हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

श्री प्रगटबानी Revelation of cause of Creation

श्री प्रगटबानी Revelations
श्री प्रगटबानी — श्री प्रकाश (हिन्दुस्थानी)

अब लीला हम जाहेर करें, ज्यों सुख सैयां हिरदे धरें ।
पीछे सुख होसी सबन, पसरसी चौदे भवन।।१

अब हम परमधामकी आनन्दमयी लीलाएँ प्रकट कर रहे हैं, जिनको हृदयमें धारण करने पर ब्रह्मात्माओंको अखण्ड सुखका अनुभव होगा. इसके पश्चात् संसारके सभी लोगोंको भी आनन्द प्राप्त होगा. इस प्रकार इन लीलाओंका प्रकाश चौदह लोकोंमें फैल जाएगा.
Now I am revealing the sports(leela) so that all the supreme souls will keep in their heart and thus experience bliss (The revealation of Brahm leela will give joy to the Brahm souls). Later, everyone will be able to experience the bliss of Brahm leela and this will expand to all the domains of existence (14 domains or lokas)

अब सुनियो ब्रह्मसृष्ट बिचार, जो कोई निज वतनी सिरदार ।
अपने धनी श्री स्यामा स्याम, अपना बासा है निजधाम ।।२
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हे परमधामकी शिरोमणि आत्माओ ! विचार पूर्वक सुनो. अपने धनी (आत्माके स्वामी) श्यामा-श्याम (श्यामावर श्याम) अक्षरातीत श्रीकृष्ण हैं और अपना मूल घर निजधाम – (परमधाम) है.
O Brahmashriti!(the souls from Paramdham, the chosen souls, the divine souls from 4 heaven) behold and ponder, those who are the head of the abode(leader of the group) our Lord is Shri Shyama and Shyam (Shyama Shyam in Paramdham) and our original (primordial) residence is ultimate abode of the self (Nijdham) निज वतनी.
First and foremost, Mahamati Prannath is making us clear that in Paramdham our Lord is Shyam consort His Shyama. The original at source, the Supreme Brahm in Aksharateet Paramdham is Shyam – Shri Krishna! with all the Brahm (supreme) souls. The moolswaroop in Paramdham Nijdham is Shyama’s Shyam.
(
श्रीठकुरानीजी रूहअल्ला, महंमद श्रीकृस्नजी स्याम।
सखियां रूहें दरगाह की, सुरत अक्षर फिरस्ते नाम।।५३

इसी प्रकार श्रीठकुराणीजीको रूहअल्लाह एवं श्यामसुन्दर श्रीकृष्णजीको मुहम्मद कहा है तथा ब्रह्मात्माओंको दरगाहकी रूह एवं अक्षरब्रह्मकी सुरताको फरिश्ता नाम दिया है.
खुलासा फुरमानका (कुरानका स्पष्टीकरण) श्री खुलासा
Our Thakurani RoohAllah(Shyama) and Mohamad is Shri Krishna Shyam. The souls of the eternal home (dargah) are Sakhiyan(chosen souls) and the astral figures of Akshar(Noor Jalal) are the angels(farishte)! This is the introduction to Aksharaateet Shri Krishna and Shyama his consort. Mohmad means praise worthy is mentioned 4 times in Holy Quran.
प्रकरण १२ श्री खुलासा
घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३
हमारा घर अखण्ड परमधाम तथा हमारे धनी श्रीकृष्ण यही तारतमका सार फल है. इस तारतम ज्ञाान द्वारा अत्यन्त प्रकाश फैलता है. जिससे मनमें किसी भी प्रकारकी शंका नहीं रहती है.
Our abode is Paramdham(akhand aksharateet) and Shree Krishna, this the fruit of Tartam (dispeller of the ignorance brought by Shree Devachandraji). The light of this is so great that all the confusion from mind is removed.
Shri Krishna = Anadi Aksharateet in Paramdham (Everyone knows the name Shri Krishna without Tartam it does not lead to the supreme)
प्रकरण ३३ श्री प्रकास (गुजराती)
)

सोई अखंड अक्षरातीत घर, नित बैकुंठ मिने अक्षर ।
अब ए गुझ करूं प्रकास, ब्रह्मानंद ब्रह्मसृष्टि विलास ।।३

वही घर अखण्ड और अक्षरातीत कहलाता है और अक्षरब्रह्मके अन्तर्गत नित्य वैकुण्ठ माना गया है. अब मैं ब्रह्मसृष्टियोंके ब्रह्मानन्दमय नित्य विलासके गुह्य रहस्यको प्रकाशित करता हूँ.
It is indivisible, imperishable, beyond Akshar, Aksharateet abode, this is eternal home of Akshar too. Now I will reveal the secret, throw light on this mystery about the supreme bliss and sports of Brahmshriti. Pragat vani means the appearance of words by Supreme for the chosen souls! This vani is to guide the souls to remember their original self and their relationship with the Supreme.

ए बानी चित दे सुनियो साथ, कृपा कर कहें प्राणनाथ ।
ए किव कर जिन जानो मन, श्रीधनीजी ल्याए धामथें बचन ।।४

हे सुन्दरसाथजी ! इन वचनोंको ध्यान देकर सुनिए, क्योंकि हमारे प्राणोंके नाथ सद्गुरु कृपा पूर्वक ये वचन कह रहे हैं. इनको कविताएँ मत समझना. साक्षात् धामधनी परमधामसे इन वचनोंको लेकर सद्गुरुके रूपमें पधारे हैं.
Listen these words with attention and think deeply oh my Sundarsath, out of mercy, compassion and grace our Lord Prananth(the Master ) has said it. Do not take it as mere poem, our Master has brought these words from Paramdham.

सो केहेती हूं प्रगट कर, पट टालूं आडा अंतर।
तेज तारतम जोत प्रकास, करूं अंधेरी सबको नास।।५

उन्हीं बातोंको प्रकट कर मैं यहाँ कह रहा हूँ. तुम्हारे हृदयके अज्ञाानरूपी आवरणको दूर करता हूँ. तारतम ज्ञाानकी ज्योति जलाकर उसके प्रकाशसे सबके हृदयमें व्याप्त अज्ञाानरूपी अन्धकारको नष्ट करता हूँ.
That is what I am manifesting the words of Lord thus removing the obstrucle (veil) of within. By the light of sharp Tartam jyot (flame that eliminates the darkness of ignorance) , I will destroy all types of darkness present in all domains.

अब खेल उपजे के कहूं कारन, ए दोऊ इछा भई उतपन ।
बिना कारन कारज नहीं होए, सो कहूं याके कारन दोए ।।६

अब सृष्टि रचनाके कारण कह रहा हूँ. यह सृष्टि दो प्रकारकी इच्छाओंके कारण उत्पन्न हुई है. क्योंकि कारणके बिना कार्य नहीं होता है. इसलिए इस रचनाके भी दो कारण बताए गए हैं.
Now I will tell the cause of this creation of play, it is created because of two desires. Nothing happens without a reason. Now I will tell you two reasons of the creation.

ए उपजाई हमारे धनी, सो तो बातें हैं अति घनी ।
नेक तामें करूं रोसन, संसे भान देऊं सबन।।7

उपरोक्त दोनों इच्छाएँ हमारे धामधनीने ही उत्पन्न करवाईं हैं. यह रहस्यपूर्ण प्रसंग है. उसको थोड.ा-सा प्रकाशित (स्पष्ट) कर सबके हृदयके संशयका निवारण कर देता हूँ.
Fundamentally, our Lord Supreme created the desire, this is very complex matter hence I will just be brief to illuminate the matter and end the confusion. (The desire in Supreme souls arose due to Supreme Brahm needs deeper understanding!)

अब सुनियो मूल बचन प्रकार, जब नहीं उपज्यो मोह अहंकार ।
नाहीं निराकार नाहीं सुन, ना निरगुन ना निरंजन।।८

ना ईस्वर ना मूल प्रकृति, ता दिनकी कहूं आपाबीती।
निज लीला ब्रह्म बाल चरित, जाकी इछा मूल प्रकृत।।९

अब सृष्टि रचनासे पूर्वकी मुख्य लीलाको ध्यान पूर्वक सुनो. जब मोह और अहंकारकी उत्पत्ति नहीं हुई थी और शून्य, निराकार, निर्गुण तथा निरंजनकी भी उत्पत्ति नहीं हुई थी, न ईश्वर ही थे और न ही मूल प्रकृति उत्पन्न हुई थी, उस समय हम ब्रह्मात्माओंके साथ क्या घटना घटी (हुई) उसकी आपबीती कहता हूँ. सच्चिदानन्द पूर्ण ब्रह्म परमात्माके सत्य अंग स्वरूप अक्षरब्रह्म बाल स्वभाव प्रेरित लीलाएँ करते हैं. संसार रचनाकी उनकी इच्छा मूल प्रकृति कहलाती है.
Now listen the original words(the source) before the creation of the Moh(attachment) and Ahankar(Ego). There was nothing(neither formlessness nor beyond three attributes-Nirgun and the formless Brahm Niranjan), neither the Lord of the Universe(Narayan) nor the prakriti(nature). This is before the creation began, I will tell you events of that day. The Nijleela(Leela of the Self) of Truth attributes of Brahm has child like nature. The desire to create is his original nature. Truth embody of Supreme Brahm is very creative in nature(desires to create the universes)!

नैन की पाओ पलमें इसारत, कै कोट ब्रह्मांड उपजत खपत ।
इत खेल पैदा इन रवेस, त्रैलोकी ब्रह्मा विस्नु महेस।।१०

(इसी मूल प्रकृतिके द्वारा) अक्षर ब्रह्म पाव पलक (एक पलके चतुर्थ अंश मात्र समय) में संकेत मात्रसे करोड.ों ब्रह्माण्डोंको बनाकर मिटा देते हैं. वे इस प्रकारके खेल बनाते रहते हैं जिसमें त्रिलोकाधिपति ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव होते हैं.
In the blink of eyes, zillions of universes are created and destroyed. He keeps playing such games in which there are Brahma Vishnu and Mahesh.

कै विध खेले यों प्रकृत, आप अपनी इछासों खेलत।
या समे श्री बैकुंठनाथ, इछा दरसन करने साथ।।११

अक्षरब्रह्म स्वेच्छासे ही इस प्रकारकी प्राकृत लीलाएँ करते रहते हैं. नित्य वैकुण्ठके स्वामी अक्षरब्रह्म नित्य प्रति अक्षरातीतके दर्शन करते हैं. इसबार उन्हें ब्रह्मात्माओंके भी दर्शन करनेकी अभिलाषा हुई.
Akshar Brahm(Truth embody of Satchidanand Brahm) plays many such sports and this He plays for His pleasure and own wishes. At this moment He wished to see the Supreme and came over.

अक्षर मन उपजी ए आस, देखों धनीजी को प्रेम विलास ।
तब सखियों मन उपजी एह, खेल देखें अक्षर का जेह ।।१२

अक्षरब्रह्मको यह अभिलाषा हुई कि अक्षरातीत धामधनीके प्रेम विलासका दर्शन करूँ. उसी समय ब्रह्मात्माओंके मनमें भी इच्छा उत्पन्न हुई कि अक्षरब्रह्मका (मायावी) खेल देख लिया जाए.
Akshar Brahm wished to see the beloved Lord’s sport of love with Supreme souls and at the same time the supreme souls residing with Supreme Brahm became curious of Akshar and His sports.
{
एक नूर और नूर तजल्ला, कहे ठौर दोए।
ए नाहीं जुदे वाहेदत से, हैं बका बीच सोए।।३१

वैसे तो अक्षरधाम तथा परमधाम दोनोंका भिन्न-भिन्न उल्लेख है किन्तु दोनों अक्षरातीत परब्रह्म परमात्माके अद्वैत स्वरूपसे भिन्न नहीं है. इसलिए दोनों ही अखण्ड हैं.
प्रकरण १४ श्री मारफत सागर

}

तब हम जाए पियासों कही, खेल अक्षर का देखें सही ।
जब एह बात पियाने सुनी, तब बरजे हांसी करने घनी ।।१३

तब हम सब ब्रह्मात्माओंने जाकर धामधनीसे कहा कि हम अक्षरब्रह्मका खेल देखना चाहतीं हैं. जब यह बात धनीने सुनी तो हमारी हँसी करनेके लिए वे हमें रोकने लगे.
Then we requested our beloved to show us the sports of Akshar. When our beloved Lord heard our request, mocking at us he tried to dissuade us.

मने किए हमको तीन बेर, तब हम मांग्या फेर फेर फेर ।
धनी कहे घरकी ना रेहेसी सुध, भूलसी आप ना रेहेसी ए बुध ।।१४

उन्होंने हमें तीन-तीन बार इसके लिए रोका. तब उत्सुकतावश हमने भी बार-बार खेल देखनेकी माँग की. तब धनीजीने कहा, तुम्हें अपने घरकी भी सुधि नहीं रहेगी. तुम स्वयंको भी भूल जाओगी और यहाँ जैसी बुद्धि भी तुम्हारे पास नहीं रहेगी.
For three times he refused our request, but we asked again and again. He warned us, you will not have consciousness of your home, your own self and you will forget everything and you will also not have this divine intelligence. (You will forget everything, be unconscious and will lack intelligence)

तो मने करत हैं हम, हमको भी भूलोगे तुम।
तब हम फेर धनीसों कह्या, कहा करसी हमको माया ।।१५

मैं इसलिए मना कर रहा हूँ कि तुम मुझे भी भूल जाओगी. तब हम लोगोंने धामधनीसे पुनः कहा कि यह माया हमारा क्या बिगाड. सकेगी ?
That is why I am declining your this request over there, you will even forget me. Lord is expressing concern that the souls will totally forget even Him and hence He is not eager to show them this sport of Maya(illusion)! (This is also a some sort of hint that Lord loves us so much)
Then we told our beloved Lord what harm can Maya do to us?

तब हम मिलके कियो बिचार, कह्या एक दूजीको हूजो हुसियार ।
खेल देखनकी हम पियासों कही, तब हम दोऊ पर आग्या भई ।।१६

पुनः हम सभीने मिलकर विचार किया और एक दूसरेको सचेत रहनेके लिए कहा. जैसे ही हमने धामधनीसे खेल देखनेकी अपनी तैयारी बताई तब हम दोनोंको (अक्षरब्रह्मको सृष्टि रचनाके लिए और हमें उसे देखनेके लिए) आज्ञा हुई.
Then we all pondered together, cautioned one another to be alert, also promised to awaken one another and asked our beloved to show us the game of creation of Akshar. Then Lord accepted our request and gave permission to both of us (the souls to watch and Akshar Brahm to create).

ए कहे दोऊ भिंन भिंन, खेल देखन के दोऊ कारन ।
उपज्यो मोह सुरत संचरी, खेल हुआ माया विस्तरी ।।१7

इस प्रकार सृष्टि रचनाके दोनों अलग-अलग कारण कहे गए हैं. (धनीजीकी आज्ञाा होते ही) सर्वप्रथम मोहतत्त्व उत्पन्न हुआ और उसमें अक्षर ब्रह्मकी सुरताका संचार हुआ, फिर मायाका विस्तार होते ही सृष्टिकी रचना हुई.
Now these two different desires became the cause of this creation.
First and foremost the creation of element of Moh(attachment, ignorance of the self) then expansion of the illusion(Maya) thus created the game.

इत अक्षर को विलस्यो मन, पांच तत्त्व चौदे भवन ।
यामें महाविस्नु मन मनथें त्रैगुन, ताथें थिर चर सब उतपन ।।१८

इधर अक्षरब्रह्मका मन विलसित हुआ कि मायासे पाँच तत्त्व और उनसे चौदह लोकोंकी रचना हुई. इस खेलमें अक्षर ब्रह्मका मन महाविष्णुके रूपमें प्रकट हुआ और उससे तीन गुण (सत, रज, तम और उनके देवता-ब्रह्मा, विष्णु महेश)उत्पन्न हुए एवं उनसे स्थावर एवं जंगम सृष्टिकी उत्पत्ति हुई.
Out of Akshar Brahm’s playful mind created the five elements and 14 domains. From His mind Lord Mahavishnu(Aadi narayan) and from the mind of Mahavishnu the three natures(Brahm,Vishnu,Mahesh ) and from these three nature the entire animate and unanimate beings created.

या विध उपज्यो सब संसार, देखलावने हमको विस्तार ।
जो आग्या भई हम पर, तब हम जान्या गोकल घर ।।१९

हमें अक्षरब्रह्मकी लीलाका विस्तार दिखानेके लिए इस प्रकार सृष्टिकी रचना हुई. जैसे ही हमें खेल देखनेकी आज्ञाा हुई (तो हमारी सुरता जगतके उत्तम जीवों पर उतर आई) तब हमें ज्ञाात हुआ कि हमारा घर गोकुल है.
This way the world is created to show us the sport of Akshar Brahm. When Lord allowed us to go, we found ourselves in the Gokul.

ज्यों नींदेमें देखिए सुपन, यों उपजे हम ब्रजबधू जन ।
उपजत हीं मन आसा घनी, हम कब मिलसी अपने धनी ।।२०

जैसे नींदमें स्वप्न देखा जाता है उसी प्रकार हम सभी आत्माएँ व्रज वनिताओंके रूपमें व्रजमें उत्पन्न हुई. व्रजमें आते ही मनमें बड.ी अभिलाषा हुई कि हम सब अपने धामधनीसे कब मिलेंगी.
Like one sees in dream, we arrived at Gokul as brides of Braj. As soon as we came we longed to see our Lord and wondered will be able to see Him again. (Although at Braj the souls lack consciousness, there is presence of Love of Supreme in the heart. As soon as they were created as Braj and Badhu their mind (the mann) is hoping intensely to unite with ‘our’ Lord)! There is seeking to unite with the beloved Lord.

जेती कोई हैं ब्रह्मसृष्ट, प्रेम पूरन धनी पर द्रष्ट।
कंसके बंध वसुदेव देवकी, इत आई सुरत चत्रभुज की ।।२१

जितनी भी ब्रह्मात्माएँ हैं उन सबकी प्रेमपूर्ण दृष्टि अपने प्रियतम धनी पर टिकी रहती है. (उधर) कंसके कारागृहमें वसुदेव देवकीके सामने चतुर्भुज स्वरूप भगवान विष्णुकी सुरत प्रकट हुई.
Those who are Brahmshristi the celestial souls from Paramdham, their full attention with love was always on our beloved (our Lord of Paramdham). Brahmshristi were drenched in the love of beloved Lord and always contemplated on Dhamdhani (even in amnesia). (The seed of love is always there in Brahmshristi!)
Watch Maharaas
Lord Vishnu(Lord with four hands) appeared before Vasudev and Devaki who were imprisoned by Kans.

सुरत विस्न्ुकी चत्रभुज जोए, दियो दरसन वसुदेव को सोए ।
पीछे फिरे केहेके हकीकत, अब दोए भुजा की कहूं विगत ।।२२

भगवान विष्णुके इस चतुर्भुज स्वरूपने वसुदेव देवकीको दर्शन दिया एवं आने वाले दिव्य बाल स्वरूपका बोध करवाया और उन्हें गोकुल पहुँचानेकी बात कहकर वे अन्तर्धान हो गए. अब द्विभुज स्वरूपका विवरण कहते हैं.
The one who has four hands (Lord Vishnu) appeared before Vasudev and he told about the reality about the child to be born. Now I will discuss about the two handed child(new born).

मूल सुरत अक्षर की जेह, जिन चाह्या देखों प्रेम सनेह ।
सो सुरत धनीको ले आवेस, नंद घर कियो प्रवेस ।।२३

जिन अक्षरब्रह्मकी मूल सुरता (चित्तवृत्ति) ने पूर्णब्रह्म परमात्मा एवं ब्रह्मात्माओंकी विलास लीला देखनेकी इच्छा की थी, उसी (सुरता) ने परब्रह्म परमात्माकी आवेश शक्ति लेकर नन्दजीके घरमें प्रवेश किया.
The original desire of Akshar Brahm to see the leela of Supreme with the celestial souls, the astral body of the same desire along with the inspiration of the Supreme, entered in the house of Nand. (Astral body of Akshar with the inspiration of the Supreme Brahm entered into the house of Nand.)

दो भुजा सरूप जो स्याम, आतम अक्षर जोस धनी धाम ।
ए खेल देख्या सैयां सबन, हम खेले धनी भेले आनंद घन ।।२४

दो भुजा स्वरूप श्याम (श्रीकृष्णजी) के अन्दर अक्षरब्रह्मकी आत्मा और धामधनीका जोश विद्यमान था. इन धामधनीके साथ हम सब ब्रह्मात्माआंेेने आनन्दमयी लीला की और संसारका खेल भी देखा.
Now, the two handed appearance which is Shyam-the soul is Akshar but the inspiration are of our beloved Lord Supreme of Aksharateet (all the activities are of Supreme, the soul(Akshar) is just witnessing it). All the celestial souls saw the game and also enjoyed with the beloved Lord(Aksharateet Shri Krishna) very much.
About Dhamdhani’s Josh in Meharsagar.
(
ज्यों मेहेर त्यों जोस है, ज्यों जोस त्यों हुकम।
मेहेर रेहेत नूर बल लिएं, तहां हक इसक इलम।।२८

जैसे ही श्रीराजजीकी कृपा प्राप्त होती है वैसे ही उनका जोश तथा उनकी आज्ञाा प्राप्त होती है. वस्तुतः यह कृपा तेजोमय शक्तिके साथ ही रहती है उसके साथ श्रीराजजीका प्रेम तथा ज्ञाान भी रहते हैं.
Where there is grace there is Lord’s inspiration and where there is inspiration of the Lord,over there issues forth His Will. In the grace that sprouts from the power of the Supreme light there also exist the ultimate love of/for the Lord and the absolute wisdom.
: 28 meharsagar
)

बाल चरित्र लीला जोवन, कै विध सनेह किए सैयन ।
कै लिए प्रेम विलास जो सुख, सो केते कहूं या मुख ।।२५

बाल चरित्र एवं यौवन लीलाओंके द्वारा उन्होंने (श्रीकृष्णजीने) ब्रह्मात्माओंको विभिन्न प्रकारसे स्नेह प्रदान किया. इस प्रेम विलासमें इतना सुख प्राप्त हुआ कि इस जिह्वासे उसका वर्णन नहीं हो सकता.
First with Baal leela (sport of child) and youth leela and many more types of leela, beloved Lord showered love on all the souls. There were many blissful and act of love, how can I describe those joys(it is hard to express the internal experiences)!

ए कालमायामें विलास जो करे, सो पूरी नींदमें सब विसरे ।
पूरी नींद को जो सुपन, कालमाया नाम धराया तिन ।।२६

कालमायासे प्रभावित इस व्रज मंडलमें जितनी विलास पूर्ण लीलाएँ हुईं, उसमें पूरी नींद (अज्ञाान) के कारण हमें अपने सम्बन्धोंका कुछ भी भान नहीं रहा. गहरी नींदमें स्वप्नके समान की गई इस लीलाको कालमाया कहा गया है.
The sport in Kaalmaya (illusion of time), all the joyful leela that took place, there was complete unconsciousness among the souls. Like a dream in deep sleep, the leela of Kaalmaya is called as such.

तब धाम धनिएं कियो बिचार, ए दोऊ मगन हुए खेले नर नार ।
मूल बचन की नाहीं सुध, ए दोऊ खेले सुपने की बुध ।।२7

ऐसी स्थितिमें धामधनीने विचार किया कि ये दोनों (अक्षरब्रह्म एवं ब्रह्मात्माएँ) मग्न होकर खेल रहे हैं. ये दोनों स्वप्नकी बुद्धिसे खेल रहे हैं, इसलिए इन्हें मूल वचन (सृष्टिपूर्वके वार्तालाप) की सुधी नहीं है.
Then Lord of Abode thought these two (Akshar and Brahm souls) are totally engrossed in playing and they are playing with mind of the dream (they have no clue of the self and mind of the soul) and they have no consciousness of their original word to beloved Lord .

एह बात धनी चितसों ल्याए, आधी नींद तब दई उडाए ।
अग्यारे बरस और बावन दिन, ता पीछे पोहोंचे वृन्दावन ।।२८

ऐसा मनमें सोचकर धामधनीने नींदका आधा आवरण दूर कर (हटा) दिया. उस समय व्रज मण्डलमें ग्यारह वर्ष और बावन दिन बीत चुके थे. अब वे दोनों (रासलीलाके लिए) वृन्दावन चले गए.
When Lord pondered over this, then he removed half the sleep(unconsciousness)(This is still at Braj that Lord made the souls partly conscious). The eleven years and 52 days Lord played in Braj after that He went to Brindavan.

Watch this how Gopis desired to get Shri Krishna!

तहां जाए के बेन बजाई, सखियां सबे लई बुलाई ।
तामसियां राजसियां चलीं, स्वांतसियां सरीर छोडके मिलीं ।। २९

वृन्दावनमें जाकर श्रीकृष्णजीने वंशी बजाई और सभी ब्रह्मात्माओंको अपने पास बुला लिया. वंशीकी आवाज सुनते ही तामस स्वभाव एवं राजस स्वभावकी सखियाँ तत्काल चल पड.ीं, (विलम्ब होने पर) सात्विक (स्वातस) स्वभावकी सखियाँ अपना शरीर छोड.कर (सुरताके रूपमें) अपने प्रियतमसे जा मिलीं.
Our Lord first made the souls partly conscious and then went to Vrindavan, Lord Shri Krishna, played the flute and called all the souls. Listening to the flute, the tamasi and rasasi souls walked but swantsiya left their physical body and went there in their astral body.

और कुमारका ब्रज बधू संग जेह, सुरत सबे अक्षर की एह ।
जो व्रत करके मिली संग स्याम, मूल अंग याके नाहीं धाम ।।३०

व्रजमण्डलमें गोपियोंके साथ जो कुमारिका सखियाँ थीं वे अक्षर ब्रह्मकी सुरतासे उत्पन्न हुई थीं. (उन्होंने कात्यायनीका व्रतकर श्रीकृष्णलीलामें सम्मिलित होनेका वार माँगा था) वे भी सुरताके रूपमें ब्रह्मात्माओंके साथ जाकर श्यामसुन्दरसे मिलीं. इनके मूल अंग (परात्म) परमधाममें नहीं हंै.
The kumarika gopis all those have astral body of Akshar, who had done worship and fasting of Katyanika and had received boon to unite with Shri Krishna, and thus they united with Shyam (will witness the Brahmleela) but they do not have a ’ang’ (soul) in Paramdham.

बेन सुनके चली कुमार, भवसागर यों उतरी पार ।
इनकी सुरत मिली सब सखियों मांहि, अंग याके रासमें नांहिं ।।३१

वंशीकी ध्वनि सुनते ही कुमारिकाएँ भी चल पड.ीं. उन्होंने इस प्रकार भवसागर पार किया. उनकी सुरताएँ ब्रह्मात्माओंके साथ सम्मिलित हुईं. रासलीलामें उन्हें दिव्य शरीर नहीं मिले.
Even the kumarikas ran after listening the flute and thus could easily cross the ocean of world(world of desires, attachments and ignorance). Their astral body united with the body of celestial souls. The 24,000 astral bodies of Akshar(Kumarika Gopis) did not gain physical body in Raas (They witnessed the raas residing along with the astral body of supreme souls who gained the body to play Raas, so in one physical body there were three astral bodies(2 kumarikas, 1 brahm) witnessing the bliss of Raas).

या विध मुक्त इनों की भई, कुमारका सखियां जो कही ।
ए जो अग्यारे बरस लों लीला करी, कालमाया तितहीं परहरी ।।३२

इस प्रकार कुमारिका सखियोंकी मुक्ति हुई है. श्रीकृष्णने ग्यारह वर्ष तक व्रजमण्डलमें लीलाएँ की और तत्काल ही कालमायाका परित्याग किया (अर्थात् कालमाया जनित ब्रह्माण्डको अक्षर ब्रह्मने अपने हृदयमें अंकित किया).
Thus Kumarika got liberated. Now, Supreme sported for 11 years and left the Kaalmaya universe.

कछू नींद कछू जाग्रत भए, जोगामाया के सिनगार जो कहे ।
जोगमाया में खेले जो रास, आनन्द मन आनी उलास ।।३३

ब्रह्मात्माओंने योगमाया द्वारा र्नििमत ब्रह्माण्डमें योगमायाके ही शृङ्गार धारण कर कुछ नींद और कुछ जागृत अवस्थामें रासकी लीलाएँ की. इस प्रकार ब्रह्मात्माओंने योगमायामें आनन्द और उल्लासके साथ लीलाएँ कीं.
Partly sleepy and partly conscious and awake the souls adorned(attained the spledour) themselves with ornaments of Yogmaya. The souls played Raas in Jogmaya universe. Here the souls played and expreienced lots of joy and blissful sports.

जोगमाया में खेल जो खेले, संग जोस धनी के भेले ।
जोगमाया में बाढयो आवेस, सुध नहीं दुख सुख लवलेस ।।३४

योगमायाके ब्रह्माण्डकी इस रास लीलामें ब्रह्मात्माओंने पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णके आवेश स्वरूप श्रीकृष्णके साथ विभिन्न प्रकारकी लीलाएँ की. योगमायामें प्रेमका आवेग इतना बढ. गया कि उनको दुःख और सुखकी थोड.ी-सी भी अनुभूति नहीं हुई.
Sports played in Yogmaya was with the inspiration (josh)of the Master (Dhani ) Aksharateet Shri Krishna Shyam. Here the Lord’s inspiration kept rising and souls had no trace of consciousness of joy and sorrow. !
फेर मूल सरूपें देख्या तित, ए दोउ मगन हुए खेलत ।
जब जोस लियो खेंच कर, तब चित चौंक भई अक्षर ।।३५
मूल स्वरूप पूर्णब्रह्म परमात्माने पुनः देखा कि अक्षरब्रह्म एवं ब्रह्मात्माएँ दोनों ही आनन्दमें मग्न होकर लीला कर रहे हैं. उन्होंने अपना जोश खींच लिया, तब अक्षरब्रह्मका चित्त एकाएक चौंक गया.
Again, the Supreme(Remember Moolswaroop Shyam is totally awake, aware and is actively participating in this sport) saw that Akshar and the Brahm souls are playing totally immersed in the joy. Then Lord pulled out the inspiration (Aksharateet Shri Krishna disappeared), this alerted astral Akshar(brought awareness of His presence) and he became conscious of himself and the surrounding .
(moolswaroop Akshar created the universe but the astral mind of Akshar is unaware of himself. Supreme wants the moolswaroop to be present in the astral)

कौन वन कौन सखियां कौन हम, यों चौंकके फिरी आतम ।
रास आया मिने जाग्रत बुध, चूभ रही हिरदे में सुध ।।३६

अरे ! यह कौन-सा वन है ? ये कौन-सी सखियाँ हैं ? इनके साथ खेलनेवाला मैं कौन हूँ ? इस प्रकार चौंक कर विचार करते ही अक्षरब्रह्मकी सुरता (आत्मा) स्वयंमें लौट आई. तब उनकी जागृत बुद्धिमें रासलीला अंकित हुई और उनके हृदयमें जाकर समाहित हो गई.
Now Akshar pondered which forest is this(Where am I ), who are these girls and Who am I and thus he got alerted and diverted the attention towards the soul and thus His astral body reached back to Akshar and this awakened Akshar. (This is technique to get awakened). Now, the next part of Raas, Akshar witnessed with awakened mind where the consciousness was pricking the heart.
(Fully conscious of the self with Awakened mind Akshar witnessed the remaining Raas played between the soul and the Supreme (brahmatma and Shri Krishna))!
( Mool Akshar is the creator and his surta is currently in the Raas but this surta has his own mind.
Why surta Akshar (astral) has to realize Himself at this hour? Because Aksharateet Shri Krishna’s power were working all this time. Unless the astral figure realizes the self the consciousness of mool Akshar cannot activate. Beloved Lord wanted Akshar to witness the Raas with awakened mind of mool and fulfill his desire to see the leela of Brahm (Supreme) with souls. The same is true for Brahmvasana in jaagani.)

कै सुख रास में खेले रंग, सो हिरदे में भए अभंग ।
या विध रास भयो अखंड, थिर चर जोगमाया को ब्रह्मांड ।।३7

रास लीलामें आनन्द मग्न होकर खेले गए सभी खेल अक्षरब्रह्मके हृदय पट पर अमिट रूपसे अंकित हो गए. इस प्रकार रास लीला सहित सचराचर योगमायाका ब्रह्माण्ड अक्षर ब्रह्मके हृदयमें अंकित हुआ.
Later, many more blissful sports (Brahm leela that takes place in the Paramdham) were played and all this are impressed in the heart of Akshar forever. Thus the Raas became everlasting joy for eternity along with the conscious Yogmaya universe. (Yogmaya Universe is a conscious creation, the trees, rivers, rocks everything were full of consciousness and awareness and witnessing the Raas thus all the consciousness became eternal).

तब इत भए अंतरध्यान, सब सखियां भइंर् मृतक समान ।
जीव ना निकसे बांधी आस, करने धनीसों प्रेम विलास ।।३८

तब इधर वृन्दावनमें श्रीकृष्ण अन्तर्धान हुए और सभी सखियाँ उनके वियोगमें मृतप्रायः हो गइंर्. अपने धनीके साथ प्रेम विलासकी आशा बँधी हुई होनेके कारण (प्रिय मिलनकी आशामें) उनकी आत्माने देहका परित्याग नहीं किया.
When Aksharateet Shyam disappeared, then all the sakhiyan(souls) became morose like dead. The soul did not come out because of hope of uniting with the beloved and continue to play the game of love.

बिरह सैयोंने कियो अत, धनी दियो आवेस फेर आई सुरत ।
तब सैयों को उपज्यो आनंद, सब बिरहा को कियो निकंद ।।३९

इस प्रकार सखियोंने अतिशय विरह विलाप किया. तब धामधनीने पुनः अपना आवेश दिया और अक्षरब्रह्मकी सुरता श्रीकृष्णके साथ पुनः प्रकट हुई. तब ब्रह्मात्माओंको अतिशय आनन्द प्राप्त हुआ. इस प्रकार श्रीकृष्णजीने सबके विरहको मिटा दिया.
The souls suffered the extreme pain of separation(another technique of uniting with beloved Lord) then beloved Lord brought back the inspiration in astral body of Akshar. Then all the souls gained the bliss and no more felt the pain of separation.

आया सरूप कर नए सिनगार, भजनानंद सुख लिए अपार ।
दोऊ आतम खेले मिने खांत, सुख जोस दियो कै भांत ।।४०

श्रीकृष्णजीका यह नया स्वरूप नूतन शृङ्गारके साथ प्रकट हुआ है, जिनसे ब्रह्मात्माओंने भजनानन्दके अपार सुख प्राप्त किए. दोनों आत्माएँ (अक्षरब्रह्म एवं ब्रह्मात्माएँ) अति चाहसे खेलते रहे. धामधनीने उन्हें अपना जोश प्रदान कर अनेक प्रकारके सुख दिए.
Now, Lord has come with novelty (consciousness about the self, awareness of the presence of the Supreme and awakened mind (the mind of the soul in Paramdham witnessing it)) which souls enjoyed the infinite bliss of hymns(the bliss in singing the praise of Lord). Both the souls played with lots of interest and Lord inspired the game to provide the bliss in various ways.

कै बिरह विलास लिए मिने रात, अंग आनंद भयो जोलों प्रात ।
रास खेल के फिरे सब एह, साथ सकल मन अधिक सनेह ।।४१

रास रात्रिमें संयोग और वियोग दोनों प्रकारकी लीलाओंका आनन्द प्राप्त किया. इस प्रकार प्रातः होने तक आनन्दलीलामें विहार करते रहे. रास खेलकर सभी ब्रह्मात्माओंकी सुरता परमधाम लौटी. उस समय सब ब्रह्मात्माओंके मनमें अत्यधिक स्नेह था.
Now in Raas sakhiya experienced the pain of separation and the joy of union thus Ang(soul) experienced ectasy thus it became morning(fully conscious) and returned back to Paramdham at that time, souls felt extreme love within themselves.

पीछे जोगमाया को भयो पतन, तब नींद रही अक्षर सैयन ।
व्रज लीलासों बांधी सुरत, अखंड भई चढि आई चित ।।४२

उसके उपरान्त (उनके लौट जाने पर) योगमायाका संवरण हुआ. तब अक्षर ब्रह्म और ब्रह्मात्माओंकी नींद बनी रही अर्थात् इस लीलाके प्रति उनका लगाव अभी भी बना रहा. इसलिए व्रज लीलामें उनकी सुरता बँध गई और व्रजलीला उनके चित्तमें स्थिर होकर अखण्ड हुई.
The purpose of Jogmaya universe was done and thus it disappeared but Akshar brahm and the souls got attached to the sport of unconsciousness and their astral body tied themselves with the sport in Braj(recollected the braj leela) thus the leela became eternal at this time!
For reference
(
Braj
———
This braj leela is eternal(akhand) and goes on day and night(continuous)
we are playing with our beloved Lord.
The पूरे पीउजी (the absolute whole beloved) is fulfilling our wishes!
ए सदा नवले रंग In color of novelty, there is always freshness which is eternal (the Brahmic bliss is eternal, everlasting yet refreshing)!

अखंड लीला अहेनिस, हम खेलें पिया के संग।
पूरे पीउजी मनोरथ, ए सदा नवले रंग।।४४

हम सब सखियाँ रात-दिन श्री कृष्णजीके साथ अखण्ड लीला करतीं हैं. प्रियतम श्री कृष्णजी सदैव नई नई रंग द्वारा हमारे
मनोरथ पूर्ण करते हैं.

श्रीराज व्रज आए पीछे, व्रज वधू मथुरा ना गई।
कुमारका संग खेल करते, दान लीला यों भई।।४५

श्री राजजी (श्री कृष्णजी) जबसे व्रजमें आए, तबसे व्रजवधु (गोपिकाएँ) दूध-दधि बेचनेके लिए मथुरा नहीं गइंर्. कुमारिकाएँ (अक्षरकी सुरताकी सखियाँ) गोपियोंकी देखादेखी दूध दधि बेचनेका बहाना बनाकर श्री कृष्णजी के साथ खेल करतीं थीं. (उनका दूध-दधि लूटकर श्री कृष्णजी ग्वालोंको देते थे) इस प्रकार उनके साथ दानलीला होती थी.
When Shri Raaj= Shri Krishna arrived at Braj, the Gopis did not go to Mathura even the Kumarikas(24000 Ishwari Shristi-Akshar’s astral figures) also joined the Brahmshristi and they all enacted the daan leela (the sport where Shri Krishna at Braj pretended to be tax officer
and would rob all the butter from the gopis and distribute it to his gwaal baal friends ). At Braj gopis are playing with Shri Krishna Shyam who is our beloved Lord.(There is only one Lord when it comes to Brahmshristi).
प्रकरण १९ चौपाई श्री कलश (हिन्दुस्तानी)
Raas
———–

इत खेलत स्याम गोपियां, ए जो किया अरस रूहों विलास।
है ना कोई दूसरा, जो खेले मेहेबूब बिना रास।।१३

इस रासमण्डलमें अक्षरातीत श्री कृष्ण एवं परमधामकी ब्रह्मात्माओं (गोपियों) ने लीला-विलास किया. वस्तुतः प्रियतम धनी अक्षरातीत
श्री कृष्णके अतिरिक्त अन्य कौन रासलीला रचा सकता है ?
Here the Shyam and Gopiya are playing, this is the sport/recreation of the soul of Arash(Paramdham). And non but our beloved is playing the Raas. There is none others but the Supreme! The celestial souls played Raas with no one but the beloved Mehboob the Shyam! Supreme souls were playing Raas with Supreme! (The experience of the soul is eternal and everlasting!)
The beloved is Shyam= Shri Krishna beloved (mehboob) of the Brahmshristi in first Kaalmaya of Braj and Raas! Remember souls, we are one and we have one beloved Lord i.e. Shyam Shri Krishna!

ए हमारी अरस न्यामतें, याके हम पें सहूर।
कह्या कतरा नूर का, चुआ है अंकूर।।१४

यह रासलीला हमारी परमधामकी सम्पदा है. इसलिए इसकी समझ भी हमारे पास ही है. यह रास मण्डल अक्षरब्रह्मके तेजका अंश होनेसे इसका सम्बन्ध भी अक्षरब्रह्मसे ही अङ्कुरित है.
These sports are our treasures of Paramdham and we can only contemplate and understand it. This Raas is sprouted from Akshar Brahm’s splendourous power (a droplet)
and hence is extremely splendours.Only celestial souls can contemplate this Raas sport
as a soul’s treasure in yogmaya brahmand.

इत सबद न पोहोंचे दुनी का, नेक इन की देऊं खबर ।
कायम हुआ सायत में, जो आया नूर नजर।।१५

संसारकी वैखरी (वाक शक्ति) वाणीके शब्दोंसे रासलीलाका वर्णन नहीं हो सकता, तथापि मैं इसका थोड.ा-सा वर्णन कर रहा हूँ. यह लीला अक्षरब्रह्मकी दृष्टिमें आनेसे उसी समय अखण्ड हो गई.
The speech cannot describe it (unspeakable), let me inform you first, since Akshar brahm witnessed the Raas and hence it became eternal.
Those who have not experience the raas must understand by what is explained but it cannot be explained or described this Mahamati is clearly telling, so how will duni understand it? Hence I can understand the misunderstanding amongst dunis!

ए जो बात बका अरस नूर की, सो केहेनी या जिमी माहें ।
क्यों सुनसी दुनी इन कानों, जो कबहूं ना सुनी क्यांहें ।।१६

अखण्ड धामोंके प्रकाशकी बात इस नश्वर जगतमें करनी है, इसलिए नश्वर जगतके जीव इन बातोंको, जो कभी कहीं भी नहीं सुनी
हैं, अपने कानोंसे कैसे सुन सकेंगे ?
To speak the splendour and light of the eternal Arash(Paramdham) in this physical world, why would the world pay attention to these words which was never spoken before (unheard to them)?
They cannot grasp it and cannot realize it. It is sometimes frustrating too! But those souls from Paramdham will immediately understand it and remember it!

कोट हिसे एक हरफ के, हिसाब किया मीहीं कर ।
एक हिसा न पोहोंच्या इन जिमी लग, ए मैं देख्या दिल धर ।।१7

मैंने इस लौकिक वचनोंके एक-एक शब्दकी सूक्ष्मरूपसे गणना करते हुए करोड.ों भाग किए. उनमें-से एक भाग भी रास मण्डलका स्पर्श नहीं कर सका अर्थात् रास मण्डल तक पहुँच नहीं पाया. यह मैंने भलीभाँति विचार कर लिया.
I will divide my one word in millions and calculated it microscopically and not even a single piece could touch the jogmaya brahmand of Raas and pondering about it deep in my heart I have seen this.
Trying to speak the Jogmaya brahmand of Raas, there is no word which can make express it. Mahamati is trying to speak the unspeakable.
प्रकरण ३९ सनंध

तीन ब्रह्मांड लीला तीन अवस्था, खिनमें देखे खेले संग आधार ।
धनी मैं अरधांग साथ अंग मेरा, इन घर सदा हम नित विहार ।।२० प्रकरण ५४ श्री किरंतन

इस प्रकार हमने तीनों ब्रह्माण्डों (व्रज, रास और जागनी) की तीनों लीलाओंको तीन अवस्था (बाल, किशोर और वृद्ध अथवा निद्रा, अर्धनिद्रा और जागृत) में आत्माके आधार स्वरूप प्रियतम धनीके साथ रहकर क्षणमात्रमें देखा. पूर्णब्रह्म परमात्मा मेरे धनी हैं. मैं उनकी अर्धाङ्गिनी हूँ. सुन्दरसाथ मेरा अङ्ग है. मूल वतन परमधाममें हम सब आनन्दपूर्वक नित्य विहार करती हैं.
Three universes and three states of consciousness
(First Kaalmaya the Braj the unconscious of the self and the relationship with the Lord- child like state in matter of consciousness ,
Second Yogmaya Raas partly conscious about the self and the relationship with the Lord youth like state ,
Third kaalmaya Jaagani recreated again the full consciousness adult like in matter of consciousness) we have sported with OUR beloved Lord in ONE moment.
O Master, I am part and parcel of your Supreme being and all the sundarsath are part of my soul in this imperishable abode, where we eternally dwell.
I am of your kind and all sundarsath are parts of my soul (full consciousness)
)—- Added related vani about braj raas from Kalash, Sanandh,Kirantan,Khulasa
pragatvani contd…

अक्षर चितमें ऐसो भयो, ताको नाम सदासिव कह्यो।
ब्रज रास दोऊं ब्रह्मांड, ए ब्रह्मलीला भई अखंड।।४३

अक्षरब्रह्मकी ऐसी चित्तवृत्तिको सदाशिव कहा गया है. व्रज और रास इन दोनों ब्रह्माण्डोंमें सम्पन्न हुई ब्रह्मलीला इस प्रकार अखण्ड हो गई.
Impression of Braj and Raas leela in Akshar’s mind is called Sadashiv and Braj and Raas leela in two different universe played by Supreme with His soul became eternal and everlasting.

ब्रज रास लीला दोऊं मांहिं, दुख तामसियों देख्या नाहिं ।
प्रेम पियासों ना करे अंतर, तो ए दुख देखे क्यों कर ।।४४

व्रज और रास इन दोनों लीलाओंमें तामस स्वभाववाली ब्रह्मात्माओंने अधिक दुःख नहीं देखा था, क्योंकि अपने प्रियतमके प्रेममें उन्होंने कुछ भी अन्तर (कमी) होने नहीं दिया. इसलिए वे अधिक दुःख देखती ही कैसे ? (क्योंकि संयोग एवं वियोग दोनोंमें प्रेमी आनन्दका ही अनुभव करता है.)
In both the leelas of Braj and Raas, Tamasi souls did not see suffering because they never allowed anything come between them and beloved Lord, they continued to love Supreme deep inside their heart then how can they ever witness any type of sufferings.
(The technique to end the suffering even in unconsciousness(neither aware of oneself, nor abode, nor Lord nor the world) is from depth of heart we must attach ourselves to the Aksharateet Shri Krishna our beloved)

कछुक हमको रह्यो अंदेस, सो राखे नहीं धनी लवलेस ।
ता कारन ए भयो सुपन, हुए हुकमें चौदे भवन।।४५

दुःख देखनेकी हमारी कुछ चाहना शेष रह गई थी किन्तु धामधनी हमारी इच्छाको लेशमात्र भी अधूरी रहने नहीं देते, इसलिए पुनः स्वप्नकी सृष्टि रची गई. धनीकी आज्ञााके कारण अक्षरब्रह्म द्वारा इस ब्रह्माण्डके चौदह लोक बन गए.
So there was some desires not completely fulfilled and our Master did not want even a trace of desire to be unfulfilled. That is why this world of dream was created again by the order of the Supreme, Akshar created the 14 lokas.
(Understand the desires first because dropping the wordly one and desiring the union with beloved Lord is only way to uniting with Him)

कालमाया को ए जो इंड, उपज्यो और जाने सोई ब्रह्मांड ।
ए तीसरा इंड नया भया जो अब, अक्षर की सुरत का सब ।।४६

इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति पुनः कालमाया द्वारा हुई, परन्तु सबको लगा कि यह वही (पहलेका ही) ब्रह्माण्ड है. यह तीसरा नया ब्रह्माण्ड अक्षरब्रह्मकी सुरता (इच्छाशक्ति) से ही बना हुआ है.
Now the new universe of Kaalmaya is made exactly the replica of the previous universe. Now this is the third universe created by the astral body of Akshar bhagawan.

याही सुरत की सखियां भई, प्रतिबिम्ब वेदरूचा जो कही ।
जाको कह्यो ऊधो ग्यान जोगारंभ, सो क्यों माने प्रेमलीला प्रतिबिम्ब ।।४7

अक्षरब्रह्मकी इसी सुरतासे अनेक सखियाँ प्रकट हुइंर्. प्रतिबिम्बलीलाकी इन सखियोंको वेदऋचा कहा गया है. इन्हीं वेद ऋचाओंको उद्धवने ज्ञाान और योगाभ्यासके द्वारा निराकार ब्रह्मकी उपासनाका उपदेश दिया था. ब्रह्मात्माओंकी प्रेमलीलाके प्रतिबिम्बरूप लीलाएँ करने वाली गोपियाँ उन उपदेशोंको कैसे स्वीकार करतीं ?
The souls in gopis were astral body of Akshar who are called Vedricha (they were going to enact the Supreme souls). Udhav went there and gave them lecture on yog(union) and formless God. These followers of sport of love who have enacted the original Raas of love (Pratibimb of Raas means reflection of original raas played in Yogmaya universe) how can they ever accept his teachings.

जो ऊधोने दई सिखापन, सो मुख पर मारे फेर बचन ।
याही बिरह में छोडी देह, सो पोहोंची जहां सरूप सनेह ।।४८

उद्धवजीने उन्हें जो भी उपदेश दिया, गोपियोंने उसे उनको ही लौटा दिया. श्रीकृष्णजीके वियोगमें उन्होंने देहको त्याग दिया. उनका स्न्ेह जिस स्वरूप (प्रतिबिम्ब लीलाके श्रीकृष्ण- अक्षरब्रह्म) के साथ था, वे उन्हींके पास पहुँचीं.
When he tried to teach them, they gave him back his words and in this pain of separation they left the physical body and they attained their love (Shri Krishna in new universe is only Akshar) Second Kaalmaya universe Shri Krishna= Akshar.
Udhav teaching Gopis about Nirakaar Brahm
Watch video of Udhav getting lessons of love from Gopis
Watch Radha manifesting Shri Krishna
Watch Udhav understands love
Watch glory of Radha

अक्षर हिरदे रास अखंड कह्यो, ए प्रतिबिम्ब साथ तहां पोहोंचयो ।
ए प्रतिबिम्ब लीला जो भई इत, सो कारन ब्रह्मसृष्ट के सत ।।४९

अक्षरब्रह्मके हृदयमें रासलीला अखण्ड हुई है. प्रतिबिम्ब लीलाकी ये गोपिकाएँ भी वहीं जा पहुँचीं. ब्रह्मसृष्टिके साथ हुई अखण्ड लीला सत्य है, यह स्पष्ट करनेके लिए ही यह प्रतिबिम्ब लीला संसारमें प्रकट की गई है.
Since the Raas is eternal in the heart of Akshar, this reflection of Raas was played by Akshar and Vedricha in new Kaalmaya universe. This leela which took place is the reflection of the true one is that played by Brahmshristi Yogmaya universe. To make awareness of the true Raas to the world the reflection of Raas was played in this universe at Brindavan.

जो प्रगट लीला न होवे दोए, तो असल नकलकी सुध क्यों होए ।
ता कारन ए भई नकल, सुध करने संसार सकल।।५०

यदि दोनों (अखण्ड और प्रतिबिम्ब) लीलाएँ न हुइंर् होतीं, तो सत्य और असत्यका अन्तर कैसे स्पष्ट होता ? समस्त संसारके जीवोंको वास्तविक लीलाके माध्यम से ब्रह्मात्माओंका परिचय दिलानेके लिए ही यह प्रतिबिम्ब लीला की गई है.
If two leelas are not shown then how would one find the difference between the original and the duplicate. How can one become conscious about the truth and the copy of the truth. That is why this image of Raas was played in this world to make the world conscious.

सारे अरथ तब होवें सत, जो प्रगट लीला दोऊ होवें इत ।
याही इंड में श्री कृस्नजी भए, सो अग्यारे दिन ब्रज मथुरा रहे ।।५१

सभी धर्मग्रन्थोंके सम्पूर्ण अर्थ (श्रीकृष्णजीके क्षर, अक्षर और अक्षरातीत स्वरूपोंका रहस्य तथा उनका तारतम्य) तभी सिद्ध होंगे, जब अखण्ड और प्रतिबिम्ब दोनों लीलाएँ इस संसारमें होंगी. कालमायाके इसी ब्रह्माण्डमें श्रीकृष्णजी (अक्षर ब्रह्मके सुरताके स्वरूप) आए, वे ग्यारह दिन तक व्रज और मथुरामें रहे.
One can get the complete meaning of truth when one is revealed of both the leelas over here. In this universe Shri Krishna came again for 11 days and stayed at Braj and Mathura.

दिन अग्यारे ग्वाला भेस, तिन पर नहीं धनीको आवेस ।
सात दिन गोकल में रहे, चार दिन मथुरा के कहे ।।५२

ग्यारह दिनों तक श्रीकृष्णजीने गोकुलमें ग्वाल वेश धारण किया, उन पर अक्षरातीत ब्रह्मका आवेश नहीं था. सात दिन तक वे गोकुलमें रहे और चार दिन तक मथुराके कहलाए.
On those eleven days, he was in cowherd’s outfit but now there is no inspiration of Supreme Master Aksharateet Shyam, here only Akshar. Out of eleven seven days he stayed at Gokul and four days at Mathura.

गज मल कंस को कारज कियो, उग्रसेन को टीका दियो ।
कालाग्रह में दरसन दिए जिन, आए छुडाए बंध थें तिन ।।५३

मथुरामें उन्होंने गज (कुबलयापीड हाथी), मल्ल (चाणूर एवं मुष्टिक) और कंसका उद्धार किया एवं उग्रसेनका राज तिलक किया. और कंसके कारागृहमें जिन वसुदेव और देवकीको दर्शन दिया था, उन्हें वहीं जाकर बन्धन मुक्त किया.
At Mathura, he completed the task of elephant, Malla and Kansa and crowned Ugrasen back to King. He went to prison where He had appeared to them before and made them free.

वसुदेव देवकी के लोहे भांन, उतार्यो भेष किए अस्नान ।
जब राजबागे को कियो सिनगार, तब बल पराक्रम ना रह्यो लगार ।।५४

वसुदेव और देवकीकी हथकड.ी काटकर श्रीकृष्णजीने गोपाल वेष उतार दिया और स्नान करके राजसी वस्त्र धारण किए. अब उनमें अलौकिक बल (अक्षरब्रह्मका आवेश) और पराक्रम दोनों नहीं रहे. (अक्षरब्रह्मकी आवेश शक्ति लौट गई अब केवल योगीराज श्रीकृष्ण ही
रह गए, अब उनमें पारकी शक्तिका समावेश नहीं रहा.)
He cut the hand cuffs of Vasudev and Devaki (liberated them), then he took off the cowherd outfit and took a bath. Then he accepted the princely outfit but he had no powers of Akshar of beyond.

आए जरासिंध मथुरा घेरी सही, तब श्रीकृस्नजीको अति चिंता भई ।
यों याद करते आया बिचार, तब कृस्न बिस्नुमय भए निरधार ।।५५

कंसके उद्धारके बाद जब जरासन्धकी सेनाने चारों ओरसे मथुराको घेर लिया, तब श्रीकृष्णजीके मनमें चिन्ता उत्पन्न हुई. चिन्तन करते हुए उन्हें जैसे ही अपने विष्णु स्वरूपका ध्यान आया तब (विष्णु भगवानकी शक्ति उनमें जागृत हुई और) वे विष्णुमय बन गए.
When Jarasindh(father in law of Kans) attacked and surrounded Mathura then Shri Krishna got worried and started contemplating and thus he became conscious about himself as Lord Bishnu from here Shri Krishna got all the powers of Shri Vishnu.
(Although the name continues to be same in Kaalmaya universe – Shri Krishna but there are three different powers working at first Kaalmaya universe Aksharateet Shri Krishna, second Kaalmaya universe it is Akshar till end of Kansa then it is Shri Vishnu.)
This is the mystery revealed by Aksharateet Shri Krishna to Dhani Devachandraji-Shyama . This is the essence of Tartam gyaan. This fact was kept secret and revealed to Shyama avtar Dhani Devachandraji.

तब बैकुंठमें विस्नु ना कहे, इत सोले कला संपूरन भए ।
या दिन थें भयो अवतार, ए प्रगट बचन देखो बिचार ।।५६

तब वैकुण्ठ धाममें भगवान विष्णु नहीं रहे क्योंकि अपनी सोलहों कलाओंके साथ वे इस धरती पर आ गए. यहींसे भगवान विष्णुकी (श्रीकृष्ण) अवतार लीला आरम्भ हुई. इस रहस्यको स्पष्ट करनेवाले वचनों पर विचार करो.
From that Lord Vishnu was not found in Vaikunth dham, with complete 16 attributes he was present over here and from this day onwards the avtar of Shri Vishnu took place. Ponder over this revealation.

सिसपाल की जोत बैकुंठे गई, समाई श्रीकृस्नमें तित ना रही ।
आउध अपने मगाए के लिए, कै विध जुध असुरोंसों किए ।।५7

शिशुपालका वध होने पर उसकी आत्मा (ज्योति) वैकुण्ठ धाम गई. (उस समय भगवान विष्णु तो सोलह कलाओं सहित संसारमें आ गए थे इसलिए) वहाँ विष्णु भगवानको न पाकर वह ज्योति जगतमें लौट आई और श्रीकृष्णमें समा गई. अब विष्णु भगवानके अवतार श्रीकृष्णने वैकुण्ठ धामसे अपने अस्त्र शस्त्र एवं रथ आदि मँगवा लिए और आसुरी बुद्धि वाले राजाओंसे अनेक युद्ध किए.
When Shishupal’s soul went to Baikunth but returned back and entered in Shri krishna. Now the avatar of Lord Vishnu Shri Krishna got all the divine weapons and carriage to earth and fought with many Asurs.

मथुरा द्वारका लीला कर, जाए पोहोंचे विस्नु वैकुंठ घर ।
अब मूल सखियां धामकी जेह, तिन फेर आए धरी इत देह ।।५८

मथुरा और द्वारिकामें विभिन्न लीलाएँ पूर्ण कर विष्णु भगवान अपने वैकुण्ठ धाम लौट गए. अब परमधामकी आत्माओंने पुनः इस धरती पर आकर शरीर धारण किए. उनका वृत्तान्त इस प्रकार है.
Shri Vishnu Krishna did many leelas at Mathura and Dwarka and then went back to Baikunth his abode.
Now, the original souls of Paramdham they again came back to the world and assumed the physical body.
Remember the revealation is about the secret of Brahm (Shri Krishna of Aksharateet mool swaroop, Shri Krishna as Akshar surat-astral body of Akshar in Braj/Raas with power of Aksharateet Lord), Shri Krishna as Shri Vishnu’s avatar.

उमेदां तामसियां रही तिन बेर, सो देखन को हम आइयां फेर ।
इन ब्रह्मांड को एह कारन, सुनियो आतम के श्रवन ।।५९

रासलीला पूर्ण कर परमधाममें जागृत होते समय तामस स्वभाववाली ब्रह्मात्माओंकी (मायाके सुख-दुःख पूर्ण खेल देखनेकी) इच्छा शेष रह गई थी. उन्हीं इच्छाओंको पूर्ण करने (और खेल देखने) के लिए हम सब ब्रह्मात्माएँ फिर इस मायावी संसारमें आ गईं. इस तृतीय ब्रह्माण्डकी रचनाका यही कारण है. अब आप आत्माके श्रवणोंसे इस वृत्तान्तको सुनिए.
As Tamasi souls did not experience the game of sorrow, that is why we all came back to see the world, this is the cause of the creation of this Kaalmaya(illusion of birth-death and time ) universe listen this with the ears of your soul.

रास खेलते उमेदां रहियां तित, सो ब्रह्मसृष्ट सब आइयां इत ।
यामें सुरत आई स्यामाजी की सार, मतू मेहेता घर अवतार ।।६०

रासलीलाके समय (सुख-दुःखको और अधिक अनुभव करनेकी) चाहना शेष रहनेके कारण ब्रह्मात्माएँ पुनः इस संसारमें आइंर्. इन ब्रह्मात्माओंमें-से सुन्दरबाई सखीकी सुरतामें प्रवेशकर श्रीश्यामाजीने मतुमेहताजीके घरमें (श्रीदेवचन्द्रजीके रूपमें) अवतार लिया.
When the divine souls came to braj in the universe of kaalmaya (world of illusion out of ignorance i.e. darkness) and later played raas in universe of jogmaya played bra they never ever away from Lord and since they were detached from the worldly activities they never felt the pain or pleasure of this world. Hence they requested to show them the world of ignorance and misery and yet another universe just like the original one was created. Shyama chose Sundarbai’s dream body and took avatar at Matoo Mehta’s house.

कुंवरबाई माता को नाम, उतम कायथ उमरकोट गाम ।
आए श्री देवचन्दजी नौतन पुरी, सुख सबों को देने देह धरी ।।६१

उनकी माताका नाम कुँवरबाई था. उमरकोट नगरके उत्तम कायस्थ परिवारमें उनका जन्म हुआ था. वहाँसे श्रीदेवचन्द्रजी नवतनपुरी (जामनागर) आए. समस्त संसारको अखण्ड सुख देनेके लिए ही उन्होंने मानव देह धारण किया है.
Kunvarbai is the mother’s name and from the best of Kayastha family of Umarkot village came Shri Devchandraji at Navtanpuri Jamnagar, took the human form to grant bliss to entire universe.

इन इत आए करी बडी खोज, चाहे धनी को मूल संजोग ।
अंग मूल उपजी ए द्रष्ट, सास्त्र सबद खोजे कै कष्ट ।।६२

उन्होंने इस संसारमें आकर परमात्म-तत्त्वकी बड.ी खोज की. वे धामधनीके साथके सम्बन्धकी पहचान करना चाहते थे.उन्होंने शास्त्रों एवं मत-मतान्तरोंमें खोज करते हुए अनेक साधनाएँ की, जिससे उनकी अन्तर्दृष्टि खुल गई.
इन इत आए करी बडी खोज He came to this earth but started searching (Even Shyama avtar had to go through the searching process)
चाहे धनी को मूल संजोग There was a चाहे desire to मूल संजोग unite with Lord one that is primordial very original that always existed.
After coming here, he started seeking the beloved Lord and always desired to attain the original relationship with Lord’. He painfully started searching in the scriptures; arose the insight of original soul.
(अंग (soul ) मूल (the root one, source, original) उपजी (arose) ए द्रष्ट (the sight))
The desire to unite with Lord itself elevates one to attain the soul consciousness.

चौदे बरसलों नेष्टा बंध, बचन ग्रहे सारी सनंध।
कै जप तप किए व्रत नेम, सेवा सरूप सनेह अति प्रेम ।।६३

नवतनपुरी (जामनगर) में उन्होंने चौदह वर्ष पर्यन्त निष्ठापूर्वक श्रीमद्बागवतका श्रवण किया और उसके सार तत्त्वको आत्मसात् किया. उन्होंने चालीस वर्ष पर्यन्त जप, तप, व्रत एवं नियमोंका पालन किया. मूलस्वरूप परमात्माके प्रति स्नेह रखते हुए प्रेमपूर्वक सेवा की.
For 14 years he devotedly listened to Srimad Bhagvat and understood the essence of divine wisdom. He did many penances, jap(repeatition of Lord’s name), fasting and following strictly to the rules he served the Lord with affection and ultimate love to please the Lord Supreme.

कै कसनी कसी अति अंग, प्रेम सेवामें ना कियो भंग ।
कै कसौटी करी दुलहिन, सो कारन हम सब सैयन ।।६४

उन्होंने अनेक साधनाओंसे अपनी देहको तपाया किन्तु परमात्माकी प्रेमसेवामें कमी आने नहीं दी. इस प्रकार पूर्णब्रह्म परमात्माकी अर्धाङ्गिनी श्रीश्यामाजीने इस संसारमें आकर कई कसौटियाँ कीं. उन्होंने यह हम ब्रह्मात्माओंके लिए किया है.
He began hard penances which also inflicted physical pain but it never came in the way of serving the Lord with love and devotion. The bride of the Lord (Shyama) has to go through so many trials and tribulations so as to awaken the divine souls.

पियाजी किए अति प्रसंन, तीन बेर दिए दरसन।
तारतम बात वतन की कही, आप धाम धनी सब सुध दई ।।६५

अपने प्रेम और सेवासे उन्होंने धामधनीको प्रसन्न किया. परब्रह्म परमात्माने उन्हें तीन बार दर्शन दिए और पातालसे लेकर परमधामतकका तारतम्य समझाते हुए तारतम ज्ञाान देकर परमधामका रहस्य खोल दिया. उनकी आत्माका स्वरूप बताते हुए ‘निजनाम श्रीकृष्णजी’ कहकर अपना परिचय दिया और सब प्रकारकी सुधि दी.
The Supreme beloved was extremely pleased and appeared three times before Shri Devachandra ji. He spoke the words of the supreme abode which shall eliminate all the ignorance (tartam mantra which reveals the supreme Lord as Aksharateet Shri Krishna)and revealed to Devchandraji who he is, the Supreme abode Paramdham and the beloved Lord and all the ‘consciousness’. The 16 worded Shri Krishna mantra which reveals the name of the Supreme and His eternal abode .

धरयो नाम बाई सुन्दर, निज वतन देखाया घर।
इत दया करी अति घनी, अंदर आए के बैठे धनी ।।६६

अक्षरातीत श्रीकृष्णजीने श्रीदेवचन्द्रजीकी परात्मका नाम सुन्दरबाई बताकर उनको मूलघर परमधामका दर्शन करवाया. धामधनीने उन पर बहुत बड.ी दया की और स्वयं उनकी अन्तरात्मामें विराजमान हुए.
Lord Shri Krishna of Aksharateet which is beyond the creator Akshar, revealed to Shri Devachandra ji that his name in Paramdham is Sundarbai and showed his real abode of the self निज . Beloved Lord graced Sundarbai extremely and showed her the abode and resided in her heart. The heart of the soul is Nijdham and the Lord Shri Krishna resides here.

दियो जोस खोले दरबार, देखाया सुंन के पार के पार ।
ब्रह्मसृष्टि मिने सुन्दरबाई, ताको धनीजीएं दई बडाई।।६7

सब सैयों मिने सिरदार, अंग याही के हम सब नार।
श्री धामधनीजी की अरधंग, सब मिल एक सरूप एक अंग ।।६८

श्रीकृष्णजीने अपना जोश देकर परमधामके द्वार खोल दिए और शून्य निराकारसे परे अक्षर और उससे भी परे परमधामको अपना घर बताया. इस प्रकार ब्रह्मसृष्टियोंमें सुन्दरबाईको धामधनीने बहुत बड.ा महत्त्व दिया. श्रीश्यामाजीके अवतार स्वरूप होनेसे वे सब ब्रह्मात्माओंकी शिरोमणि (सिरदार) हैं. हम सभी आत्माएँ उनकी ही अङ्गस्वरूपा हैं. श्रीश्यामाजी धामधनीजीकी अर्धांगिनी हैं. पूर्णब्रह्म परमात्मा, श्यामाजी एवं समस्त ब्रह्मात्माएँ सब मिलकर एक ही स्वरूप और एक ही अङ्ग हैं.
Lord graced him with the inspiration, opened the doors of the supreme and showed the Sunya-vacuum (empty space), the perishable universe, imperishable universe Akshardham and the beyond- Aksharateet Paramdham. Amongst all the divine souls Lord has appreciated Sundarbai greatly and she is our leader as Shyama who is the consort of Lord and of whom we are the parts also is united with Sundarbai’s dream body. Although Shri Krishna, Shyamaji and brahma shriti seem separate all are actually one.
(We live in world of duality unless we become soul conscious we cannot understand what is that although look separate but in real are one)

श्री धाम लीला बैकुंठ अखंड, ब्रज रास लीला दोऊ ब्रह्मांड ।
ए सब हिरदेमें चढ आए, ज्यों आतम अनभव होत सदाए ।।६९

इस प्रकार (श्रीकृष्णजीके हृदयमें बैठने पर) अखण्ड परमधामकी दिव्य लीलाएँ, नित्य वैकुण्ठ, कालमाया तथा योगमाया दोनों ब्रह्माण्डके व्रज तथा रासकी दिव्य लीलाएँ श्रीदेवचन्द्रजीके हृदय पटल पर अङ्कित हो गईं. उनको ऐसा लगा कि मेरी आत्मा इन सबका नित्य अनुभव करती है.
When Devachandraji realized Aksharateet Shri Krishna within his heart, paramdham, the sport (the cause of this creation), the creator Akshar bhagwaan, the braj and raas leela and the two universes (kaalmaya and yogmaya) all were revealed into his heart as if the soul eternally has been experiencing it.
All the truth revealed, the Supreme Aksharateet Shri Krishna residing in the heart of Shri Devchandraji Maharaj (dream body of Sundarbai accompanied by Shyama) experience nijanand.
Carefully read ज्यों आतम अनभव होत सदाए : There are three tenses past, present and future. Our universe is called KaalBrahmand (Time Universe). Everything from planets to an entity of living exist or cease to exist are bound by time. We live in a world where time is very important. Our lives are timed and so our experiences. The soul is eternal and it is not bound by time, there is only present tense, all the experiences of the soul are eternal and everlasting. When one becomes soul conscious we will experience the braj-raas that we enacted is eternal experience of the soul. One will realize that pleasure immediately.
(
हंसते हरषे जागसी, सुख देसी सब सैयन।।३०
बाललीला और किसोर, तीसरी बुढापन।


बाललीला और किसोर, तीसरी बुढापन।
तीन अवस्था तीन ब्रह्मांड, देखाए मिने एक खिन ।।३१

इस प्रकार व्रजमण्डलकी बाल-लीला, रासकी किशोर-लीला और जागनीकी यह प्रौढ. लीला, इन तीनों अवस्थाकी लीलाओंके लिए क्षण मात्रमें ही तीनों ब्रह्माण्डोंको दिखा दिया है.

बाबा बूढा होए खेलावसी, दे मन चाह्या सुख सब ।
तीन अवस्था एक साएत में, देखाए के हंससी अब ।।३२

कुरानमें इमाम महदीका सङ्केत एक बूढ.े बाबाके रूपमें हुआ है, जो सबको (जागनी रास खेलाकर) इच्छित सुख प्रदान करेंगे. इस प्रकार इसी जागनी लीलामें ब्रज, रास और जागनी तीनों लीलाओंका एक साथ अनुभव करवाकर श्रीराजजी ब्रह्मात्माओंके साथ हँसी करेंगे.
The mature father (the Imam) will fulfill the wish of playing the game of awakening. In this way all the three states of consciousness(Braj, Raas, Jaagani) in ONE moment is shown and we will all merry about it in NOW – The eternal present अब.

तीन ठौर लीला करी, देखाए तीनों ब्रह्मांड।
सो तीनों एक पलमें, देखाए के उडावसी इंड।।३३

इस प्रकार धामधनी तीनों ब्रह्माण्डोंमें हुई व्रज, रास और जागनी इन तीनों लीलाओंको पल मात्रमें दिखाकर इस ब्रह्माण्डको भी उड.ा देंगे.
Lord Supreme played three sports in three different universes, showing all the three in ONE moment, this universe will be ended along with the body consciousness. (Entire living being will achieve soul consciousness)

खेले एकै रात में, व्रज रास जागन।
बेर साएत भी ना हुई, यों होसी सब सैयन।।३४

वास्तवमें एक ही महिमावान रात्रि (लैल-तुल-कद्र)के तीन खण्डोंमें ये तीनों लीलाएँ सम्पन्न हुईं हैं. इस खेलसे जागृत होने पर समस्त आत्माओंको अनुभव होगा कि इन लीलाओंको देखनेमें उन्हें पल भरका समय भी नहीं लगा.
All are played in one night Braj, Raas and Jaagani(Awakening). One moment also has not passed thus all the souls will experience.

बीच ब्रह्मांड ना जुग कोई, वरस मास ना दिन।
खिनमें सब देखाए के, दोए साखें करी जागन।।३५

इन तीनों ब्रह्माण्डोंकी लीलाओंको दिखानेमें न कोई युग बीता न ही वर्ष, महीना अथवा दिन व्यतीत हुआ, अपितु क्षणमात्रमें ही इन सब खेलोंको दिखाकर वेद और कतेब दोनोंकी साक्षी देते हुए ब्रह्मात्माओंकी जागनी की.
Three sports in three different universes (looks like eons have gone) but not even one era has passed, neither year nor month nor a day. In ONE moment all is shown both have witnessed it will awaken.
प्रकरण ४१ सनंध
The above says chaupai of sanandh says the eons of time that we experience are are of ONE moment.
)

अब ए केते कहूं प्रकार, निजधाम लीला नित बडो विहार ।
अक्षरातीत लीला किसोर, इत सैयां सुख लेवें अति जोर ।।७०

परमधामकी लीला एवं वहाँके नित्य विहारका महत्त्व बहुत बड.ा है. उसका वर्णन कहाँ तक करूँ ? वहाँ पर अक्षरातीतकी किशोर लीलाएँ होतीं हैं. उन लीलाओंमें ब्रह्मात्माएँ अपार आनन्दका अनुभव करतीं हैं.
How will I describe the Leela of Nijdham(abode of the self), this sport is nitya(everlasting) experience, This Aksharateet sport is of youth, here the souls experience extreme bliss.

मोहोल मंदिर को नाहीं पार, धाम लीला अति बडो विस्तार ।
इन लीला की काहूं ना खबर, आज लगे बिना इन घर ।।७१

परमधामकी अखण्ड लीलाका विस्तार बहुत बड.ा है. वहाँके भवन एवं मन्दिरोंका पारावार नहीं है. परमधामकी ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त आज तक किसीको भी इन लीलाओंका ज्ञाान नहीं था.
The leela of Paramdham is very vast and there is no limit or beyond of the palaces in Paramdham. Except the souls from Paramdham no one else know about it.

ब्रह्मसृष्ट बिना न जाने कोए, ए सृष्ट ब्रह्मथें न्यारी न होए ।
सो निध ब्रह्मसृष्ट ल्याइयां इत, ना तो ए लीला दुनियामें कित ।।७२

ब्रह्मात्माओंके बिना इस घरकी रहस्यमयी लीलाको कोई भी जान नहीं सकता और ये ब्रह्मात्माएँ कभी भी अपने धामधनीसे अलग नहीं होतीं. परमधामकी इस अलौकिक निधिको ब्रह्मात्माएँ ही इस संसारमें ले आईं हैं, अन्यथा इस झूठी दुनियामें यह अखण्ड वस्तु कैसे आ सकती थी ?
No one but brahmshristi know about it and these souls are never away from Brahm (The Supreme). They brought the technique to become close to Brahm(experience the bliss of Brahm) as this was not known before any where in the world.

ए बानी धनी मुखथें कहे, सो ए दुनिया क्यों कर लहे ।
गांगजीभाई मिले इन अवसर, तिन ए बचन लिए चित धर ।।७३

इस प्रकारकी वाणी सद्गुरुने अपने श्रीमुखसे कही है, उसे इस संसारके लोग कैसे ग्रहण कर सकते ? ऐसे में श्रीगाङ्गजी भाई सद्गुरुके चरणोंमें पहुँचे. उन्होंने ही सर्वप्रथम इस वाणीको हृदयङ्गम किया.
These kind of wisdom satguru spoke but how can world digest it? At this time, Gangji bhai approached him and paid full attention to the preachings and kept it to his heart.

कर बिचार पूछे बचन, नीके अरथ लिए जो इन ।
जब समझाई पारकी बान, तब धनी की भई पेहेचान ।।७४

सद्गुरुके वचनों पर विचार करते हुए उन्होंने अनेक प्रश्न भी पूछे और उनके अर्थको भी हृदयङ्गम किया. जब उन्हें परमधामकी बातें समझमें आईं, तब उन्होंने धामधनीको सद्गुरुके रूपमें पहचाना.
He asked may questions and understood the meanings very well. When he received the understanding of beyond, he recognized the Satguru Maharaj as Lord Supreme.

अपने घरों लिए बुलाए, सेवा करी बोहोत चित ल्याए ।
सनेहसों सेवा करी जो घनी, पेहेचान के अपना धामधनी ।।७५

गाङ्गजीभाईने सद्गुरुको अपने घरमें बुला लिया और प्रेमपूर्ण हृदयसे उनकी सेवा की. इस प्रकार सद्गुरुको साक्षात् धामधानी (पूर्णब्रह्म परमात्मा) समझकर गाङ्गजीभाईने स्नेह पूर्वक उनकी सेवा की.
He invited Satguru to his house and served him from heart with love as understanding satguru as Lord Supreme of Paramdham.

तब श्री मुख बचन कहे प्राणनाथ, ढूंढ काढना अपना साथ ।
माया मिने आई सृष्ट ब्रह्म, सो बुलावन आए हम ।।७६

प्राणनाथ स्वरूप सद्गुरुने गाङ्गजीभाईको अपने श्रीमुखसे कहा, हमें सुन्दरसाथ (ब्रह्मात्माओं) को खोज निकालना है. ब्रह्मसृष्टियाँ इस मायामें (खेल देखनेके लिए) आईं हैं, इसलिए उन्हें बुलानेके लिए हमारा यहाँ आना हुआ है.
Then Lord Prannath(master of life) said we have to find all other souls Brahm, they have come to see the Maya, I have come here to call them back home.

हम आए हैं इतने काम, ब्रह्मसृष्ट लेने घर धाम।
तब गांगाजीभाई पायो अचरज मन, कौन मानसी पारके बचन ।। ७७

हमारा यहाँ पर मात्र इसी उद्देश्यसे आना हुआ है कि ब्रह्मात्माओंको अपने घर परमधाम ले जाना है. यह सुनकर गाङ्गजीभाईके मनमें बड.ा आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे, पारके इन वचनों पर कौन विश्वास करेगा ?
I have come here for only to do this task, to take Brahmshristi (souls) back to Paramdham.
At that time Gangji bhai got astonished and and thought now who will accept the knowledge of beyond?

कह्या ब्रह्मसृष्ट क्यों मिलसी, चाल तुमारी क्यों चलसी ।
मोहजल पूर तीखा अति जोर, नख अंगुरी को ले जाए तोर ।।७८

गाङ्गजीभाई पुनः कहने लगे, ब्रह्मात्माएँ इस जगतमें कैसे मिलेंगी और आपका अनुसरण कैसे कर पाएँगी ? क्योंकि यहाँ तो मोहजलका प्रवाह अत्यन्त तीव्र (तीक्ष्ण) है, वह नख मात्रके स्पर्श होने पर भी अँगुलीको तोड. देता है.
How can we find the Brahmshristi, Why would anyone follow you? The ocean of attachment is at its pinnacle, sharp and extremely powerful that even the nail can chop off whole finger.

तरंग बडे मेर से होए, इत खडा ना रेहेने पावे कोए ।
लेहेरें पर लेहेरें मारे घेर, मांहें देत भमरियां फेर ।।७९

इस मोह सागरमें पर्वतके समान (काम, क्रोध, लोभ, मोह आदिकी) ऊँची-ऊँची लहरें उठा करतीं हैं. इसलिए इनमें कोई भी खड.ा नहीं रह पाता. एक लहरके ऊपर दूसरी लहर प्रहार करती है और बीच-बीचमें (सत्व, रज एवं तम इन गुणोंकी) भँवरी भी फिरती है.
In this ocean of attachment and ignorance of self, powerful waves bigger than mountains(lust, anger, greed,attachment) rise and do not let anybody stand and such many waves hit and send them back in the whirlpool again and again.

आडे टेढे मांहें बेहेवट, विक्राल जीव मांहें विकट।
दुखरूपी सागर निपट, किनार बेट न काहूं निकट।।८०

मोहसागरकी ये तेज लहरें कोई ऊँची हैं, कोई तिरछी हैं. इसके अन्दर भयंकर जीवोंके समान ईर्ष्या, द्वेष आदि मानवको मृत्युकी ओर घसीटते हैं. इस निपट दुःखके महासागरका कोई किनारा तथा टापू (आश्रयदाताके रूपमें सद्गुरु) निकट दिखाई नहीं देता.
These sharp waves in the ocean of Moh(attachment and ignorance) some are tall, some are slanting and there are many monster within drag it to death. The whole world seems like ocean of misery and the bank is nowhere to be seen niether there is any island.

ऊंचा नीचा गेहेरा गिरदवाए, कठन समया इत पोहोंचा आए ।
हाथ ना सूझे सिर ना पाए, इन अंधेरी से निकस्यो न जाए ।।८१

यह मोह सागर ऊँचा, नीचा, गहरा तथा चारों ओर विशालरूपमें फैला हुआ है (इन चौदहलोकोंमें सर्वत्र मोह व्याप्त है). बड.ा कठिन समय सामने आ गया है. अज्ञाानका अन्धकार इतना व्याप्त है कि स्वयंको अपने हाथ पैर तथा सिर भी नहीं सूझते हैं (अज्ञाानके कारण आत्माएँ स्वयंको तथा अपने अङ्गी परमात्माको भी पहचान नहीं सकतीं). ऐसे समयमें इस अज्ञाानरूपी अन्धकारसे बाहर नहीं निकला जा सकता.
This is very difficult time, the ocean of attachment and ignorance is high and deep and very vast. Where ever one goes will find the same ocean of attachment and ignorance. The ignorance is such that one cannot detect one’s ears, head or legs, at such, how can one come out of such darkness.

चढयो मायाको जोर अमल, भूलियां आप मांहें घर छल ।
ना सुध धनी ना मूल अकल, इन मोहजलको ऐसो बल ।।८२

मायाका नशा (अमल) ब्रह्मात्माओंको भी इतने जोरसे चढ. गया है कि वे स्वयं तथा अपने मूल घर परमधामको भी भूल गइंर्. उन्हें न अपने धामधनीकी सुधि रही, न ही अपनी मूल (जागृत) बुद्धिकी सुधि रही. वस्तुतः मोहजलका इतना बड.ा प्रभाव है.
The intoxication of maya is so much, the souls have forgotten themselves and their original abode. They are not conscious about the presence of their Supreme Lord, neither they have original intelligence and the ocean of attachment is so powerful.

बचन बेहद के पार के पार, सो क्यों माने हदको संसार ।
त्रगुन महाविस्नु मोह अहंकार, ए हद सास्त्रों करी पुकार ।।८३

आपके वचन बेहदसे परे अक्षर तथा उससे भी परे परमधामके हैं. इस सीमित संसार (हद) के जीव उन्हें कैसे मानेंगे (समझेंगे) ? शास्त्रोंने स्पष्ट रूपसे कहा है कि त्रिगुण (सत्व, रज, तम एवं इन तीनोंके अधिपति ब्रह्मा, विष्णु महेश), महाविष्णु (भगवान नारायण), मोह-अहंकार
ये सब हद (नाशवान जगतकी सीमा) के अन्तर्गत आते हैं.
The wisdom of beyond of beyond, how can this perishable world accept. The three nature(Brahma, Vishnu, Mahesh), MahaVishnu(Aadi narayan), Moh(attachment), Ahankaar(Ego consciousness) all these come under the perishable world.

ब्रह्मसृष्ट भी धरे मोहके आकार, सो इत आवसी कौन प्रकार ।
तब श्री धनीजीएं कहे बचन, बेहेर द्रष्ट होसी रोसन ।।८४

ब्रह्मात्माओंने भी इसी मोहका शरीर धारण किया है. वे इस मोहमें-से निकल कर आपके वचनोंकी ओर कैसे आ पाएँगी ? तब धामधनी सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी महाराजने कहा, बाह्य दृष्टि प्रकाशित होगी अर्थात् चमत्कारी (आडि.का) लीलाओंके द्वारा सब ब्रह्मात्माएँ आर्किषत होंगी.
Even the celestial souls also have taken the body of this world so how can we bring them here. Then the lord spoke that first the external sight will be enlightened(miracles will take place).

ए बंधेज कियो अति जोर, रात मेटके करसी भोर ।
प्रतछ परमान देसी दरसन, ए लीला चित धरसी जिन ।।८५

चमत्कारी लीलाओंका यह विधान (बन्धन) अति प्रबल है. इससे अज्ञाानरूपी रात मिटकर ज्ञाानका प्रभात उदय होगा. जो लोग यह लीला अपने चित्तमें धारण करेंगे उन्हें श्री कृष्णजी प्रत्यक्ष दर्शन देंगे.
This technique is very powerful which will end the ignorance of within thus dawn of enlightening begin.
Lord Shri Krishna will give the proof and appear before those who contemplate on this leela and impress it upon their heart .

साथ कारन आवसी धनी, घर घर वस्तां देसी घनी ।
साथ मांहें इत आरोगसी, विध विध के सुख उपजावसी ।।८६

सुन्दरसाथको प्रेरित करनेके लिए धामधनी श्रीकृष्ण प्रकट होंगे और घर-घरमें अलौकिक वस्तुएँ वितरित करेंगे. वे ब्रह्मात्माओंके बीच विराजमान हो कर भोजन ग्रहण करेंगे तथा विभिन्न प्रकारसे उन्हें आनन्दित करेंगे.
Lord will come because of the souls, he will appear before the houses and give them gifts. Lord Krishna will eat with the sundarsath and give various joys.

अचरा पकड पीउ देखलावसी, एक दूजीको प्रेम सिखलावसी ।
ए लीला बढसी विस्तार, साथ अंग होसी करार ।।८७

जिन आत्माओंको श्रीकृष्णजीके दर्शन होंगे वे उनका आँचल पकड.कर दूसरोंको भी उनके दर्शन करवाएँगीं. इस प्रकार आत्माएँ एक दूसरेको प्रेम सिखाएँगीं. इस लीलाका विस्तार बढ.ता जाएगा जिससे समस्त सुन्दरसाथको आनन्द (शान्ति)मिलेगा.
Those who experienced Shri Krishna they will further show Lords to all the other sundarsath. They will teach love to each other. This leela will expand very vast where the sundarsath will experience much of joy and peace. The sundarsath will gain spiritual experiences which will enlighten them and thus they will be able to further enlighten others. Thus this jaagani leela will expand which will bring joy to all the sundarsath.

तब बानी को करसी बिचार, सब माएने होसी निरवार ।
तब आवसी ब्रह्मसृष्ट, जाहेर निसान देखसी द्रष्ट।।८८

तब सभी जन अखण्ड परमधामका बोध करवाने वाली वाणी (तारतम ज्ञाान) पर विचार करेंगे उस समय शास्त्रांेके सभी अर्थ स्पष्ट होंगे. तब शास्त्रोंके उन सङ्केतोंको प्रत्यक्ष देखकर ब्रह्मात्माएँ आएँगी.
Those who ponder over the vani(tartam gyaan), all the meanings will be revealed, seeing the signs and symbols of scriptures the brahmshristi will come (for Brahmshristi the signs and symbols of scriptures itself is enough)

ए बंधेज कियो उतम, पर धामकी निध सो कही तारतम ।
जिन सेती होवे पेहेचान, नजरों आवे सब निसान।।८९

इस प्रकार धामधनीने चमत्कारी (आडि.का) लीलाओंका उत्तम विधान (बन्धेज) किया है, किन्तु परमधामकी वास्तविक निधि तो तारतम ज्ञाान है. जिन आत्माओंको इस ज्ञाानके द्वारा अपनी पहचान होगी, उनकी दृष्टि (स्मृति) में परमधामके सभी सङ्केत स्पष्ट उभर आएँगे.
The very best technique is taken into consideration(leela of Shri Krishna in Jaagani universe ) but to experience Paramdham one has to understand Tartam. Those who have acknowledge, they will understand all the signs and symbols.

तब गांगजीभाई पाए मन उछरंग, किए क्रतब अति घने रंग ।
सनेहसों सेवा करी जो अत, पेहेचानके धाम धनी हुए गलित ।।९०

सद्गुरुके ये वचन सुनकर श्रीगाङ्गजीभाईका मन उमङ्गसे भर आया और उन्होंने अपने कर्तव्यका पूरा पालन किया. सद्गुरुके रूपमें धामधनीको पहचानकर उन्होंने द्रवित हृदयसे सद्गुरुकी स्नेह पूर्वक सेवा की.
Listening to Satguru Gangjibhai was inspired and he performed his duty in many ways. With love he served him extremely, witnessing the Supreme Lord within Satguru Dhani Devachandraji.

साथसों हेत कियो अपार, सुफल कियो अपनो अवतार ।
मैं श्रीसुन्दरबाई के चरने रहूं, एह दया मुख किन विध कहूं ।।९१

गाङ्गजीभाईने सब सुन्दरसाथके साथ भी अपार स्नेह किया और अपना अवतार (जन्म) सफल बनाया. मैंने निश्चय किया कि मैं सदैव श्रीसुन्दरबाई (सद्गुरु) के श्रीचरणोंमें रहूँ. इस झूठी जिह्वासे सद्गुरुकी कृपाका वर्णन कैसे हो सकता है ?
He also showered unlimited affection on all the sundarsaths and thus he accomplished his avatar.
I shall live with Sundarbai serving her feet, her grace on me how can I describe with this mouth?

कह्यो ताको इन्द्रावती नाम, ब्रह्मसृष्ट मिने घर धाम ।
मों पर धनी हुए प्रसंन, सोंपे धामके मूल बचन।।९२

परमधामकी ब्रह्मात्माओमेंसे उन्होंने मेरी आत्माका नाम इन्द्रावती कहा. धामधनी सद्गुरु मुझपर अति प्रसन्न हुए और परमधामके मूल वचनके रूपमें उन्होंने मुझे तारतम ज्ञाान सौंपा.
She recognized me as Indrawati by name and a Brahmshristi of abode Paramdham. Satguru was pleased to see me and granted me the original words of Paramdham.

आदके द्वार ना खुले आज दिन, ऐसा हुआ ना कोई खोले हम बिन ।
सो कुंजी दई मेरे हाथ, तूं खोल कारन अपने साथ।।९३

उन्होंने बताया कि आज दिन तक परमधामके द्वार नहीं खुले थे (अर्थात् शास्त्रोंके अर्थ स्पष्ट नहीं हुए थे) हमारे बिना ऐसा कोई भी नहीं हुआ कि उन (रहस्यों) को खोल (स्पष्ट कर) सके. उन द्वारोंको खोलनेकी कुञ्जी (तारतम ज्ञाान) मेरे हाथमें देते हुए सद्गुरुने मुझे आदेश दिया, ‘तुम अपने सुन्दरसाथके लिए उन रहस्योंको खोल दो.’
The door of Paramdham was not opened to anyone before.
The hidden signs/symbols/messages were not revealed to anyone other than me. The key to all the scriptures the revealations, the tartam gyaan I am giving it to you, you open the doors for rest of the sundarsath said Satguru Dhani Devachandraji(Shyama – Sundarbai)

मोहे करी सरीखी आप, टालने हम सबोंकी ताप।
आतम संग भई जाग्रत बुध, सुपनथें जगाए करी मोहे सुध ।।९४

हम सब ब्रह्मात्माओंका सन्ताप मिटानेके लिए सद्गुरुने मेरे हृदयमें बैठकर मुझे अपने समान बनाया. मेरी अन्तर आत्मामें उनकी जागृत बुद्धिका प्रवेश हुआ. इस स्वप्नवत् संसारमें सोई हुई मेरी आत्माको जगाकर उन्होंने मुझे सब प्रकारकी सुधि दी.
Satguru made me as equal to her(sundarbai) to elliminate all misery in us. Awakened my soul and mind and
awakened me from the dream and gave me complete consciousness.
Remember Satguru Dhani Devachandraji made Mahamati Prannath equal to himself. He gave all the wisdom of Paramdham and also gave the key to all the scriptures and gave the privilege to open the doors of Paramdham to all. This is what Satguru does equips your disciple with truth, intelligence, awakening, enlightening, soul realization and krishna consciousness!

श्रीधनीजीको जोस आतम दुलहिन, नूर हुकम बुध मूल वतन ।
ए पांचों मिल भई महामत, वेद कतेबों पोहोंची सरत ।।९५

श्रीधनीजीका जोश, श्रीश्यामाजीकी आत्मा, अक्षरब्रह्मका नूर, श्रीराजजीका आदेश, परमधामकी मूल बुद्धि (तारतम ज्ञाान) इन पाँचों शक्तियोंको प्राप्तकर मैं महामति बन गई. वेद शास्त्रों तथा कुरानादिकी भविष्य वाणी (परब्रह्मका ज्ञाान संसारमें आएगा ऐसी) का समय आ गया है.
The inspiration of Supreme Master, consort the soul of the Master-Shyama, Cosmic Intelligence of Akshar, Will of the Master, the intelligence of the original soul (the intelligence of soul in Paramdham) together, I became Mahamat (Greater Intelligence), thus fulfilling the profecies of Ved and Kateb.

या कुरान या पुरान, ए कागद दोऊ परवान।
याके मगज माएने हम पास, अंदर आएके खोले प्राणनाथ ।।९६

वेद पुराण आदि शास्त्र तथा कुरान आदि कतेब ग्रन्थ पूर्णब्रह्म परमात्माकी पहचानके लिए प्रमाण स्वरूप साक्षी ग्रन्थ हैं. इन सभीका गूढ. रहस्य (साङ्केतिक अर्थ) हमारे पास है क्योंकि हमारे प्राणनाथ-सद्गुरु मेरे हृदयमें विराजकर, ये सब गूढ. अर्थ खोल रहे हैं.
Whether it is Pooraan or Quran both scriptures provide the proofs of the Supreme but the deeper meaning and intelligence of them, it is with us the Prannath(Master of the life) my Satguru residing within is revealing those secrets.

आप भी ना खोले दरबार, सो मुझसे खोलाए कियो विस्तार ।
मोहे दई तारतमकी करनवार, सो काहूं न अटकों निरधार ।।९७

सद्गुरुने उन शास्त्रों (वचनों) का स्पष्टीकरण कर स्वयं परमधामके द्वार नहीं खोले, अपितु मुझसे खुलवाकर उनका विस्तार करवाया. उन्होंने मुझे तारतम ज्ञाान रूपी नौका दी है. अब मैं निश्चयही इस भवसागरमें कहीं भी नहीं रुकूँगा.
Satguru did not open the doors of Paramdham but he graced me to do this and expand it further. He gave me such a ship of tartam gyaan so I do not get stuck in any ocean.

सब संसेको कियो निरवार, कोई संसा ना रह्या वार के पार ।
रोसन करूं लेऊं हुकम बजाए, ब्रह्मसृष्ट और दुनिया देऊं जगाए ।।९८

सद्गुरुने मेरे सभी संशयोंका निवारण किया. भवसागर तथा परमधामके विषयमें अब कोई संशय शेष नहीं रहा. इसलिए अब मैं सद्गुरुकी आज्ञााका पालन करते हुए (तारतम ज्ञाान द्वारा) पूरे संसारको प्रकाशित कर दूँ एवं ब्रह्मात्माओं तथा दुनियाँके जीवोंको माया मोहरूपी नींदसे जगा दूँ.
He cleared all the confusions, till there is no confusion from the knowledge of the world to the beyond. By his order, I am enlightening the world and awakening both the brahmshristi and the world. (Remember Brahmshristi and those who are not both will get enlightened, they will establish relationship with the Supreme and they will also be able to experience the Supreme)

द्वार तोबा के खुले हैं अब, पीछे तो दुनियां मिलसी सब ।
जब द्वार तोबा के मूंदयो, रैन गई भोर जो भयो।।९९

अभी प्रायश्चितके लिए द्वार खुले हुए हैं. बादमें तो संसारके सभी लोग एक हो जाएँगे. जब प्रायश्चितके द्वार बन्द होंगे, तब अज्ञाानरूपी रात्रिका समापन होकर ज्ञाानरूप प्रभातका उदय होगा. (तात्पर्य यह है कि सद्गुरु तथा श्रीजीके समयमें प्रायश्चितका मार्ग खुला रहेगा तत्पश्चातकी भूलोंके लिए दुःखाग्निमें जलकर ही शुद्ध होना पड.ेगा).
Now, the door of repentence is opened (as there exists descrepancies in beliefs), but later whole world will unite at that time the door of repentence will be closed as the night will end and morning begin(the darkness of attachment and ignorance will disappear by the light of Tartam gyaan)

या भली या बुरी, जिनहूं जैसी फैल जो करी।
तब आगूं आई सबोंकी करनी, जिन जैसी करी आप अपनी ।।१००

भले (अच्छे) या बुरे कार्य जिन्होंने जैसे भी किए हों, उस समय अपनी-अपनी करनी अनुसारका फल सबके सामने आएगा (अर्थात् सबको अपनी करनी अनुसारका परिणाम भोगना पड.ेगा, क्षमा नहीं दी जाएगी.)
Either good or bad deed, all will face the consequences as per their actions. The first their deeds will taken into consideration, so what you do,keep in mind , it is for yourself. Your actions will determine your deeds and your deeds will determine you. So remember whatever you do you are responsible for yourself. You are totally accountable for your deeds.

तब कोई नहीं किसी के संग, दुख सुख लेवे अपने अंग ।
करूं ब्रह्मसृष्ट को मिलाप, अखंड सूर उदे भयो आप ।।१०१

(इस जागनी लीलाके समय जो जागृत नहीं होगा) फिर कोई भी उसका साथ नहीं देगा. सबको अपने दुःख – सुख स्वयं भोगने
पड.ेंगे. अब अखण्ड ज्ञाानका सूर्य उदय हो गया है. अतः इसके प्रकाशमें समस्त ब्रह्मात्माओंको एक सूत्रमें बाँधकर उनका मिलाप करवाता हूँ.
At that time (judgement day) everyone is on their own, no one can help any other, the soul will experience the joy or sorrow as per the deeds of the individual.
The rise of eternal sun (the knowledge of beyond about the supreme and his leela with the souls has been revealed to entire cosmos) will unite all the brahmshristi(souls).

विस्व मिली करने दीदार, पीछे कोई ना रहे मिने संसार ।
ब्रह्मसृष्ट को पिया संग सुख, सो कह्यो न जाए या मुख ।।१०२

समग्र विश्वके लोग पूर्णब्रह्म परमात्मा (तथा उनके परिचायक ब्रह्मात्माओं) के दर्शन (पहचान) के लिए एकत्र हुए हैं. कोई भी दर्शनसे वञ्चित नहीं रहना चाहता. (जब दुनियाँकी यह स्थिति है तो) ब्रह्मात्माओंको तो अपने धनीके मिलनसे जो आनन्द प्राप्त हुआ है, उसका वर्णन इस जिह्वासे नहीं हो सकता.
The entire cosmos together will be able to witness Lord and later no one will be left out. The Brahmshristi will experience intense joy to unite with the beloved Lord, this is unspeakable and thus cannot be expressed by this mouth.

ब्रह्मसृष्ट को ऐसो नूर, जो दुनिया थी बिना अंकूर ।
ताए नए अंकूर जो कर, किए नेहेचल देख नजर ।।१०३

ब्रह्मसृष्टियोंका ऐसा तेज (ओज) है कि जिन मायावी जीवोंका अंकुर परमधाममें नहीं था, उन्हें नया अंकुर प्रदान कर उन्होंने अपनी कृपा दृष्टिके द्वारा उनको अखण्ड कर दिया.
See the enlightening power and grace of Brahmshristi, the entire cosmos was without the sprouting seed (lacked love), to that they created new sprouts and gave them eternal, everlasting life by mere sight. (Remember only the astral body has come here the souls are still residing in Paramdham and watching this as we see a dream.)

श्री धनीजीको दीदार सब कोई देख, होए गई दुनिया सब एक ।
किनहूं कछुए ना कह्यो, क्रोध ब्रोध कांहूंको ना रह्यो ।।१०४

धामधनी पूर्णब्रह्म परमात्माके दर्शन (अनुभव) प्राप्त कर दुनियाँके सभी लोग एकरस हो गए. इस विषयमें कोई भी कुछ कह नहीं पाए. किसीके भी मनमें क्रोध, विरोध (वैमनस्य) इत्यादि नहीं रहे.
Now everyone can see the Supreme Lord hence whole world became one (There is one God, but nobody could experiece Him, hence there is conflict in the world. Satguru Maharaj has given us such a knowledge that everyone can experience Him and unity consciousness (the same Lord resides in the heart of all of us)). Those who follow Satgure they no more have complaints also anger and conflict cease to exist in them.
श्री धनीजी को ऐसो जस, दुनिया आपे भई एक रस ।
तेज जोत प्रकास जो ऐसो, काहूं संसे ना रह्यो कैसो ।।१०५
धामधनीकी र्कीित (महिमा) ही ऐसी है कि सारी दुनियाँ स्वतः एकरस हो गई. उनके दिव्य ज्ञाानका तेजस्वी प्रकाश ही ऐसा है कि जिससे किसी भी प्रकारसे संशय शेष नहीं रहते.
See the glory of Lord, that entire cosmos is now one (experience the unity consciousness), the sharp beam light of tartam is such, there will be no confusion of any kind.
सब जातें मिली एक ठौर, कोई ना कहे धनी मेरा और ।
पियाके बिरहसों निरमल किए, पीछे अखंड सुख सबोंको दिए ।।१०६
सब जातियाँ एक स्थान पर एकत्र हो गईं. अब कोई भी ऐसा नहीं कहता कि परब्रह्म परमात्माको छोड.कर मेरा कोई दूसरा स्वामी (प्रियतम धनी) है. धामधनीने ब्रह्मात्माओंको अपना विरह देकर उनके अन्तःकरणको निर्मल बना दिया और फिर सबको अखण्ड सुख प्रदान किया.
All the caste/creed/race are united now, no one is saying my God is better than yours! (My God is different than yours). The pain of separation from the beloved in the brahmshristi purified and later granted whole cosmos the everlasting joy of eternity.
ए ब्रह्मलीला भई जो इत, सो कबहूं हुई ना होसी कित ।
ना तो कै उपज गए इंड, भी आगे होसी कै ब्रह्मांड ।।१०७
इस संसारमें यह जो ब्रह्म लीला हुई है वह पहले कभी भी कहीं भी नहीं हुई थी और भविष्यमंे भी नहीं होगी, अन्यथा अक्षरब्रह्मकी कल्पना मात्रसे (पहले भी) अनेक ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो गए हैं और भविष्यमें भी होंगे.
This Brahmleela that took place now, never happened before nor will happen again. Akshar created many zillions of universes before and later too He will continue to create.
ए तीन ब्रह्मांड हुए जो अब, ऐसे हुए ना होसी कब ।
इन तीनोंमें ब्रह्मलीला भई, ब्रज रास और जागनी कही ।।१०८
ये तीन ब्रह्माण्ड (व्रज, रास और जागनी) इस बार बने हैं, ऐसे कभी भी नहीं हुए थे और भविष्यमें भी नहींं होंगे. इन तीनोंमें ब्रह्मलीला सम्पन्न हुई है जिन्हें व्रज, रास और जागनी कहा गया है.
The three universe Braj, Raas and Jaagani, that happened now, it never happened before nor will happen again because in all three are the sports of the Brahm(the Supreme) and those are Braj, Raas and Jaagani.
ज्यों नींद में देखिए सुपन, यों ब्रज को सुख लियो सैयन ।
सुपन जोगमाया को जोए, आधी नींद में देख्या सोए ।।१०९
जैसे नींदमें स्वप्न देखा जाता है, उसी प्रकार ब्रह्मात्मात्माओंने व्रजलीलाके सुखका अनुभव किया. योगमायाके रास मण्डलका स्वप्न आधी नींद (अर्धजागृति) में देखा.
As you see dream in the sleep, this is how the souls experienced the joy in Braj (the souls although loved the true Lord as their lover but they did not know why as they did not know themselves and the Lord). In Raas the souls were partly awakened (they knew their relationship with Lord).
कछुक नींद कछुक सुध, रास को सुख लियो या विध ।
जागनी को जागते सुख, ए लीला सुख क्यों कहूं या मुख ।।११०
कुछ निद्रावस्था (अज्ञाान) में तथा कुछ जागते हुए (सुधिमें) ब्रह्मात्माओंने रासका सुख अनुभव किया. (रासलीलाके समय पूर्ण पहचान नहीं थी, इसलिए संयोग वियोग दोनोंका थोड.ा-थोड.ा अनुभव किया) किन्तु जागनी लीलाका सुख तो जागृत अवस्थामें प्राप्त कर रहे हैं. (यह लीला तो पूर्णज्ञाानका प्रभात है) अतः इस लीलाका सुख जिह्वासे बताया नहीं जा सकता.
They were partly sleeping and partly conscious, this is how they experienced the bliss of Raas. The bliss of jaagani leela, how can I explain this with this mouth. It is unspeakable.
जागनीमें लीला धाम जाहेर, निसान हिरदें लिए चित धर ।
तब उपज्यो आनंद सबों करार, ले नजरों लीला नित विहार ।।१११
इस जागनीमें परमधाम तथा वहाँकी अखण्ड लीला स्पष्ट (प्रकट)हुई है. सभीने परमधामके संकेत अपने हृदयमें धारण कर लिए.तब
सबके हृदयमें परम आनन्द तथा परम शान्तिका अनुभव हुआ. सबने परमधामकी लीलाके नित्य विहारका दर्शन (अनुभव) किया.
In this jaagani leela (sport of awakening), the Paramdham is revealed along with all the signs and symbols in scriptures. Those who accept it in their heart experience the ultimate bliss-joy and they can witness in their inner mind the eternal leela. All those who accept this wisdom in their heart and contemplate will experience the eternal sport of Brahm and thus everlasting bliss of eternity.
इतहीं बैठे घर जागे धाम, पूरन मनोरथ हुए सब काम ।
धनी महामत हंस ताली दें, साथ उठा हंसता सुख लें ।।११२
तारतम ज्ञाानके प्रतापसे ब्रह्मात्माएँ संसारमें रहती हुई भी परमधाममें जाग्रत हुइंर्. सबके मनोरथ सब प्रकारसे पूर्ण हो गए. महामति कहते हैं, धामधनीने ब्रह्मात्माओंको जागृत करनेके लिए हँसते हुए ताली दी और समस्त ब्रह्मात्माएँ भी हँसती हुई परमधाममें जागृत हुईं.
Residing in this world one can awaken in the Paramdham then all the wishes of the mind are fulfilled and all the work accomplished. Beloved Lord says Mahamati with a smile gives a light clap as a cue to wake up the sundarsath who wake up cheerfully.
प्रकरण ३7 चौपाई ११८५
बाललीला भई व्रज में, लीला किसोर वृन्दावन ।
जगंनाथ बुधजी जागनी, भई भोर लीला बुढापन।।५ प्रकरण ५९ श्री किरंतन
सर्व प्रथम व्रज मण्डलमें धामधनीने बाललील की. तत्पश्चात् वृन्दावनमें किशोर लीला की. अब इस तीसरे जागनीके ब्रह्माण्डमें जगतके नाथ बुद्धजी द्वारा प्रौढ.ावस्थाके समान जागनी लीलाका प्रभात हुआ.
राजा प्रजा बाल बूढा, नर नारी ए सुमरन।
गाए सुने ताए होवहीं, लीला तीनों का दरसन।।६ प्रकरण ५९ श्री किरंतन

राजा-प्रजा, बालक-वृद्ध, स्त्री-पुरुष कोई भी व्यक्ति यदि धामधनीकी इन लीलाओंका ध्यान, मनन, गान या श्रवण करे, तो उसे व्रज, रास और जागनी इन तीनों लीलाओंके दर्शन हो सकते हैं.
प्रकरण ५९ चौपाई ५ ,६

Mahamati says all (irrespective of status, age, gender ) those who contemplate can witness the sports of braj , raas and jaagani. Remember Narsaiya was not brahmshristi and he achieved it then all can.
The Braj/Raas is impressed upon akshar’s mind.
The creation is a dream or projection of Akshar;’s mind. When one contemplates deeply then one will be able to connect to the original mind the cosmic mind (Akshar's mind) and can witness the braj/raas themselves. This is a gift of Brahmshristi to the creation.
श्री किरंतन
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(श्री कृष्ण में त्रिधा शक्ति)
साक्षात्कृष्णो ब्रजे नित्यं स्वांसेनैव विहारिणः
तस्यांशो हि मथुरायां वासुदेवो जगद्गुरुः ॥
द्वारकायां तदंशो अस्ति विष्णुवीर्यो यतः प्रभुः ।
कंसं जघान वासुदेवः श्रीकृष्णो नन्दसूर्न तु ॥
द्वारकायां ययौ विष्णुः कृष्णांशाद्धो जगत्प्रभुः ॥
सनत्कुमार संहिता /५५-५६
शब्दार्थ
साक्षात्कृष्णो साक्षात ब्रह्म स्वरूप श्री कृष्ण
ब्रजे नित्यं ब्रज में नित्य विहार/लील करने वाले
स्वांसेनैव = अपने ही अंशो के द्वारा
विहारिणः = विहार करने वाले
तस्यांशो हि = उन क ही अंश
मथुरायां = मथुरा के कृष्ण हैं
वासुदेवः जगत्प्रभुः = वासुदेव श्री कृष्ण को जगद्गुरु कहते हैं
द्वारकायां = द्वारिक आदि में लीला करने वाले श्री कृष्ण को जगदगुरु कहते हैं
तदंशो अस्ति = उन का ही अंश
विष्णुवीर्यो यतः प्रभुः = विष्णु जो पराक्रमी नारायण के अंश है
कंसं जघान = कंसं वध करने वाले
वासुदेवः = वासुदेव श्री कृष्ण
श्रीकृष्णो = वह भी श्री कृष्ण परमात्मा
नन्दसूर्न तु = नन्द पुत्र श्री कृष्ण परमात्मा नहीं
द्वारकायां = द्वारिका में
ययौ = जानेवले = जाने वाले
कृष्णांशाद्धो मथुरावाले श्री कृष्ण के अंश्भूत

जगत्प्रभुः विष्णुः = जगत प्रभु कहलाने वाले विष्णु भगवान ही है
भवार्थ:
ब्रज में नित्य विहार/लीला करने वाले साक्षात ब्रह्म स्वरूप श्री कृष्ण है, जिन्होने अपने ही अंशो के द्वारा या साथ विहार/लीला की । मथुरा में श्री कृष्ण के अंश्रूप वासुदेव जगद्गुरु श्री कृष्ण है। द्वरिका में भारी लीला करने वाले कृष्ण जगद्गुरु वासुदेव कृष्ण के भी अंश है। इसलिए कंस को वध करने वाले वासुदेव जगद्गुरु कृष्ण हैं। परन्तु नन्द पुत्र श्री कृष्ण परमात्मा नहीं। और द्वारिका में जाकर भारी लीला रचने वाले मथुरा वाले कृष्ण के अंश विष्णु भगवान ही है।

कृष्ण एवाक्षरातीतः सच्चिदानन्द लक्षणः ।
प्रियाभिः प्रार्थितः प्रेम्णा रेमे वृन्दावने विभुः ॥
वृहद सदशिव संहिता
कृष्ण एव = श्री कृष्ण ही अक्षरातीतः = अक्षरातीतः परमत्मा है
सच्चिदानन्द = सत चित आनन्द
लक्षणः लक्षणों से विलक्षण प्रियाभिः = प्राण वल्लभा आत्माओं की
प्रार्थितः = प्रार्थन करने पर
प्रेम्णा प्रेम्पूर्वक रेमे रास रमण किया वृन्दावने वृन्दावन के कुंजवन में
विभुः = सर्वेश्वर परमात्मा ने
भावर्थ :=
श्री कृष्णही सच्चिदानन्द लक्षणों से विलल्षण अक्षारतीत ब्रह्म है । प्राणवल्लभा सखियों (ब्रह्म अंगना)द्वारा खेल दिखाने की प्रार्थना करने पर सर्वेश्वर परमात्मा ने वृन्दावन में प्रेम पूर्वक रास के रस का आस्वादन कराया!

तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयस्तत्त्वस्य तावेन समेत्य योगम् ।
एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मैः ॥३॥

tatkarma krtva vinivartya bhuya-
stattvasya tavena sametya yogam ।
ekena dvabhyam tribhirastabhirva
kalena chaivatmagunaischa suksmaih ॥ 3॥

જડતત્વોને રચી ધ્યાનથી ચેતનતત્વ રચ્યું તેણે,
ચેતન જડનો યોગ કરાવી કરી સૃષ્ટિરચના તેણે;
અથવા એક અવિદ્યા તેમજ પુણ્યપાપ ને ત્રણ ગુણને,
આઠ જાતની પ્રકૃતિ તેમજ કાલ સાથે જોડ્યાં એણે.
પછી અહંતા મમતા જેવા આત્માના ગુણની સાથે,
જીવતણો સંબંધ કરાવી કરી જગતની રચનાને. ॥૩॥
Chapter 6, Verse 03
Swetasvatara Upanishad

आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः ।
तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥५॥

adih sa samyoganimittahetuh
parastrikaladakalo'pi drstah ।
tam visvarupam bhavabhutamidyam
devam svachittasthamupasya purvam ॥ 5॥

આદિ જગતના પરમાત્મા છે કાલાતીત અકલ સાચે,
છતાં જીવ ને પ્રકૃતિના સંયોગતણા તે કારણ છે;
અંતરમાં તે પરમાત્મા છે, જગતરૂપમાં તે પ્રકટ્યા,
પુરાણ છે તે સ્તુત્ય, કર્યાથી ભક્તિ પ્રેમથી તે મળતા. ॥૫॥

Chapter 6, Verse 05
Swetasvatara Upanishad
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१४॥

na tatra suryo bhati na chandratarakam
nema vidyuto bhanti kuto'yamagnih ।
tameva bhantamanubhati sarvam
tasya bhasa sarvamidam vibhati ॥ 14॥

Chapter 6, Verse 14
Swetasvatara Upanishad

Hindi translation is from Shri 108 Krishnamani Maharaj ,Shri 5 Navtanpuri Dham, Jamnagar.