हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

Braj and Raas

धन गोकल जमुना त्रट, धन धन ब्रजवासी।
अग्यारे बरस लीला करी, करी अविनासी।।३२

ना जप तप ना ध्यान कछू, ना जोगारंभ कष्ट।
सो देखाई व्रज रास में, एही वतन चाल ब्रह्मसृष्ट।।


ए लीला अखंड थई, एहनो आगल थासे विस्तार।
ए प्रगटया पूरण पार ब्रह्म, महामति तणो आधार।।१०


सतगरु मेरा स्याम जी, मैं अहेनिस चरणें रहूं।
सनमंध मेरा याहीसों, मैं ताथें सदा सुख लहूं ।।


खोजी खोजें बाहेर भीतर, ओ अंतर बैठा आप।
सत सुपने को पारथें पेखे, पर सुपना न देखे साख्यात ।।५

hai nijnaam Shri Krishna

We must first believe this chaupai as truth must have complete faith on it and then one can understand the Nijanand Sampraday.
पिया जो पार के पार हैं, तिन खुद खोले द्वार।
पार दरवाजे तब देखे, जब खोल देखाया पार।।३

जो अक्षरसे भी परे अक्षरातीत परमात्मा हैं उन्होंने ही स्वयं आकर परमधामके द्वार खोल दिए. पारके द्वार मुझे तब प्रत्यक्ष हुए जब उन्होंने इस प्रकार खोलकर दिखाए.
The beloved Lord who is beyond of beyond(Akshar), he Himself (Khud) opened the door. I could see the door of beyond when he opened and showed the door!

खोजी खोजें बाहेर भीतर, ओ अंतर बैठा आप। Lord and the abode is within!

नूर रोसन बल धाम को, सो कोई न जाने हम बिन।
अंदर रोसनी सो जानहीं, जिन सिर धाम वतन।।

परमधामके दिव्य ज्ञानके प्रकाशके सामर्थ्यकी जानकारी हम ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त किसीको नहीं है. जिनको परमधामका दायित्व प्राप्त है, वे ही उसके अन्दरके प्रकाशको जान सकतीं हैं.

No one but the divine celestial souls know the splendour, illumination and power of the supreme abode paramdham. Those who are acquainted with light within, only those can experience the original abode of the supreme and bear the responsibility of Paramdham.

स्वाद चढया स्वाम द्रोही संग्रामे ! Mahamati

Do you know the written book that Mahamati Prannathji compiled for Aurangazeb? How can Prannathji explain the brute Aurangazeb a religious bigot who killed his own siblings(one of them was eldest son Darah Sikoh who spent his time seeking truth and has requested Aurangazeb to spare him as he does not want the throne but he did not listen), imprisoned his father and sister for life, cruel to the core and intolerant for other's beliefs?

गोकल सरूप पधारियो, तेहने न कहीए अवतार। Krishna is not in Avtaar

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--------------- How can celestial souls continue to be in confusion?
व्रज रास ए सोई लीला, सोई पिया सोई दिन।
सोई घडी ने सोई पल, वैराट होसी धन धन।।२२
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सोई पिया सोई पिया सोई पिया सोई पिया सोई पिया सोई पिया !!!!
व्रज और रासकी भाँति यह जागनी लीला भी अखण्ड है. इसमें भी वही धामधनी सद्गुरुके रूपमें हैं, वही लीला भरे दिन, वही आनन्दकी घड.ी, वही पल है. इसी जागनी लीलाके कारण समग्र सृष्टि धन्य (अखण्ड) हो जाएगी.

बुरा चाहें तिनका, जिन देखाया मूल वतन! How can one go against Devachandraji!

मिनो मिने गुझ करें, निस दिन एही चितवन।
बुरा चाहें तिनका, जिन देखाया मूल वतन।।९

कुछ लोग परस्पर छिपकर बातें करते हैं और निरन्तर (रात-दिन) दूसरोंके गुण-दोषोंका ही चिन्तन (छिद्रान्वेषण) करते रहते हैं. वे उनका भी बुरा चाहते हैं, जिन्होंने उन्हें परमधामका ज्ञाान दिया है.

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चरचा सुने वतन की, जित साथ स्यामाजी स्याम।
सो फल चरचा को छोडके, जाए लेवत हैं हराम।।१३
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चर्चा तो परमधामकी सुनती हैं जहाँ श्याम-श्यामाजी तथा सुन्दरसाथ आनन्दमें रहते हैं, परन्तु ऐसी दिव्य चर्चाके फलको छोड.कर त्याज्य वस्तुको ग्रहण करते हैं.

बाहेर देखावें बंदगी, माहें करें कुकरम काम।
महामत पूछे ब्रह्मसृष्ट को, ए वैकुंठ जासी के धाम।।१४

जो बाहरसे तो भक्तिभाव दिखाते हैं और अन्दर छिपकर दुष्कर्म करते हैं. ऐसी तथाकथित ब्रह्मसृष्टियोंसे महामति पूछते हैं कि वे वैकुण्ठ जाएँगे अथवा परमधाम ? अर्थात् उनकी कौन-सी गति होगी ?

निज बुध जागृत लेय के, साहेब पेहेचाने सोए।। Know your Master with your awakened mind.

सुनो साथजी सिरदारो, ए कीजो वचन विचार।
देखो बाहेर माहें अंतर, लीजो सार को सार जो सार ।।१

हे शिरोमणि सुन्दरसाथजी ! सुनो तथा इन वचनों पर विचार करो. इन वचनोंको बाहरसे श्रवण कर अन्दरसे मनन भी करो एवं इनके सारके भी सारतत्त्वको अन्तर आत्मामें धारण करो.


सुंदरबाई कहे धाम से, मैं साथ बुलावन आई।
धाम से ल्याई तारतम, करी ब्रह्मांड में रोसनाई।।२

सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी महाराज (सुन्दरबाई) ने कहा था कि मैं परमधामसे सुन्दरसाथको बुलानेके लिए आया हूँ. उन्हीं सद्गुरुने परमधामसे तारतम ज्ञाान लाकर पूरे विश्वको प्रकाशित कर दिया है.

कहे सुन्दरबाई अक्षरातीत से, आया खेल में साथ।
दोए सुपन ए तीसरा, देखाया प्राननाथ।।९

सद्गुरुने यह भी कहा कि अक्षरातीत धामसे ब्रह्मात्माएँ इस नश्वर खेलमें सुरता रूपसे आई हैं. धामधनीने इस स्वप्न जगतमें व्रज और रास तथा यह तीसरी जागनी लीला दिखाई है.

धनी फुरमान साख लेय के, देखाय दई असल।
सो फुरमाया छोड के, करें चाह्या अपने दिल।।१२

सद्गुरुने कतेब ग्रन्थोंकी साक्षी देकर पूर्णब्रह्म परमात्मा एवं ब्रह्मात्माओंके वास्तविक स्वरूपका दर्शन करवा दिया. कतेब ग्रन्थोंको माननेवाले लोग उनके ऐसे वचनोंको छोड.कर अपने मनोनुकूल अर्थघटन करते हैं.

तोडत सरूप सिंघासन, अपनी दौडाए अकल।
इन बातों मारे जात हैं, देखो उनकी असल।।१३

ऐसे लोग परमात्माके स्वरूप तथा उनके स्थान (सिंहासन-परमधाम) की अवगणना करते हैं और अपनी बुद्धिको परमात्माके प्रति दौड.ाते हैं. वे इन्हीं रहस्यों पर धोखा खा जाते हैं. यही उनकी वास्तविकता है.

दरदी जाने दिलकी, जाहेरी जाने भेख।
अन्तर मुस्किल पोहोंचना, रंग लाग्या उपला देख।।१५

धामधनीके विरहका अनुभव करनेवाली विरही आत्मा ही सद्गुरुके दिलकी बात समझ सकती है, बाह्य दृष्टिवाले लोग मात्र उनकी वेश-भूषाको ही महत्त्व देते हैं. जिन्होंने मात्र बाह्य रूप पर ही विश्वास किया है, उनको अन्तर्हृदय तक पहुँचना कठिन होता है.


इन विध सेवें स्याम को, कहे जो मुनाफक।
कहावें बराबर बुजरक, पर गई न आखर लों सक।।१६

इस प्रकार बाह्यदृष्टिसे परमात्माकी उपासना करनेवाले लोग मिथ्याचारी कहलाते हैं. स्वयंको तो वे ज्ञाानी कहलवाते हैं, किन्तु अन्त तक उनके हृदयसे दुविधा नहीं मिटती.

पेहेले तौले बुध जागृत, पीछे तौले धनी आवेस।
और तौले इसक तारतम, तब पलटे उपलो भेस।।३

वे सर्वप्रथम जागृत बुद्धिका और धनीके आवेशका मूल्याङ्कन करेंगी. पश्चात् प्रेम और तारतमका भी मूल्याङ्कन करेंगी. तब उनकी बाह्य (लौकिक) मान्यताएँ बदल जाएगी.
जो सैयां हम धाम की, सो जानें सब को तौल।
स्याम स्यामाजी साथ को, सब सैयोंपे मोल।।६

परमधामकी हम ब्रह्मात्माएँ ही सबका मूल्याङ्कन कर सकतीं हैं. श्याम-श्यामाजी एवं ब्रह्मसृष्टिका मूल्याङ्कन (महत्त्व) भी हम ब्रह्मात्माओंको ही ज्ञाात है.

जो कोई उलटी करे, साथी साहेब की तरफ।
तो क्यों कहिए तिन को, सिरदार जो असरफ।।१४

जो व्यक्ति धामधनीकी ओर उन्मुख आत्माओंको उनसे विमुख करनेका प्रयत्न करता है, तो ऐसे व्यक्तिको प्रतिष्ठित अथवा अग्रणी कैसे माना जाए?


भी लिख्या कुरान में गिरो की, सोहोबत करसी जोए ।
निज बुध जागृत लेय के, साहेब पेहेचाने सोए।।१८
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कुरानमें और भी लिखा है कि जो ऐसी आत्माओंका सङ्ग करेंगे, वे भी उनसे जागृत बुद्धि प्राप्त कर अपने धनीको पहचानेंगे.

ले साख धनी फुरमान की, महामत कहें पुकार।
समझ सको सो समझियो, या यार या सिरदार ।।२३

धामधनी सद्गुरु तथा धर्मग्रन्थोंकी साक्षीके आधारपर महामति पुकार कर कह रहे हैं. ब्रह्मआत्माएँ अथवा शिरोमणि सखियाँ इस रहस्यको जितना समझ सकें, उतना समझ लें.

The last will of Mahamati


सोई झरोखे धाम के, जित झांकत हम तुम।
सो क्यों ना देखो नजरों, बुलाइयां खसम।।९


सोई खेलना सोई हंसना, सोई रस रंग के मिलाप।
जो होवे इन साथ का, सो याद करो अपना आप।।१०


सोई चाल गत अपनी, जो करते माहें धाम।
हंसना खेलना बोलना, संग स्यामाजी स्याम।।११

Save the Hindu dharma! Mahamati

छूटत है रे खडग छत्रियों से, धरम जात हिन्दुआन।
सत न छोडो रे सत बादियों, जोर बढयो तुरकान।।२

हे क्षत्रिय वंशके शूरो ! तुम्हारे हाथोंसे तलवार छूट रही है और हिन्दू धर्मका नाश हो रहा है. मुगलोंके अत्याचारोंका जोर बढ. रहा है इसलिए हे सत्यवादियो ! तुम अपना सत्य कर्तव्य मत छोड.ो.

Spiritual Being (Brahmashristhi) Vs Physical Beings(Jiv Shristhi)

इनमें रूह होए जो अरस की, सो क्यों रहे दुनीसों मिल ।
कौल फैल हाल तीनों जुदे, तामें होए ना चल विचल ।।२१

इस जगतमें जो परमधामकी आत्माएँ होंगी वे नश्वर जगतके जीवोंके साथ मिल कर कैसे रह सकेंगीं ? क्योंकि उन दोनोंके मन, वचन एवं कर्म तीनों ही भिन्न-भिन्न प्रकारके होंगे, जिनमें कोई परिवर्तन नहीं होगा.

The celestial souls in this world, who are from the Paramdham always long for the beloved Lord, how can they integrate with the beings who aspire for the worldly (physical and materialistic) pleasures. There is no relation between the speech, action and living of the worldly beings. Where as, the celestial souls, walk the talk and pursue the truth.

Mahamati emphasis on Practice and Silence!

कहे हुकम आगे रेहेनीय के, केहेनी कछुए नाहें।
जोस इसक हक मिलावहीं, सो फैल हाल के माहें।।१६

धामधनीके आदेशका तात्पर्य (कथन) यही है कि आचरणके समक्ष मात्र कथनका कोई महत्त्व नहीं है. सद् आचरण एवं शुद्ध मनोभाव होने पर ही परमात्मा उसके अन्तर्गत अपना आवेश एवं प्रेमको सम्मिलित कर देते हैं.

दुनियां केहेनी केहेत है, सो डूबत मैं सागर।
मैं लेहेरें मेर समान में, कोई निकस न पावे बका घर।।१7

Krishna is the name, world is just a game!

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पेहेलें भाई दोऊ अवतरे, एक स्याम दूजा हलधर।
स्याम सरूप है ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर।।२

श्रीमद्बागवतके अनुसार व्रज मण्डलमें दो भाई अवतरित हुए. उनमें एक श्याम श्रीकृष्ण हैं और दूसरा हलधर बलभद्र हैं. उन दोनोंमें से श्याम ब्रह्मके स्वरूप हैं जिन्होंने रासलीला रचाई.
Shri Krishna - Shyam = Brahma!
अब सुनियो ब्रह्मसृष्ट विचार, जो कोई निज वतनी सिरदार।
अपने धनी श्री स्यामा स्याम, अपना बासा है निजधाम।।२
सोई अखंड अक्षरातीत घर, नित वैकुंठ मिने अक्षर।
अब ए गुझ करूं प्रकास, ब्रह्मानंद ब्रह्मसृष्टि विलास।।३

Mahamati on Value of Time

The moment lost cannot be gained back even if you will to chop your head off or offer billions of gold coins. The every moment is very precious and nothing can be compared with it.

इन समे खिन को मोल नहीं, तो क्यों कहूं दिन मास वरस ।
सो जनम खोया झूठ बदले, पीउसों भई ना रंग रस ।।४

इस अवसरके एक क्षणका भी मूल्य आँका नहीं जा सकता फिर दिन, मास या वर्षकी तो बात ही क्या रही ? धनी मिलनके आनन्दमें मग्न न होकर ऐसे अमूल्य मनुष्य जीवनको संसारके नश्वर सुखके लिए तुम खो रहे हो.

The present moment is priceless how can I tell about day, month and year! And the one who lose whole life over the false and never united with the beloved Lord.

Mahamati Prannath on Scriptures

साधो भाई चीन्हो, सबद कोई चीन्हो।
ऐसो उतम आकार तोको दीन्हों, जिन प्रगट प्रकास जो किन्हों ।।१

हे साधुजन ! परमात्माकी पहचान करानेवाले शास्त्र वचनोंके रहस्यको समझो (इन शब्दोंका ज्ञाान प्राप्त कर अपनी अन्तरात्माको पहचानो). धामधनीने तुम्हें ऐसा श्रेष्ठ शरीर (मनुष्य देह) दिया है, जिसके द्वारा परमात्माका साक्षात् अनुभव किया जा सकता है.

O seeker understand the Reality enmeshed in the words of scriptures. You have got a human form which is the greatest amongst other living beings in which you can see the one who brought the light for us (you can see the Supreme)

मानषे देह अखंड फल पाइए, सो क्यों पाएके वृथा गमाइए।
ए तो अधखिनको अवसर, सो गमावत मांझ नींदर।।२

मनुष्य शरीरके द्वारा ही परब्रह्म परमात्मारूपी अखण्ड फल प्राप्त हो सकता है. ऐसे महामूल्यवान् मानव शरीरको प्राप्त कर उसे क्यों व्यर्थ गँवा रहे हो? यह अवसर तो आधे क्षणके लिए प्राप्त हुआ है, इसे अज्ञाानरूपी निद्रामें पड.कर व्यर्थ गँवा रहे हो.

Nij, Nijnaam and Nijanand

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घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३

हमारा घर अखण्ड परमधाम तथा हमारे धनी श्रीकृष्ण यही तारतमका सार फल है. इस तारतम ज्ञाान द्वारा अत्यन्त प्रकाश फैलता है. जिससे मनमें किसी भी प्रकारकी शंका नहीं रहती है.

ए सोभा ना आवे वाणी माहें, पण साथ माटे कहेवाणी ।
ए लीला साथना रुदेमां रमाडवा, तो में सबदमां आणी।।२

यह वाणी मायावी जगतमें कही नहीं जा सकती, मात्र ब्रह्मात्माओंके लिए ही कही गई है. सभी सुन्दरसाथ इसे हृदयमें धारण कर एकत्र होंगे, इस विश्वासके साथ मैंने इसको व्यक्त किया है.
These words must not be spoken in this world of illusion amongst the worldly people who are engrossed in the sense pleasure but I have to say it for the sake of my celestial souls. When my kindred souls come together they will keep it in their heart with this faith I have said it. It was Lord's will that Mahamati Prannathji must awaken the souls that is why he has to speak what must be kept in the heart. - Mahamati

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