हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Ego-Body conciousness

As long as we live in this world and being aware of soul consciousness, ego does not completely die, it might prop up even when you say I am soul conscious and I know the Supreme. This is also ego and ahankaar.
Its Lord's will only exists and we sleep and awaken as per His will, so saying I know Him is inappropriate. We do not have capacity to know Him with our limited physical senses.

पेहेले आप पेहेचानो रे साधो, पेहेले आप पेहेचानो ।
बिना आप चीन्हें पार ब्रह्मको, कौन कहे मैं जानो।।१
महामति कहते हैं, हे साधुजन ! सर्व प्रथम स्वयं (आत्मा) को पहचानो, क्योंकि स्वयंको पहचाने बिना कौन कह सकता है कि मैंने परब्रह्म परमात्माको पहचान लिया है.
O seeker know thyself first. Who are you? Body is connected to Ego and Soul to Lord (eternal Brahma). Mind thinks that we are the body and ego as reality which is an illusion. We are actually that is blissful, eternal, everlasting, imperishable, beyond the mind and physical senses can experience. Become conscious of your original self. Realise your real self without it one cannot proclaim that they know the Supreme Lord.

खोजी खोजें बाहेर भीतर, ओ अंतर बैठा आप।
सत सुपने को पारथें पेखे, पर सुपना न देखे साख्यात ।।५
परमात्माको ढूँढ.नेवाले लोग इस विश्वमें पिण्ड-शरीरमें अथवा ब्रह्माण्ड (बाहर) में परमात्माको ढूँढ.ते हैं, परन्तु स्वयं परमात्मा तो आत्म स्वरूपसे अन्तरमें विराजमान हैं. सत्य आत्माएँ (ब्रह्मात्माएँ) पार परमधाममें रहकर इस स्वप्नरूपी झूठे संसारको देख रही हैं, परन्तु स्वप्नके जीव उन्हें देख नहीं पाते.
The seekers look for the Creator in this world like temples or outside like Heaven/Swarg but He is dwelling inside the self. The soul (true being) can witness this illusionary world but the ego conciousness (the perishable entity) cannot see the true form.
Wake up and recognize the world within where we may find the Supreme Lord Himself (imperishable, infinite, eternal, luminious, beautiful, bountiful, abundant supply, love, living -chaitainya,energy, truth, always awake, witnessing). Do not go after the world without, it is just a reflection of world within.

महामत कहें बिंद बैठे ही उडया, पाया सागर सुख सिंध ।
अक्षरातीत अखंड घर पाया, ए निध पूरव सनमंध।।१०
महामति कहते हैं, सद्गुरुकी कृपा द्वारा अनायास (सहज) ही बिन्दुरूपी झूठी मायाके प्रपञ्च दूर हो गए हैं और सिन्धुरूप पूर्णब्रह्म परमात्माका अपार सुख प्राप्त हो गया. पूर्णब्रह्म परमात्मा अक्षरातीतके अखण्ड घर-परमधामकी प्राप्ति हो गई. यह अखण्ड निधि पूर्व सम्बन्धके कारण ही प्राप्त हुई.
Mahamati (the great mind) says by the Grace of satguru, the infinitisimally small worldly entity is lost and ocean of eternal bliss of the infinite is gained. I have found the Aksharateet Akhand (whole eternal infinte which is beyond the imperishable Akshar) abode and also have established the original relationship with the Lord.

ए वानी गरजत मांझ संसार, खोजी खोज मिटावे अंधार।
मूढमति न जाने विचार, महामत कहे पुकार पुकार।।९
यह तारतम वाणी इस संसारमें गर्जना कर रही है. खोजनेवाले जिज्ञाासु ही खोजकर अपने हृदयके अज्ञाानरूप अन्धकारको दूर करते हैं. इसलिए महामति प्राणनाथजी पुकार-पुकार कर इसका रहस्य स्पष्ट कर रहे हैं. मूढ लोग इसका मूल्य न समझनेके कारण इस विषयमें विचार नहीं करते.
These words of the wisdom are roaring right in the middle of the world but only the seekers search can find it and destroy the darkness of ignorance in the heart. The fool can never understand it and will not pay heed to Mahamati’s persisting call.

बांधत बंध आपको आपे, न समझे माया को मरम।
अपनों कियो न देखें अंधे, पीछे रोवें दोस दे दे करम ।।४
संसारके लोग मायाके मर्मको समझे बिना अपने द्वारा बनाए गए मायाके बन्धनोंमें स्वयं बँध जाते हैं. ऐसे अन्धे-अज्ञाानी लोग अपने किए हुए कर्मोंको देख नहीं सकते और अपने भाग्य (कर्म) को दोषी मानकर रोते फिरते हैं.

We are the cause of our bondage. The mind binds us to the ego (me, mine) and body (perishable, continuously changing) which is actually an illusion (maya). Our real self is the soul that is blissful, eternal, never changing and which longs nothing but to unite with the Lord. We do not realize this fundamental fact and all our actions are directed towards protecting this blinded thinking that we are fragile and vulnerable to the outer environment. This very thought out of fear and worry is the cause and experiences that we meet in life is the effect. Our blindness does not see our erroneous actions and make hue and cry blaming the fate. If we could realize our true self of the soul then we will be liberated and we will be awakened. We will enjoy the supreme eternal bliss (akhand aanand) with Grace of Shri Rajji.

From kirantan: Dear Sundarsathji I will translate as and when I will get time.

रे जीवजी जिन करो यासों नेहडा।

जाको सनमुख नाहीं सरम, तासों नाहीं मिलवेको धरम ।

ए तो भूलवनी कोई भरम, कोहेडासों लाग्यो करम ।।१

जीवको उद्दिष्ट (लक्ष्य) कर सुन्दरसाथको उपदेश देते हैं, हे जीव ! पाँचतत्त्वके द्वारा बने हुए इस नश्वर शरीर पर ममता मत रखो. जिस शरीरको अपने साथी (जीव) को छोड.कर सामनेसे जाते हुए लज्जा ही नहीं आती, उसके साथ ममता रखना तेरा धर्म नहीं है. यह शरीर तो भुलाने वाला भ्रममात्र है. तू तो कुहिरके समान कर्मोंके जालमें उलझा हुआ है.

O Being(the soul within), Do not fall in love with the physical body. It does not have any shame to abandon you(the soul), it is not the duty of the soul to get attached to it. The body is an illusion and you are puzzled in the web of fog of deeds(karma).

नामैं जाको प्रपंच, तिन सबको मूल सरीर।

या बनथें बाग विस्तरयो, जानो भरिया मृगजल नीर ।।२

जिसका नाम ही प्रपञ्च है, उन प्रपञ्चों (सांसारिक बन्धनों) का मूल ही यह शरीर है. इसके द्वारा ही बाग-बगीचेकी भाँति मायाका विस्तार फैला हुआ है. मानों चारों ओर मृगजलके समान (आभासित) जल भरा हुआ है.

The origin of worldly drama is the body made of 5 elements(which makes one forget about the soul). This is spread from the forest and to the garden like filled with mirage (appearance of water)!The illusion begins from the body and everything that one sees and feels from the senses are also like a mirage. Everything appears to be real,everlasting,blissful but are actually temporary and perishable.

रे जीव सरीर मंदिर सोहामनों, चौदे खूने रे अवास ।

इनके भरोसे जे रहे, ते निकस चले निरास।।३

हे जीव ! यह शरीररूपी मन्दिर अति सुन्दर दिखाई दे रहा है. इस आवासके चौदह अङ्ग (दश इन्द्रियाँ और चार अन्तःकरण) हैं. जो इनके भरोसे रहते हैं, वे अन्तमें निराश होकर चले जाते हैं.

O soul, the temple of the body is very beautiful and in it are housed all the 14 sense organs (10 external sense organs and 4 internal mind,emotion, intellect,identification(ahankaar) that one believes oneself). Those who live in their faith will leave the world in despair.

खास छजे गोख जालियां, यामें केती मिलाई धात।

संधों संध समारियां, मिने हिकमत कै हिकात।।४

इस शरीररूपी मन्दिरमें चाँदनी जैसा ललाट, छज्जेके समान कन्धा, गोख (झरोखे) के समान नेत्र और नाक कानके समान जालियाँ लगी हुई हैं. जिस प्रकार भवनमें विभिन्न पदार्थोंका उपयोग होता है, उसी प्रकार इस शरीररूपी भवनमें भी धातुओंके रूपमें मांस, मज्जा, रक्त, हड्डियाँ, त्वचा आदिका उपयोग कर शरीरके अङ्गोंको भलीभाँति जोड.ा गया है. महान कलाकारकी कला कौशलका यह आदर्श उदाहरण है.

In this beautiful temple of body is adorned with moonlike forehead, balcony like shoulders, windows like eyes, nose and veils like ears and so many body parts are made with elements and many metals and all are so nicely joined with one another. This is a exemplary work of a great artist.

मेहेनत करी केती या पर, विध विध बांधे बंध।

जानिए सदा नेहेचल, ए रच्यो ऐसी सनंध।।५

इस शरीरकी रचना विभिन्न प्रकारके अंशोंको जोड.कर बड.े परिश्रमसे की गई है. उसे देखकर संसारके जीवोंको यह आभास होता है कि यह अखण्ड रहनेवाला है. इसकी रचना ही इस प्रकारसे की गई है.

It is a piece of hard work as there are many valves and it appears will be everlasting such is this created.

गुन पख अंग इन्द्रियां, सबके जुदे जुदे स्वाद।

तरफ अपनी खैंचहीं, खेलत मिने बिवाद।।६

इस शरीरमें तीन गुण (सत्व, रज, तम), चार अङ्ग (अन्तःकरण) तथा दश इन्द्रियोंका समूह है, उन सबके अलग-अलग स्वाद हैं. ये सब अपने-अपने स्वभावके अनुसार अपनी ओर आर्किषत करते हैं. लोग इनके मोहमें उलझकर परस्पर वाद-विवाद करते हैं.

The various organs experiences different taste and they all as per the nature of the organs(internal or external) drives the being and the being following these senses plays in confusion.

या वनथें बाग रंग फूलिया, जानें लेसी सुख अपार ।

अधबीच उछेदिया, सो करता गया पुकार।।

मायावी वन (जङ्गल) के समान इस जगतके कुटुम्ब-परिवाररूपी उपवनमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहङ्कारसे भरे हुए मायावी रङ्गके विभिन्न पुष्प खिले हैं. इन्हें देखकर जीवको आभास होता है कि इनसे अपार सुख प्राप्त होगा. परन्तु बीचमें ही मृत्यु द्वारा उसका नाश होता है. इसलिए (ब्रह्मका साक्षात्कार न होनेके) पश्चात्तापके साथ उसे संसार छोड.ना पड.ता है.

In this forest of life one will find flowers of various colors (family, friends, name, fame, glory) which looks attractive to the being and it follows it. But suddenly one day the body perishes because of death and this languishes the soul for not uniting with the real.

मोहे बाग रंग मंदिरों, सेजडिएं सोए करार।

सो काढे कंठ पकडके, गए कलकलते नर नार।।८

हे जीव ! इस शरीररूपी मन्दिरके कुटुम्ब परिवाररूप बागमें मोहित होकर रङ्गकर झूठे सुखोंकी शय्या पर चैनकी नींद सो रहे हो. जब काल गला पकड.कर इस सुख-शय्या परसे खींच ले जाता है, तब सब नर-नारी रोते-कलपते हुए चले जाते हैं.

In this temple of beautiful body the being entertains the garden of forgetfulness and sleeps in the bed of peace, unaware of oneself. When the death comes all the men or women leave this world away crying.

ए अनमिलतीसों ना मिलिए, जाको सांचो नाहीं संग ।

नाहीं भरोसो खिन को, ज्यों रैनी को पतंग ।।९

इसलिए हे जीव ! जिस शरीरने अन्त तक कदापि किसीका साथ नहीं दिया, उसके साथ मित्रता मत रखो. इसका सङ्ग सच्चा नहीं है. जैसे पतङ्ग रातमें ही पैदा होकर रातको ही मर जाता है, इसी प्रकार इस शरीरका भी क्षण मात्रका भरोसा नहीं किया जा सकता.

That is why O being within O soul, do not mingle with this perisable body. Do not befriend it, uniting with this is not true. There is no trust even for a moment like a nocturnal moth is for a night and perishes thus is this body. O being do not trust this body which can perish any moment and uniting and attaching oneself with the temporary will only cause distress and suffering.

क्यों रे नेहडा यासों कीजिए, जो मिलके करे भंग ।

एक रस होइए क्यों तिनसे, नेहेचल नहीं जाको रंग ।।१०

हे जीव ! तू इस मायावी शरीरके साथ ममता क्यों रख रहा है ? क्योंकि यह तो थोड.े दिन साथ देकर फिर धोखा दे देता है. ऐसे मायावी शरीरके साथ एकरस क्यों हो रहे हो (शरीरके साथ क्यों तादात्म्य सम्बन्ध रख रहे हो) जिसका रङ्ग (प्रभाव) ही स्थायी नहीं है.

Why do you get attached to this body and establish relationship with it, once united, it breaks. Why you have to unite with such an object which is not everlasting?

ऐसे कै उजाडे मंदिर, ए सब को देवे छेह ।

मिलापै में रंग बदले, अधबीच तोडे नेह।।११

ऐसे अनेक मन्दिर (शरीर) उजाड. दिए गए हैं क्योंकि यह सबको धोखा देता है. इससे मिलते ही यह जीवको अपने मायावी रङ्गसे रङ्ग देता है, फिर बीचमें ही अपना साथ छोड. देता है. One can see so many such temples are being destroyed still one believes that there's is the everlasting one (in such a way they delude the being), while uniting it shows many colors but in the halfway it will break all the loving relationship. (No matter how much you love this body but it will perish one day)

रे जीव सरीर रची सेजडी, इत आवे नींद अपार ।

ए सूतेहीं पटकावहीं, पुकार न पीछे बहार।।१२

हे जीव ! यह शरीररूपी शय्या इस प्रकार बनाई गई है कि उस पर सोते ही अज्ञाानताकी गहरी नींद आ जाती है. वह इस प्रकार सोते हुए जीवको नींदमें ही चौरासीके फेरेमें पटक देता है, फिर उससे बाहर निकलकर कुछ बोला भी नहीं जा सकता.

O soul (being), this body is created in such a manner, one feels extremely sleepy(stays unconscious of the self within) and while in this deep sleep it takes the soul into cycle of birth and death. Once out of the body, it cannot make a plea.

(The soul must wake up while in the body, be aware of its presence, be conscious of its mind, words, deeds, master the body and drive it to create relationship with the truth and reality.)

यासों तो मनडो माने नहीं, जो छोडे ए अंत्रीयाल ।

उरझाए आप न्यारी रहे, जीवको बांध देवे मुख काल ।।१३

जब तक यह देह जीवको ऊँचा उठाकर बीचमें ही पटक नहीं देती, तब तक यह मन मायासे नहीं भरता. यह देह तो जीवको कर्मबन्धनमें बाँधकर उलझा देती है एवं कालके मुखमें इसे धकेल कर स्वयं अलग हो जाती है.

The desires of the mind are not fulfilled but the body abandons it in the midway. The body makes the being attached to it and thus making it go through the cycle of birth and death but it does not get attached to the soul(when the time comes it leaves the being in the mouth of death and it stays aloof from all this)

रे जीव नीके जानिए ए भूलवनी, इत भूले सब कोए ।

या रंग रसे जो भूलहीं, तिन करडी कसोटी होए ।।१४

इसलिए हे जीव ! तू भलीभाँति समझ ले कि यह मायावी देह भूल-भूलैयाका खेल है, इसके सङ्गमें आकर सभी जीव मार्ग भूल गए हैं. इसके रस-रङ्गमें फँसकर जो जीव ब्रह्म प्राप्तिके सत्य मार्गको भूल जाएगा, उसकी कड.ी कसौटी होगी अर्थात् उसे नाना योनियोंमें जाना पड.ेगा.

O soul you very well understand that this body is an illusion and everyone makes mistake here. The being which colors oneself to the body and blunders for them there are many more rigorous test to go through.

कांटे चूभे दुख पाइए सेहे न सके लगार।

पर होत है मोहे अचंभा, ए क्यों सेहेसी जम मार।।१५

शरीरमें एक काँटा चुभने पर भी बड.ा कष्ट होता है, वह सहन नहीं होता, किन्तु मुझे आश्चर्य होता है कि यह जीव कर्मबन्धनमें बँधकर यमराजकी मार कैसे सहेगा ?

When one small thorn pricks is such painful and one cannot tolerate then it makes me wonder how they can tolerate the Jamaraj's thrashing (It seems Jamraj's beating is far more painful than we can actually imagine the pain!)

इन गफलत के घरमें, पडेगी बडी अगिन।

पीछे लाख चौरासी देहमें, जलसी रात और दिन।।१६

इस झूठे शरीरमें रहते हुए चिन्ता और सन्तापरूपी भयङ्कर आग जलने लगेगी. फिर मृत्युके बाद चौरासी लाख योनियोंमें घूमते हुए रात-दिन झुलसना पड.ेगा.

While living in this house of confusion one has to face lots of burning like worry and anxiety and later after the death it has to go through 840 million bodies and shall continue to suffer day and night.

ए देखी अजाडी आंखा खोलके, याकी तो उलटी सनंध ।

ए मोहडा लगावे मीठडा, पीछे पडिए बडे फंद।।१

मैंने आँख खोलकर देखा कि यह देह तो फँसाने वाली खाईके समान है. इसकी कार्यशैली ही उलटी है. यह सर्व प्रथम मीठा मोह उत्पन्न करती है और अन्तमें बड.े जालमें फँसा देती है.

I have seen this with my awakened eyes, the body is an open man hole or trench and its working is absurd as the attachement to it appears very sweet but later traps you into the noose of death.

ए अंधेरी है विकट, ए जाहेर रची जमजाल।

ए पेहेले देखावे सुख सीतल, पीछे जाले अगिनकी झाल ।।१८

यह मायावी देह गहन अन्धकारके समान है. वस्तुतः यह तो प्रत्यक्ष यमपाश ही है क्योंकि यह सर्वप्रथम जीवको ललचानेके लिए इन्द्रियोंका सुख देती है और अन्तमें कर्म फलकी अग्निकी ज्वालामें जला देती है.

This illusion of body is extremely dark and this is created by the bait of the Yamraj(angel of death)first it allures the soul with pleasure of the senses and later throws into the fiery flames(one creates karma out of unconsciousness and sense pleasure and thus gets trapped in the cycle of birth and death).

ए धूतारीको न धीरिए, जो पलटे रंग परवान।

ए विस्व बंधे वैराट को, सो भी निगलसी निरवान ।।१९

इस ठगिन देहका तनिक भी विश्वास मत करना, क्योंकि यह तो क्षणमें ही अपना रङ्ग बदलती रहती है. इस विराट विश्वके जीव इसी देहके बन्धनमें बँधे हुए हैं, यह निश्चय ही सबको निगल जाएगी.

Do not believe this decieving body which changes its color. Those who get attached to the body shall forever be trapped in this illusionary world(all planes of existence)

ए सब मोहे इन मोहनी रे, पर इन बांध्यो न कासों मन ।

जीवको यातें बिछडते, बडी लागी दाझ अगिन।।२०

इस मोहिनी मायाने सब जीवोंको मोह लिया है, किन्तु यह स्वयं किसीसे मोहित नहीं हुई (इसका मन किसीसे भी नहीं बँधा). परन्तु जीवको इससे अलग होनेमें अति कष्ट होता है.

The attachment of the body is so enchanting has tied all but is not tied to any. When the soul separates from it because of death, it burns in the flame of separation.

प्रकरण ३३ kirantan