रूहें अरस की, हक हादी सूरत।।२०

ये सभी दिव्य परमधाममें एकात्मभाव अर्थात् अद्वैत स्वरूप कहलाते हैं. श्री राजजीकी अङ्गना श्री श्यामाजी तथा उनकी अङ्गभूता परमधामकी ब्रह्मात्माएँ सभी अद्वैत स्वरूपमें हैं.

प्रकरण १४ श्री मारफत सागर ग्रन्थ

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निजनाम श्री कृष्ण ही है यह जान पड़ा है मुझे
सभी प्रकार(विध) से नाम, धाम और लीला प्रगट हो गए जो प्रेम से पूरण निधान हैं
आत्मा के दृष्टि से देखो और परखो तब परमधाम के सुन्दर सुख की अनुभूति होगी
अक्षरातीत और अनादि जिसे वेद और पुराण ने नेति नेति गाया है
तारतम ज्ञान सुनते ही सभी तिमिर (अन्धकार) का नाश हो गया है और पवित्र अंतर ज्ञान का उपज गया है
रात्रि के अन्धकार की सभी भ्रम मिट गए हैं और निर्मलता का भान हो गया है (सभी विकार दूर हो गए हैं)
यह निज लीला ब्रह्म विनोद में लिखी है सुन्दर परमधाम के सुख अनुभव करते हुए
सभी जुत्थे (४० जुत्थे) जुगल जोड़ी के संग मिल कर श्यामाश्याम संग विहार करते हैं
यह सुखसगार परम उजागर है सभी विध कामना पूरण कर देती है
जिस अद्भूत रूप कहते हैं उसकी कोई उपमा नहीं और मुख से वर्णन भी नहीं हो पाता है, उनका बखान नहीं हो सकता है !
The name of my soul is Shri Krishna I have come to know. The one with full of love Shri Krishna is revealed along with the abode. Only by the eyes of the soul one can see and find out the reality of eternal bliss of beautiful Paramdham. The one who is beginningless eternal imperishable of beyond (Aksharateet) to whom Ved sing praise of and say "Neti" and could not grasp or known. By listening to the Tartam mantra the destroyer of all darkness of ignorance, all the darkness is destroyed and the pure wisdom has sprouted. All types of confusion/doubts of ignorance of darkis eliminated and rose the pure understanding. The sport of Supreme Brahm with the self is written along with bliss and beautiful abode Paramdham. The duo couple jugal swaroop Shyama Shyam are united together and frolic joyfully in Paramdham. The ocean of bliss (Sukhsagar) exposes the extreme and ultimate revelations and fulfills all the wishes in every possible manner. The amazing form one cannot it compare with any and speech cannot describe it (one must experience it) !
श्री जी साहेब जी मेहरबान

गिरो बचाई साहेब ने, तले कोहतूर हूद तोफान ।
बेर दूजी किस्ती पर, चढाए उबारी सुभान।।१२
प्रकरण १ छोटा क़यामतनामा
इसी व्रज मण्डलमें इन्द्रकोपके समय श्रीकृष्णजीने ब्रह्मात्माओंको गोवर्धन पर्वतके नीचे सुरक्षित रखा था. इस प्रसङ्गको कुरानमें हूद तूफान कहा गया है. उस समय हूद पैगम्बरने अपने समुदायके लोगोंको कोहतूर पर्वतके नीचे सुरक्षित रखा था. दूसरी बार नूह तूफानके समय भी उन्होंने ही योगमायाकी नावमें चढ़ा कर उन्हें पार किया था.


छिपके साहेब कीजे याद, खासलखास नजीकी स्वाद ।
बडी द्वा माहें छिपके ल्याए, सब गिरोहसों करे छिपाए ।।१
प्रकरण १५ बड़ा क़यामतनामा
परमात्माकी उपासना गुप्त रूपसे करनी चाहिए. श्रेष्ठ आत्माएँ इस प्रकारकी उपासनासे उनकी निकटताका आनन्द प्राप्त करतीं हैं. सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजीने परब्रह्म परमात्मासे जो प्रार्थना की थी उसे उन्होंने ब्रह्मात्माओंके समुदायसे भी गुप्त रखा था.

One must pray to Lord secretly. The supreme souls pray in this manner and tastes the union with the Lord. The Master when prayed to Lord, he would even keep it secret from the other celestial souls.

बंदगी रूहानी और छिपी, जो कही साहेदी हजूर।
ए दोऊ बंदगी मारफत की, बीच तजल्ला नूर।।४२ श्री मारफत सागर

आत्मभावसे तथा गुप्तभावसे की जानेवाली उपासना परब्रह्म परमात्माके सान्निध्यकी कही जाती है. ये दोनों प्रकारकी उपासना आत्म-अनुभव अथवा परमधामकी पूर्ण पहचानकी है.
The souls that are from Paramdham they do not display their devotion and do it secretly and find themselves closer to the Lord.

जिसने भी निजनाम मंत्र में श्रीजी साहेबजी रखा है उसकी मंशा श्री कृष्ण ही थी।पियुजी, श्रीजी साहेबजी, प्राणनाथ, धनीजी, श्री राजजी ब्रह्म आत्मा के एक ही मालिक है, वे उनको अलग अलग तरीके से रिझाती हैं। अगर आप को किसीने कृष्ण मंत्र नहीं दिया और कृष्ण नाम से बैर करा दिया तब समझ जाईये की आप अधर्म को धर्म मान कर बैठे हैं और पाखंडी को गुरु।
यदि आपको मेरी बात मान्य नहीं तब आप अपने धाम के धनी से दूध का दूध पानी का पानी करने के लिए कहिये। सच्चे मन से एक बार सत्य क्या है उसका निवारण करने के लिए विनती करिए, यह आपके आत्मा की सत्गति के लिए अति आवश्यक है!

Whoever wrote Shriji Sahebji in nijnaam mantra was not replacing Shri Krishna. It is Shri Krishna who is also called Dhaniji, Prannathji, Shriji Sahebji, Shri Rajji as He is only Master of the celestial soul descending from Paramdham (4th Heaven). Yet, not a single character must change in the granthas as per the beliefs of devotees as it creates conflicts which we are facing right now.Prem pranam to all sundarsathji!

अब तारतम की कुंजी जब बदल गयी, अब गफलत ही गफलत है।
सबसे पहेले तारतम का अवतरण में सत चित आनंद प्रभु ने श्री कृष्ण का भेष धरा (उनका स्वरुप कोई और है पर कोई और बन कर आये) और निजनाम श्री कृष्ण कहा। सत चित आनंद ने असत्य कहा। सर्व समरथ धाम धनी भयभीत हो गये क्योंकि देवचन्द्र जी श्याम श्री कृष्ण के भक्त थे, यदि वह कृष्ण के रूप में नहीं गए तब उनकी अंगना श्री श्यामा उनको नहीं अपनाएंगी।
अब सत्चिदानन्द ने आनंद स्वरुप श्यामा अवतार धनी देव चन्द्र से असत्य कहा। यहाँ से अनिजानंद का धर्म का विस्तार होता है। यहाँ पर कोई मंत्र नहीं है, निज (आत्मा स्वयं स्वरुप) नाम अब कोई साहेब कोई प्राणनाथ को सत्चिदानन्द अनेक अनेक हैं। गर्गाचार्य ने श्री कृष्ण ब्रज के एक लड़के का नाम रख दिया। ब्रज और रास भूत काल है और इसका कोई महत्व नहीं, अब इसा का इलम असत्य हो गया। महामति प्राणनाथ ने कुम्भ में सर्व संसार को बताने के लिए तारतम मंत्र कहा, निष्कलंक बुध कल्कि अवतार ने दुनिया को असत्य कहा ऐसा कहते हैं यह लोग.
ब्रह्मात्मा की तारतम रचना को यह सब नहीं मानते कहते हैं। और अपने आपको बिना पहचाने, धाम के बिना दर्शन पाए अपने आप को ब्रह्मसृष्टि मानते हैं। बिना कुंजी कोई भी ग्रन्थ नहीं खुलते तब सभी ग्रन्थ हद के हैं कहा। महेश्वरी तंत्र में अक्षरातीत श्री कृष्ण के परमधाम में हुए ब्रह्मात्माओं से हुए इशक के रबद भी भ्रम है कहने लगे। सभी शास्त्र का विरोध और अब कुलजम स्वरुप के चौपाई भी यह जीव सृष्टि के लिए बिना कोई प्रमाण रद्द कर दिए। किसी एक ग्रन्थ पर भी पूर्ण विश्वास नहीं, और अपने हिसाब से सभी जगह फेर बदल करते रहते हैं। महात्मा गाँधी ने मेरी माता प्रणामी धर्म की अनुयायी कहा उसे भी बदलना चाहिए ऐसा अर्जी तयार किया। हर जगह बदल कर अपनी ढिढ्ता प्रमाणित करना चाहते हैं। अक्षरातीत श्री कृष्ण को प्रणाम करने वाले सुन्दर साथ की निंदा, इनको गवार, अज्ञानी कहते हैं और इनको छेड़ना यह इनका प्रथम धर्म है।
कुलजम स्वरुप जिसका मतलब धाम धनी श्री कृष्ण का पूर्ण स्वरुप का परिचय यह भी ग्राह्य नहीं, यह मेहराज ने कहा है, यह इन्द्रावती ने कहा है, यह सत्य आत्मा के लिए नहीं, यह तो भागवत का ज्ञान है, यह वल्लभाचार्य की टिका पर है यह उनके लिए है, यह जीव के लिए, अगर कुछ ग्रहण किया तब उसका अर्थ अपने गुरु के लिए कहा ऐसा मानते हैं, यह नवरंग वाणी हम नहीं मानते, यह करुणा सखी की बीतक नहीं मानते। नहीं मानते इसा के नुस्खे को और तोड़ते हैं एक दीन के रूहल्लाह के सपने को, नहीं मानते तारतम के सार को, नहीं मानते रास को, नहीं कोई प्रकाश को, ना ही कलश को, खुलाशा के १०, ११, १२ प्रकरण से एक दो चौपाई मानते हैं बांकी सब नहीं मानते। कोई एक ग्रन्थ में पूर्ण विश्वास नहीं होता।
सिर्फ मानते हैं कोई सरकार और कोई स्वामी को ।

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