हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

बंदौ सतगुरु બન્દૌ સતગુરુ

बंदौ सतगुरु

बंदौ सतगुरु चरणको, करूँ प्रेम प्रणाम ।
अशुभ हरन मंगल करन, श्री देवचन्द्रजी नाम ॥१

श्री देवचन्द्रजीको दरश दियो, जो है पूरण रूप ।
तारतमको तत्व कह्यो, हिरदे बैठि स्वरूप ॥२

धामधनी आनंद हो, पावन पूरण नाम ।
परके परे परम पद, सो कहिये परनाम ॥३

गुरु कन्चन गुरु पारस, गुरु चंदन परमान ।
तुम सतगुरु दीपक भये, कियो जो आप समान।४

तुम स्वरूप तुममें स्वरूप, तुम स्वरूपके संग ।
भेद तुम्हारो को लखे, ब्रह्मानंद रस रंग॥५

तुम केवट भानु वा देशके, देहु चक्षु आप समान ।
दृष्टि तुम्हारी क्यों रहे, संसय तिमिर अज्ञान ॥६

जेहि पद नारायण भजे, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
महाबिष्णु वाछंत सदा, मोहिं पहुँचाओ वा देश ।७

काल करम भव दुख से, तुमही छुडवन हार ।
परमहंस पद देत हो , क्षर अक्षरके पार ॥८

क्षर अक्षरके पार है, अक्षरातीत आधार ।
बिना संबंध न पाइये, कोटिन करे आचार ।९

वेद थके, थकि गये शेष महेश ।
गीताको जहाँ गम नहीं, वह सतगुरुको देश ॥१०

चाँद सूरज्को गम नहीं, नहीं पवकको काम ।
पहुँचे सो आवे नहीं, सोइ मुकुन्द निजधाम ॥११

श्री प्राणनाथ निज मूलपति, श्री मेहेराज सुनाम ।
तेजकुँवरी श्याम युगल, पल पल करूँ परनाम ॥१२

બંદૌ સતગુરુ

બંદૌ સતગુરુ ચરણકો, કરૂઁ પ્રેમ પ્રણામ |
અશુભ હરન મંગલ કરન, શ્રી દેવચન્દ્રજી નામ ||૧

શ્રી દેવચન્દ્રજીકો દરશ દિયો, જો હૈ પૂરણ રૂપ |
તારતમકો તત્વ કહ્યો, હિરદે બૈઠિ સ્વરૂપ ||૨

ધામધની આનંદ હો, પાવન પૂરણ નામ |
પરકે પરે પરમ પદ, સો કહિયે પરનામ ||૩

ગુરુ કન્ચન ગુરુ પારસ, ગુરુ ચંદન પરમાન |
તુમ સતગુરુ દીપક ભયે, કિયો જો આપ સમાન|૪

તુમ સ્વરૂપ તુમમેં સ્વરૂપ, તુમ સ્વરૂપકે સંગ |
ભેદ તુમ્હારો કો લખે, બ્રહ્માનંદ રસ રંગ||૫

તુમ કેવટ ભાનુ વા દેશકે, દેહુ ચક્ષુ આપ સમાન |
દૃષ્ટિ તુમ્હારી ક્યોં રહે, સંસય તિમિર અજ્ઞાન ||૬

જેહિ પદ નારાયણ ભજે, બ્રહ્મા વિષ્ણુ મહેશ |
મહાબિષ્ણુ વાછંત સદા, મોહિં પહુઁચાઓ વા દેશ |૭

કાલ કરમ ભવ દુખ સે, તુમહી છુડવન હાર |
પરમહંસ પદ દેત હો , ક્ષર અક્ષરકે પાર ||૮

ક્ષર અક્ષરકે પાર હૈ, અક્ષરાતીત આધાર |
બિના સંબંધ ન પાઇયે, કોટિન કરે આચાર |૯

વેદ થકે, થકિ ગયે શેષ મહેશ |
ગીતાકો જહાઁ ગમ નહીં, વહ સતગુરુકો દેશ ||૧૦

ચાઁદ સૂરજ્કો ગમ નહીં, નહીં પવકકો કામ |
પહુઁચે સો આવે નહીં, સોઇ મુકુન્દ નિજધામ ||૧૧

શ્રી પ્રાણનાથ નિજ મૂલપતિ, શ્રી મેહેરાજ સુનામ |
તેજકુઁવરી શ્યામ યુગલ, પલ પલ કરૂઁ પરનામ ||૧૨

बंदौ सतगुरु चरणको, करूँ प्रेम प्रणाम ।
अशुभ हरन मंगल करन, श्री देवचन्द्रजी नाम ॥१

श्री देवचन्द्रजीको दरश दियो, जो है पूरण रूप ।
तारतमको तत्व कह्यो, हिरदे बैठि स्वरूप ॥२

धनी देवचन्द्रजी बुध अवतार, श्यामा अवतार, इसा, रूहल्लाह, महम्मद मेहदी , निजानंद संप्रदाय के स्वामी को अनादी अक्षरातीत धाम के धनी पूर्ण ब्रह्मस्वरूप में दर्शन दिए और निज आत्मा स्वरुप का नाम श्री कृष्ण है कहा और ब्रज रास के ब्रह्मलीला, संसार, चौदह लोक, बेहद, अक्षर, परमधाम वतन का तारतम ज्ञान प्रदान किया , ब्रह्मात्मायों को जगाने का आदेश दिया और उनके हृदये में विराजे। इसे तारतम महामंत्र को कुंजी कहा है।इस कुंजी से आप कुरान, पुराण, वेद, भागवत, तोरेत, एंजेल और जबूर सभी खोले।
यह आनंद स्वरूप श्यामा के वर सुन्दर श्याम सत्य हैं।

धामधनी आनंद हो, पावन पूरण नाम ।
परके परे परम पद, सो कहिये परनाम ॥३

धाम धनी आनंद हैं और श्री कृष्ण नाम अत्यंत पावन है। पार के पार के परम पद को सभी प्रणाम करे। श्री कृष्ण के चरण में प्रणाम।
इनके चरण में शरण पड़ने वालों को अखंड सदा सुख प्राप्त होगा।

गुरु कन्चन गुरु पारस, गुरु चंदन परमान ।
तुम सतगुरु दीपक भये, कियो जो आप समान।४
तुम स्वरूप तुममें स्वरूप, तुम स्वरूपके संग ।
भेद तुम्हारो को लखे, ब्रह्मानंद रस रंग॥५

यह कुंजी ब्रह्मात्मा इन्द्रावती ने प्राप्त किया और श्याम श्यामा, सुंदरी सखी से उसका समागम हुआ और महामति प्राणनाथ हुई। हमारे सतगुरु धनी देव चन्द्र और महामति प्राणनाथ का एकाकार हो गया। धाम धनी श्री कृष्ण इन्द्रावती के हृदये में बैठ, इसीलिए साक्षात् परमधाम कृष्ण के स्वरुप हुए, इनके हृदये में अक्षरातीत श्री कृष्ण का स्वरुप विराजे हैं और परमधाम में इन्द्रावती तो श्री कृष्ण के साथ ही है। ब्रह्मानंद का यह भेद कौन जान सकता है ऐसा ब्रह्मात्मा मुकुंद दस जी कह रहें हैं। अब महामति प्राणनाथ और धाम के धनी श्री कृष्ण में कोई अंतर ही नहीं रहा। तब हमारे धनी श्यामा श्याम इन्द्रावती के हृदये में बैठ कर सभी ब्रह्मात्मा सुन्दरसाथ की जागनी की। अब यह सतगुरु दीपक भये और सभी सुन्दरसाथ को अपने सामान बना दिया। यह जो सुन्दरसाथ जागे वे प्राणनाथ पर समर्पित होकर घर बार छोड़ कर जागनी में लगे। यह ब्रह्मात्माओं के ह्रदय धाम में धनी श्यामा श्याम विराजे, इन्होने ने निजानंद अनुभव किया और इन्होने भी तारतम सागर बीतक लिखे।

तुम केवट भानु वा देशके, देहु चक्षु आप समान ।
दृष्टि तुम्हारी क्यों रहे, संसय तिमिर अज्ञान ॥६
जेहि पद नारायण भजे, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
महाबिष्णु वाछंत सदा, मोहिं पहुँचाओ वा देश ।७
काल करम भव दुख से, तुमही छुडवन हार ।
परमहंस पद देत हो , क्षर अक्षरके पार ॥८
क्षर अक्षरके पार है, अक्षरातीत आधार ।
बिना संबंध न पाइये, कोटिन करे आचार ।९
अब सतगुरु तो अखंड धाम के केवट हैं, उनके देह और नैन परमधाम की आत्मा स्वरुप हैं तब ऐसे स्वरुप के नजर में असत्य, शंसय, अन्धकार, अज्ञान कैसे टिक सकता है। जिस अक्षरातीत श्री कृष्ण के चरण नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश भजते हैं, जहाँ पर अक्षर सदा रहते हैं उस देश में आपने पंहुचा दिया। यह कालमाया ब्रह्माण्ड के कर्म के बंधन के कारण भूत, वर्त्तमान और भविष्य में बार बार जनम और मृत्यु के कालचक्र से निकाल दिया और परम हंस के चरण दे दिए जो क्षर और अक्षर से पार हैं। क्षर और अक्षर से पार अक्षरातीत आधार बीना संबंध, करोडों आचार करने पर भी प्राप्त नहीं हैं। अक्षरातीत श्री कृष्ण की अंगना ही इस धाम में जागती हैं।

वेद थके, थकि गये शेष महेश ।
गीताको जहाँ गम नहीं, वह सतगुरुको देश ॥१०

चाँद सूरज्को गम नहीं, नहीं पवकको काम ।
पहुँचे सो आवे नहीं, सोइ मुकुन्द निजधाम ॥११

श्री प्राणनाथ निज मूलपति, श्री मेहेराज सुनाम ।
तेजकुँवरी श्याम युगल, पल पल करूँ परनाम ॥१२

वेद ने ब्रह्म की बहूत खोज की और बहूत कुछ कहा लेकिन संपूर्ण कह नहीं सके, थक गए और ब्रह्मा विष्णु महेश तीनो ने भी खोजा और कहा भी पर थक गए। यह परमधाम में सूर्य, चन्द्र जो इस पृथ्वी को जीवन दान देती है उसकी पहुँच वहां नहीं है आग की कोई आवश्यकता नहीं । वहां पर पहुँच कर फिर से हद (मृत्यु लोक) में आना नहीं पड़ता यह मुकुंद जी का आत्मा का घर निजधाम है।
श्री प्राणनाथ मेरे आत्मा के मूल धनी हैं जिनका सुनाम मेहेराज है और तेज कुँवरी श्यामा जुगल स्वरुप को पल पल (हर पल) प्रणाम।

सतगुरु धनी देवचन्द्रजी और महामति प्राणनाथ जी एक ही बातें करते हैं। इसा और इमाम का इलम एक ही है। अब इसे के नुस्खे पर चलने वाले सुन्दरसाथ को न कुलजम स्वरुप में कहीं शंका उपशंका है न ही कोई भी बीतक में, ना ही भागवत में, न हीं अन्य कोई ग्रन्थ में। ब्रह्मात्मायों की रचना में भी कोई भेद नहीं होता। एक ही धाम की सखियाँ धाम धनी की गुण गान कर रहीं हैं। सभी से आत्मा को सुख ही मिलता है। कहीं कोई संशय नहीं होता। अज्ञान और तिमिर का नाश होता है। तारतम की कुंजी से ग्रन्थ में छुपे हुए धाम धनी का पत्र बिलकुल स्पस्ट होता है। महामति प्राणनाथ ने कुम्ब में हमारा मंत्र तारतम इसी को कहा है। और हम श्री प्राणनाथ निज मूलपति, श्री मेहेराज सुनाम को सत्य मानते हैं, इन्ही से हमारे धर्म का जहाज चल रहा है।

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