घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।

कोमल चित करी वचन रुदे धरी, जो जो ते सरव संभारी जी।
खरा जीवने वचन कह्या छे, माया जीवने थासे अति भारी जी।।४५

चित्तको कोमल बना कर (विनम्र भावसे) एवं धनीजीके वचनोंको हृदयमें धारण कर इन सब वचनोंको याद रखना. सच्चे जीवोंके लिए ये वचन कहे गए हैं. मायाके जीवोंको तो ये कठिन लगेंगे.
Pay attention to these words with gentleness and keep them in your heart all those who listen to it. These words are spoken for true life(saty jeev). These words are meant for the jeev coming from Paramdham as the jeev of this creation will find it too difficult to understand or too heavy to carry it in their heart.
प्रकरण ३०
एहना पात्र हसे ए जोग, आ लीलानो ते लेसे भोग।
केसरी दूध न रहे रज मात्र, उतम कनक विना जेम पात्र।।१५

रासलीलाके जो अधिकारी (योग्यपात्र) होंगे वे ही इस अखण्ड सुखको ग्रहण कर सकेंगे. जिस प्रकार केसरी सिंहिनीका दूध स्वर्ण पात्रके सिवा अन्य पात्रमें नहीं टिक सकता, उसी प्रकार योग्य पात्र (ब्रह्मसृष्टि) के बिना कोई दूसरा रासके सुखका अनुभव नहीं कर सकता.

हवे सुकजीनां वचन हुं केटलां कहुं, में सार काढवा भागवत ग्रह्युं।
सघलानो सार आ ते रास, जे इन्द्रावती मुख थयो प्रकास।।२१

हे सुन्दरसाथजी ! शुकदेवमुनिके वचनोंके विषयमें मैं कहाँ तक कहूँ. सार बतानेके लिए श्रीमद्बागवत ग्रहण कर रहा हूँ. सबका सार रास ग्रन्थ है जो इन्द्रावतीके मुखसे प्रकाशित हुआ है.
How much can I praise Sukhdev Muni's words. I have accepted the Srimad Bhagavat to reveal the gist of it. The most important extract in Bhagavat is the Raas and that is Indrawati(the celestial soul of Paramdham) is saying it.
Why here it is Indrawati?
Because it is the experience of Indrawati, it is the paratam who witnessed the Raas is speaking now. This is not spoken from the Cosmic Intelligence but the experience of the celestial soul.
These words are from Brahmatma Indrawati of Paramdham revealing the Raas from Shrimad Bhagavad.

हवे रास तणो सार तमने कहुं, ते तां आपणुं तारतम थयुं।
तारतम सार आ छे निरधार, जिहां वसे छे आपणां आधार।।२२

अब मैं रास ग्रन्थका सार तुम सबको कह रही हूँ. वह तो हमारे अखण्ड घरका तारतम है. तारतमका सार निश्चय ही यह है कि जहाँ हमारी आत्माओंके आधार धामधनी निवास करते हैं.
This Raas that Brahm(Supreme) and the souls played in the jogmaya universe. I will reveal the extract of whole Raas and that will become your emancipator of all the ignorance (tartam). The extract of the Tartam is that where resides our Lord(on whom our soul relies upon).
Remember the Lord resides in the heart of the celestial souls along with His abode.

घर श्री धाम अने श्रीक्रस्न, ए फल सार तणो तारतम।
तारतमे अजवालुं अति थाए, आसंका नव रहे मन मांहे।।२३

हमारा घर अखण्ड परमधाम तथा हमारे धनी श्रीकृष्ण यही तारतमका सार फल है. इस तारतम ज्ञाान द्वारा अत्यन्त प्रकाश फैलता
है. जिससे मनमें किसी भी प्रकारकी शंका नहीं रहती है.

Our real home is Paramdham and Shri Krishna, this is the extract of the fruit of Tartam. The light of this Tartam is so much not a doubt should you have in mind. One must believe this without creating confusion and doubts in the mind.

मन जीवने पूछे रही, त्यारे जीव फल देखाडे सही।
ए अजवालुं कीधुं प्रकास, तारतमनां वचन मांहें रास।।२४

यदि मन जीवको शान्त भावसे पूछे तो जीव उसे अखण्ड फल दिखाएगा. इस ज्ञाानका प्रकाश, 'प्रकाश' ग्रन्थमें किया गया है. तारतम ज्ञाानके वचनोंमें रासकी लीलाएँ समायी हुई हैं.

When your mind turns within and seeks the truth from the Jeev(the conscious life force within) then the Jeev can show the fruit that is truth(sahi). (Changelessnes, eternally present are the attributes of truth) . In the words of Tartam(the knowledge that emancipates all the darkness of ignorance) is within the Raas this fact I am bringing into the light. (Within the raas one can find the key to end the ignorance, this fact I have revealed)
Is Indrawati talking about perishable jeev or imperishable jeev from Paramdham?
In prakaran 30 Indrawati has already given why she is refering jeev for vaasana
( कठण वचन हुं तो ज कहुं छुं, नहीं तो केम कहुं वासनाने जीव जी।
रखे दुख देखे वासना ते माटे, ए प्रगट वाणी में कही जी।।४९

हे सुन्दरसाथजी ! ऐसे कठोर वचन आपको तभी कहे जा रहे हैं अन्यथा वासनाओंको जीव कैसे कहा जा सकता है. ब्रह्मवासना दुःख न देखे (दुःखका अनुभव न करे) इसलिए इस प्रकट वाणीका प्रकाश फैला रही हूँ.
The harsh words I have spoken otherwise how can I say the brahmvasana(celestial soul) as worldly jeev! To ensure the celestial soul be saved from the suffering, I have said these words. (Prakash wani is meant for the celestial souls)

प्रकास वाणी तमे जो जो जोपे करी, रखे मूको ते एक वचन जी।
द्रढ थई तमे देजो जीवने, लेजो ते मांहेलुं धन जी।।५०

इस प्रकाश ग्रन्थकी वाणीको तुम सब अच्छी तरहसे देखो. इसके एक वचनकी भी अवहेलना मत करना. दृढ.ता पूर्वक अपने जीवको समझाना और उनके रहस्य (धन) को ग्रहण करना.
Kindly see this Prakash vani carefully, do not discard even one single word(accept all the words as whole truth), with firm determination grant this knowledge to the jeev(life force within) and accept the secret wealth in it within. O celestial souls Prakash wani is meant for you hence do not drop even a single word from Prakash wani.
प्रकरण ३०)
ए अजवालुं जीवने करे, जे जीव घर भणी पगलां भरे।
पोते पोतानी पूरे साख, ए तारतमतणो अजवास।।२५

यह तारतम ज्ञाान जीवके हृदयको प्रकाशित कर भ्रम और अज्ञाानको दूर करता है. इसके कारण यह जीव अपने घर परमधामके मार्ग पर दृढ. विश्वासके साथ अग्रसर होता है. तत्पश्चात् जब आत्मा जागृत होकर स्वयं अपनी साक्षी देने लगे तो समझ लेना कि वही तारतम ज्ञाानका प्रकाश है.
This Tartam gyaan this knowledge will enlighten your Jeev(life force within) and thus this jeev will step steadfastly towards the abode. After that when the soul gets awakened then it will provide the witnesses, understanding, that is due to the light of the tartam gyaan.

ते लई धणी आव्या आंहे, साथ संभारी जुओ जीव मांह।
एणे घरे तेडे आ वल्लभ, बीजाने ए घणुं दुर्लभ।।२६

इस तारतम ज्ञाानको लेकर धामधनी इस संसारमें आए हैं. हे सुन्दरसाथजी! इस तथ्यको याद करके अपनी अन्तरात्मामें देखो. धामधनी हमें इसी घर-परमधाममें बुला रहे हैं. दूसरे जीवोंके लिए इसकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है.
Lord Himself came over here to grant this knowledge (Remember, Lord answered to Devachandraji Maharaj's prayer and gave the Tartam mantra). O my celestial friends go within and seek the truth within the soul. Our beloved Lord is calling us back into Paramdham but not all can attain it.
So the souls those who have come from Paramdham, seek within your soul and witness the above truth. Only those celestial soul who came here to see this world, that jeev can experience it, for other's it is very rare!

बीजा कहुं छुं एटला माट, जे माया भारे करो छो साथ।
तारतम पख बीजो कोय नथी, एक आव्या छो तमे घर थकी।।२7

तुम सब सुन्दरसाथ मायाको अधिक महत्त्व दे बैठे हो. इसलिए मैं तुम्हें अन्य कहती हूँ. यदि तारतमके आधार पर देखें तो सुन्दरसाथ, ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है. मात्र तुम ही परमधामसे आए हो.
I have to say this because you sundarsath has paid too much attention this world of illusion, there is nothing real other than this tartam and the celestial souls. This world of dream will come to end when all the souls get awakened in the Paramdham.

आ माया कीधी ते तम माट, तारतम मांहें पाडी वाट।
एणी वाटे चालीए सही, श्री वालाजीनां चरण ज ग्रही।।२८

तुम्हारे लिए ही इस मायाकी रचना की गई है और तारतम ज्ञाानके द्वारा घर-परमधामका मार्ग प्रशस्त हुआ है. इसलिए हम सब सद्गुरुके चरण ग्रहण कर इसी मार्गसे चलें.
This world of illusion (dream of the Creator Akshar bhagwan) is created for the sport of celestial souls of Paramdham, by the knowledge of Tartam find your way home. Following the road of this Truth we will reach the abode where we will find the feet of Lord to surrender. The celestial soul from Paramdham must follow this path to reach Paramdham!

Here she is talking about the jeev of Paramdham aapno (celestial soul's) and not about perishable. This whole granth is written for imperishable ones coming from Paramdham.

एह चरण छे प्रमाण, इन्द्रावती कहे थाओ जाण।
तमे वचन तणां लेजो अरथ, आपणा जीवनो ए छे ग्रथ।।२९

सद्गुरुके ये चरणकमल हमारे लिए यथार्थ आधार (प्रमाण) हैं. इन्द्रावती कहती है, हे सुन्दरसाथजी ! इस वास्तविकताको समझ लो. तारतमके इन वचनोंके मर्म (अर्थ) ग्रहण करो. यही हमारे जीवके लिए अमूल्य धन है.

Indrawati is showing the feet of the Lord as the proof as she is sitting in the Paramdham, understand this reality. Kindly take the true meaning of these words this is our life's greatest treasure(scriptures).
The Feet of the Lord Shri Krishna is the evidence knowing the reality, Indrawati says to accept these words with true meaning as the treasure of life to the celestial soul from Paramdham!
श्री प्रकास
(गुजराती)
These are the words of Indrawati a celestial soul who is united with the Supreme.
ए वचन पाधरां प्रगट कहे, जाण होय ते जोइने लहे।
पख पचवीस ए उपर जेह, तारतमनां वचन छे तेह।।१२

ये वचन सीधे और स्पष्ट रूपसे कहे गए हैं. जिस किसीको जाननेकी इच्छा हो वह उसका परिचय प्राप्त कर ले. इन तिरासी पक्षोंके ऊपर परमधाम (अखण्ड और अद्वैत भूमिका)के पच्चीस पक्ष हैं, ये तारतमके रहस्यपूर्ण वचन हैं.

एह वचनो मांहें श्री धाम, धणी आपणा ने साथ सर्व स्थान।
ए तारतमतणो अजवास, धणी बेठा मांहें लई साथ।।१३

इन तारतमके वचनोंमें ही परमधाम है और इन्हीं वचनोंके द्वारा धामधनी, सुन्दरसाथ तथा परमात्माकी मूल बैठकका परिचय मिलता है. यह सब तारतमका ही प्रकाश है. इससे निश्चय होता है कि धामधनी सुन्दरसाथको लेकर परमधाम-मूलमिलावेमें बैठे हैं.

हवे कां नव ओलखो रे साथ सुजाण, घणुं तेहने कहिए जे होय अजाण।
वचिखिण छो तमे परवीण, गलजो जेम अगिनसुं मीण।।१४

हे सुज्ञा सुन्दरसाथजी ! अब तुम धामधनीकी पहचान क्यों नहीं करते ? जो अज्ञाानी (अनजान) है उसे वारंवार कहना पड.ता है. किन्तु तुम तो दक्ष और निपुण हो, इसलिए तुम भी अग्निके सम्पर्कसे मोमकी भाँति सद्गुरु धनीके वचनोंसे द्रवित हो जाओ,

सनेहसुं सेवा करजो धणी, गलित चित थई अति घणी।
तमे सेवाए पामसो पार, धणीतणां वचन निरधार।।१५

प्रेममें मग्न होकर (गलित चित्त होकर) स्नेह पूर्वक धामधनीकी सेवा करो. सेवाके द्वारा तुम भवसागर पार कर परमधाम प्राप्त कर सकते हो. ये सद्गुरु धनीके निर्णायक वचन हैं.

पाछला साथे छे ते आवसे केम, ते जोसे रासतणां वचन।
चरणे छे ते तो आव्या सही, पण हवे आवसे वचन प्रकासनां ग्रही।।१६

पीछले सुन्दरसाथ धनीके चरणोंमें कैसे पहुँच पाएँगे ? वे भी रास और प्रकाशके वचनोंको सुनकर पहुँच जाएँगे. इस समय सद्गुरु धनीके चरणोंमें जो सुन्दरसाथ विद्यमान हैं, वे तो पहुँच ही गए हैं. किन्तु जो शेष रह गए हैं, वे प्रकाशके वचनोंको ग्रहण कर आ जाएँगे.

धणीतणां वचन ग्रह्यां मांहें रास, पाछला पार उतारवा साथ।
आवसे साथ एणे प्रकास, अंधकारनो कीधो नास।।१७

पीछे आने वाले सुन्दरसाथको पार उतारनेके लिए मैंने रासमें धामधनीके वचन ग्रहण किए. वे सुन्दरसाथ इन प्रकाशके वचनोंसे परमधामकी ओर आएँगे क्योंकि तारतमके इन वचनों (प्रकाश) ने अज्ञाानान्धकारको नष्ट कर दिया है.

आवसे साथ सकल परवरी, रासतणां वचन चित धरी।
एह वचन हवे केटलां कहुं, आ लीलानो पार नव लहुं।।१८

समस्त सुन्दरसाथ जो देश विदेशमें फैले हैं, वे रासके वचनोंको हृदयमें धारण कर उसी प्रेम मार्गको अपना कर आ पहुँचेंगे. तारतमके इन वचनों (प्रकाश) का महत्त्व कहाँ तक कहूँ ? इस लीलाका कोई पार नहीं है.

ए वचन आहीं छे अपार, पण साथ केटलो करसे विचार।
ते माटे कांई घणुं न कहेवाय, आ तां पूरतणो दरियाय।।१९

तारतम ज्ञाानके ये वचन अपार हैं, किन्तु सुन्दरसाथ इन पर कितना विचार करेंगे? इसलिए ज्यादा नहीं कहा जाता. इन वचनोंका प्रवाह तो समुद्रकी लहरोंकी भाँति मेरे हृदयमें बह रहा है.

एनुं एक वचन विचारसे रही, ते ततखिण घर ओलखसे सही।
घरनी जे होसे वासना, नहीं मूके ते वचन रासना।।२०

जो तारतम वाणीके एक वचन पर भी विचार करेगा, उसे उसी समय मूल घर परमधामकी पहचान हो जाएगी. जो परमधामकी वासना होगी वह रासके इन वचनोंको नहीं छोडे.गी.

खरी वस्त जे थासे सही, ते रहेसे वचन रासना ग्रही।
जेम कह्युं छे करसे तेम, ते लेसे फलतणो तारतम।।२१

जो सच्ची ब्रह्मात्मा होगी, वे रासके वचन अवश्य ग्रहण करेगी और धनीजीने जो कहा है उसी आदेशका पालन करेगी. ऐसी आत्माएँ तारतमका फल (पूर्णब्रह्म
परमात्मा अक्षरातीत श्री कृष्ण एवं परमधाम) प्राप्त करेगी.

इन्द्रावती कहे सुणजो साथ, वचन विचारे थासे प्रकास।
प्रकास करीने लेजो धन, जे में तमने कह्यां वचन।।२२

इन्द्रावती कहती है, हे सुन्दरसाथजी ! तुम सब ध्यान पूर्वक सुनो. तारतमके इन वचनों पर विचार करनेसे अन्तःकरणमें प्रकाश फैलता है. मैंने तुम्हें जो वचन कहे हैं उनसे अन्तरात्माको प्रकाशित कर श्रीकृष्ण और परमधामरूपी अखण्ड धन प्राप्त करो.
प्रकरण ३४

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