हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

निज नेहेचल नाम श्रीक्रस्न स्याम

धिक धिक पडो मेरी बुध को।
मेरी सुधको, मेरे तन को, मेरे मन को, याद न किया धनी धाम ।
जेहेर जिमीसों लग रही, भूली आठों जाम।।१

मेरे मन, बुद्धि, चित्त तथा इस शरीरको धिक्कार है, जिन्होंने धामधनीको याद नहीं किया एवं संसारके विषतुल्य विषयोंमें रत होकर आठों प्रहर अपने धनीको भूलती रही.

मूल वतन धनिएं बताइया, जित साथ स्यामाजी स्याम ।
पीठ दई इन घर को, खोया अखंड आराम।।२

धामधनी सद्गुरुने वह मूलघर (परमधाम) बताया, जहाँ श्याम-श्यामाजी तथा सुन्दरसाथ हैं. ऐसे अखण्ड घरको पीठ देकर हमने अखण्ड सुखोंको गँवा दिया.

सनमंध मेरा तासों किया, जाको निज नेहेचल नाम।
अखंड सुख ऐसा दिया, सो मैं छोडया बिसराम।।३

सद्गुरुने मेरा सम्बन्ध उन अनादि अक्षरातीत श्रीकृष्णजीके साथ जोड. दिया जिनका नाम ही अखण्ड है. उन्होंने तो मुझे ऐसा अखण्ड सुख प्रदान किया, किन्तु मैंने मायावी सुखोंमें रत होकर उन अखण्ड सुखोंको छोड. दिया.

खिताब दिया ऐसा खसमें, इत आए इमाम।
कुंजी दई हाथ भिस्त की, साखी अल्ला कलाम।।४

सद्गुरुने यहाँ आकर मुझे निष्कलङ्क बुद्ध (इमाम महदी) की उपाधि प्रदान की. उन्होंने कतेब ग्रन्थोंकी साक्षी देकर जीवोंके मुक्तिस्थलों (बहिस्तों) के द्वारकी कुञ्जी मेरे हाथ सौंप दी.

अखंड सुख छोडया अपना, जो मेरा मूल मुकाम।
इसक न आया धनीय का, जाए लगी हराम।।५

तथापि मैंने परमधामके उन अखण्ड सुखोंको छोड. दिया, जो अपना मूल स्थान है. मुझे धामधनीके प्रति प्रेम भी उत्पन्न नहीं हुआ एवं मैं झूठे विषयसुखोंकी ओर लग गया.

खोल खजाना धनिएं सब दिया, अंग मेरे पूरा न ईमान ।
सोए खोया मैं नींद में, करके संग सैतान।।६

धामधनीने अखण्ड निधिका भण्डार खोलकर मुझे लुटा दिया, तथापि मेरे हृदयमें पूर्ण श्रद्धा उत्पन्न नहीं हुई. मैंने दुष्ट मायाका सङ्गकर उस अखण्ड निधिको अज्ञाानरूपी नींदमें गँवा दिया.

उमर खोई अमोलक, मोह मद क्रोध ने काम।
विषया विषे रस भेदिया, गल गया लोहू मांस चाम ।।७

मैंने अपना अमूल्य जीवन काम, क्रोध, मद एवं मोहकी ओर लगकर गँवा दिया. विषयोंके विषमय रसने मेरे शरीरको इतना प्रभावित किया कि रक्त, माँस, चमड.ी सब गल गए.

अब अंग मेरे अपंग भए, बल बुध फिरी तमाम।
गए अवसर कहा रोइए, छूट गई वह ताम।।८

अब मेरे सभी अङ्ग शिथिल हो गए हैं तथा मेरा सम्पूर्ण बल एवं बुद्धि भी मायाकी ओर लग गई. अवसर बीत जाने पर रोनेसे क्या लाभ ? सद्गुरुके धामगमनके साथ-साथ अब तो आत्माका आहार ही छूट गया.

पार द्वार सब खोल के, कर दई मूल पेहेचान।
संसे मेरे कोई ना रह्या, ऐसे धनी मेहेरबान।।९

ऐसे कृपालु सद्गुरु धनीने पार (बेहद) के सभी द्वार खोल कर मुझे अपने मूल (पर-आत्मा) की पहचान करवाई, जिसके कारण अब मेरा कोई भी संशय शेष नहीं रहा.

बोहोत कह्या घर चलते, वचन न लागे अंग।
इन्द्रावती हिरदे कठिन भई, चली ना पीउजी के संग ।।१०

सद्गुरुने परमधाम जाते समय मुझे बहुत समझाया, किन्तु उनका एक भी वचन मेरे हृदयमें नहीं चुभा. इन्द्रावती ऐसी कठोरहृदया हो गई कि वह सद्गुरुधनीके साथ परमधाम नहीं जा सकी.

तब हारके धनिएं विचारिया, क्यों छोडूं अपनी अरधंग ।
फेर बैठे माहे आसन कर, महामति हिरदें अपंग।।११

तब हताश होकर धनीने विचार किया कि मैं अपनी अङ्गनाको अकेली कैसे छोड. दूँ ? पश्चात् वे महामतिके अपङ्ग हृदयमें विराजमान हो गए.
प्रकरण ९९ श्री किरन्तन

dhamdhaniparichay braj raas jaagani

मेरे मीठे बोले साथ जी, हुआ तुमारा काम।
प्रेमैं में मगन होइयो, खुल्या दरवाजा धाम।।१
सखी री धाम जैये ।। टेक ।।

हे सुन्दरसाथजी ! मेरे (सद्गुरुके) मीठे वचनोंके द्वारा तुम्हारे सब कार्य (मनोरथ) पूर्ण हो गए हैं. तुम अपने धनीके प्रेममें मग्न रहो. तुम्हारे लिए परमधामके द्वार खुल गए हैं. इसलिए हे सुन्दरसाथजी ! अब परमधाम चलें.

दौड सको सो दौडियो, आए पोहोंच्या अवसर।
फुरमानमें फुरमाइया, आया सो आखर।।२

जागनीके लिए अन्तिम समय आ पहुँचा है, इसलिए जितना दौड. सकते हो उतना दौड.ो (अज्ञाानको छोड.कर जागृत हो जाओ). आत्म-जागृतिका शास्त्रोक्त समय आ गया है.

वरनन करते जिनको, धनी केहेते सोई धाम।
सेवा सुरत संभारियो, करना एही काम।।३

सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजी महाराज जिस मूलघरका वर्णन करते थे, वही अपना परमधाम है. इसलिए तुम धनीजीकी सेवा करते हुए अपनी सुरताको परमधामकी ओर केन्द्रित करो, क्योंकि हमें यही कार्य करना है.

वन विसेखे देखिए, माहें खेलन के कै ठाम।
पसु पंखी खेलें बोलें सुन्दर, सो मैं केते लेऊं नाम ।।४

परमधामके विभिन्न वन-उपवनकी शोभाको देखो. वहाँ पर अनेक क्रीड.ास्थल हैं. उनमें असंख्य पशु-पक्षी विभिन्न प्रकारके खेल करते हुए सुन्दर कलरव करते हैं. मैं उनमेंसे कितनोंका नाम लूँ ?

स्याम स्यामाजी सुन्दर, देखो करके उलास।
मनके मनोरथ पूरने, तुम रंग भर कीजो विलास।।५

अपने हृदयमें प्रेम और उल्लास भरकर अपने प्राणाधार श्याम-श्यामाजीके सुन्दर स्वरूपके दर्शन करो और अपने मनोरथोंको पूर्ण करनेके लिए उनके साथ आनन्द-विलास करो.

इसक आयो पीउ को, प्रेम सनेही सुध।
विविध विलास जो देखिए, आई जागनी बुध।।६

अब हमारे हृदयमें धामधनीका प्रेम प्रकट हुआ है, उसीसे हमें परमधामके प्रेमकी सुधि हुई. अब परमधामके विभिन्न प्रकारके प्रेम विलासको देखो, क्योंकि तारतम ज्ञाानरूपी जागृत बुद्धि प्रकट हो गई है.

आनंद वतनी आइयो, लीजो उमंग कर।
हंसते खेलते चलिए, देखिए अपनों घर।।7

परमधामका आनन्द प्रकट हो गया है, उसे उत्साह पूर्वक ग्रहण करो. हँसते-खेलते चलो और अखण्ड परमधामको देखो.

सुख अखंड जो धाम को, सो तो अपनों अलेखें।
निपट आयो निकट, जो आंखा खोलके देखे।।८

परमधामके अखण्ड सुख तो असीम हैं. अब वे हमारे निकट आ चुके हैं. तुम उन्हें अन्तर्दृष्टिसे देखो एवं अन्तरात्मामें उनका अनुभव करो.

अंग अनभवी असल के, सुखकारी सनेह।
अरस परस सबमें भया, कछू प्रेमें पलटी देह।।९

तुम्हारी आत्मा तो परमधामके वास्तविक प्रेमका अनुभव कर रही है जो अखण्ड सुख देनेवाला है. वह प्रेम तुम सबमें आत्मा-परात्माके सम्बन्ध द्वारा जागृत हो चुका है. इसके कारण तुम्हारे शरीरका व्यवहार ही बदल गया है.

मंगल गाइए दुलहे के, आयो समे स्यामा वर स्याम।
नैनों भर भर निरखिए, विलसिए रंग रस काम।।१०

इसलिए अब प्रियतम परमात्माके शुभगुणोंका गायन करो, क्योंकि सुन्दरवर श्याम-श्यामाको मिलनेका समय आ गया है. अब नयन भरकर युगल स्वरूपके दर्शन करो और प्रेमानन्द लेते हुए उनके साथ विलास करो.

धामके मोहोलों सामग्री, माहें सुखकारी कै विध।
अंदर आंखें खोलिए, आई है निज निध।।११

परमधामके महल और मन्दिर विभिन्न प्रकारकी आनन्ददायी सामग्रियोंसे परिपूर्ण हैं. इसलिए अन्तःदृष्टिको खोलकर देखो, वह अखण्ड निधि स्वरूप तारतम ज्ञाान यहाँ आ पहुँचा है.

विलास विसेखें उपज्या, अंदर कियो विचार।
अनभव अंगे आइया, याद आए आधार।।१२

इस प्रकार अन्तर हृदयसे विचार करो, प्रियतम धनीके साथ विशेष आनन्द-विलास करनेकी कामना उत्पन्न हुई है. अब धामधनीका स्मरण होते ही परमधामके अखण्ड सुखोंका अनुभव होने लगा.

दरदी विरहा के भीगल, जानों दूरथें आए विदेसी।
घर उठ बैठे पलमें, रामत देखाई ऐसी।।१३

इस संसारमें आकर हम सबके हृदय धनीजीके प्रेम और विरहके कारण रो रहे हैं. मानों हम दूर आकर विदेशी बन गए हैं. परन्तु धनीजीने ऐसा खेल दिखाया कि हम क्षणभरमें ही जागृत होकर परमधाममें बैठ जाएँगे.

उठके नहाइए जमुनाजी, कीजे सकल सिनगार।
साथ सनमंधी मिलके, खेलिए संग भरतार।।१४

इसलिए अब भ्रमकी निद्राको छोड.कर जागृत हो जाओ तथा यमुनाजीके शीतल जलमें स्नान करो. तत्पश्चात् परमधामके सम्पूर्ण शृङ्गार धारण कर सभी ब्रह्मात्माएँ एक साथ मिलकर प्रियतम धनीके साथ रमण करो.

महामत कहें मलपतियां, आओ निज वतन।
विलास करो विध विध के, जागो अपने तन।।१५

महामति कहते हैं, प्रेममें मस्त रहने वाली हे आत्माओ ! तुम सब साथ मिलकर परमधाम आओ और परात्मामें जागृत होकर प्रियतम धनीके साथ विभिन्न प्रकारके आनन्द-विलास करो.
प्रकरण ८० श्री किरन्तन
सखी जोइए आपण वनमां, एम रे थैयो तमे कांय।
जेनुं नाम श्री क्रस्नजी, ते बेठा छे आपण मांय।।२३

हे सखियो ! चलो हम सब मिलकर उन्हें वनमें ढूँढंे.. तुम सब इस प्रकार निराश क्यों हो रही हो ? जिनका नाम श्रीकृष्ण है वे तो हमारे बीच (हृदय) में ही विराजमान हैं.

O dear sakhi, let us find Him in this forest, why are you so sad. The one whose name is Shri Krishna, is residing within us.
O Dear sakhi, lets first search Him in the forest(without) Why you feel so empty? The one with the name Shri Krishna lives in our heart (within). Seek the one whose name is Krishna within the self. (Remember Nijnaam). The realization that Lord is residing within is called full awakening. How can one find a body within?
श्री रास प्रकरण ३२

They were looking everywhere externally in the forest first and realized the truth(the purpose of becoming antardhyan).
They knew how exactly they were behaving in Braj and were close to the Lord so they enacted the whole braj leela in which Radha became the Shri Krishna.
We contemplate on His leela with Gopis at Braj(kalmaya uninverse) and Raas (Yogmaya universe).

खबरदार! डरते रहें परवरदिगार! महामति प्राणनाथ वाणी

खबरदार! डरते रहें परवरदिगार! महामति प्राणनाथ वाणी
सो काफर पडे माहें दोजक, आखर को जो ल्यावें सक। जो मोमिन हैं खबरदार, डरते रहें परवरदिगार ।।६ प्रकरण ३ श्री कयामतनामा ग्रन्थ (बडा) ऐसे अविश्वासी लोग नारकीय यातनाओंको भोगते हैं जो (आखर = ईसा आखरी,महंमद मेहेदी आखरी, इमाम आखरी, आखरी किताब श्री कुलजम स्वरुप तारतम सागर) अन्तिम समयमें अवतरित परमात्माके प्रति सन्देह करते हैं. जो ब्रह्मात्माएँ हैं धर्ममें सचेत रहें , परमात्मा से डरती रहें.
The infidels those who have no faith in the last prophets (Isa and Mehadi) will go in dojhak(hell) the ones who doubt the last appearance of Lord. Those who are the celestial souls beware, always have fear of the Lord.

जब हम निजानंद संप्रदाय के सुन्दरसाथ के ह्रदय धाम में श्री कृष्ण श्याम श्यामा बिराजते हैं। इसी लिए इन्हें अरश दिल कहा गया है। सुन्दरसाथ एक दुसरे के हृदये में बैठे श्री कृष्ण को प्रणाम करती हैं और श्री कृष्ण प्रणामी विख्यात हुई। ऐसे अरश दिल सुन्दरसाथ को बार बार रास प्रकाश कलश ग्रन्थ की अवहेलना करते और ताना कसने वालों का सामना करना पड़ता है। प्रकाश ग्रन्थ के प्रमाण को यह काफ़िर मानते ही नहीं हैं।
अरस कह्या दिल मोमिन, दिया अपना इलम सहूर ।
सक ना खिलवत निसबत, ताए काहे न होवे जहूर ।।९०
प्रकरण १४ परिक्रमा
ब्रह्मात्माओंके हृदयको ही परमधाम कहा गया है. स्वयं धामधनीने सद्गुरुके रूपमें आकर मुझे ब्रह्मज्ञाान दिया एवं यह समझ दी. अब मुझे उनके साथका सम्बन्ध तथा मूलमिलावाके विषयमें कोई संदेह नहीं रहा. जिसको यह अमूल्य निधि मिल गई हो उसके हृदयमें ज्ञाानका प्रकाश कैसे नहीं होगा ?
The heart of Momin(soul of Paramdham) is said to be Arash (Paramdham) and granted the Supreme Wisdom of the Self(Shri Krishna) to contemplate. when there is no doubt about the original meeting place moolmilava and the treasures of Paramdham(unity consciousness and love) how can the heart not be enlightened then?

हक तालाने किया फुरमान, डांटत हैं कीने कुफरान ।
अंजीर तौरेत से जो फिरे, सोई काफर हुए खरे ।।३

कुरानके अनुसार खुदाने जो कुछ कहा है अवज्ञााकारी लोग उसे कपट भावसे छिपाते हैं. जो लोग अंजील तथा तौरातसे विमुख होंगे उनको ही विशेष रूपसे अवज्ञााकारी (काफिर) कहा गया है. (इधर परब्रह्म परमात्माके आदेश स्वरूप रास, प्रकाश, कलश आदि ग्रन्थ श्रीप्राणनाथजीके द्वारा अवतरित हुए उनको विहारीजीने कपट भावसे छिपानेका प्रयत्न किया. जो इन ग्रन्थोंसे विमुख होंगे वे ही वास्तवमें नास्तिक कहलाएँगे).
Lord Supreme has sent this message and he is scolding at those who are cynical about Anjir/Toret (Raas, Prakash and Kalash) as Athiest(non-believers). Those who go against these scriptutes are in true sense the non-beleivers.
(Remember there is penalty for non-believing the original truth for me not becoming closer to God itself is severe punishment but some people care less about it for them there is dojhakh!)

काफर दिलमें कीना आने, अंजीर तौरेत पर मारे ताने ।
जो खुदाएका पैगंमर, तिनसे फिरे सो हुए काफर ।।४

ऐसे अवज्ञााकारी लोग हृदयमें कपट भाव रखकर अंजील एवं तौरातके (रास, प्रकाश, कलश ) वचनों पर ताना मारते हैं. परमात्माका सन्देश लेकर आनेवालोंसे जो विमुख होते हैं उनको ही अवज्ञााकारी (काफिर) कहा है.
इस प्रकार हृदयमें कपट भाव होनेके कारण विहारीजी रास, प्रकाश, कलश आदि ग्रन्थोंको देख कर दुःखी हुए और उन्होंने सुन्दरसाथको उन ग्रन्थोंके ज्ञाानसे वञ्चित रखनेका प्रयास किया.

The people who do not have faith in the heart because of their vested interest speak sarcastically about the Angil and toret(Raas, Prakash, Kalash) which are the messages from the Lord but they turn against it and hence they are the infidels.
(Many of Ahuja devotees do this at regular basis!)

जुबां यकीन क्यामत न माने, ऊपर इसलाम के कीना आने ।
उनसे जो हुए मुनकर, सोई गिरो कही काफर।।५

ऐसे लोग मुखसे तो रसूलके प्रति विश्वास करते हैं किन्तु उनके बताए हुए कयामतके सङ्केतोंके प्रकट होने पर विश्वास नहीं करते हैं एवं धर्मके वचनोंके प्रति कपट भाव रखते हैं. जो लोग ऐसे वचनोंसे विमुख होते हैं उनको ही कुरानमें काफिर कहा है.
Every one by the lips say they do believe in the messenger of the Lord (Mahamati Prannath) but in deeds actually they do not, they go against the essence of the religion, such group is called infidel.

मुनकर हुकम और क्यामत, हुए नाहीं नेक बखत ।
फंद माहें हुए गिरफतार, भमर हलाकी पडे कुफार ।।६

जो लोग परमात्माके आदेश एवं कयामतकी घड.ीसे विमुख होते हैं उनके भाग्य कभी नहीं खुले हैं. ऐसे लोग माया-मोहके बन्धनोंमें ही फँसे हुए हैं और भवसागरकी भँवरीमें पड.कर जन्म-मरणरूपी दुःख भोग रहे हैं.
Those who do not believe the command of the Lord and this moment of awakening(Qayamat) it is their misfortune. They will be caught in the noose of the maya and they will end themselves in the world of misery and shall not be out of the cycle of birth and death.
प्रकरण १० श्री कयामतनामा ग्रन्थ (बडा)

तीसरी सृष्ट जो जाहेरी, सब मजकूर इनकी कही

Mahamati Prannathji have foretold about it so we are facing what he says over here.

हम दोऊ बंदे रूहअल्ला के, दोऊ गिरो जुदी भई।
तीसरी सृष्ट जो जाहेरी, सब मजकूर इनकी कही।।६

हम दोनों (विहारीजी और मैं) रूहअल्लाह-सद्गुरुके सेवक (बन्दे) हैं. धर्मके प्रचारमें मत-भेदके कारण हम दोनोंके समूह पृथक्-पृथक् हो गए. इसके अतिरिक्त बाह्य अर्थको ग्रहण करने वाली तीसरी सृष्टिका वर्णन भी कुरानमें किया गया है.
प्रकरण १२२ श्री किरन्तन
It is already stated in Holy Quran that the third group will be created who will gain the outer meaning of the Mahamati's wani. So this what is happening now. This confusion and conflict is also the will of our Lord and it His divine plan. We have to accept it.
The holy Quran has predicted a third group who will not be able to dive into the deeper meanings of Prannath vani and shall create a new group. We accept this group as will of the Lord.

और तफरका भए, चलें कौल तोड कर।
दांए बांए चलाए दुसमने, मारे गए हक बिगर।।३९

शेष सभी लोग रसूल मुहम्मदके वचनोंको भङ्ग कर भिन्न-भिन्न समुदायोंमें बँट गए. दुष्ट इबलीसने इनके हृदयमेें बैठकर इनको सन्मार्गसे विपरीत यत्र-तत्र भटकाया. इसलिए सत्यको प्राप्त किए बिना ये सब हताश होकर मारे गए.
Chhota Qayamatnama
The Iblish sitting in their heart they will not pay heed to the words of truth and will get divided in many groups and in the end will die without Lord.

कोई आप बडाई अपने मुखथें, करो सो लाख हजार ।
परमेस्वर होएके आप पुजाओ, पर पाओ नहीं भव पार ।।५

कोई अपने मुँहसे अपनी प्रशंसा हजारों या लाखों गुना भी कर ले एवं स्वयंको परमेश्वर घोषित कर अपनी पूजा भी करवाने लगे, तथापि वह आत्म-ज्ञाानके अभावमें भवसागरसे पार नहीं हो सकता.
One might speak great of oneself and have a following of millions also make people worship one as God but will not cross the ocean of illusion. See, this is being done right now but what counts is whether one finds the Supreme in the end!

केते आप कहावें परमेस्वर, केते करत हैं पूजा।
साध सेवक होेए आगे बैठे, कहें या बिन नहीं कोई दूजा ।।१०

कई लोग स्वयंको परमेश्वर मान कर बैठते हैं, कई लोग उनकी पूजा भी करते हैं. कई साधक सेवक बनकर अग्रिम पंक्तिमें बैठकर उनकी कथा सुनते हैं और कहते हैं कि ये ही हमारे परमात्मा हैं, इनके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं.

Many people call themselves as God and many worship them as God too. Many become their slaves and many sit in the very first row to listen to them and say this person is only our Lord and no one else.

All the messages are truth one cannot break truth and create confusion. But that is what is happening, what happens when one does not pay heed to the words of God.

जो कोई होसी बे फुरमान, नेहेचे सो दोजखी जान ।
ताको ठौर ठौर लानत लिखी, सो जाहेरियों हिरदेमें रखी ।।२१

जो लोग इस प्रकार खुदाके आदेशसे विपरीत आचरण करते हैं, उनको निश्चय ही नरकगामी समझना चाहिए. ऐसे लोगोंको विभिन्न स्थानोंमें धिक्कारा गया है. बाह्यदृष्टिवाले लोगोंने उन्हीं बातोंको अपने हृदयमें अङ्कित किया (इसलिए वे इमाम महदीके रूपमें प्रत्यक्ष प्रकट हुए परमात्माको नहीं पहचानते हैं).

Those who do not believe the message of Lord and go against it, it is certain for them to go in hell(dojhakh). They are repeatedly condemned those who understand the outer meaning of the scriptures and do not dive into the deeper meanings.
प्रकरण ५ श्री कयामतनामा (बडा)

---The truth ShyamShyam in Paramdham----
->gain the confidence of abode->can judge all others-> even Shyam, Shyama and sundarsath and their value
जो सैयां हम धाम की, सो जानें सब को तौल।
स्याम स्यामाजी साथ को, सब सैयोंपे मोल।।६
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परमधामकी हम ब्रह्मात्माएँ ही सबका मूल्याङ्कन कर सकतीं हैं. श्याम-श्यामाजी एवं ब्रह्मसृष्टिका मूल्याङ्कन (महत्त्व) भी हम ब्रह्मात्माओंको ही ज्ञाात है.
The souls from Paramdham can judge all, Shyam Shyama and Sundarsath. Then they will gain the confidence that we belong to Supreme abode, they can judge all others.
They can only understand the value of Shyam, Shyamaji and all the sundarsath that is in Paramdham. A brahmashristi will get the message what Mahamati is trying to reveal.
साथ अंग सिरदार को, सिरदार धनी को अंग।
बीच सिरदार दोऊं अंग के, करे न रंग को भंग।।९

सभी ब्रह्मात्माएँ श्यामाजीकी अङ्गरूपा हैं तथा श्यामाजी श्रीराजजीकी अङ्गरूपा हैं. इसीलिए श्रीश्यामाजी दोनों अङ्गों (श्रीराजजी एवं ब्रह्मात्माओं) के प्रेम रसको न्यून (कम) होने नहीं देतीं.

All the sundarsath(souls) are the body parts of the chief soul (Roohallah, Shyama) and Shyama is part of the Lord. The chief soul between two beings does not allow the love to diminish.
(Remember this chaupai is cue, Shyama Devachandraji is only between the souls and the Supreme Lord who never shall disrupt the affection between the souls a...nd the Supreme. For us only tartam gyaan brought by Shri Devachandraji presented to us by Mahamati Prannath is Shyama and nothing else. We must not allow anybody to intervene in between us.
He has also warned us that the danger of people misguiding us and taking us away from Lord exists in his later chaupai.)
The souls realize that the chief soul has very soft corner for all the souls and she unites the soul with Lord (as there is some sort of amnesia in the souls which keeps them away from Lord.) The soul is awakened by the chief soul.
साथ धाम के सिरदार को, मोमिन मन नरम।
मिलावे और धनीय की, दोऊ इनके बीच सरम।।१०

सुन्दरसाथके लिए श्यामाजीका हृदय द्रवित (नरम) रहता है. सभी सुन्दरसाथको जागृतकर धामधनीकी पहचान करवानेके दायित्वको निभानेमें ही श्यामाजीका गौरव है.

The leader of the souls (Shyma Roohallah) has very soft corner for the souls and she is trying to unite them with the Lord as there is some sort of shyness/shamefulness between them.

WARNING: Those who take souls away from the master how can such be the leader souls.
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जो कोई उलटी करे, साथी साहेब की तरफ।
तो क्यों कहिए तिन को, सिरदार जो असरफ।।१४
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जो व्यक्ति धामधनीकी ओर उन्मुख आत्माओंको उनसे विमुख करनेका प्रयत्न करता है, तो ऐसे व्यक्तिको प्रतिष्ठित अथवा अग्रणी कैसे माना जाए?

And those who create confusion and make sundarsath away from the Saheb(the master), so how can one call such a person leader?

Big or Small will have to follow the true leader the chief soul Roohallah Shyama avtar Devachandraji who brought the knowledge of abode.
कह्या कुराने बंद करसी, इन के जो उमराह।
आधीन होसी तिन के, जो होवेगा पातसाह।।१५

कुरानमें कहा है कि ऐसे अग्रणी (प्रतिष्ठित) व्यक्ति ही धनीके आदेशकी अवहेलना करेंगे. धर्मके सम्राटको भी ऐसे लोगोंके अधीन रहना पडे.गा.

The holy Quran has said that the people who are rich and respected will not obey its command (the innocent, humble and downtrodden will obey). Such disobedient people also must follow the souls of Paramdham (otherwise they will not get God)

लटी तिन से न होवहीं, जो कहे सिरदार।
सबों सिरदार एक होवहीं, मिने बारे हजार।।१६

सभी ब्रह्मात्माओंमें शिरोमणि कहलाने वाली श्यामाजीसे किसी भी प्रकारकी भूल नहीं होगी, क्योंकि सभी ब्रह्मात्माओंके शिरोमणि तो एक श्यामाजी ही हैं.

There will be no mistake from Shyama-RoohAllah the leader of the souls, because she is the supreme leader of all the 12,000.
The celestial souls will never doubt the RoohAllah Shyama who has come to earth as Devachandraji Maharaj.

लिख्या है कुरान में, छिपी गिरो बातन।
सो छिपी बातून जानही, ए धाम सैयां लछन।।१७
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कुरानमें लिखा है कि ब्रह्मात्माएँ छिपी हुईं हैं. वे ही कुरानके गूढ. रहस्योंको समझेंगी. परमधामकी आत्माओंके ये ही लक्षण हैं.

The holy Quran has written that these group of souls of Arsh Ajeem (Paramdham) is hidden but they will understand the secret message in the holy Quran. They will decipher the code of scriptures and this is the trait of the celestial souls (arvaahen).

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भी लिख्या कुरान में गिरो की, सोहोबत करसी जोए ।
निज बुध जागृत लेय के, साहेब पेहेचाने सोए।।१८
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कुरानमें और भी लिखा है कि जो ऐसी आत्माओंका सङ्ग करेंगे, वे भी उनसे जागृत बुद्धि प्राप्त कर अपने धनीको पहचानेंगे.

It is written in holy Quran that those who support or accompany this group of celestial souls the intelligence their self (nij budh) will be awakened (self illumination) and they will know the same Saheb the master.

Mahamati has first make us known the master is Shyam Shyama in Paramdham, He is the Saheb our master.
First awaken your inner self's intelligence and recognize the same Master that the celestial souls have come to show.

(Check Mahamati is asking nijbudh means the intelligence of the self(aatma) and not somebody else’s interpretation)!
Sundarsathji if you only contemplate the vani given in the picture you will know the truth!

When Shri Shyama (Dhani Devachandraji) who is the head of all soul and there is only one leader among 12000 celestial soul and she cannot go wrong! Mahamati Prannathji has clearly stated it above.
The one who takes sundarsath away from Saheb, how can that person be called leader?
Beware of this person who defies Lord Prannath and creates confusion about Shyama avtaar!
Mahamati PRannath ji has said the hidden group has the signs of celestial souls and not those who are working for duni trying hard to get recognition (jaheri)!
Know the Saheb from the hidden group, they will take you to Paramdham.
प्रकरण ९५ किरंतन

अब जो सुनो खास उमत, खडे रहो दोजक एक बखत

बुजरकों धोखा क्यों ए न जाए, तो बखत ऐसा दिया देखाए ।
फितुए इनोंके जावें तब, ऐसा कठिन बखत देखंे जब ।।३४

तथाकथित ज्ञाानियोंका भ्रम किसी भी प्रकार दूर नहीं होता है. इसीलिए कयामतके समयको इस प्रकार कठिनाई पूर्ण कहा गया है. इन लोगोंके मनकी भ्रान्तियाँ तभी दूर होंगी जब वे ऐसी कठिन घड.ीको प्रत्यक्ष देखेंगे.
Those who think oneself very learned and proficient will betray such is the time I can foresee.
The confusion from the mind of the one who consider oneself knowledgeable cannot go away. Very difficult time is seen. The confusion from their mind will be removed when they see the time of difficulty.

ठंडे बजूद होवें वर पाए, तब हकीकत देखे आए ।
सब दुनिायां हुई गुन्हेगार, यों देख्या बखत दोजखकार ।।३५

नरककी अग्निमें जल कर शुद्ध होने पर इनके मनमें शीतलता छा जाएगी तभी वे यथार्थताको समझ पाएँगे. सभी अभिमानी लोग अपराधी बन गए. ऐसे नरकगामी लोगोंने ही इस कठिन समयको देखा.

After facing difficult time or experiencing the hell, these souls will understand the truth and reality. All the worldly people are sinners and at this time these sinners who experience the hell will see the difficult time.

After cooling down from the pride of the existence they will get the master(वर) and then they will see the reality(हकीकत). The world is called sinners can see such time of the hell dwellers.

अब जो सुनो खास उमत, खडे रहो दोजक एक बखत ।
जिन भागो गोसे रहो खडे, देखो दोजकियों खजाने बढे ।।३६

जो श्रेष्ठ आत्माएँ हैं वे अब सुनें, उनको अपने प्रेम और विश्वासमें दृढ. रहना चाहिए. सब अधर्मी लोगोंके लिए नरककी अग्निकी लपटें चारों ओर छा जाएँगी. ऐसे समयमें अपने धैर्य एवं विश्वास पर खड.े रहो. अपने कर्तव्य पथसे विचलित नहीं होना. देखो, नरकगामियोंके लिए यातनाएँ बढ. रहीं हैं.
Those who are celestial souls listen now and be alert at this time. Do not let the love and faith for Lord falter because of the sinners. Be patient and trust the Lord and continue the path of truth and reality. Behold the pains for the sinners in the hell is rising.

भिस्त रजवान मोमिन निगेहवान, दोजख खजाना पोहोंचे कुफरान ।
तहां ताहीं बखत पोहोंचे सबन, पैदरपें जले अगिन ।।३7

जिन जीवोंके ऊपर ब्रह्मात्माओंकी कृपा होती है उनको सबसे उच्च बहिश्त प्राप्त होगी. जो लोग अवज्ञााकारी होंगे उन्हें नरककी यातनाएँ प्राप्त होंगी. वे लोग जब तक परमात्मा पर विश्वास नहीं लाएँगे तब तक नरककी अग्निमें बार-बार जलते रहेंगे.
Those who do not understand and belief that is truth and reality they will suffer.

गुजरे हैं हदसों काफर, दूर दराज जानी थी आखर ।
दुख लंबे हुए तिन कारन, यों मता पाया दोजखीयों हाल इन ।।३८

ऐसे अवज्ञााकारी लोग पापकी सीमाएँ पार कर चुके हैं. उनको कयामतकी घड.ी दूर लग रही थी. इसीलिए उनके दुःख दीर्घ काल तक चलते रहे. इस प्रकार अवज्ञााकारी लोगोंने नरककी अनेक सम्पदाएँ (यातनाएँ) प्राप्त कीं हैं.

Those who think the day of judgement is far away and do not have faith that it does exist, their suffering will continue for very long time, because of their belief they attain such state.
प्रकरण २२ श्री कयामतनामा (बडा)

किनको नफा न देवे कोए, तब कोई न किसीके दाखिल होेेए ।
कूवत तिन समें कहूंए जाए, तो कोई नफा किसी को न सके पोहोंचाए ।।7

न्यायकी इस घड.ीमें कोई भी किसीको लाभ नहीं पहुँचा पाएगा एवं कोई भी किसीके दुःख सुखमें सहयोगी नहीं हो पाएगा. उस समय किसीका भी चातुर्य अथवा अहङ्कार कहींका कहीं उड. जाएगा. इसलिए कोई भी किसीको लाभ नहीं पहुँचा सकेगा (सबको अपने ही शुभाशुभ कर्मोंका यथायोग्य फल प्राप्त होगा).
At the time of judgement no one can recommend anyone or help one another, the cunningness cannot work either, each and everyone will reap what they have sowed.

हुकम हादिका साहेब फुरमान, करे सिफायत खुदा मोमिनों पेहेचान ।
मोमिन यकीनदारोंको चाहंे, हकमें भी उन ही को मिलाए ।।८

सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजीके आदेशसे इमाम महदी श्रीप्राणनाथजी सभीको यहाँ सन्देश दे रहे हैं और ब्रह्मात्माओंको परमात्माकी पहचान करवा कर उनकी अनुशंसा (सिफारिश) कर रहे हैं. परब्रह्म परमात्मा (उनके प्रति) विश्वास करने वाली ब्रह्मात्माओंसे प्रेम करते हैं और उनको ही दिव्य परमधामकी अपनी लीलाओंमें सम्मिलित करते हैं.
Our master Prannathji is giving us the command of Hadi(Devchandraji maharaj) who reminded and recommened the celestial souls of our Supreme Lord. The firm faith is expected from these souls.
Lord loves those who has firm belief in Him and He only unites with them.
प्रकरण २३
श्री कयामतनामा ग्रन्थ (बडा)

बिना श्रीकृस्नजी जेती मत, सो तूं जानियो सबे कुमत ।
कुमत सो कहिए किनको, सबथें बुरी जानिए तिनको ।।६
प्रकरण २१ प्रकाश (हिंदुस्तानी)
श्रीकृष्णजीके बिना जितनी भी मति हैं उन सबको तुम कुमति ही जानो. कुमति उसीको कहना चाहिए जो सबसे बुरी (निन्दित)होती है.
Without Shri Krishna all the intelligence, understand that all are stupidity, the stupidity(कुमत) also that one which is of worst kind.

ए सुख या मुख कह्यो न जाए, याको अनभवी जाने ताए ।
ए कुमत कहिए तिनसे कहा होए, अंधकूपमें पडिया सोए ।।९
प्रकरण २१ प्रकाश (हिंदुस्तानी)
इन सुखोंका वर्णन इस मुखसे नहीं हो सकता. अनुभवी व्यक्ति ही इस सुखको जान सकते हैं, जिसे कुमति कहा गया है उसके वशीभूत होनेसे क्या होता है ? ऐसी बुद्धि वाला अन्धकूप (नामक नरक) में पड. जाता है.

This bliss one cannot describe with this tongue, only those who have experienced it can understand and those who are stupid(कुमत) they will end in the Andh koop named hell.

सब दुखोंमें बुरा ए दुख, कुमत करे धनीसों बेमुख ।
केतो कहूं या दुख को विस्तार, जाके उलटे अंग इंद्री विकार ।। १०
प्रकरण २१ प्रकाश (हिंदुस्तानी)
सब दुःखोंसे बुरा दुःख यही है कि कुमति परमात्मासे विमुख कर देती है. इस दुःखका मैं विस्तारसे कितना वर्णन करूँ ? इसके कारण सभी गुण अंग इन्द्रियाँ उलटी होकर विकारी हो जातीं हैं.

Out of all the sufferings, this is the worst one, the stupidity(कुमत) makes them go against the supreme. What can I say about the sufferings of this, their senses go against the soul and thus will be a vikaar(disorder)!
The person with disorder forever looks for sense gratification which is momentary (does not last long) and hence never satisfied this creates dissatisfaction which further creates frustration which is followed by anger, anger creates forgetfulness, confusion in mind, which creates lack of consciousness(does not what one is saying or doing) and thus further destruction which leads to misery and sufferings!

दोऊ मतको कह्यो प्रकार, ए ब्रह्मसृष्टि करें विचार ।
जाको जाग्रत है बडी बुध, चेते अवसर जाके हिरदे सुध ।।११
प्रकरण २१ प्रकाश (हिंदुस्तानी)
मैंने दोनों प्रकारकी मतिका विवेचन कर दिया है. ब्रह्मसृष्टि उन पर विचार करेंगी. जिसमें बड.ी बुद्धि (महामति) जागृत हो जाएगी वह हृदयमें सुधि प्राप्तिकर इस सुअवसरमें सचेत हो जाएगी.
The two kind of intelligence(बडी मत superior intelligence and stupidity कुमत ), I have described, brahmshristi(celestial souls of Paramdham) must think over it those whose greater mind(connected with the cosmic intelligence) is awakened and their heart is purified, they will consciously grasp this opportunity. Only the brahmshristi will understand the distinction between the superior intelligence (understanding) and the stupidity!
This is a request by Indrawati(celestial souls of Paramdham) who is sitting before Lord Supreme to those celestial souls who are still wondering in the world to pay attention to these two differences in the intelligence.
The beloved Lord she is talking about is Shri Krishna of nijghar(Paramdham).

श्रीकृस्नजीसों प्रेम करे बडी मत, सो पोंहचावे अखंड घर जित

ब्रह्मलीला प्रकट कर अपनी तथा आत्मा परमात्माकी पहचान कराई

ब्रह्मलीला ढांपी हती, अवतारों दरम्यान।
सो आए फेर अपनी, प्रगट करी पेहेचान।।२५ प्रकरण ५२ किरंतन

विभिन्न अवतारोंकी लीलाओंमें ब्रह्मलीलाका रहस्य छिपा हुआ था. बुद्धजीस्वरूप सद्गुरुने स्वयं प्रकट होकर अपनी तथा आत्मा परमात्माकी पहचान कराई.

कोटि जतन ब्रह्मा करि थाके, सो जूठन नहिं पाये ।
सो जूठन धनी सहज कृपासों, पंचम निशदिन पाये ॥३

श्री कृष्ण ब्रज रास में ब्रह्म स्वरुप हैं ! यह कोई चतुर्मुखी ब्रह्मा ने बनाया हुआ शारीर नहीं है , इनको तो चतुर्मुखी ब्रह्मा की बुद्धि पहचान ही नहीं पाई !

पेहेलें भाई दोऊ अवतरे, एक स्याम दूजा हलधर। स्याम सरूप है ब्रह्म का, खेले रास जो लीला कर।।२७ प्रकरण १३ खुलासा

श्रीमद्बागवतके अनुसार व्रज मण्डलमें दो भाई अवतरित हुए. उनमें एक श्याम श्रीकृष्ण हैं और दूसरा हलधर बलभद्र हैं. उन दोनोंमें से श्याम ब्रह्मके स्वरूप हैं जिन्होंने रासलीला रचाई.
श्याम ब्रज में ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्रह्म का स्वरुप किसी पञ्च तत्व का तन नहीं है|

दो बेटे नूह नबीय के, एक स्याम दूजा हिसाम।
स्यामें समारी किस्ती मिने, दिया रूहों को आराम।।२8 प्रकरण १३ खुलासा

इसी प्रकार कुरानमें भी नूह पैगम्बरके दो पुत्रोंका उल्लेख है. उनमें-से एक शाम तथा दूसरा हिशाम है. उन दोनोंमें-से शामने तूफानके समय नौकाको सम्भाला और श्रेष्ठ आत्माओंको उसमें बैठाकर सुख (आराम) प्रदान किया.
यहाँ पर बात रूह को आराम देने की हो रही है क्या एक तन रूह देख सकता है ?

ए लीला अखंड थई, एहनो आगल थासे विस्तार।
ए प्रगटया पूरण पार ब्रह्म, महामति तणो आधार।।१० प्रकरण ५१ किरंतन

श्रीकृष्णजीकी यह लीला अक्षरब्रह्मके हृदयमें अङ्कित होकर अखण्ड बन गई. इस लीलाके रहस्यका आगे विस्तार होगा. अक्षरातीत पूर्णब्रह्म परमात्मा प्रकट हुए हैं, ये ही तो महामतिके प्राणाधार हैं.
The Lord who is absolute and Brahm of beyond appeared here.
This is eternal leela of the Lord and this will be elaborated more in future.
Here the Complete Pooran Brahma appeared who is aadhar(Supporter) Lord of Mahamati.

श्रीकृस्नजीसों प्रेम करे बडी मत, सो पोंहचावे अखंड घर जित ।
ताए आडो न आवे भवसागर, सो अखंड सुख पावे निज घर ।।८
प्रकरण २१ प्रकाश (हिंदुस्तानी)
श्रीकृष्णजीसे प्रेम करने वाली बुद्धि बड़ी मति (महामति) अखण्ड घरमें पहुँचा देती है. उसकी राहमें भवसागर बाधा नहीं बनता.वह अपने घरका अखण्ड सुख प्राप्त करती है.महामति प्राणनाथ वाणी चिंतन और मंथन
यह अखंड निज घर ब्रह्मात्माओं का धाम है। अखंड निज घर का मतलब है अखंड स्वयं का घर यह तो सिर्फ ब्रह्मात्माओं का है। जीव सृष्टि माया से उत्पन्न हुई है उनका अपना घर तो अखंड धाम नहीं है। इश्वरी सृष्टि का तन अक्षर धाम में नहीं है २४,००० इश्वरी सृष्टि अक्षर की सुरता हैं, यह धाम धनि श्री कृष्ण की उपासना करेंगी और अक्षर ब्रह्म से मिल जाएँगी। वैसे प्रेम तो इस दुनिया में है ही नहीं, सिर्फ ब्रह्मात्मा ही प्रेम करना जानती है और इनकी मति बड़ी ही होती है, ब्रह्मात्मा ही सिर्फ श्री कृष्ण से प्रेम कर सकती हैं और यह उन्ही के लिए कहा गया है। तारतम वचन भी उन्ही के लिए है।

The beings with higher intelligence will love Shri Krishna which will take them to the eternal home, there the world (ocean of emotions) will not obstruct, and they will get the bliss of eternal home of the self.
Nij means the self Nijghar means the abode of the self it is also called Nijdham or Paramdham. The one with higher intelligence can love Shri Krishna, which will take one to eternal imperishable abode, the ocean of world (ignorance) will not obstruct and that will attain the eternal, everlasting bliss of the abode of the Nij. Remember the name of the Nij (the soul the self) is Shri Krishna which is eternal and from Aksharateet! This is the revelation of tartam gyaan Do not waste even a single breath and accept the enlightening of the beloved of Nijghar (abode of the self), accept it this with your nature and the senses you will not get this opportunity again.These words must eliminate all the confusion, greater intelligence those who accept shall become praiseworthy. End this confusion and recognise the beloved better! My soul is very wise, has given the path of Aksharateet says Mahamati! Do not take this as a mere poem!
भिस्त दई सबन को, चढे अक्षर नूर की द्रष्ट।
कायम सुख सबन को, सुपन जीव जो सृष्ट।।१०९

बुद्धजीने संसारके सभी जीवोंको मुक्तिस्थलोंमें स्थान दिया जिससे वे अक्षरब्रह्मकी दृष्टिमें अखण्ड हो गए. इस प्रकार बुद्धजीके प्रतापसे स्वप्न जगतके जीवोंको भी अखण्ड सुख प्राप्त हुआ.

दूजी सृष्टि जो जबरूती, जो ईस्वरी कही।
अधिक सुख अक्षर में, दिल नूर चूभ रही।।११०

दूसरी अक्षरधामकी सृष्टि है जिसको ईश्वरीसृष्टि कहा गया है. अक्षरब्रह्मकी सुरता स्वरूप होनेसे उन्होंने अक्षरब्रह्मके हृदयमें स्थान प्राप्त कर अखण्ड सुख प्राप्त किया.

और उमत जो लाहूती, ब्रह्मसृष्टि घर धाम।
इन को सुख देखाए के, पूरन किए मन काम।।१११

इनके अतिरिक्त परमधामकी आत्माएँ ब्रह्मसृष्टि कहलाती हैं. इस क्षर जगतकी लीला दिखाकर बुद्धजीने इनके सभी मनोरथ पूर्ण किए.

मुक्त दई त्रैगुन फिरस्ते, जगाए नूर अक्षर।
रूहें ब्रह्मसृष्टि जागते, सुख पायो सचराचर।।११२

बुद्धजीने त्रिदेवों तथा अन्य फरिश्तोंको भी अखण्ड सुख (मुक्ति) प्रदान किया तथा अक्षरब्रह्मको भी जागृत किया. इस प्रकार ब्रह्मसृष्टियोंके परमधाममें जागृत होने पर जगतके सचराचर प्राणियोंको अखण्ड सुख प्राप्त हुआ.

करनी करम कछू ना रह्या, धनी बडे कृपाल।
सो बुधजीएं मारिया, जो त्रैलोकी का काल।।११३

धामधनी इतने बड.े कृपालु हैं कि उन्होंने किसीके भी कर्तव्य तथा कर्मबन्धनोंको शेष रहने नहीं दिया. इस प्रकार बुद्धजीने तीनों लोकों (स्वर्गादि, मृत्युलोक तथा पाताल) के जीवोंके कालचक्र (आवागमन चक्र) को मिटा दिया.
प्रकरण १३ श्री खुलासा

उडाए दियो सबको अंधेर, काढयो सबको उलटो फेर

दूजा देह धरके सुन्दरबाई श्यामा (श्री राजजी ) फिर से मेहेराज परातम इन्द्रावती में आये और तारतम ज्ञान फिर से कही , पहेले बार सभी ने तारतम लिया धनि की सेवा भी की पर उनकी नींद पूर्ण तरह से गयी नहीं थी . धनि देव्चान्द्रजी इसा और महामति प्राणनाथजी मेहदी हैं ,यह ही आखरी इमाम हुए हैं , इन्ही के मार्फ़त प्राणनाथ श्री कृष्ण श्याम ने वाणी कही है वोह कुल्जम्स्वरूप आखरी किताब कह कर गए हैं . मंत्र का धनि इसा धनि देवाचान्द्रजी को कहा है . इसीलिए अगर कुछ बदला और शंका श्रीजन किया , साहेब के उन्मुख आत्मायों को धनि से बेमुख किया तब ऐसे लोगों को धाम धनि के सामने प्रतिष्ठा नहीं है भले ही ये अपने आप को सतगुर या परमेश्वर की उपाधि दे कर क्यों न अपनी ही पूजा कराएँ !

हम कारन तुम आए देह धर, तुम कै विध दया करी हम पर ।
तुम धनी आए कारन हम, देखाई बाट ल्याए तारतम ।।१७
हमारे लिए ही आप शरीर धारण कर आए हैं. आपने हम पर अनेक प्रकारके अनुग्रह किए हैं. हे सद्गुरु धनी ! वस्तुतः आप हमारे लिए ही आए हैं और आपने तारतमका प्रकाश दिखाकर हमारा मार्ग प्रशस्त किया है.
साथें माया मांगी सो भई अति जोर, तुम सबद कहे कै कर कर सोर ।
पर तिन समे नींद क्योंए न जाए, तब धनी सरूप भए अंतराए ।।१८
सुन्दरसाथने माया देखनेकी माँग की थी, किन्तु यह उनके लिए कठिन हो गई है. आपने पुकार-पुकार कर हमें उपदेश दिया, परन्तु उस समय किसी भी तरह हमारी नींद नहीं मिटी. तब धामधनी स्वरूप आप हममेंसे अन्तर्धान हो गए.
तो भी ना भई हमको खबर, तब फेर आए दूजा देह धर ।
ततछिन मिले हमको आए, सागर वतनी नूर बरसाए ।।१९
फिर भी हमें सुधि न हुई, तब आप पुनः दूसरा शरीर धारण कर (मेरे हृदयमें) प्रकट हुए. आप तत्काल आकर हमसे मिले और तारतम सागरके रूपमें परमधामका नूर बरसाने लगे.
मैं साथ को कह्या सो कहिए क्योंकर, यों तो कहिए जो दूर किये होवें घर ।
एता तो मैं जानूं जीव मांहें, जो ए अरज धनीसों करिए नाहें ।।२०
हे धनी ! मैंने सुन्दरसाथको जो कुछ कहा है वह आपसे कैसे कहा जाए? यह सब तो तब कहा जाए, जब आपने हमें अपने घर-परमधामसे दूर किया हो. इतना तो मैं अन्तरसे जानती हूँ कि ऐसी विनती धनीसे नहीं करनी चाहिए.
पर साथ वास्ते दाह उपजी मन, यों जाने न कह्या हम कारन ।
यों न कहूं तो समझे क्यों कोए, कै विध दया धनीकी होए ।।२१
किन्तु सुन्दरसाथके लिए मेरे मनमें यह चाह उत्पन्न हुई है. वे यह न सोचें कि इन्होंने हमारे लिए कुछ कहा ही नहीं. मैं इस प्रकार न कहूँ तो कोई कैसे समझ पाएगा कि धनीकी दया किस प्रकार हो रही है.
ए साथ की चिन्हार को कहे वचन, ना तो धनी दया जीव जाने मन ।
साथ चरने हैं सो तो बचिछिन बीर, ए भी वचन विचारे द्रढ धीर ।।२२
सुन्दरसाथको धनीकी पहचान करानेके लिए ही मैंने ये वचन कहे हैं, अन्यथा धनीकी दया तो मेरा जीव ही जानता है. जो सुन्दरसाथ धनीके चरणोंमें हैं, वे तो विचक्षण (तीक्ष्ण प्रतिभावाले) एवं वीर (साहसी) हैं. वे भी इन वचनों पर दृढ.तासे विचार करेंगे.
पर करूं साथ पीछले की बडी जतन, देख बानी आवसी इन बाट वतन ।
देखियो साथ दया धनी, ए कृपाकी बातें हैं अति घनी ।।२३
परन्तु भविष्यमें आने वाले सुन्दरसाथके लिए मैं प्रयत्न कर रही हूँ. इसी वाणीको देखकर वे परमधामके इस मार्ग पर आएँगे. हे सुन्दरसाथजी ! धनीजीकी दयाको देखो, उनकी कृपाकी बातें बहुत हैं.
ए दया धनी मैं जानूं सही, पर इन जुबां ना जाए कही ।
जो जीव वचन विचारे प्रकास, तो अंग उपजे धाम धनी उलास ।।२४
धनीकी इस अपार कृपाको मैं ही समझती हूँ किन्तु इस नश्वर जिह्वासे कह नहीं सकती. जो जीव इस प्रकाश ग्रन्थकी वाणी पर विचार करेंगे, तब उनका मन धामधनीसे मिलनेके लिए सदैव उल्लसित होगा.
कहे इन्द्रावती सुन्दरबाई चरने, सेवा पीउकी प्यार अति घने ।
और कछू ना इन सेवा समान, जो दिल सनकूल करे पेहेचान ।।२५
इन्द्रावती कहती है कि सुन्दरबाईके चरणोंकी सेवा करनेसे प्रियतम धनीका अत्यधिक प्रेम प्राप्त होता है. धामधनीको पहचान कर प्रसन्न दिलसे उनकी सेवा करनेके समान अन्य कुछ भी सुख नहीं है.
प्रकरण २४

श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी) महामति प्राणनाथ वाणी

अब सांचा तो जो करे रोसन, जोत पहोंची जाए चौदे भवन ।
ऐ समया तो ऐसा मिल्या आए, चौदे भवनमें जोत न समाए ।।२२

सच्चा ज्ञान वही है जो आत्माको प्रकाशित कर दे और उस ज्ञाानकी ज्योति चौदह लोकोंमें पहुँच जाए. यह समय तो ऐसा प्राप्त हुआ है कि चौदह लोकोंमें इस (तारतम) ज्ञाानकी ज्योति समाती नहीं है.

The true knowledge is that which will illumine the soul and the light of this illumination will spread in all the 14 lokas. This moment you have got which is so bright, that the light cannot be contained in all the 14 lokas. It is by the knowledge and understanding one can awaken the jeev and thus the soul and finally experience the Supreme. This knowledge and understanding will illumine whole 14 lokas!
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यों हम ना करें तो और कौन करे, धनी हमारे कारन दूजा देह धरे ।
आतम मेरी निजधामकी सत, सो क्यों ना कर उजाला अत ।।२३
श्री सुन्दरबाईके चरन प्रताप, प्रगट कियो मैं अपनों आप ।
मोंसों गुनवंती बाइएं किए गुन, साथें भी किए अति घन ।।२४
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यदि हम ऐसा (इस तारतम ज्ञाानको फैलानेका) कार्य नहीं करेंगे तो अन्य कौन करेगा ? सद्गुरु धनीने हमारे लिए ही दूसरी बार शरीर धारण किया है. यदि मेरी आत्मा सचमुच परमधामकी है तो वह इस संसारमें परमधामके ज्ञाानका प्रकाश क्यों नहीं फैलाएगी ?

Illuminating the universe with light of supreme knowledge, if I do not do then who else will do. Out of compassion our beloved Lord has taken the human form twice. My soul is truth of abode of the self(निजधामकी सत), then why will it not illuminate the universe extremely.

This reference धनी हमारे कारन दूजा देह धरे
Means Lord first came in Shyama-Sundarbai and then He united with Indravati again!

सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी (सुन्दरबाई) के चरणोंके प्रतापसे मैंने स्वयंको प्रकट किया है. मुझ पर श्रीगोवर्धन ठाकुर (गुणवन्तीबाई) ने बडे. उपकार किए हैं और सुन्दरसाथने भी मुझ पर बड.ा अनुग्रह किया है.

By the mercy of Sundarbai(celestial soul of Paramdham who resided in Devachandraji Maharaj), I could manifest myself(Indrawati). Gunvanti bai(a celestial soul residing in Govardhan Thakkar, Meheraj’s elder brother) have obliged me a lot and all other sundarsath also were extremely graceful towards me.

It is Indrawati who is enlightened by the grace of Lord who resided within her and said and eliminated all the darkness and brought the soul to right path from the wrong ones!
जोत करूं धनीकी दया, ए अंदर आएके कहया।
उडाए दियो सबको अंधेर, काढयो सबको उलटो फेर ।।२५

अब मैं धनीकी दयाको प्रकाशित करती हूँ. उन्होंने मेरे हृदयमें बैठकर ये वचन कहे हैं. उन्होंने इन वचनोंके द्वारा सबके अज्ञाानरूपी अन्धकारको दूर किया और संसारके समस्त जीवोंके जन्म-मरणके उलटे चक्रको समाप्त कर दिया.
The compassion of our beloved Lord let me throw light upon it, it is He who residing in me, has spoken these words. All the darkness of ignorance is eliminated. Salvaged all the beings from birth and death into eternity! (The world is a place of suffering, misery, always longing for happiness which never lasts, going through birth and death exactly opposite to the bliss, everlasting happiness and eternity.)
इन्द्रावती प्रगट भई पीउ पास, एक भई करे प्रकास ।
अखंड धाम धनी उजास, जाग जागनी खेले रास।।२६

इन्द्रावती पिया (सद्गुरु) के साथ प्रकट हुई है. वह उनसे एकाकार होकर इन वचनोंको प्रकाशित कर रही है. धामधनीके ज्ञाानके अखण्ड प्रकाशसे जागृत होकर जागनी रास खेल रही है.
Indrawati (celestial soul of Paramdham) is revealed and became near to beloved and united with the beloved is bringing this light (illuminating). Awakening in the light of the eternal Lord of the abode is playing the raas (one which is full of nectar of bliss) of awakening!
Indrawati united with the Aksharateet Lord is requesting all the brahmshriti to understand these words for which she has given the proof from the scriptures too and recognize the supreme Lord.
Those who fail to understand and follow their stupidity will end in the hell where the suffering is indescribable.
प्रकरण २१ प्रकाश (हिंदुस्तानी)

विस्वास करके दौडे जे, तारतमको फल सोई ले। तिन कारन करूं प्रकास, ब्रह्मसृष्टि पूरन करूं आस

श्रीसुन्दरबाईके चरन पसाए, मूल बचन हिरदें चढि आए । चरन फले निध आई एह, अब ना छोडूं चित चरन सनेह ।।१८
सद्गुरु (सुन्दरबाई) के चरणोंके प्रतापसे परमधामके मूल वचन मेरे हृदयमें प्रकट हुए. जिन चरणोंकी कृपाके फल स्वरूप यह निधि मुझे प्राप्त हुई है, उनका स्नेह अब मैं नहीं छोड. सकती हूँ.
चरन तले कियो निवास, इन्द्रावती गावे प्रकास। भानके भरम कियो उजास, पावें फल कारन विस्वास ।।१९
ऐसे सद्गुरुके चरणोंमें रह कर इन्द्रावती प्रकाशके वचनोंको इस प्रकार गा रही है. सद्गुरुने मेरी सभी भ्रान्तियोंको मिटाकर मेरे हृदयको प्रकाशित किया है. उनके चरणोंमें विश्वास करनेसे मुझे यह फल प्राप्त हुआ.
विस्वास करके दौडे जे, तारतमको फल सोई ले। तिन कारन करूं प्रकास, ब्रह्मसृष्टि पूरन करूं आस।।२०
जो पूर्ण विश्वासके साथ आगे बढ.गे, उन्हें ही तारतम ज्ञानका फल प्राप्त होगा. इस प्रकार प्रकाश ग्रन्थके इन वचनोंको प्रकाशित कर ब्रह्मात्माओंकी आशा पूर्ण करूँगी.
इन्द्रावती धनीके पास, रासको कियो प्रकास। धनिएं दई मोहे जागृत बुध, तो प्रकास करूं तारतमकी निध ।।२१
इन्द्रावतीने सद्गुरुके चरणोंमें रहकर रासके रहस्योंको इस प्रकार (प्रकाश ग्रन्थके द्वारा) प्रकट किया. सद्गुरु धनीने मुझे जागृत बुद्धि प्रदान की है. इसलिए उसके बल पर ही मैं तारतम ज्ञानरूपी अखण्ड निधिको प्रकट करती हूँ. प्रकरण १९ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)

Anil Vala
सत्य की वास्तविकता

दिनांक 19-10-1995 गुरुवार रात्रि 8 बजे पूर्व सूचनानुसार स्थानीय विद्दद् वर्ग की विशेष बैठक श्रीमान् पन्नालालजी शर्मा उपाध्यक्ष ट्रस्ट की अध्यक्षता मेँ संपन्न हुई । जिसमे निम्नांकित महानुभाव उपस्थित हुए एवं 5 बार श्री निजनाम जाप करने के बाद कार्यवाही प्रारंभ हूई ।

1 ) श्री पन्नालालजी शर्मा उपाध्यक्ष 2 ) श्री पं. धनीदासजी 3 ) श्री पं. चेतनदत्तजी शर्मा 4 ) श्री पं. आनंददासजी शर्मा 5 ) श्री पं. पन्नालालजी गूडा 6 ) श्री पं. क्रृष्णदासजी शर्मा
7 ) श्री पं. मानिकलालजी शर्मा 8 ) श्री सुभाषचंद्रजी शर्मा , सचिव ट्रस्ट 9 ) श्री राजक्रृष्णजी दुबे , ट्रस्टी 10 ) श्री बाबुलाल हीरालाल ट्रस्टी 11 ) श्री पु.देवकरनजी त्रिपाठी

# दुसरा विचार श्री निजानंद आश्रम रतनपुरी ( इन्चोली ) से प्रकाशित '' संसार और मेरा भर्तार '' नामक पुस्तक मे कइ विसंगतियाँ श्री क्रृष्ण के संबंध मे तथा और भी धर्म विरोधी बातो की व्याख्या की गइ है जो विरोधात्मक है तथा

श्री निजनाम श्रीक्रृष्णजी है या निजनाम श्री जी साहेब जी है इस विषय पर निर्णय होना है ।

विचार हो तथा मुजफ्फरनगर बुलेटिन हिन्दी दैनिक ता.26 सितम्बर 1995 बैटक मे प्रस्तुत हुआ जिसमे एक लेख श्री निजानंद आश्रम रतनपुरी मे वार्षिकोत्सव टाईटल के अंतर्गत स्पष्ट लेख है कि महाराज श्री क्रृष्णदासजी ने अपने भाषण मे यह स्पष्ट किया कि मूलमंत्र 'निजनाम श्रीजी साहेबजी कहा जाए ' इसका स्पष्टीकरण श्री पं. क्रृष्णदास जी से बैठक मे मांगा गया ।# सर्वसम्मति से यह प्रमाणित किया गया कि मुलमंत्र निजनाम श्री क्रृष्णजी है और वह रहेगा । इसके अलावा पं. श्री क्रृष्णदासजी शर्मा से पूछने पर स्पष्ट किया कि उत्त्क बुलेटिन मे जो मेरा कथन यह छापा गया है कि '' निजनाम श्रीजी साहेबजी है '' यह लेख मेरे '' बिना अनुमति के छापा गया है '' । वह जब मैने बुलेटिन मे पढा था तो उस समय इंचोली प्रवास केदौरान ही मैने इस पर आपत्ति उठाकर रोक लगा दी थी कि बुलेटिन मे छपे अभिभाषण के खंडन हेतु मै लिखकर देने को तैयार हु व मेने इंचोली मे ही रोक लगा दी थी कि धाम दर्शन मे उत्त्क गलत लेख नही आना चाहिए ।------------हस्ताक्षरति---------- 1.पन्नालाल ,2. चेतन दत्त शर्मा ,3.पु.पन्नालाल , 4. देवकरन त्रिपाठी अध्यक्ष श्री धर्म प्रचार संगीत मंडल , 5. धनीदासजी , 6. क्रृष्णदासजी , 7. आनन्ददास , 8. सुभाषचंन्द्र , 9. राज क्रृष्ण दुबे , 10. बाबुलाल , 11. मानिकलाल शर्मा .

1) विक्रम सँवत् 1733 भादरवा सूद एकम से 1746 अषाढ सुद तेरस गुरुवार संग्रह तिथि 1758 चैत्र अग्यारस रविवार समय 334 वर्ष पूर्वलेखन और स्थान ब्रह्ममुनी श्री नंदरामजी तथा ब्रह्ममुनी श्री वीरजीभाई श्रीजी के समकालीन सुप्रसिद्द लेखक स्थान श्री 5 पद्भमावतीपुरी धाम पन्नायह अति प्राचीन और प्रामाणिक हस्तलिखित प्रत श्री घुम्मटजी मंदिर , श्री 5 पद्मावतीपुरीधाम पन्नामे सुरक्षित है ।यह स्वरुप साहेब के अलग अलग किताबे अलग अलग समयमे दोनो ब्रह्ममुनी के द्रारा लीखे गये है यह एक एक पुस्तक का संग्रह संवत 1758 चैत्र सुद 11 रविवार के दिन कीया गया था ।ये स्वरुत साहेब मे रास से लेकर कयामतनामा तक सारे ग्रन्थ मे बीज मंत्र मे निजनाम श्री क्रूष्न जी ही है ।

2) विक्रम संवत 1760 अषाढ वद रविवार 293 वर्ष पहेले लेखक श्रीजी के समकालीन ब्रह्ममूनी श्री वीरजीभाई जो स्वामीजी की जागनी यात्रा मे साथ थे यह ग्रंन्थ पन्ना मे ही लीखा गया हे । स्वरुप साहेब की यह अति प्राचीन नकलो मे रास से लेकर कयामतनामा के आरंभ मे प्रत्येक ग्रन्थ के प्रारंभ मे निजनाम श्री क्रृष्ण जी अनादि अक्षरातीत हि लिखा है ।इस स्वरुप साहेब मे एक और विशेषता हे की सिनगार ग्रन्थ के बीच मे श्री राधाक्रृष्ण का चित्र बना हुआ है जो अनेक रंगो से अत्यंत मनोहर ओर दर्शनीय है ।

3 ) विक्रम संवत 1826 पोष वद 3 ,227 वर्ष पहेले ब्रह्ममुनी श्री गनेश ब्रह्मचारी ने पन्ना जी मे लिखा था ।ग्रन्थ के प्रारंभ मे अथवा कीसी भी जगस पर निजनाम महामंत्र का उल्लेख हुआ हे वहा पर निजनाम श्री क्रृष्णजी अनादी अक्षरातीत ही है ।

4 ) विक्रम संवत 1851 अषाढ सुद 14 शुक्रवार , 202 वर्ष पहेलेश्री श्यामदास जी ने पन्ना परमधाम मे लिखा था ।ग्रन्थ के आरंभ और एक एक पुस्तक के प्रारंभ मे निजनाम श्री क्रृष्णजी अनादि अक्षरातित ही लिखा है।

5) विक्रम संवत 1852 जेठ वद गुरुवार , 201 वर्ष पहेले शाहगढ के राजा परमहंस श्री बखतवली के समय मे महाकोटा मे लीखा गया था । यह स्वरुप साहेब श्री 108 श्री बंगलाजी मे 200 वर्ष पूर्व मजलिस ( चर्चा ) के समय पधराया जाता था । चांदीके कवरमे जडीत यह स्वरुप साहेबका आकार और वजन ईतना है की कोइ साधारन मनुष्य के लिए उठाना अशक्य है । इस स्वरुप साहेब मे भी निजनाम मंत्र मे निजनाम श्री क्रृष्णजी अनादि अक्षरातीत ही है ।que. प्राणनाथजी और देवचंन्द्रजी की वाणी और बीतक का इतना अपमान करने वालो को माफ क्यु कर दिया गया ? किसकी जमीर मे खोट है ? महामतिजी के समाज मे भेदभाव रखनेवालो को पन्नाधाम ने माफ क्यु कर दिया ?WRITTEN BY : LET'S WAKE UP SUNDARSATH GROUP Anil Vala

Know Thyself

Know thyself

The true meaning of Mahamati

Can Dhani Devachandraji be called Mahamati or not?

इत भेलें रूह नूर बुध, और आग्या दया परकास।
पूरूं आस अक्षर की, मेरा सुख देखाए साख्यात।।३२

मेरे हृदयमें श्री श्यामाजीकी आत्मा, तारतम (नूर), अक्षरकी जागृत बुद्धि (बुध), श्री राजजीकी आज्ञाा और कृपाका पूर्ण प्रकाश है. अब मैं इन सबके द्वारा मेरे घरका सुख दिखाकर परमधामकी लीला देखनेकी अक्षरब्रह्मकी इच्छाको पूर्ण कर दूँ.

Here unites in my soul(Shyama),light of Supreme knowledge(tartam gyaan), the cosmic mind of Akshar, will/command of the Lord, the grace and enlightening(realisation of the self). I will fulfill the desire of Akshar by showing the bliss of the real abode and supreme.

इत भी उजाला अखंड, पर किरना न इत पकराए।
ए नूर सब एक होए चल्या, आगूं अक्षरातीत समाए।।३३

तारतम ज्ञाानके अखण्ड प्रकाशसे यह संसार भी प्रकाशित हुआ है किन्तु इस दिव्य ज्ञाानकी किरणें यहाँ समा नहीं रहीं हैं. उपर्युक्त बुद्धि, आज्ञाा, दया सबके सब एक साथ अपना प्रकाश फैलाते हुए अक्षरातीत धाममें जाकर समा जाते हैं.
By the light of the supreme wisdom of indivisible true abode there is enlightening but one cannot contain the rays. These enlightening (all five described ahead)bound together enter into the heart of Aksharateet Paramdham.

ए नूर आगे थें आइया, अक्षर ठौर के पार।
ए सब जाहेर कर चल्या, आया निज दरबार।।३४

अक्षरसे परे अक्षरातीतके धामसे ही तारतमका प्रकाश इस संसारमें आया है. सम्पूर्ण क्षर ब्रह्माण्ड, अक्षरधाम और परमधाम इन सभी भूमिकाओंको प्रकट कर यह फिर अपने स्थान परमधाममें ही समा जाएगा.
This enlightening has come from beyond, beyond the abode of Akshar. All these are revealed and now we are at the palace of the self.

वतन देख्या इत थें, सो केते कहूं परकार।
नूर अखंड ऐसा हुआ, जाको वार न काहूं पार।।३५

ब्रह्मात्माओंने इस तारतम ज्ञाानके प्रतापसे संसारमें रहते हुए भी परमधामके दर्शन किए, इसका विवरण कहाँ तक दूँ ? ज्ञाानका ऐसा अखण्ड प्रकाश फैला जिसका कोई पारावार ही नहीं है.

Living in this world, I saw my abode, how can I describe how it is!
The imperishable enlightening is such there is neither I can describe this side nor the other side (unbound and unlimited at all end)

किए विलास अंकूर थें, घर के अनेक परकार।
पिया सुंदरबाई अंग में, आए कियो विस्तार।।३६

परमधामके सम्बन्धी होनेके कारण हम ब्रह्मात्माओंने इस जगतमें रहते हुए भी परमधामके अनेक प्रकारके अखण्ड सुखोंमें विलास किया. सुन्दरबाई (सद्गुरु) के स्वरूपमें स्वयं प्रियतम परमात्माने मेरे हृदयमें विराजमान होकर धाम लीलाका विस्तार किया.

Due to relationship, we enjoyed in many ways the unlimited(abundance) sport of original home. Beloved Lord came in the soul of Sundarbai and spread the revelations.

ए बीज बचन दो एक, पिया बोए किओ परकास।
अंकूर ऐसा उठिया, सब किए हांस विलास।।३7

सद्गुरु धनी श्री देवचन्द्रजी महाराजने मेरे हृदयमें तारतम ज्ञाानके बीज वचन बोकर ही यह प्रकाश किया है. उसका ऐसा अङ्कुर फूटा (तारतम वाणी प्रकट हुई) कि इसके द्वारा सभीने परमधामके अपार सुखोंका अनुभव किया.
By the word of seeds, beloved Lord sowed and enlightened. The seed sprouted so well (tartam vani) all are able to enjoy the union with the beloved.
The revelations which Lord spread through Sundarbai, the same knowledge is planted as seed in Indrawati which sprouts for us tartamsagar so we all can unite and sport with our beloved Lord.
प्रकरण २४ श्री कलश ग्रन्थ (हिन्दुस्तानी)

श्री सुंदरबाई स्यामाजी अवतार, पूरन आवेस दियो आधार ।
ब्रह्मसृष्ट मिने सिरदार, श्री धाम धनीजी की अंगना नार ।।१

सद्गुरु श्रीदेवचन्द्रजी (सुन्दरबाई) श्रीश्यामाजीके अवतार हैं. धामधनीने उनको अपना पूर्ण आवेश दिया है. वे ब्रह्मसृष्टियोंमें शिरोमणि हैं और धामधनीकी अर्धाङ्गिनी हैं.

Shri Sundarbai avataar of Shyamaji whom the Master gave पूरन complete aavesh(inspiration). She is the head of all other Brahmshristi and she is the part of Master of Paramdham.
prakaran 5 Prakash Hindi
Shyama avtaar Dhani Dev chandra first got tartam gyaan from the Supreme Lord then Lord resided in her heart.
All five will of the Lord, grace, tartam gyaan of original abode mool vatan, intelligence of Akshar, inspiration of Lord came along with it.
He thus became Mahamat first and showed the game to Indrawati and all other souls. Later, united with Indrawati and she too became Mahamati!
स्याम स्यामाजी आए देखो खेल बनाए, सब उठियां हंसकर ।
खेले महामति देखलावे इंद्रावती, खोले पट अंतर ।।१० प्रकरण ४० श्री परिक्रमा
---------
उस समय श्रीश्यामश्यामाजीने वहाँ पर आकर सखियोंकी यह लीला देखी तो सभी सखियाँ हँसती हुईं उठ गइंर्. इस प्रकार इन्द्रावती आदि सखियोंके इन खेलोंको दिखाते हुए महामति सभी सुन्दरसाथके अन्तर पटको खोल रहे हैं.

श्री भागवत को करत श्रवण, श्री पुरुषोत्तम दियो दर्शन /
प्रथम दृष्टि उजियारो आयो, पीछे स्वरूप को दर्शन पायो // 39 //

वय किशोर अति सुन्दर स्वरूप, तेज पुंज सिंगार अनूप /
श्री श्यामा जी की सुरत सुदेश, तापर पुरुषोत्तम आवेश // 40 //

आज्ञा, बुध, अरु मूल तारतम, पांचो निध आई उत्तम /
कह्यो थो श्यामनी रास मोझारी, अहम् कृष्ण कृष्ण भई प्यारी // 41 //

है स्वरूप सुन्दर सुखदाई, साक्षात जागनी रूप सुहाई /
श्री देवचन्द्र जी को दर्शन जब भयो, तब होकारो कथा को रेहे गयो // 42 //
श्री जयराम कंसारा जी (करुणा सखी) द्वारा रचित बीतक

बुद्धि सु अक्षर ब्रह्म की जगी रास मधि सोई । ध्यान कार्यो ब्रज्रासको बहुबिध चेतन होई ।।
जाग्रत बुद्धि को तातें प्रयो जू नाम । श्यामा ताको संग ले प्रगटी नौतन ठाम ।।
(वृत्तान्त मु. ३४ )
The intelligence of Akshar was awakened at Raas. If you meditate on Braj and Raas you will become conscious. Shyama using this awakened mind appeared in Nautan place.
Akshar then provides the cosmic consciousness noor budhi so to understand the creation and also attracts the gyaan from moolbudhi to itself. Thus we see the creation/destruction laws of creation and Akshar sees the leela of Paramdham.
दृष्टि अन्तरगत जेही, खोली धनी देवचन्द्रकी तेही ।
प्रथमै व्रज अखंड जो देख्यो, पीछे रास अखंड निज पेख्यो ॥
मंगलमूल धाम दृष्ट आयो, लीला सहित सो निकट सुहायो ।
मूल मेलो परम निज जोई, दृष्ट देख्यो साक्षात सोई ॥

सरूप पन्च सोहावे, मूल आज्ञा ताहिं खेलावे ।
आवेस श्री स्वामिनी संग जानो, सो श्री सुन्दरबाई विषे मानो ॥
बुध अक्षर की अवतरी, बुद्धि तारतम दृष्ट विस्तरी ।
आज्ञा मूल सरूपकी जेही, पांचो सरूप खेलावे तेही ॥
(सुन्दरसागर २७)

तब हारके धनिएं विचारिया, क्यों छोडूं अपनी अरधंग ।
फेर बैठे माहे आसन कर, महामति हिरदें अपंग।।११
तब हताश होकर धनीने विचार किया कि मैं अपनी अङ्गनाको अकेली कैसे छोड. दूँ ? पश्चात् वे महामति अपङ्ग हृदयमें विराजमान हो गए.
प्रकरण ९९ श्री किरन्तन

आदके द्वार ना खुले आज दिन, ऐसा हुआ ना कोई खोले हम बिन ।
सो कुंजी दई मेरे हाथ, तूं खोल कारन अपने साथ।।९३

उन्होंने बताया कि आज दिन तक परमधामके द्वार नहीं खुले थे (अर्थात् शास्त्रोंके अर्थ स्पष्ट नहीं हुए थे) हमारे बिना ऐसा कोई भी नहीं हुआ कि उन (रहस्यों) को खोल (स्पष्ट कर) सके. उन द्वारोंको खोलनेकी कुञ्जी (तारतम ज्ञाान) मेरे हाथमें देते हुए सद्गुरुने मुझे आदेश दिया, ‘तुम अपने सुन्दरसाथके लिए उन रहस्योंको खोल दो.’
The door of Paramdham was not opened to anyone before.
The hidden signs/symbols/messages were not revealed to anyone other than me. The key to all the scriptures the revealations, the tartam gyaan I am giving it to you, you open the doors for rest of the sundarsath said Satguru Dhani Devachandraji(Shyama – Sundarbai)

मोहे करी सरीखी आप, टालने हम सबोंकी ताप।
आतम संग भई जाग्रत बुध, सुपनथें जगाए करी मोहे सुध ।।९४

हम सब ब्रह्मात्माओंका सन्ताप मिटानेके लिए सद्गुरुने मेरे हृदयमें बैठकर मुझे अपने समान बनाया. मेरी अन्तर आत्मामें उनकी जागृत बुद्धिका प्रवेश हुआ. इस स्वप्नवत् संसारमें सोई हुई मेरी आत्माको जगाकर उन्होंने मुझे सब प्रकारकी सुधि दी.
Made me equal to him, awakened the intelligence and gave the conciousness!
Satguru made me as equal to her(sundarbai) to elliminate all misery in us. Awakened my soul and mind and
awakened me from the dream and gave me complete consciousness.
Remember Satguru Dhani Devachandraji made Mahamati Prannath equal to himself. He gave all the wisdom of Paramdham and also gave the key to all the scriptures and gave the privilege to open the doors of Paramdham to all. This is what Satguru does equips your disciple with truth, intelligence, awakening, enlightening, soul realization and krishna consciousness!

श्रीधनीजीको जोस आतम दुलहिन, नूर हुकम बुध मूल वतन ।
ए पांचों मिल भई महामत, वेद कतेबों पोहोंची सरत ।।९५

श्रीधनीजीका जोश, श्रीश्यामाजीकी आत्मा, अक्षरब्रह्मका नूर, श्रीराजजीका आदेश, परमधामकी मूल बुद्धि (तारतम ज्ञाान) इन पाँचों शक्तियोंको प्राप्तकर मैं महामति बन गई. वेद शास्त्रों तथा कुरानादिकी भविष्य वाणी (परब्रह्मका ज्ञाान संसारमें आएगा ऐसी) का समय आ गया है.
The inspiration of Supreme Master, consort the soul of the Master-Shyama, Cosmic Intelligence of Akshar, Will of the Master, the intelligence of the original soul (the intelligence of soul in Paramdham), akshar's awakened mind, together, I became Mahamat (Greater Intelligence), thus fulfilling the profecies of Ved and Kateb.
Sundarbai got Dhamdhani's complete avesh, she was shyama avtaar herself. She got tartam gyaan from Shri Rajji. She was commanded to awaken the sundarsath that is hukum, She came to earth with the Akshar's mind that awakened in Nitya Raas hence is called Budh avtaar. That is why Sundarbai Shyama and Shyam residing in Dhani Devchandra is Mahamati too. When united with Indrawati in Meheraj, he became Mahamati too.
When all five above are present then one becomes Mahamat.
Sundari sakhi resided in Dhani Devachandraji and Indrawati sakhi resided in Meharaj ji. In both Shyama resided and both united with Shri Krishna Shri Raaj Prannath. Both got Tartam gyaan, both got hukum to awaken sundarsath, both were awakened mind. All sakhis are Shyama'a ang and Shyama is Shri Rajji Shyam's ardhang(half part), all are parts and parcel of Shri Rajji, Shri Rajji is working through them. When something is done by a person do we ask which hand of his actually did the work? Do we credit the legs for walking and mind for thinking etcs or we just credit the person and appreciate the work done.

आंखां खोल तूं आप अपनी, निरख धनी श्री धाम।

आंखां खोल तूं आप अपनी, निरख धनी श्री धाम।
ले खुसवास याद कर, बांध गोली प्रेम काम ।।१
हे मेरी आत्मा ! तू स्वयं अपनी अन्तर्दृष्टि खोलकर परमधामके धनीको निहार. परमधामको याद कर वहाँकी सुगन्धि ग्रहण कर अपनी कामनाओंको प्रेमपूर्वक धनीके चरणोंमें लगा.
प्रेम प्याला भर भर पीऊं, त्रैलोकी छाक छकाऊं।
चौदे भवनमें करूं उजाला, फोड ब्रह्मांड पीउ पास जाऊं ।।२
मेरी इच्छा है कि मैं धनीके प्रेमके प्याले भर-भर कर पी लूँ और फिर उस प्रेमामृतसे तीनों लोकोंकी तृषाको शान्तकर दूँ. चौदह लोकोंमें इस प्रेमको प्रकाशित कर ब्रह्माण्डको भी फोड.कर मैं अपने प्रियतमके पास पहुँच जाऊँ.
वाचा मुख बोले तूं वानी, कीजो हांस विलास।
श्रवना तूं संभार आपनी, सुन धनीको प्रकास।।३
हे वाचा ! तू अपनी वाणीसे धनीजीके गुणोंका उच्चारण कर और उनसे हास-परिहास कर. हे श्रवण ! तुम स्वयंको सम्हालकर धामधनीके प्रकाश स्वरूप तारतम ज्ञाानको सुन.
कहे विचार जीवके अंग, तुम धनी देखाया जेह।
जो कदी ब्रह्मांड प्रले होवे, तो भी ना छोडूं पीउ नेह ।।४
जीवके सभी अंग विचार कर कहते हैं कि तुमने हमें धनीकी पहचान करवाई है. यदि कभी ब्रह्माण्डका प्रलय भी हो जाए तो भी हम धाम धनीका स्नेह नहीं छोड.ेंगे.
खोल आंखां तूं हो सावचेत, पेहेचान पीउ चित ल्याए ।
ले गुन तूं हो सनमुख, देख परदा उडाए।।५
मेरे जीव ! तू आँखें खोलकर सावचेत हो जा और दिलसे अपने धनीको पहचान ले. तू उनके सम्मुख रहकर उनके गुणोंको ग्रहण कर और अज्ञाानके पर्देको उड.ाकर उनकी ओर निहार.
एते दिन वृथा गमाए, किया अधमका काम।
करम चंडालन हुई मैं ऐसी, ना पेहेचाने धनी श्री धाम ।।६
इतने दिनोंको व्यर्थ ही गँवाकर तूने बड.ी नीचताका काम किया है, जिसके कारण मैं चण्डालकर्म करनेवाली हो गई और मैंने अपने परमधामके धनीको भी नहीं पहचाना.
भट परो मेरे जीव अभागी, भट परो चतुराई।
भट परो मेरे गुन प्रकृती, जिन बूझी ना मूल सगाई ।।७
हे मेरे अभागे जीव ! तुझे धिक्कार है. मेरी चतुराईको भी धिक्कार है. मेरे सारे गुण और स्वभावको भी धिक्कार है जिन्होंने धामधनीके मूल सम्बन्धको नहीं पहचाना.
I condemn my life force(jeev) which is unfortunate, and also condemn the cunningness, I condemn the physical nature, which never understood the primordial relationship with the beloved Lord!
आग परो तिन तेज बलको, आग परो रूप रंग।
धिक धिक परो तिन ग्यानको, जिन पाया नहीं प्रसंग ।।८
उस तेज, बल, रूप और रंग सबको आग लग जाए. उस ज्ञाानको भी धिक्कार है, जो धामधनीका सङ्ग नहीं कर सका.
धिक धिक मेरी पांचो इन्द्री, धिक धिक परो मेरी देह ।
श्री स्याम सुन्दर वर छोडके, संसारसों कियो सनेह ।।९
मेरी पाँचों इन्द्रियोंको धिक्कार है, मेरे शरीरको भी धिक्कार है क्योंकि श्याम सुन्दर जैसे सर्वगुण सम्पन्न वर (धनी) को छोड.कर इन्होंने इस कुटिल संसारसे स्नेह किया.
धिक धिक परो मेरे सब अंगों, जो न आए धनीके काम ।
बिना पेहेचाने डारे उलटे, ना पाए धनी श्री धाम।।१०
मेरे सभी अंगोंको धिक्कार है जो धनीजीके काम कभी नहीं आए. पहचाने बिना ही प्रतिकूल मार्ग पर चलनेसे धामधनीको पानेसे वे वञ्चित रह गए.
तुम तुमारे गुन ना छोडे, मैं बोहोत करी दुष्टाई।
मैं तो करम किए अति नीचे, पर तुम राखी मूल सगाई ।।११
हे सद्गुरु धनी ! आपने अपने गुणों (उपकार) को कभी नहीं छोड.ा, मैंने तो (आपको न पहचानकर) बहुत दुष्टता की है. मैंने नीच कार्य किए हैं फिर भी आपने अपने मूल सम्बन्धको बनाए रखा.
प्रकरण २२ श्री प्रकाश (हिन्दुस्तानी)

"Mahamati"

स्याम स्यामाजी आए देखो खेल बनाए, सब उठियां हंसकर ।
खेले महामति देखलावे इंद्रावती, खोले पट अंतर ।।१० प्रकरण ४० श्री परिक्रमा
---------
उस समय श्रीश्यामश्यामाजीने वहाँ पर आकर सखियोंकी यह लीला देखी तो सभी सखियाँ हँसती हुईं उठ गइंर्. इस प्रकार इन्द्रावती आदि सखियोंके इन खेलोंको दिखाते हुए महामति सभी सुन्दरसाथके अन्तर पटको खोल रहे हैं.

श्री भागवत को करत श्रवण, श्री पुरुषोत्तम दियो दर्शन /
प्रथम दृष्टि उजियारो आयो, पीछे स्वरूप को दर्शन पायो // 39 //

वय किशोर अति सुन्दर स्वरूप, तेज पुंज सिंगार अनूप /
श्री श्यामा जी की सुरत सुदेश, तापर पुरुषोत्तम आवेश // 40 //

आज्ञा, बुध, अरु मूल तारतम, पांचो निध आई उत्तम /
कह्यो थो श्यामनी रास मोझारी, अहम् कृष्ण कृष्ण भई प्यारी // 41 //

है स्वरूप सुन्दर सुखदाई, साक्षात जागनी रूप सुहाई /
श्री देवचन्द्र जी को दर्शन जब भयो, तब होकारो कथा को रेहे गयो // 42 //
श्री जयराम कंसारा जी (करुणा सखी) द्वारा रचित बीतक

बुद्धि सु अक्षर ब्रह्म की जगी रास मधि सोई । ध्यान कार्यो ब्रज्रासको बहुबिध चेतन होई ।।
जाग्रत बुद्धि को तातें प्रयो जू नाम । श्यामा ताको संग ले प्रगटी नौतन ठाम ।।
(वृत्तान्त मु. ३४ )
The intelligence of Akshar was awakened at Raas. If you meditate on Braj and Raas you will become conscious. Shyama using this awakened mind appeared in Nautan place.
Akshar then provides the cosmic consciousness noor budhi so to understand the creation and also attracts the gyaan from moolbudhi to itself. Thus we see the creation/destruction laws of creation and Akshar sees the leela of Paramdham.

Personified Consciousness, Joy, Intelligence

Mahamati means higher intelligence and Prannath means the Master of the living consciousness.
Mahamati is union of all (Indrawati and Shyam, Nij budhi of Indrawati with Noor budhi of Akshar, Shyama's soul aatma (which was present in Sundarbai and Rashul both in different times), and Dhamdhani's josh (Gibrail)). The awakened and enlightened intelligence of the jeev the conscious living being animating the physical body called Meheraj Thakkar became the instrument to deliver the message.

Caste System

The descrimination on the basis of caste or anything is totally wrong. Mahamati Prannathji ridicules the existing system where a person is judged on the basis of his caste or anything that is seen outside. He says what matters is what a person is within. A person can wear clean clothes, recite all the ved mantras and perform all sorts of rituals, proclaim oneself pious and virtuos yet cannot see Shyam even in dreams. And there is another who is called Chandaal by the world, who day in and out remembers Lord's name and does it secretly.

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सागर आठमा मेहेर का
और सागर जो मेहेर का, सो सोभा अति लेत।
लेहेरें आवे मेहेर सागर, खूबी सुख समेत।।१
हुकम मेहेर के हाथमें, जोस मेहेर के अंग।
इसक आवे मेहेर से, बेसक इलम तिन संग।।२
पूरी मेहेर जित हक की, तित और कहा चाहियत।
हक मेहेर तित होत है, जित असल है निसबत।।३
मेहेर होत अव्वल से, इतहीं होत हुकम।
जलुस साथ सब तिनके, कछू कमी न करत खसम।।४
ए खेल हुआ मेहेर वास्ते, माहें खेलाए सब मेहेर।

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