आरती यह सतगुरु

आरती
आरती यह सतगुरु पर कीजे ,
सतगुरु स्वरुप आप लखि लीजे ।।१
सोई सतगुरु ब्रजके वासी,
ब्रजबाला संग सदा सुख रासी ।।२
सोई सतगुरु रास बिलासी,
खेलत रास अखंड अविनाशी ।।३
सतगुरु सोई श्री देवचंद्रजी सुहाये,
तेज तारतम आप ले आये ।।४
सोई सतगुरु श्री इन्द्रावती राजे,
निज नवरंग संग आप विराजे ।।६

यह सतगुरु का आरती कीजिये सतगुरु के साक्षात् स्वरुप यह बात लिख लीजिये
येही सतगुरु ब्रज के वासी थे, जिन्होंने ब्रजबाला संग सदा सुख देने वाली लीला रची
येही सतगुरु रास में विलासे और अविनाशी और अखंड रास (निरंतर चलने वाला रास) खेला,
येही सतगुरु श्री देवचंद्रजी शोभा दे रहें हैं, और जागनी रास में तारतम परमधाम से ले कर आये.
येही सतगुरु इन्द्रावती पर राज किये (एकाकार हुए) और नवरंग के आत्मा के संग विराजे (इन्द्रावती और सुन्दरबाई सतगुरु दोनों नवरंग स्वामी के आत्मा के संग विराजे)!

निजनान्दम नमस्क्रत्येम प्राणनाथ गुरु तथा प्रभु पूजा बिधा नैबे येथा पूर्वं प्रकाशते श्री कृष्णा किशोर ब्रज वल्लभा युगल स्वोरुपा अनूप बिघ्न हराना मंगल करना बन्दे प्रेम स्वरुप तन मन धन अर्पण कियो सब तुमपे ब्रजराज मनभावे सोही करो हाथ तुम्हारे लाज
जियावर श्री कृष्ण की जय