हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Hypocrisy by Mahamati Prannath

धनी न जाए किनको धूत्यो, जो कीजे अनेक धुतार ।
तुम चेहेन ऊपरके कै करो, पर छूटे न क्योंए विकार।।१

परमात्मा किसी भी प्रकारकी धूर्तता या चतुराईसे ठगे नहीं जा सकते, चाहे ऐसे प्रयत्न अनेक क्यों न हों. तुम बाह्य आचरण कितने भी कर लो परन्तु इनसे मनके विकार छूट नहीं सकते.

The beloved Lord cannot be tricked no matter what trickery one tries. You can chose many external vagaries or manipulate the external apprearances or behaviour to protray that you are a great devotee but this will not end the vikaar (greed, lust, anger, attachment, ego consciousness caused by ignorance).

कोई बढाओ कोई मुडाओ, कोई खैंच काढो केस ।
जोलों आतम न ओलखी, कहा होए धरे बहु भेस ।। २

कोई जटा बढ.ा ले, कोई मुण्डन कराए अथवा कोई अपने केशको नोंच-नोंचकर उखाड. डाले, परन्तु जब तक आत्माकी पहचान नहीं होती, तब तक ये सब वेश धारण करनेसे कुछ भी प्राप्त नहीं होता.

Some grow their hair long or shave it altogether while others pluck it altogether. For one who has not realized the self how is the external changes going to help?

चार बेर चौका देओ, लकडी जलाओ धोए जल ।
अप्रस करो बाहेर अंग को, पर मन ना होए निरमल ।। ३

चाहे चार बार रसोईके चौकेको साफ करो और लकड.ीको भी धोकर जलाओ. शरीरके बाह्य अङ्गोंको चाहे जितना भी स्वच्छ रख लो तथापि इससे मन निर्मल (पवित्र) नहीं बनता.

Clean the kitchen four times and even wash the firewood before cooking. Keep that all is external clean but could not clean the mind.

सात बेर अस्नान करो, पेहेनो ऊन उतम कामल ।
उपजो उतम जातमें, पर जीवडा न छोडे वल ।। ४

चाहे दिनमें सात बार स्नान करो और उत्तम प्रकारके ऊनी कम्बल या वस्त्र धारण करो, चाहे उत्तम कुलमें जन्म लेनेका गर्व रखो तथापि यह जीव मायाके बन्धनोंसे मुक्त नहीं हो सकता.

Wash your body 7 times in a day and wear the best woolen clothes. Might have been born in superior caste but the being is trapped in the illusion.

सौ माला बाओ गलेमें, द्वादस करो दस बेर ।
जोलों प्रेम न उपजे पीउसों, तोलों मन न छोडे फेर ।। ५

दिखानेके लिए चाहे सौ मालाएँ गलेमें धारण करो और दसों बार द्वादश तिलक (शरीरके बारह अंगों पर चन्दनका लेप) करते रहो, परन्तु जब तक परब्रह्म परमात्माके प्रति सच्चा प्रेम हृदयमें प्रकट न होगा, तब तक मनका फेरा नहीं छूटेगा.

One can wear 100s of garland of beads, wear chandan in 12 places 10 times a day but these are of no use if it does not create the longing for love of Lord and cannot end the pursuit of desires and thus the cycle.

तान मान कै रंग करो, अलापी करो किरंतन।
आप रीझो औरों रिझाओ, पर वस न होए क्योंए मन ।।६

चाहे भक्तिभाव दिखानेके लिए स्वर-तानके साथ रागका आलाप करते हुए कीर्तन करो और इससे स्वयं प्रसन्न रहो तथा दूसरोंको भी प्रसन्न करो तथापि तुम्हारा मन संयमित नहीं रहेगा.

One can sing with great tune and lyrics devotional song which can entertain one and others too but does not understand why the mind is not under control.

उछव करो अंनकूट का, विविध करो प्रसाद।
पर निकट न आवें नाथजी, पीछे सब मिल करो स्वाद ।।7

चाहे अन्नकूटका उत्सव कर विभिन्न प्रकारके व्यञ्जनोंका भोग लगाओ पश्चात् सब मिलकर प्रसादका आनन्द लो, तथापि श्रीनाथजी (भगवान) निकट नहीं आएँगे.

One can celebrate various tradional festivals and with variety of edible offerings. But the Lord does not come near it later everyone can enjoy the delicious food.

सीखो सबे संस्कृत, और पढो सो वेद पुरान।
अर्थ करो द्वादस के, पर आप न होए पेहेचान।।८

चाहे तुम सब संस्कृत भाषा सीख कर वेद, पुराण आदि धर्मग्रन्थोंका अध्ययन कर लो और बारह मात्राओंको अलग-अलग कर उनका अर्थ भी लगा लो, परन्तु इन सब प्रयत्नोंके बाद भी अपनी आत्माकी पहचान न हो पाएगी.

One can learn the entire sanskrit language and read the vedas and puranas and find the meanings of each words but all the knowledge is of no use if one does know the self.

साधो सबे जोगारंभ, अनहद अजपा आसन।
उडो गडो चढो पांचमें, आखर सुंन न छोडी किन।।९

चाहे तुम योगकी साधना करो, अनहद नादका श्रवण करो, अजपा जाप करो अथवा चौरासी आसनोंका प्रयोग करो, साधना द्वारा आकाशमें उड.ने लगो अथवा भूमिके अन्दर समाधि लगा लो तथा पञ्चमहाभूतोंसे बने इस ब्रह्माण्डमें जितनी भी प्रगति करो, तथापि अन्तमें शून्य निराकारको छोड.कर उससे आगे कोई भी नहीं बढ. सका.

One can practice yog, and listen to the internal resonant vibration sound, repeat the mantra that is never recited, fly, bury under the soil or rise up in the 5 elements but all these physical achievements is no use when one cannot reach beyond the formless nothingness or spiritual vacuum.

आगम भाखो मनकी परखो, सूझे चौदे भवन।
मृतक को जीवत करो, पर घरकी न होवे गम।।१०

चाहे ज्योतिषका अभ्यास कर भविष्यवक्ता बनो, दूसरोंके मनको परख लो. चाहे तुम्हें चौदह लोकोंके ज्ञाानकी भी समझ आने लगे. चाहे जप अथवा चमत्कार द्वारा मृतको जीवित भी कर लो, परन्तु इन सबके करने पर भी तुम्हें अपने मूल घर (परमधाम) की सुधि प्राप्त नहीं हो सकेगी.

One can become astrologer and predict the future accurately or one can read others mind and gain the knowledge of the 14 creations. Can show miracles of bringing back life of dead but all these outstanding feats are of no use if one does not get the sense of the original abode.

सतगुरु सोई जो आप चिन्हावें, माया धनी और घर ।
सब चीन्ह परे आखर की, ज्यों भूलिए नहीं अवसर ।।११

वे ही सद्गुरु कहलाते हैं जो आत्माकी पहचान करवा दें, मायाकी सूझ देकर आत्माके स्वामी (धनी) परमात्मा तथा परमधामकी पहचान भी करवा दें. ऐसे सद्गुरुके मिलने पर आत्म-जागृतिका मार्ग प्रशस्त होगा. इसलिए ऐसे अवसरको हाथसे जाने मत दो.

The true guru is the one who can help realize the self and make one understand the maya –physical world of attachment and illusion,the beloved Lord and the supreme abode also the one who can explain the knowledge of the beyond ultimately leading to the Supreme Abode. Do not let go such an opportunity from you prays Mahamati.

ए पेहेचाने सुख उपजे, सनमंध धनी अंकूर।
महामत सो गुरु कीजिए, जो यों बरसावे नूर।।१२

इस प्रकारकी पहचान होने पर आत्माको अखण्ड सुखका अनुभव होता है और अपने धनीके साथ मूल सम्बन्धकी भी पहचान होती है. महामति कहते हैं, इस प्रकार जो अखण्ड ज्ञाानके तेजकी वर्षा करते हैं, ऐसे व्यक्तिको ही अपना सद्गुरु बनाना चाहिए.

When one realizes the self and recollects the original relationship with the beloved Lord this recognision will lead to happiness and bliss. Mahamati says choose such a Guru who can shower such illumination upon you.

प्रकरण १४
------------------------------------
देहुरे मसीत अपासरे, सब लगे मांहें रोजगार।
बाहेर देखावें बंदगी, माहें माया मोह अहंकार।।7

मन्दिर, मस्जिद, उपाश्रय आदिमें भी स्वार्थका व्यापार चलने लगा. उपासना और सेवा तो बाह्यरूपसे ही दिखाई देती है, किन्तु भीतर तो मोह, माया और अहङ्कार ही भरा पड.ा है. \
प्रकरण ३० kirantan
-------------------------------------

Mirabai composed many ecstatic songs which are still treasured in India; I translate one of them here:

"If by bathing daily God could be realized
Sooner would I be a whale in the deep;
If by eating roots and fruits He could be known
Gladly would I choose the form of a goat;
If the counting of rosaries uncovered Him
I would say my prayers on mammoth beads;
If bowing before stone images unveiled Him
A flinty mountain I would humbly worship;
If by drinking milk the Lord could be imbibed
Many calves and children would know Him;
If abandoning one's wife would summon God
Would not thousands be eunuchs?
Mirabai knows that to find the Divine One
The only indispensable is Love." Autobiography of Yogi by Yogananda

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
Hindi translation is from Shri 108 Krishnamani Maharaj ,Shri 5 Navtanpuri Dham, Jamnagar.

Image: