Seva Pooja

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Morning Pooja (pratah kaleen)

आओजी बाला આઓજી બાલા

Here our dear Indravati sakhi is grieving the separation with the beloved Lord.
She is expressing the yearning to unite back with the Lord after awakening of the soul. If we could sing in our heart with the same longing and the same pain that our sakhi Indrawati suffers, how can beloved Lord not grace us with His presence?

आओजी बाला આઓજી બાલા
आओजी बाला मारे घेर आओजी , आओजी श्यामा मारे घेर आओजी ।
एकलडी परदेशमां मुने, मूकीने कां चाल्या ॥१

हे प्रियतम धनी ! मेरे हृदयरूपी घरमें आप पधारें. इस संसाररूपी परदेसमें मुझे अकेली छोड.कर आप कहाँ चले गए हैं ?

मुने हुति नींदलडी, तमे सुती मूकीने कां राते ।
जागीने जोऊ तां पियुजी ना पासे, पछीतो थासे प्रभाते ॥२

मैं तो अज्ञाानकी निद्रामें सो रही थी. आप अज्ञाानरूपी रात्रिमें मुझे अकेली सोई हुई छोड.कर कहाँ चले गए ? (अज्ञाानरूपी निद्रासे) जागृत होकर देखा तो प्रियतम धनी पास ही नहीं हैं. पीछे तो ज्ञाानका प्रभात हो जाएगा.

कलकलीने कहुं छुं तमने, आओजो आणे क्षणे ।
मारा मनना मनोरथ पूरन करजो, इन्द्रावती लागी चरणे ॥ ३

हे धनी ! मैं व्याकुल होकर आपसे विनयपूर्वक प्रार्थना करती हूँ कि कृपया आप इसी क्षण मेरे हृदय मन्दिरमें पधारें. मेरे मनके सभी मनोरथ पूर्ण करें, इन्द्रावती आपके श्री चरणोंमें सर्मिपत होती है.

આઓજી બાલા મારે ઘેર આઓજી , આઓજી શ્યામા મારે ઘેર આઓજી |
એકલડી પરદેશમાં મુને, મૂકીને કાં ચાલ્યા ||૧

મુને હુતિ નીંદલડી, તમે સુતી મૂકીને કાં રાતે |
જાગીને જોઊ તાં પિયુજી ના પાસે, પછીતો થાસે પ્રભાતે ||૨

કલકલીને કહું છું તમને, આઓજો આણે ક્ષણે |
મારા મનના મનોરથ પૂરન કરજો, ઇન્દ્રાવતી લાગી ચરણે || ૩

O my dear Lord do visit my home, O Shyama do visit my home!
Where hast Thou gone my Lord, leaving me alone in this foreign land!
I was fast asleep; where did You go leaving me alone in the dark of the night?
How I lamented your absence when I woke up in the morning and did not find you by my side. Later, it will be morning.
I beg Thee pray come back to me this very moment.
And drench my soul with Thy Infinite Love, Indravati says falling at your feet.

I was fast asleep means I got unconscious was unaware of the self... do not know who I am (the outer body is not real but appears so), where is my abode, what am I saying, thinking and actually doing!
The unconscious being does not know and loses the presence of the Lord within. When the soul awakens and realizes the whole affair and repents. And thus begs with Lord to reside in her heart and unite with her. There is a promise over here that later whole universe will be awakened!

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प्रात कालीन सेवा पूजा

हे धामाधनी मेरो घरमा आउनुहोस्,एकादेशमा मलाई एक्लै छोडेर हजुर कहाँ जानु भो
यो सन्सारको अग्यानरुपी रात्री (निन्द्रा)मा छोडेर कहाँ जानु भयो,
म बिहानै जागेर आए तर हजुरलाई त्यहाँ पाइन.
अहिले चाडै आउनु होस् पछि त म हजुरलाई पाइहल्छु नि, हजुरले मलाई यो दु:खदायी सन्सारमा एक्लै छोडेर नजानुहोस आउनुहोस भन्दै घुक्क घुक्क गर्दै रुदै आवाहन गर्नुहुन्छ।
हजुर आउनुहोस् मेरो मनको मनोरथ पूर्ण गरिदिनुहोस् भन्दै स्वामीजि(ईन्द्रiवती सखि)धामधनीको चरणमा प्रणाम गर्नुहुन्छ ।
प्रणाम !!!!!!

लवंग दातून લવંગ દાતૂન

लवंग दातून

रैनिको उनीदी श्यामा पीउ पासे आइयाँ, प्रीतम पासे आइयाँ ।
नैन अरुण सोहें राते रंग भीने, पीउ प्यारी मंद मंद मुस्काइयाँ ॥१

अतलस गेंदुवा सेत निहाली, जाडो लगे पिया शाल ओढाइयाँ ।
लटपटी पाग छुटे बन्ध सोहे, रंग सेज्या दूओ लाल सोहाइयाँ॥२

अंगसों अंग जोडे दोऊ मन भनिन्यान, अरस परस कर कन्ठ लपटाइयाँ ।
महारंग रस भीने रसिक जुगल पिय, निरखि निरखि सखियां सुख पाइयाँ ॥३

चन्दन कि चौकी डरौं बैठो प्यारे अंगना, लवन्ग की दातून जल भरी ल्याइयाँ।
श्री इन्द्रावती पति रूप जुगल धनी, निज नवरंग निरखि बलि जाइयाँ ॥४

Mouth washing
At the dawn of awakening of the intelligence, Shyama (bliss essence) came near to her beloved the Supreme Lord. This is the moment when Shri Rajji revealed Himself to Dhani Devachandraji.
Because of lack of sleep (in the night of ignorance, Dhani Devachandraji continuosly searched for his beloved)there is redness in the eye but the dear one to the beloved (Shyama piyu pyaari) is smiling softly.
All the necessary items for sleeping the bedsheet, white mattress, soft pillow, are provided and also if Lord feels cold there is a shawl. The turban that Shri Rajji is wearing , some knots have come off and in the red bed both Rajji and Shyamaji are enthroned (All the arrangement to invite Lord is already brought by Shyamaji now souls need to bind Rajji's turban all must come together and bind themselves to Him and enjoy the union with Rajji and Shyamaji in the red bed of their heart!
O souls, Shri Rajji keeps you on His turban! See how much He loves you!
The soul meet with the soul and both look very attractive, and they are tightly coupled and united together. Shyamaji and Rajji's soul have united. Very necterous beloved couple (filled with love) fills soul with great colorful nectar(love) seeing this sight, all soul experience bliss.
I will put choky (the stool) made of chandan the sandal wood so all the celestial souls can sit and I will bring the clove as toothbrush and water to wash the mouth. The darkness(lack of consciousness and the intelligence) has ended, it is morning, I must gather all sundarsath and bring them closer to Shri RajShyama and give them purifying agents to wash off all the impurities of ignorance and unconsciousness by the knowledge the clove and love the water and thus preparing the sundarsath to unite with RajShyamaji. The master of Indrawati the duo couple, seeing them again and again the soul Navrang surrenders herself.
रात्री के समाप्त होते सुभह श्यामा पियु के पास आ गयी अपने प्रियतम के पास आ गयी
भावार्थ: मोह की रात्री समाप्त होते ही देवचन्द्रजी की आत्म जागृति की सुबह हुइ तब, श्यामा अपने पियु धाम धनी श्री राजजी के पास पहूंच जाती है जो उसके प्रितम हैं.
नैनों में लालिमा है रातों की भिनी भिनी सुगन्ध लिये,अब पिया की प्यारी मन्द मन्द मुस्कुरा रहि है
श्यामा अपने धनि को मोह की रात्री में ढुंढती रहि, सोइ नहि, प्रियतम से मिलने क परम सुख अभास कर रही है
धामधनी की नरम तकिये चादर, सफेद गद्दा,ठंडि लग्ने पर ओढने को शाल रख दिया है
भावार्थ: धामधनी की नरम तकिये नरम हृदय,ज्ञान की चादर, सफेद गद्दा- स्वच्छ, निश्छल मन और ठंडि लग्ने पर ओढने को प्रेम की शाल रख दिया है.
धामधनी को हृदयधाम में विश्राम कि सभी वस्तु श्यामा महारानी ने उपलब्ध कर दिये हैं
श्री राजजी की पगडि का एक बन्ध छुटा हुआ है,लाल रंग के पलंग पर दोनो शोभा दे रहेन हैं
भावार्थ: सभी बन्ध कसा हुआ नहि है, ब्रह्मत्मायें छुटे हुये हैं, कुछ कमी है. लाल रंग के पलंग ब्रह्मात्माओं क हृदय है जहान पर श्री राजजी और श्यामाजी दोनो शोभा दे रहेन हैं. ब्रह्मातमायें मोह कि निन्द्रा में सोये हैं, पर वे सभी श्यामा के अंग हैं, इस प्रकार से धामधनी उनके भितर प्रवेश कर चुके हैं. (और सोये हुये सुन्दरसाथ जी देखिये, धामधनी के पगडि पर आप लोगों की शोभा रखी गयी है! )
महरंग रस से भरे रसिक जुगल जोडी पिया को देख कर सखीयों को आनन्द प्राप्त होता है

आत्मा से आत्मा जुड गये हैं येह दृश्य मन को बहूत प्रफ़ुलित करत हैं, दोनो अरस परस कन्ठ से कन्ठ लिपटे हुये है
भावार्थ: श्यामा आत्मा (देवचन्द्रजी की परातम) और परमधाम में श्री राजजी के अंग (आत्म स्वरूप) का मिलन होते देख कर ब्रह्मात्मायों का मन प्रफ़ुल्लित होता है,दोनो एकाकार हो जाते हैं ऐसे में श्यामा और धामधनी को अलग नहिं किया जा सकता.
चन्दन की चौकी डालती हूं प्यारी ब्रह्मात्मायों के बैठने के लिये, लवन्ग की दातुन और जल भर के भी लाउंगी
भावार्थ ब्रह्म ज्ञान के प्रभात में ब्रह्मत्मा को ढुंडके श्री राजश्यामाजी के पास लाने क काम करती हूं.
ज्ञान की सुगन्धित लवन्ग और प्रेम की पानी सभी सुन्दरसाथ को दूंगी.
निज नवरंग (नवरंग आत्म) श्री इन्द्रावति के पति रूप जुगल जोडी को देख देख कर समर्पित होती है.

લવંગ દાતૂન

રૈનિકો ઉનીદી શ્યામા પીઉ પાસે આઇયાઁ, પ્રીતમ પાસે આઇયાઁ |
નૈન અરુણ સોહેં રાતે રંગ ભીને, પીઉ પ્યારી મંદ મંદ મુસ્કાઇયાઁ ||૧

અતલસ ગેંદુવા સેત નિહાલી, જાડો લગે પિયા શાલ ઓઢાઇયાઁ |
લટપટી પાગ છુટે બન્ધ સોહે, રંગ સેજ્યા દૂઓ લાલ સોહાઇયાઁ||૨

અંગસોં અંગ જોડે દોઊ મન ભનિન્યાન, અરસ પરસ કર કન્ઠ લપટાઇયાઁ |
મહારંગ રસ ભીને રસિક જુગલ પિય, નિરખિ નિરખિ સખિયાં સુખ પાઇયાઁ ||૩

ચન્દન કિ ચૌકી ડરૌં બૈઠો પ્યારે અંગના, લવન્ગ કી દાતૂન જલ ભરી લ્યાઇયાઁ|
શ્રી ઇન્દ્રાવતી પતિ રૂપ જુગલ ધની, નિજ નવરંગ નિરખિ બલિ જાઇયાઁ ||૪

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uthapan

बिहान मिर्मिरे उज्यालो भैसकेपछि श्यामाजी महारानी श्री राज्जीको छेउमा आउनु भयो।
राज्जी महाराजको रगमग आँखाले श्यामाजी महारानीलाई देखेर मन्द मन्द मुकाउनु भयो.
राज्जी महाराजको शेज्यामा नरम नरम सिराने,तन्ना ,सेतो डसना (गद्दा) अनि जाडो हुँदा ओड्ने च्यादर पनि राखिएको छ।
राज्जी महाराजले बेलुका लगाएको पगरी हल्का खुलेको थियो तर पनि राज्जी महाराजको साथमा श्यामाजी महारानी सुख सेज्यामा सुन्दर शोभायमान भैरहनु भएको
छ।
राज्जी महाराज श्यामाजी महारानीको छेउमा आएर बस्नु भयो अनि वहा हरुको दर्शन गर्दा मनमा आनन्द आयो।
राज्जी अनि श्यामाजी महारानी अङ्कमाल गरेर बस्नु भएको अत्यन्त शोभायमान आनन्दमयी स्वरुपलाइ देखेर सखीहरुले सुख अनि आनन्द लिन्छन।

हे धामाधनी चन्दन चौकीमा आएर वीराजमान हुनुहोस ,दत्तिवन गर्नको लागी ल्वाङ अनि जल ल्याएको छ।
श्री इन्द्रावतीका पति श्री राज्जी महाराज र श्यमाजी महारानीको स्वरुपलाई देखेर नवरङ्ग स्वामी समर्पित हुनुहुन्छ।
प्रणाम!!!

दांहिनी तरफ

इत चार घडी लों बैठें, मेवा मिठाई आरोग के उठें ।
दांहिनी तरफ दूजा जो मंदर, आए बैठें ताके अंदर ।।९२
श्रीराजजी यहाँ पर चार घड.ीके लिए बैठते हैं और मेवा, मिठाई आदिका रसास्वादन कर यहाँसे उठते हैं. इसके पश्चात् दायीं ओर दूसरे मन्दिरके अन्दर जाकर विराजमान होते हैं.

नीला ने पीला रंग, ताकी उठत कै तरंग।
दोऊ रंगों की उठत झांइंर्, इन मंदिरों दिवालों के ताइंर् ।।९३

इस मन्दिरमें (दोनों ओरके मन्दिरकी) नीले तथा पीले रङ्गकी आभा पड.ती है. उसकी किरणें भी तरङ्गोंकी भाँति उठतीं हैं. इन दोनों रङ्गोंकी किरणोंसे मन्दिरकी दीवार झिलमिलाती है.

पैठते दाहिने हाथ जो जांहीं, सेज्या है या मंदिर माहीं ।
कै जिनस जडाव सिंघासन, राजस्यामाजी के दोऊ आसन ।।९४

इस मन्दिरमें प्रवेश करने पर दायीं ओरके (पीले) मन्दिरमें श्रीराजश्यामाजीके लिए सुखशय्या सुशोभित है. सामने विभिन्न रत्नोंसे
जड.ायमान सिंहासन है. उस पर श्रीराजजी तथा श्यामाजीके लिए दो आसन बिछे हुए हैं.

झरोखे को पीठ देवें, बैठे द्वार सनमुख लेवें।
संग सखियां केतीक विराजें, या समें श्री मंडल बाजे ।।९५

यहाँ पर झरोखेको पीठ देकर तथा मन्दिरके द्वारके सम्मुख होकर श्रीराजजी एवं श्यामाजी सिंहासन पर विराजमान होते हैं. कतिपय सखियाँ चारों ओर बैठ जातीं हैं. इस समय श्रीमण्डल नामक वाद्ययन्त्रकी मधुर ध्वनि निकलती है.

नव रंग बाई जो बजावें, मुख बानी रसीली गावें ।
इत बाजत वेन रसाल, वेन बाई गावें गुन लाल ।। ९६

नवरङ्गबाई श्रीमण्डल वाद्यको बजाती हुई मधुर स्वर निकालकर गायन करती है. यहाँ पर मधुर स्वरमें वंशी भी बजती है. वेनबाई वंशी बजाकर श्रीराजजीका गुणगान करती है.

सखी एक निकसें एक पैठें, एक आवें उठें एक बैठें ।
इन समे भगवानजी इत, दरसन को आवें नित ।। ९7

इस समय कोई सखी यहाँ पर प्रवेश करती है तो कोई यहाँसे बाहर निकलती है. इस प्रकार कोई सखी आकर बैठती है तो कोई यहाँसे उठकर चली जाती है. इसी समय अक्षरब्रह्म श्रीराजजीके दर्शनके लिए नित्य आते हैं.

झरोखे सामी नजर करें, परनाम करके पीछे फिरें ।
इत और न दूजा कोए, स्वरूप एक है लीला दोए ।। ९८

जैसे श्रीराजजी झरोखेकी ओर दृष्टि डालते हैं उस समय अक्षरब्रह्म उनको प्रणाम कर लौट जाते हैं. वस्तुतः ये अक्षरब्रह्म कोई अन्य नहीं हैं, स्वयं श्रीराजजीके ही स्वरूप हैं. मात्र इनकी लीला ही अन्य प्रकारकी होती है.

भगवानजी खेलत बाल चरित्र, आप अपनी इच्छा सों प्रकृत ।
कोट ब्रह्मांड नजरों में आवें, खिन में देखके पलमें उडावें ।। ९९

अक्षरब्रह्म बाल लीला करते हैं. वे अपनी प्रकृतिके अनुसार क्षण मात्रमें करोड.ों ब्रह्माण्डोंकी रचना करते हैं तथा दूसरे ही क्षण उन्हें उड.ा भी देते हैं.

और ए तो लीला किसोर, सैयां सुख लेवें अति जोर ।
ए लीला सुख केता कहूं, याको पार परमान न लहूं ।।१००

इधर श्रीराजजीकी किशोर लीला है. सभी सखियाँ इस लीलासे अपार आनन्दका अनुभव करतीं हैं. इस लीलाके आनन्दकी बात कहाँ तक करें, इसका कोई पारावार ही नहीं है.

सखियां केतीक बन में जावें, साक पान मेवा सब ल्यावें ।
घडी चार खेल तित करें, दिन पोहोर चढते आवें घरें ।।१०१

कतिपय सखियाँ वनमें जातीं हैं और वहाँसे शाक, पान, मेवा आदि ले कर आतीं हैं. वे वनमें चार घड.ी तक लीलाएँ कर एक प्रहर दिन व्यतीत होने पर रङ्गमहलमें लौट आतीं हैं.

ए सब इच्छासों मंगावें, पर सखियों को सेवा भावे ।
सैयां सेवा करन बेल ल्यावें, लेवें एक दूजी पें छिनावें ।।१०२

धामधनीकी इच्छा मात्रसे सभी वस्तुएँ स्वतः आ जातीं हैं किन्तु सखियोंको धनीजीकी सेवा करनेकी इच्छा होती है. इस प्रकार सखियाँ सेवा करनेके लिए सामग्रियाँ लातीं हैं साथ ही एक दूसरीसे छिनतीं हुई आगे चलतीं हैं.

कै चाकले चित्रकारी, ता पर बैठे श्रीजुगलबिहारी ।
दोऊ स्वरूप चित में लीजे, फेर फेर आतम को दीजे ।।१7५
आसनों (चाकलों) में भी विभिन्न प्रकारकी चित्रकारी है, उनमें श्रीराजश्यामाजी विराजमान होते हैं. इन दोनों युगलस्वरूपको हृदयमें धारण कर आत्मा वारंवार अखण्ड सुखका अनुभव करती है.
आतमसों न्यारे न कीजे, आतम बिन काहूं न कहीजे ।
फेर फेर कीजे दरसन, आतमसे न्यारे न कीजे अधखिन ।।१7६
इन युगलस्वरूपको क्षणमात्रके लिए भी अपनी आत्मासे दूर न होने दें. इनके विषयमें अपने आत्माके अतिरिक्त अन्य किसीसे कहें भी नहीं. बार-बार इनके दर्शन करते हुए इनको आधे क्षणके लिए भी आत्मासे दूर न होने दें.
पेहेलें अंगुरी नख चरन, मस्तकलों कीजे वरनन ।
सब अंग वस्तर भूखन, सोभा जाने आतम की लगन ।।१77
सर्वप्रथम इनके चरणोंकी उङ्गलियोंसे मस्तककी शोभाका वर्णन करते हैं. सभी अङ्गों पर वस्त्र एवं आभूषण सुसज्जित हैं. यह शोभा आत्मिक भावनासे ही अनुभव की जा सकती है.

इत खेलत जुथ सैयन, सदा आनंद इन वतन।
मिनें राज स्यामाजी दोए, सुख याही आतम सब कोए ।।३०

यहाँ पर सखियाँ समूहमें खेलतीं हैं. सभी आत्माओंके सुख सागर स्वरूप श्रीराज श्यामाजी उनके मध्यमें क्रीड.ा करते हैं. इस प्रकार परमधाममें सदा आनन्द छाया रहता है.

प्रकरण ३ parikrama

प्रभाती પ્રભાતી

प्रभाती

प्रातः समिरूँ अक्षरातीत , श्याम श्यामाजी साथ रे ॥
प्रथम पाट सातों घाट, दौ पुल रेति पाल रे ।
सोर तेर झुंड नव देहुरियाँ, टापू निज ताल रे ।१

चौबीस हाँस जवेरोंकी नेहेरें, मानिक मोहोल अपार रे ।
बन मोहोल नेहेरोंके आगे , हार हवेली चार रे ।२

गिरद रांग आठों सागर, पशु पंखी कै जात रे ।
अन्न-वन मेवा फूल नूर बाग, चेहेबच्चे कै भांत रे ।३

लाल चबूतरा खडोकली ताडवन, पुखराजी आकासी रे ।
हजार गुर्ज चाँदनी सोहें, खेलत वाके वासी रे ॥४

पुखराजी ताल चार घडनाले, गिरत सोले चादरें खासी रे ।
अधबीच बंगला मूल कुंड सोहे, ढपी खुली जमुना जासी रे ॥५

बट केल दोऊ पुल अरस परस, शोभित सातों घाट रे ।
बीच पाट चान्दनी सोहे, बारह थम्भ झलकात रे ॥६

चान्दनी चौक में हरे लाल दरखत , सौ सीढी ऊपर द्वार रे ।
छ: छ: हजार मन्दिर दौ हारें, अंदर हार हवेली चार रे ॥७

गोल हवेली चौंसठ थम्भ, विध विध रंग अपार रे ॥
तले गिलम ऊपर चन्द्रवा, शोभा चारों द्वार रे ॥८

बारह हजार खिलवत बैठीं, संग धनीजीके पास रे ।
जुगल स्वरूप चरनकी आस, राखत दयादास रे ॥ ९

પ્રભાતી

પ્રાતઃ સમિરૂઁ અક્ષરાતીત , શ્યામ શ્યામાજી સાથ રે ||
પ્રથમ પાટ સાતોં ઘાટ, દૌ પુલ રેતિ પાલ રે |
સોર તેર ઝુંડ નવ દેહુરિયાઁ, ટાપૂ નિજ તાલ રે |૧

ચૌબીસ હાઁસ જવેરોંકી નેહેરેં, માનિક મોહોલ અપાર રે |
બન મોહોલ નેહેરોંકે આગે , હાર હવેલી ચાર રે |૨

ગિરદ રાંગ આઠોં સાગર, પશુ પંખી કૈ જાત રે |
અન્ન-વન મેવા ફૂલ નૂર બાગ, ચેહેબચ્ચે કૈ ભાંત રે |૩

લાલ ચબૂતરા ખડોકલી તાડવન, પુખરાજી આકાસી રે |
હજાર ગુર્જ ચાઁદની સોહેં, ખેલત વાકે વાસી રે ||૪

પુખરાજી તાલ ચાર ઘડનાલે, ગિરત સોલે ચાદરેં ખાસી રે |
અધબીચ બંગલા મૂલ કુંડ સોહે, ઢપી ખુલી જમુના જાસી રે ||૫

બટ કેલ દોઊ પુલ અરસ પરસ, શોભિત સાતોં ઘાટ રે |
બીચ પાટ ચાન્દની સોહે, બારહ થમ્ભ ઝલકાત રે ||૬

ચાન્દની ચૌક મેં હરે લાલ દરખત , સૌ સીઢી ઊપર દ્વાર રે |
છ: છ: હજાર મન્દિર દૌ હારેં, અંદર હાર હવેલી ચાર રે ||૭

ગોલ હવેલી ચૌંસઠ થમ્ભ, વિધ વિધ રંગ અપાર રે ||
તલે ગિલમ ઊપર ચન્દ્રવા, શોભા ચારોં દ્વાર રે ||૮

બારહ હજાર ખિલવત બૈઠીં, સંગ ધનીજીકે પાસ રે |
જુગલ સ્વરૂપ ચરનકી આસ, રાખત દયાદાસ રે || ૯

प्रभाती
प्रात भयो तुम जागो साथजी, धनी बोलावन आय ॥टेक
रास किताब रसकी प्याला, रेहेस रंग खेलाय।
प्रकाश किताब प्रकाश कियो दिल, आतम फ़जर करय॥१
बार मास षट स्वाद विचारो, तापर कलश धराय ।
सनन्ध किताब कुरानकी बानी, श्रुति साख पुराय ॥२
शास्त्र पुराण किरंतन बानी, वेद की साख दिवाय॥
खुलासा किताब खुले निज आतम, वेद कतेब लखाय॥३
किताब खिलवत गैवकी बानी, इसक रब्द कराय।
परिक्रमा किताब पख पच्चीस की, सूरत ध्यान लगाय ॥४
आठ सागर आठ पोहोर की, स्वरूप ध्यान दृढाय ।
सिनगार किताब सिनगारकी शोभ, जुगल स्वरूप सुख्दाई ॥५
सिंधि किताब विरहनी विरह किन्हों, आसक मासूक झगराय ।
मारफ़त सागर ऊगे निज वतनी, आतम जीव जगाय ॥६
क्यामतनामा क्यामत कियो दिल, गिनती शरत मिलाय।
पाए पदारथ खुले निज दृष्ट, भई दया सदगुरु चरणकी।
कर मेहर धनी मुझ ऊपर, आतम रोग मिटाय ॥७

प्रातः सुमेरूँ પ્રાતઃ સુમેરૂઁ

प्रातः सुमेरूँ अक्षरातीत , श्याम श्यामाजी साथ रे ॥
प्रथम पाट सातों घाट, दौ पुल रेति पाल रे ।
सोर तेर झुंड नव देहुरियाँ, टापू निज ताल रे ।१

चौबीस हाँस जवेरोंकी नेहेरें, मानिक मोहोल अपार रे ।
बन मोहोल नेहेरोंके आगे , हार हवेली चार रे ।२

गिरद रांग आठों सागर, पशु पंखी कै जात रे ।
अन्न-वन मेवा फूल नूर बाग, चेहेबच्चे कै भांत रे ।३

लाल चबूतरा खडोकली ताडवन, पुखराजी आकासी रे ।
हजार गुर्ज चाँदनी सोहें, खेलत वाके वासी रे ॥४

पुखराजी ताल चार घडनाले, गिरत सोले चादरें खासी रे ।
अधबीच बंगला मूल कुंड सोहे, ढपी खुली जमुना जासी रे ॥५

बट केल दोऊ पुल अरस परस, शोभित सातों घाट रे ।
बीच पाट चन्दनी सोहे, बरह थम्भ झलकात रे ॥६

चान्दनी चौक में हरे लाल दरखत , सौ सीढी ऊपर द्वार रे ।
छ: छ: हजार मन्दिर दौ हारें, अंदर हार हवेली चार रे ॥७

गोल हवेलि चौसटः थम्भ, विध विध रन्ग अपार रे ॥
तले गिलम ऊपर चन्द्रवा, शोभा चारों द्वार रे ॥८

बारह हजार खिलवत बैठीं, संग धनीजीके पास रे ।
जुगल स्वरूप चरनकी आस, राखत दयादास रे ॥ ९

પ્રાતઃ સુમેરૂઁ અક્ષરાતીત , શ્યામ શ્યામાજી સાથ રે ||
પ્રથમ પાટ સાતોં ઘાટ, દૌ પુલ રેતિ પાલ રે |
સોર તેર ઝુંડ નવ દેહુરિયાઁ, ટાપૂ નિજ તાલ રે |૧

ચૌબીસ હાઁસ જવેરોંકી નેહેરેં, માનિક મોહોલ અપાર રે |
બન મોહોલ નેહેરોંકે આગે , હાર હવેલી ચાર રે |૨

ગિરદ રાંગ આઠોં સાગર, પશુ પંખી કૈ જાત રે |
અન્ન-વન મેવા ફૂલ નૂર બાગ, ચેહેબચ્ચે કૈ ભાંત રે |૩

લાલ ચબૂતરા ખડોકલી તાડવન, પુખરાજી આકાસી રે |
હજાર ગુર્જ ચાઁદની સોહેં, ખેલત વાકે વાસી રે ||૪

પુખરાજી તાલ ચાર ઘડનાલે, ગિરત સોલે ચાદરેં ખાસી રે |
અધબીચ બંગલા મૂલ કુંડ સોહે, ઢપી ખુલી જમુના જાસી રે ||૫

બટ કેલ દોઊ પુલ અરસ પરસ, શોભિત સાતોં ઘાટ રે |
બીચ પાટ ચન્દની સોહે, બરહ થમ્ભ ઝલકાત રે ||૬

ચાન્દની ચૌક મેં હરે લાલ દરખત , સૌ સીઢી ઊપર દ્વાર રે |
છ: છ: હજાર મન્દિર દૌ હારેં, અંદર હાર હવેલી ચાર રે ||૭

ગોલ હવેલિ ચૌસટઃ થમ્ભ, વિધ વિધ રન્ગ અપાર રે ||
તલે ગિલમ ઊપર ચન્દ્રવા, શોભા ચારોં દ્વાર રે ||૮

બારહ હજાર ખિલવત બૈઠીં, સંગ ધનીજીકે પાસ રે |
જુગલ સ્વરૂપ ચરનકી આસ, રાખત દયાદાસ રે || ૯

आरती આરતી

आरती

सुख को निधान जये जये मन्गल आरती सुखको निधान
ऊठी बैठे सुख सेज्या श्री राज, सन्ग अर्धान्ग अलि लिये लाज ॥१॥
ऐनि जगे रगमग दौ नैना, बोलत बोल मधुरि मुख बैन,
निरखी निरखी हरखे ब्रह्म सृष्टि, जुगल पियजीसों जोडे दौ दृष्टि ॥२॥
ऊठी बैठे दौ सेज्या सुखदाई, आरति साजि श्री इन्द्रावती ल्यायि
आरती वारती सखियाँ सर्वांग, लेत वारणे निज नवरंग ॥३॥

આરતી

સુખ કો નિધાન જયે જયે મન્ગલ આરતી સુખકો નિધાન
ઊઠી બૈઠે સુખ સેજ્યા શ્રી રાજ, સન્ગ અર્ધાન્ગ અલિ લિયે લાજ ||૧||
ઐનિ જગે રગમગ દૌ નૈના, બોલત બોલ મધુરિ મુખ બૈન,
નિરખી નિરખી હરખે બ્રહ્મ સૃષ્ટિ, જુગલ પિયજીસોં જોડે દૌ દૃષ્ટિ ||૨||
ઊઠી બૈઠે દૌ સેજ્યા સુખદાઈ, આરતિ સાજિ શ્રી ઇન્દ્રાવતી લ્યાયિ
આરતી વારતી સખિયાઁ સર્વાંગ, લેત વારણે નિજ નવરંગ ||૩||

tan deepak man jyoti karoon, premghrit lau laaye |
shobha lakhi Shri Raajki, aarati karoon chitta laaye||
The body as the holder, mind (man) the flame, the wick in the ghee of love, such splendor of our Master Shri Raaj is mentioned, I perform the aarati with my full attention (chita)!

Aarti is derived from the word aarta (internal task which brings fatigue) .

'Aarti utarna and baatna' means lessen the task and share it with all others. We as the soul are vowing to share the responsibility of Supreme to offer Master some relief. The aarti is an offering of the self to Prannath seeking to trust us. Its a request to allow us to help with all our life source Pran and soul. We will perform with our body that is container, mind that is the flame and we will do with the nectar of love that is fuel and further illuminating the name of the Supreme we will perform the task from the bottom of our heart out of free will, devotion and with full attention. All the soul (vaarna )sharing the aarti are accepting to carry God's task further through them.

sukh ko nidhan , jaye jaye mangal aarti sukh ko nidhan

uthi baithe sejya Shri Raaj sang ardhang ali liye laaj ||1||

Nidhan means treasure, resort sukh means happiness, bliss

This is a treasure of bliss, hail the auspicious 'aarti' which is resort of joy.

O Sakhi, our beloved Lord has rose from the blissful bed (heart) and has taken the seat along with Shyama his consort (half part of Himself) (Shyam Shyama are ready to perform their duty)1

raini jage ragmag dau naina, bolat bol madhuri mukh bain,

nirakhee nirakhee harakhe brahmshristi, jugal piyason jode dau dristi ||2||

After awakening from the night both eyes are still red (hence we must give them some relief) and He is speaking from sweet mouth by the movement of his tongue (The words(bani) which are soft and sweet like honey is flowing out ). Brahmshristi are feeling so happy to see this sight and they all are uniting with the beloved. (They are ready to face eye to eye with the Supreme!) Brahmshristis are delighted by this sight and they seek to see again and again and thus they unite with beloved facing eye to eye. 2

uthi baithe dou sejya sukhdayee, aarati saaji Shri Indrawati lyaayee,

aarati vaarati sakhiyan sarvang, let vaarne nij navrang ||3||

Both Shyam and Shyama are out from the bed and have taken seat (all set to perform their duty of waking up sundarsath), Indrawati has prepared the aarti and have come forward to perform it.All the souls are (vaarti) accepting the aarti surrendering totally (sarv anga all organs of the soul). The self of Navrang bai is also accepting the same aarti.3

ang= soul and deh =body

Indrawati soul has prepared herself to surrender to the Supreme to perform His task and all other souls join her and the self(Nij) of Navrang bai also whole heartedly joins in.

The souls of Paramdham are promising Lord that we will relieve the Lord in the task of awakening the celestial souls. Also each awakened soul further illuminating the name of Supreme, Carrying the task of Supreme and performing it is the ultimate treasure of the soul. This is our morning aarti.

भोग ભોગ

भोग
तीजी भोमकी जो पडसाल, ठौर बडे दरवाजे विशाल ।
धनि आवत हैं ऊठी प्रात, वन सींचत अमृत अघात ॥ १

पशु पक्षियों के मुजरा लेवें, सुख नजर सबों को देवें ।
पीछे बैठि करें सिन्गार, सखियाँ करावें मनुहार ॥

श्री श्यामाजी मंदिर और , रंग आस्मानी है ठौर ॥
चार चार सखियाँ सिनगार करावें, श्री श्यामाजी धनीजी के पासे आवें ॥ ३

शोभा क्यों कर कहुँ या मुख, चित्त्में लिये होत है सुख ।
चित दे दे समरत सेंथी, हेत कर कर बेनी गुँथी॥ ४

मिनोमिने सिन्गार करावें, एक दूजीको भूषण पहिरावें ॥
साथ सिन्गार करके आवें, जैस धनीजीके मन भावे॥५

सैयाँ लटकतियाँ करें चाल, ज्यों धनी मन होत रसाल ।
सैयाँ आवत बोले वाणी, संग एक दूजी पै स्यानी॥६

सैयाँ आवत करें झनकार, पाँव भूषण भोम ठमकार ॥
झलकतियाँ रे मलपतियाँ, रंग रसमें चैन करतियाँ॥७

कंठ कंठमें बाहों धरतियाँ, चित्त एक दूजीको हरतियाँ ।
सुंदरीयाँ रे शोभतीयाँ, एक दूजिको हाँस हँसतियाँ ॥८

कै फलंग दे उछलतियाँ, कै फूल लता ज्यों फिरतियाँ ।
कै हलके हलके हालतियाँ, कै मालतियाँ मचक्तियाँ ॥९

कै आवत हैं ठेलतियाँ, जुत्थ जल लेहेरां लेवतियाँ ॥
कै आवें भमरी फिरतियाँ, एक दूजी पर गिरतियाँ ॥१०

कै सीधियां सलकतियां, कै विध आवें जो चलतियाँ ।
सखि एक दुजीके आगे, आये आये चरणों लागे ॥११

एत बडा मिलावा होई, जुदि रहे ने या समये कोई।
कोई छ्ज्जों कोई जालियों, कोई महलों कोई मालियों॥१२

इत चार घडीलों श्रीराज बैठे, मेवा मिठाई आरोगके ऊठे।
एत चार घडीलों पूर्णब्रह्म बैठे, मेवा मिठाई आरोगके ऊठे ॥१३

श्री धाम की आठ पहर की बीतक
तीजी भोम की जो पडसाल, ठौर बडे दरवाजे विसाल ।
धनी आवत हैं उठ प्रात, बन सींचत अमृत अघात ।।८०
रङ्गभवनके विशाल द्वारके ऊपर तीसरी भूमिकामें खुला स्थान (पड.साल) है. धामधनी प्रातःसमय यहाँ आते हैं और अपनी अमृतमयी दृष्टिसे सम्मुखके वनोंको सींचकर तृप्त करते हैं.
पसु पंखी का मुजरा लेवें, सुख नजरों सबों को देवें ।
पीछे बैठ करें सिनगार, सखियां करावें मनुहार ।।८१
श्रीराजजी यहीं पर पशु-पक्षियोंका अभिवादन स्वीकार करते हैं तथा उन सभीको अपनी शीतल दृष्टिसे सुख प्रदान करते हैं. तत्पश्चात् सभी सखियाँ दालानमें बैठकर श्रीराजजीका शृङ्गार करती हुई उनको प्रसन्न करतीं हैं.
श्री स्यामाजी मंदिर और, रंग आसमानी है वा ठौर ।
चार चार सखियां सिनगार करावें, स्यामाजी श्री धनीजीके पासें आवें ।।८२
दूसरी ओर मन्दिरोंकी दूसरी पङ्क्तिमें श्रीश्यामाजीका आसमानी रङ्गका मन्दिर है. चार-चार सखियाँ श्रीराजजी एवं श्यामाजीका शृङ्गार करतीं हैं. पश्चात् श्रीश्यामाजी श्रीराजजीके समीप आती हैं.
सोभा क्यों कर कहूं या मुख, चित में लिए होत है सुख ।
चित दे दे समारत सेंथी, हेत कर कर वेनी गुंथी ।।८३
श्रीश्यामाजीकी शोभाका वर्णन इस मुखसे कैसे करें. इसे हृदयमें धारण करने पर ही परमानन्दका अनुभव होता है. सखियाँ हृदयपूर्वक केश सँवारती हुई श्रीश्यामाजीकी माँग बनातीं हैं तथा प्रेमसे वेणी गूँथतीं हैं.
मिनों मिने सिनगार करावें, एक दूजी को भूषन पेहेरावें ।
साथ सिनगार करके आवें, जैसा धनीजीके मन भावें ।।८४
सखियाँ भी परस्पर शृङ्गार करतीं हैं तथा एक दूसरीको आभूषण पहनातीं हैं. श्रीराजजीको जैसा प्रिय लगता है उसी प्रकारका शृङ्गार धारण कर सखियाँ उनके समीप आतीं हैं.
सैयां लटकतियां करे चाल, ज्यों धनी मन होत रसाल ।
सैयां आवत बोलें बानी, संग एक दूजी पे स्यानी ।।८५
सखियाँ विचित्र (मस्त) चालसे चलतीं हैं जिससे श्रीराजजीका मन प्रसन्न होता है. सभी सखियाँ एक दूसरीसे चतुर होकर आती हुई अपनी मधुरवाणीसे श्रीराजजीको प्रसन्न करतीं हैं.
सैयां आवत करें झनकार, पाए भूषन भोम ठमकार ।
झलकतियां रे मलपतियां, रंग रस में चैन करतियां ।।८६
सखियाँ चलते समय जब झङ्कार करतीं हैं उस समय उनके पाँवके भूषणोंसे पूरी तीसरी भूमिका गूँज उठती है. इस प्रकार सखियाँ झूमतीं हुइंर् बड.ी मस्तीसे चलकर प्रेमरङ्गमें मग्न होती हुई आनन्द लेतीं हैं.
कंठ कंठ में बांहों धरतियां, चित एक दूजी को हरतियां ।
सुंदरियां रे सोभतियां, एक दूजी को हांस हंसतियां ।।८
सखियाँ एक दूसरीके गलेमें बाँहे डालकर मनोविनोद करतीं हुइंर् एक दूसरीके हृदयको आर्किषत करतीं हैं. इस प्रकार अपने सौन्दर्यकी छटा बिखेरतीं हुइंर् एक दूसरीके साथ हास्यविनोद करतीं हैं.
कै फलंग दे उछलतियां, कै फूल लता जो फेरतियां ।
कै हलके हलके हालतियां, कै मालतियां मचकतियां ।।८८
कतिपय सखियाँ छलाङ्गें लगाकर उछलतीं हैं, कतिपय पुष्पलताओंकी भाँति अपने शरीरको घूमातीं हैं. कतिपय मस्तानी चालसे धीरे-धीरे चलतीं हैं तथा कतिपय लटक-मटककर चलतीं हैं.
कै आवत हैं ठेलतियां, जुथ जल लेहेरां ज्यों लेवतियां ।
कै आवें भमरी फिरतियां, एक दूजी पर गिरतियां ।।८९
इस प्रकार चलती हुई सखियाँ एक दूसरेको धकेलतीं हैं जिससे जलकी लहरोंकी भाँति उछलती हुई प्रतीत होतीं हैं. अनेक सखियाँ गोल-गोल घुमती हुई आतीं हैं और एक दूसरी पर गिर जातीं हैं.
कै सीधियां सलकतियां, कै विध आवें जो चलतियां ।
सखी एक दूजी के आगे, आए आए के चरनों लागें ।।९०
अनेक सखियाँ सीधे सरकती हुई आतीं हैं तो कतिपय विविध चालमें आतीं हैं. इस प्रकार सभी सखियाँ एक दूसरीसे आगे निकलकर श्रीराजजीके चरणोंमें प्रणाम करतीं हैं.
इत बडा मिलावा होई, जुदी रहे न या समें कोई ।
कोई छजों कोई जालिएं, कोई मोहोलों कोई मालिएं ।।९१
इस प्रकार तीसरी भूमिकामें सभी सखियोंका महामिलन होता है. इस समय कोई भी सखी इस लाभसे वञ्चित नहीं होती. कोई छज्जों पर, कोई झरोखों पर, कोई महलोंमें तो कोई ऊपरके मन्दिरोंमें बैठ जातीं हैं.
इत चार घडी लों बैठें, मेवा मिठाई आरोग के उठें ।

पान बीडी

अचवन कीजे कृपा निधान, सुन्दर अचवन कीजे परम निधान ।
एक सखि जमुना जल ले आई, दुजी लाई खरिका पान ॥१

काथो चूना पान सुपारी लवंग इलायची, बीडी वाली चतुर सुजान॥२
आप पाये सखियनको दीजे, श्री छत्रसाल कुर्बान ॥३

ભોગ

તીજી ભોમકી જો પડસાલ, ઠૌર બડે દરવાજે વિશાલ |
ધનિ આવત હૈં ઊઠી પ્રાત, વન સીંચત અમૃત અઘાત || ૧

પશુ પક્ષિયોં કે મુજરા લેવેં, સુખ નજર સબોં કો દેવેં |
પીછે બૈઠિ કરેં સિન્ગાર, સખિયાઁ કરાવેં મનુહાર ||

શ્રી શ્યામાજી મંદિર ઔર , રંગ આસ્માની હૈ ઠૌર ||
ચાર ચાર સખિયાઁ સિનગાર કરાવેં, શ્રી શ્યામાજી ધનીજી કે પાસે આવેં || ૩

શોભા ક્યોં કર કહુઁ યા મુખ, ચિત્ત્મેં લિયે હોત હૈ સુખ |
ચિત દે દે સમરત સેંથી, હેત કર કર બેની ગુઁથી|| ૪

મિનોમિને સિન્ગાર કરાવેં, એક દૂજીકો ભૂષણ પહિરાવેં ||
સાથ સિન્ગાર કરકે આવેં, જૈસ ધનીજીકે મન ભાવે||૫

સૈયાઁ લટકતિયાઁ કરેં ચાલ, જ્યોં ધની મન હોત રસાલ |
સૈયાઁ આવત બોલે વાણી, સંગ એક દૂજી પૈ સ્યાની||૬

સૈયાઁ આવત કરેં ઝનકાર, પાઁવ ભૂષણ ભોમ ઠમકાર ||
ઝલકતિયાઁ રે મલપતિયાઁ, રંગ રસમેં ચૈન કરતિયાઁ||૭

કંઠ કંઠમેં બાહોં ધરતિયાઁ, ચિત્ત એક દૂજીકો હરતિયાઁ |
સુંદરીયાઁ રે શોભતીયાઁ, એક દૂજિકો હાઁસ હઁસતિયાઁ ||૮

કૈ ફલંગ દે ઉછલતિયાઁ, કૈ ફૂલ લતા જ્યોં ફિરતિયાઁ |
કૈ હલકે હલકે હાલતિયાઁ, કૈ માલતિયાઁ મચક્તિયાઁ ||૯

કૈ આવત હૈં ઠેલતિયાઁ, જુત્થ જલ લેહેરાં લેવતિયાઁ ||
કૈ આવેં ભમરી ફિરતિયાઁ, એક દૂજી પર ગિરતિયાઁ ||૧૦

કૈ સીધિયાં સલકતિયાં, કૈ વિધ આવેં જો ચલતિયાઁ |
સખિ એક દુજીકે આગે, આયે આયે ચરણોં લાગે ||૧૧

એત બડા મિલાવા હોઈ, જુદિ રહે ને યા સમયે કોઈ|
કોઈ છ્જ્જોં કોઈ જાલિયોં, કોઈ મહલોં કોઈ માલિયોં||૧૨

ઇત ચાર ઘડીલોં શ્રીરાજ બૈઠે, મેવા મિઠાઈ આરોગકે ઊઠે|
એત ચાર ઘડીલોં પૂર્ણબ્રહ્મ બૈઠે, મેવા મિઠાઈ આરોગકે ઊઠે ||૧૩

પાન બીડી

અચવન કીજે કૃપા નિધાન, સુન્દર અચવન કીજે પરમ નિધાન |
એક સખિ જમુના જલ લે આઈ, દુજી લાઈ ખરિકા પાન ||૧

કાથો ચૂના પાન સુપારી લવંગ ઇલાયચી, બીડી વાલી ચતુર સુજાન||૨
આપ પાયે સખિયનકો દીજે, શ્રી છત્રસાલ કુર્બાન ||૩

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प्रात: कालका स्वरूप

प्रात: कालका स्वरूप
(परिक्रमा गानेके बाद श्री राजजीको प्रणाम करें फिर श्री राजजीके समक्ष दोनों हाथ जोडकर खडे रहें अथवा चँवर डोलाते हुए स्वरूप बोलें.)
श्रीराज श्रीठकुराणीजी प्रथम भोममें विराजमान भये.
तहाँ कंचन रंग्को सिंहासन, तिनके छ: पाये छ: डाँडे. एक एक डाँडे दश दश रंग जवेरोंके झलकत हैं.
दो छत्री दो स्वरूपों के ऊपर, दो फूल लाल मणिकके कमलके-से, निलवीकी पाखडी, छ्त्री के तरफों जवेरोंकी झालर.
छ: डाँडों पर छ कलश. दो कलश दौ छत्रियों के ऊपर, ये आठों कलश हेमके, उतरती काँगरी.
पशमी बिछौना, एक गादी दोय चाकले. ता पर पाँच तकिये.
श्री राज श्री ठकुराणीजी दो चाकले पर विराजमान भये, कै चाकले चित्रकारी ता पर बैठे श्री जुगल विहारी.
दौ स्वरूप चित्त में लीजे, फेर फेर आतम को दीजे.
आत्मा से न्यारे न कीजे अधछिन. फेर फेर कीजे दरसन.
पहिले अंगुरी नख चरन. मस्तकलों कीजे वर्णन.
सब अंग वस्तर भूषण, शोभा जाने आत्मा के लगन.
सुंदर श्री ठकुराणीजी को सिनगार, सेंदुरिया रंग जडावकी साडी. श्याम रंग जडावकी कंचुकी, निली लाहिको चरणियाँ.
श्री राजजी को श्रृंगार सेंदुरिया रंग को पटुका, केशरीया रंग जडावकी इजार, श्वेत रंग जडाव को जामा.
श्री जुगल स्वरूप को मूल वागो, अद्वैत की लाठी हाथमें लेके,सब साथ को प्रणाम .

आनन्द मंगल આનન્દ મંગલ

आनन्द मंगल
आनन्द मंगल श्री धामधनीजीकी जय ।
श्री जुगल किशोरजीकी जय । श्री वृन्दावनचंद्रजीकी जय ।
श्री रासके रमैयाकी जय । श्री हुकमके स्वरूपकी जय ।
धनी श्री देवचन्द्रजीकी जय । श्री जियवर साहेबजीकी जय ।
श्री बाईजीराजजीकी जय । श्री महराजा छत्रसालजीकी जय ।

આનન્દ મંગલ
આનન્દ મંગલ શ્રી ધામધનીજીકી જય |
શ્રી જુગલ કિશોરજીકી જય | શ્રી વૃન્દાવનચંદ્રજીકી જય |
શ્રી રાસકે રમૈયાકી જય | શ્રી હુકમકે સ્વરૂપકી જય |
ધની શ્રી દેવચન્દ્રજીકી જય | શ્રી જિયવર સાહેબજીકી જય |
શ્રી બાઈજીરાજજીકી જય | શ્રી મહરાજા છત્રસાલજીકી જય |

सदा आनंद मंगल में रहिये सदा आनंद मंगल में रहिये।
महाप्रसाद और चरणामृत, ये सुख साथ ही में पाइये ।।१।।
इश्क सुराई प्रेम का प्याला अंतर आतम छकि रहिये ।।२।।
तन सोये रूह निशदिन जागे, धाम धनि के चरणो में रहिये ।।३।।
अष्ट प्रहार और चौंसठ घड़ियाँ, पिउ- पिउ, पिउ पिउ कहिये ।।४।।
छ्त्रशाल भजो धाम धनी को, और देवन सों क्या चाहिये ।।५।।

प्रेम दिवस की सुभकामना सभी को !

स्नान સ્નાન

स्नान

मारा बालाजी चलो जमुना जल झिलिये, मारा बालाजि चलो जमुना जल झिलिये,
पाट घाट्की देहुरीमें,जहाँ रामत कीजे राज ।

रतन जदित के मोहोलमें, किजे रंग बिलास ॥१॥ मारा .

आप अकेले हुजिये, सन्ग श्यामाजी साथ,
हमहूँ बारे हजार मिलके झिलें तुम्हारे पास ॥२॥ मारा.

कुन्ज वनके रेतीमें, पिया चलो दौडिये जायी,
जो जाको छुई लेत हैं, सो ताके हाथ बिकायी ॥३॥ मारा.

पिताम्बर कति काछनी काछे, शीश मुकुट लटकाये,
हेम कसबकी ओढनी ओढे, झाँझरी घुँघरी घमकाये ॥४॥ मारा

फुलबाग और नूरबाग में , चलो पिया बैठिये जाये,
लहरी आवें सुगंधकी, बास रही महकाये ॥५॥ मारा.

बडे वन और लाल चबुतरा, पिया चलो बैठिये जाये,
पशु पक्षी मुजेरेको आवें, नये नये खेल दिखाये ॥६॥ मारा

रसिक राज श्यामाजि के आगे, सखियाँ निरत कराये,
जापर चितवन हेतसों, देखत नयन सिराये ॥७॥ मारा ..

हँसिके राज खुशी भये, पहराये बनमाला
सखी साकुँडल अरज करत हैं, बलि बलि राजकुमार ॥८॥ मारा .

સ્નાન

મારા બાલાજી ચલો જમુના જલ ઝિલિયે, મારા બાલાજિ ચલો જમુના જલ ઝિલિયે,
પાટ ઘાટ્કી દેહુરીમેં,જહાઁ રામત કીજે રાજ |

રતન જદિત કે મોહોલમેં, કિજે રંગ બિલાસ ||૧|| મારા .

આપ અકેલે હુજિયે, સન્ગ શ્યામાજી સાથ,
હમહૂઁ બારે હજાર મિલકે ઝિલેં તુમ્હારે પાસ ||૨|| મારા.

કુન્જ વનકે રેતીમેં, પિયા ચલો દૌડિયે જાયી,
જો જાકો છુઈ લેત હૈં, સો તાકે હાથ બિકાયી ||૩|| મારા.

પિતામ્બર કતિ કાછની કાછે, શીશ મુકુટ લટકાયે,
હેમ કસબકી ઓઢની ઓઢે, ઝાઁઝરી ઘુઁઘરી ઘમકાયે ||૪|| મારા

ફુલબાગ ઔર નૂરબાગ મેં , ચલો પિયા બૈઠિયે જાયે,
લહરી આવેં સુગંધકી, બાસ રહી મહકાયે ||૫|| મારા.

બડે વન ઔર લાલ ચબુતરા, પિયા ચલો બૈઠિયે જાયે,
પશુ પક્ષી મુજેરેકો આવેં, નયે નયે ખેલ દિખાયે ||૬|| મારા

રસિક રાજ શ્યામાજિ કે આગે, સખિયાઁ નિરત કરાયે,
જાપર ચિતવન હેતસોં, દેખત નયન સિરાયે ||૭|| મારા ..

હઁસિકે રાજ ખુશી ભયે, પહરાયે બનમાલા
સખી સાકુઁડલ અરજ કરત હૈં, બલિ બલિ રાજકુમાર ||૮|| મારા .

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पुष्पार्पण પુષ્પાર્પણ

पुष्पार्पण

चलो सखी श्री सुन्दर वरजीने निरखियेन, श्री श्यामाजीने जोई जोई मन हरखियेन,
श्री श्यामाजीन अन्ग हो सुन्दरसाथ, निरखि हरखि ऊमन्ग न माये ॥१॥

सुन्दरसाथ बईठो घेरी घेरी, झलहल ज्योति करी रहे सोइ
दीपक रन्ग रे सिंहासन, च्हत्री तो डाँडे झालेर अति घन ॥२॥

तापर कन्चन कलश जो होइ, झलहल ज्योति करी रहे सोइ,
ये रे सिंहासन ज्योति न मावे, सखियाँ तो सन्मुख वाणी गावें ॥३॥

श्री मन्डल नवरन्ग बाइज्युने हाथ, बेनबाई बेन बजावे तीन साथ,
झरमरबाई झरमरिया जो बजावें, तान्बई तन्नियँ जो मिलावें ॥४॥

शेनबई स्वर पुरावे तिन संग, मनमें तो धरे अति उछरंग ।
ये उछरंग कह्यो न जावें,सखियाँ तो प्रेम सहित वाणी गावे॥५॥

चन्दन चढौनी

श्री चन्दन पुष्प बहु विध राजे, सुगंध सर्वे मर बालाजी न छाजे,
श्री पियाजीना पुजन इन विध किजीये,श्रि राजजी ने पुजन इन बिध किजीये,
श्री श्यामाजीने पुजन इन विध किजीये,श्रि देवचन्द्रजीने पुजन इन विध किजीये,
श्री श्रीजीसाहेबजीने पुजन इन विध किजीये,श्रि बाईजुराजजीने पुजन इन विध किजीये,
श्री पूर्णब्रह्मजीने पुजन इन विध किजीये,श्री पाचों स्वरूप ने पुजन इन विध किजीये,
श्री सुन्दरसाथजी ने पुजन इन विध किजीये, फेर फेर मूल स्वरूप चित्तमें लिजीये ॥६॥

जो कोइ वासना इन घर मूल स्वरूप से न काढें नजर,
नहीं कोइ सुख इन रे समान, अंगना तो कोटि बेर कुर्बान ॥७॥

ચલો સખી શ્રી સુન્દર વરજીને નિરખિયેન, શ્રી શ્યામાજીને જોઈ જોઈ મન હરખિયેન,
શ્રી શ્યામાજીન અન્ગ હો સુન્દરસાથ, નિરખિ હરખિ ઊમન્ગ ન માયે ||૧||

સુન્દરસાથ બઈઠો ઘેરી ઘેરી, ઝલહલ જ્યોતિ કરી રહે સોઇ
દીપક રન્ગ રે સિંહાસન, ચ્હત્રી તો ડાઁડે ઝાલેર અતિ ઘન ||૨||

તાપર કન્ચન કલશ જો હોઇ, ઝલહલ જ્યોતિ કરી રહે સોઇ,
યે રે સિંહાસન જ્યોતિ ન માવે, સખિયાઁ તો સન્મુખ વાણી ગાવેં ||૩||

શ્રી મન્ડલ નવરન્ગ બાઇજ્યુને હાથ, બેનબાઈ બેન બજાવે તીન સાથ,
ઝરમરબાઈ ઝરમરિયા જો બજાવેં, તાન્બઈ તન્નિયઁ જો મિલાવેં ||૪||

શેનબઈ સ્વર પુરાવે તિન સંગ, મનમેં તો ધરે અતિ ઉછરંગ |
યે ઉછરંગ કહ્યો ન જાવેં,સખિયાઁ તો પ્રેમ સહિત વાણી ગાવે||૫||

ચન્દન ચઢૌની

શ્રી ચન્દન પુષ્પ બહુ વિધ રાજે, સુગંધ સર્વે મર બાલાજી ન છાજે,
શ્રી પિયાજીના પુજન ઇન વિધ કિજીયે,શ્રિ રાજજી ને પુજન ઇન બિધ કિજીયે,
શ્રી શ્યામાજીને પુજન ઇન વિધ કિજીયે,શ્રિ દેવચન્દ્રજીને પુજન ઇન વિધ કિજીયે,
શ્રી શ્રીજીસાહેબજીને પુજન ઇન વિધ કિજીયે,શ્રિ બાઈજુરાજજીને પુજન ઇન વિધ કિજીયે,
શ્રી પૂર્ણબ્રહ્મજીને પુજન ઇન વિધ કિજીયે,શ્રી પાચોં સ્વરૂપ ને પુજન ઇન વિધ કિજીયે,
શ્રી સુન્દરસાથજી ને પુજન ઇન વિધ કિજીયે, ફેર ફેર મૂલ સ્વરૂપ ચિત્તમેં લિજીયે ||૬||

જો કોઇ વાસના ઇન ઘર મૂલ સ્વરૂપ સે ન કાઢેં નજર,
નહીં કોઇ સુખ ઇન રે સમાન, અંગના તો કોટિ બેર કુર્બાન ||૭||

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भोग ભોગ

bhog

नगन जडित चौकी पर दोऊ , श्री युगल स्वरूप बिराजे ।
धरो है थाल आगे हित चितसों, षटरस व्यंजन साजे ॥१
जेंवत जुगल जोडी सुख पावत, अचवाऊं ले जल झारी ।
लेत पान पावत हित चितसों हिरदेसों हितकारी ॥२
कोटि जतन ब्रह्मा करि थाके, सो जूठन नहिं पाये ।
सो जूठन धनी सहज कृपासों, पंचम निशदिन पाये ॥३

નગન જડિત ચૌકી પર દોઊ , શ્રી યુગલ સ્વરૂપ બિરાજે |
ધરો હૈ થાલ આગે હિત ચિતસોં, ષટરસ વ્યંજન સાજે ||૧
જેંવત જુગલ જોડી સુખ પાવત, અચવાઊં લે જલ ઝારી |
લેત પાન પાવત હિત ચિતસોં હિરદેસોં હિતકારી ||૨
કોટિ જતન બ્રહ્મા કરિ થાકે, સો જૂઠન નહિં પાયે |
સો જૂઠન ધની સહજ કૃપાસોં, પંચમ નિશદિન પાયે ||૩

आरती

आरती
आनन्द आरती संझा किजै,
नवल किशोर निरखि सुख लीजै ॥१
पहिली आरती व्रज में वासा,
सब सखियन मिलि देखे तमासा ॥२
दूसरी आरती रासमें आये,
अक्षर मनोरथ पूरन कराये ॥३
तीसरी आरती श्याम सुहाई,
सुर असुरन धनी सबन मिलाई ॥४
चौथी आरती बुध्दजी मन भाई,
तारतम ज्योति करि रोशनाई ॥५
पांचमी आरती विजयाभिनंदन,
जागनी लीला कलियुग निकंदन ॥६
आरती यह श्री महमति गाई,
आशादास सुनत सुख पाई ॥७

आरती यह सतगुरु

आरती
आरती यह सतगुरु पर कीजे ,
सतगुरु स्वरुप आप लखि लीजे ।।१
सोई सतगुरु ब्रजके वासी,
ब्रजबाला संग सदा सुख रासी ।।२
सोई सतगुरु रास बिलासी,
खेलत रास अखंड अविनाशी ।।३
सतगुरु सोई श्री देवचंद्रजी सुहाये,
तेज तारतम आप ले आये ।।४
सोई सतगुरु श्री इन्द्रावती राजे,
निज नवरंग संग आप विराजे ।।६

यह सतगुरु का आरती कीजिये सतगुरु के साक्षात् स्वरुप यह बात लिख लीजिये
येही सतगुरु ब्रज के वासी थे, जिन्होंने ब्रजबाला संग सदा सुख देने वाली लीला रची
येही सतगुरु रास में विलासे और अविनाशी और अखंड रास (निरंतर चलने वाला रास) खेला,
येही सतगुरु श्री देवचंद्रजी शोभा दे रहें हैं, और जागनी रास में तारतम परमधाम से ले कर आये.
येही सतगुरु इन्द्रावती पर राज किये (एकाकार हुए) और नवरंग के आत्मा के संग विराजे (इन्द्रावती और सुन्दरबाई सतगुरु दोनों नवरंग स्वामी के आत्मा के संग विराजे)!

निजनान्दम नमस्क्रत्येम प्राणनाथ गुरु तथा प्रभु पूजा बिधा नैबे येथा पूर्वं प्रकाशते श्री कृष्णा किशोर ब्रज वल्लभा युगल स्वोरुपा अनूप बिघ्न हराना मंगल करना बन्दे प्रेम स्वरुप तन मन धन अर्पण कियो सब तुमपे ब्रजराज मनभावे सोही करो हाथ तुम्हारे लाज
जियावर श्री कृष्ण की जय

संध्या स्मरण સંધ્યા સ્મરણ

संध्या स्मरण
सन्झा सुमिरन आरती, भजन भरोसे दास ।
मनसा वाचा कर्मणा, श्री जुगल चरण की आस ॥१ ॥
स्वास स्वास निजनाम जपो, वृथा स्वास मत खोय ।
ना जानो ये स्वासको, आवन होय न होय ।
तन दीपक मन ज्योति करुं, प्रेमघृत लौ लाय ।
शोभा लखि श्री राजकी, आरती करूं चित्त लाय ॥३॥

સંધ્યા સ્મરણ
સન્ઝા સુમિરન આરતી, ભજન ભરોસે દાસ |
મનસા વાચા કર્મણા, શ્રી જુગલ ચરણ કી આસ ||૧ ||
સ્વાસ સ્વાસ નિજનામ જપો, વૃથા સ્વાસ મત ખોય |
ના જાનો યે સ્વાસકો, આવન હોય ન હોય |
તન દીપક મન જ્યોતિ કરું, પ્રેમઘૃત લૌ લાય |
શોભા લખિ શ્રી રાજકી, આરતી કરૂં ચિત્ત લાય ||૩||

Bhajan

नाम माला उर धारो साधू भाई , कृष्ण माला उर धारो !
संध्या समय सुध चित कर के , प्रभुजी को नाम चितारो !!
चार पदार्थ पाई अमोलक , सो बृथा नहीं हारो !
मनुष्य तन दुर्लभ है साधू , सो क्यों भूली गुजारो !!
कृष्ण कृष्ण मुख रटत रात दिन , स्वास ही स्वास पुकारो !
कृष्ण कृष्ण मुख रटत निरंतर , स्वास ही स्वास पुकारो !
जिस देहि प्रभु पूरण मिल्यो है , सोही जनम तुम्हारो !!
'कृष्ण दास ' मुख कृष्ण बखानत , क्षर अक्षर से न्यारो !
पूरण ब्रह्म सनातन दोए भुज , मोहन मित्र हमारो
ब्रह्मुनी श्री स्वामी कृष्ण दास जी

कृष्ण नहीं अवतारी साधू भाई , कृष्ण नहीं अवतारी |
पूरण ब्रह्म सनातन दोए भुज , कहत है निगम पुकारी ||
गोपी कृष्ण अनादी एक है , जल तरंग ज्यो वारी |
कारन मूल रच्यो एक कारज , आन भई ब्रज नारी ||
तिन गोपीन की पद रुज बांछत , ब्रम्हा बिष्णु त्रिपुरारी |
करी करी कोटि तपस्या बहु बिध , त्रिगुण थके पछिहारी ||
लीला त्रिबिध भये नाना बिध , बाल तरुण वृद्ध नारी |
कहत 'मुकुंद' सतगुरु समरथ बिना , कोही ना सके निरवारी ||
मोमिन - श्री मुकुंद दास जी (नवरंगबाई)

मुरली कौन बजाये द्वारे मेरे , बांसुरी कौन बजाये !
बाकि बाकि तान कहत मुरली में , राधे के गुण गाये !!
हाथ लकुटिया कांध कमरिया , नंदजी की धेनु चराए !
इत गोकुल उत मथुरा नगरी , बिच में दान चुकाए !!
पैठी पाताल काली नाग नाथ्यो , फन पर निरत कराये !
'छत्रसाल' नगर बलिहारी , चरण कमल बलि जाये !! ***"श्री प्राण नाथजी के दीन में , जो कोही ल्यावे ईमान !
'छत्रसाल' तिन उपर , तन मन धन कुर्बान !!"*** (महाराजा श्री छत्रसाल जी - सखी स साकुण्डल बाई ).

"जाऊं कहाँ महाराज शरण तजी , जाऊं कहाँ महाराज ! अन्ते ठोर कतहु नाही हमको , चरण छोड़ी ब्रज राज !! जो जो आये प्रभु शरण तुम्हारी , तिनके किये सब काज ! शरणे मरण सुन्यो नाही कबहो , बड़े हो गरीब नीवाज़ !! पावन पतित निगम यश गावात , श्रवन सुनत आवाज़ ! जो पतिताई अघ मिटे ना मेरो , बिरदाही आवत लाज !! बिनती करत "मुकुंद" दीन द्विज , सब पतितन सिरताज ! दीन जानी प्रभु पार उतारो , लेवो चढ़ाये जहाज !!" -मुकुंद स्वामी {सखी नवरंग्बाई }

उन्ही को होग तुम्हारा दर्शन, जो तेरे चरणों में आ चुके हैं।
सफल हुये हैं उन्हींके जीवन, जो तेरे चरणों में आ चुके हैं॥
न पाया तुझको अमीर बनके, न पाया तुझ को फकीर बनके।
सफल हुई है उन्ही की पूजा , जो तेरे चरणों में आ चुके हैं॥
जहां भी जिसने तुझे पुकारा, दिया है तुमने उसे सहारा ।
कटे हैं उनके दु:खों के बन्धन, जो तेरे चरणों में आ चुके हैं ॥

प्रार्थना पुष्पान्जलि

निजानन्द को सुमिरि के
सतगुरु क कर ध्यान,
सुन्दर साथ के चरण में,
दास करे परनाम ॥१॥

बार बार विनय करुं,
सुन्दर साथ से येह ।
सेवक सेवा भाव में,
बाढे प्रेम सनेह ॥२॥

Nijanand ko sumer ke
satguru ka kar dhyan,
sundersaath ke charan me,
daas kare pranam ||
baar baar viney karu,
sunder saath se yeh,
sevak seva bhav me,
bade prem sneha ||

किर्तन ॥

ब्रजपति मोहन हे घन श्यम ।
पतितपावन राधे श्याम ॥
हे नन्दनन्दन हे ब्रजराज ।
पूरन चिदघन हे श्रीराज ॥
हे मुरलीधर हे नन्दलाल ।
रसिक शिरोमणि हे गोपाल ॥
हे मम रक्षक हे ममनाथ ।
दीनबन्दु हे गोपीनाथ ॥
हे पूर्णानन्द सच्चिदानन्द ।
प्राण्नाथ हे आनन्द कन्द ॥

vrajpati mohan he ghanshyam |
patit pavan radhey shyam ||
he nannandan he vrajraj |
pooran chitdhan he shree raj ||
he murlidhar he nandlal |
rasik shiromani he gopal ||
he mam rakshak he mamnath |
dinbandhu he gopinath |
he poornanad sachidanand |
prannath he anand kand ||

विनती

कृष्ण प्यारे से विन्ति हमारी ।
दर्शन दे जाना ॥
मै भूला हूँ जग में आकर,
मुझ को चेताना ॥
आया था मैं किस कारण से ,
कारण बतलाना ॥
पन्थ आपका भूल गया हूँ,
मारग देखाना ॥
प्रेम रूप का देकर दशर्न ,
चरणों में ले जाना ॥

krishna pyare se vinti hamari |
darshan de jaana ||
main bhula hu jag me aakar,
mujko chetana ||
aaya tha main kis kaaran se,
kaaran batlana ||
panth aapka bhul gaya hu,
marag dekhana ||
prem roop ka dekar darshan,
charno me lejana ||

shree krishna roop poorn swaroop, tumko hamara hai pranam |
nawalbihari krishnamurari, bhakto ke hitkari shyam |
bhav dukh bhanjan jan man ranjan, tan man arpan sundar shyam |
he raasbihari mahasukhkari, mujko apna dijiye dhyan |
param dham ko bhul gaye hum, dijiye darshan shyama shyam |
aaye pade bhavsagar me hum, paar lagao he ghanshyam |
hum balak shree krishna tumhare, dekhao apna o nijdham |
bhulan hamare maaf karo dhani, hum daas tumhare hai nadaan |
tum swami hum sewak tumhare, dijiye apna tartam gyan |
chiddhanroop poorn swaroop, aksharatit hai o nijnaam |

prat uth shree raj shyama ji ko, pal pal karu pranam |
poorn brahma snatan sab par, kel karat param dham ||
jugal swaroop sundar sukhdayak, sobha sifat anama ||
duardash shahastra kiranmadh raajit, jhalkat saari jama ||
ratan singhasan aasan ke madh, sundar jadit lalama ||
tapar chidanand lakh aatam, tab hove neh kama ||
das gopal paye nij prabhu ko, varat tanman dham ||
jag nij ghar dekh apna, so...o mat bhayo bhor re ||
satguru aaye jagrit nidhi laye, tartam kiyo sor re ||
lok chode karke roshan, saat sunya ko ford re ||
chord akshar dekh aage, shree raj me chit ka jord re ||
satchit brahma ko yaad karke, mann ki duvidha tord re||
bahot soye janam khoyo, umar reh gayi thord re ||
tase prabhu ke bhajan karle, peeche vish andher re ||
jugal jivan chatur chetan, mahi mukund mor re ||
guru sheetal kripa karke, taraf go manke heir re ||

main var mangu shree dham dhani ji su, main var mangu dham ||
seva saath satguru sharan ko, sumiran ko nijnaam |
saat ghat jamuna jal jheelan, sang shyama var shyam ||1||
vasan bhushan sringaar anupam, upma ko nahi tham |
chadi sukhpaal nij taal paal grihe, vihrat aatho jaam ||2||
sundar saath prem pari poorna, kar purhi mann kaam |
jagrit gyan milyo hai dhaniji ko, mamur hou mukaam ||3||
pakh pachis dekh nij lochan, man bhave kartaam |
tartam tej hiye main barte, tab mite mann haam ||4||
preet reet reti pati akhandit, panchami bhom bishraam |
jugal jeeva piya chandra sakhi ko, yah var milyo hai inaam ||5||

निजानंद निजनाम है, श्री कृष्ण धनी धाम ।
श्यामा सुन्दर साथ सब, राखूँ ह्रदय धाम ।
विनय
निजानन्द निजनाम है, श्री कृष्ण धनीधाम ।
श्यामा सुन्दरसाथ सब, राखुं-हृदय धाम ॥
निजवर सुन्दर श्यामा श्याम।
कृष्ण जियाबर है धनीधाम॥१॥
सतचित आनन्द अक्षर पार ।
अनन्त अनादि लीला धार॥२॥
नाम महिमा सत्गुरु रुप ।
प्रगट भये हैं सो निज रुप ॥३॥
सब विध धाम की महिमा गाये ।
श्याम श्यामा वर सत्य कहाये॥४।
नित्य निरन्तर सुख के दाता ।
ब्रह्म सृष्टि के हो तुम नाथा ॥५॥
प्रियवर विन्ति करत है आज ।
राखो अब तुम मेरी लाज ॥६॥
अमृत रुप बचन तुम्हारे ।
लोक चतुर्दशतें है न्यारे ॥७॥
निराकार साकार के आगे ।
जगत वचन तहां तनक न लागे ॥८॥
अक्षर पार घर अक्षरातीत ।
है यामें सब धाम चरित ॥९॥
यह वचन सब लेऊ बिलोय।
कृपा तुम्हारी जब हीं होये ॥१०॥
सार अरथ तब जियमे धार ।
कमल चरण में प्रेम अपार ॥११॥
यह सुख सागर महिमा भारी ।
ब्रह्म सृष्टि में करुं परचारी ॥१२॥
यह आनन्द जब आतम लेवे ।
तब तुम चरण कमल को सेवे ॥१३॥
होवे विकार जब मेरे दूर ।
धनी से प्रेम करें भरपूर ॥१४॥

क्या वर मांगुं श्री राज अब मैं क्या मांगुं,
मेरे रोम रोम में रम जावो, रम जावो श्री राज । अब मैं
धन न मागुं मान न मागुं, झूठे जग की शान न मागुं
देना हो तो दे दे दाता, जपने को निजनाम । अब मैं
मांग के झूठा खेल पसारा, भूल गये ओ निजनाम प्यारा
भटक रही तेरी दर दर अंगना, बक्सो धनी श्री धाम । अब मैं
कौन कौन तेरी गुण गाए, तेरी दयाका पार न पाये
ओ प्राणों के नाथ पियारे, दो भक्ति निष्काम । अब मै
हे पूरणानन्द अन्तर्यामि, परमधाम के स्वामी
जहां जहां तेरा दर्शन पाऊँ, वही वसे सुख धाम । अब मैं
केवल चरण शरणमें लीजो, श्रद्धा प्रेम और भक्ति दीजो

पूर्णब्रह्म પૂર્ણબ્રહ્મ

अगरबत्ति और आरती तैयारी

पूर्णब्रह्म ब्रह्म से न्यारे, आनन्द अखंड अपारे
शिव सनकादि आदिके इच्छित, शेष न पावत पारे ॥१॥
अगम जानिके निगम कहाये, खोजि खोजि पचिहारे ।
जानि के मूल धनि अंगना अपनी, सो घर आये हमारे ॥२॥
श्री ठकुराणीजी सखियन सुधाँ, लेकर संग पधारे ।
त्रिगुण फाँस के फंद परे ते, सो फन्दा निरवारे ॥३॥
वारी वारी जाऊँ मैं अपने पिया पर, शोभा मुखहूँ न आवे ।
सिंहासन आसन बैठारे, श्री छत्रसाल गुण गावे ॥४॥

અગરબત્તિ ઔર આરતી તૈયારી

પૂર્ણબ્રહ્મ બ્રહ્મ સે ન્યારે, આનન્દ અખંડ અપારે
શિવ સનકાદિ આદિકે ઇચ્છિત, શેષ ન પાવત પારે ||૧||
અગમ જાનિકે નિગમ કહાયે, ખોજિ ખોજિ પચિહારે |
જાનિ કે મૂલ ધનિ અંગના અપની, સો ઘર આયે હમારે ||૨||
શ્રી ઠકુરાણીજી સખિયન સુધાઁ, લેકર સંગ પધારે |
ત્રિગુણ ફાઁસ કે ફંદ પરે તે, સો ફન્દા નિરવારે ||૩||
વારી વારી જાઊઁ મૈં અપને પિયા પર, શોભા મુખહૂઁ ન આવે |
સિંહાસન આસન બૈઠારે, શ્રી છત્રસાલ ગુણ ગાવે ||૪||

परीक्रमा પરીક્રમા

जुगल स्वरूप रूप छबि छाजे । सिंहासन के ऊपर बिराजे ॥१
नाचत देत फेर आवत फेरी । हँसी हँसी लालन मुख तन हेरी॥२
गावत गीत बजावत बाजे । जमुना तट बंशी धुन गाजे ॥३
फूल फूल फूल लई आएं । गुही गुही हार पियाको पहिरावें ॥४
देत परिक्रम कर्म सब छूटे । यह सुख पंचम निशदिन लूटे ॥५

सोमवार

पूरण ब्रह्म सच्चिदानन्द रूप, संग श्यामाजी सोहे अनूप ॥१॥
चारो चरण सुन्दर सुखदाई, भूषण की शोभा वरनी न जाई ॥ २॥
झांझरी घुंघरी कांबी कडला अलेखे, अनवट विछुवा श्री श्यामाजी विशेषे ॥३ ॥
नीलो है चरणिया केशरी इजार, स्वेत दावन झांइ करे झल्कार ॥४॥
चोली श्याम जडाव साडी सेंदुरिया रंग राजे, हैयडे पर हार शोभा अधिक विराजे ॥ ५ ॥
जरी जामा स्वेत जडाव अंग सोहे, नीलो पीलो पटुका देखत मन मोहे ॥६॥
जाम पर चादर रंग आश्मानी,छेडले किनार वेली जाय न वखानी ॥७॥
जरी पाग सेंदुरिया जगमग जोत, राखडी कलंगी कही जाये न उद्योत ॥ ८॥
शब्दातीत पिया शोभा है अपार, श्री महमति अंगना जाय बलिहार ॥९॥

मंगलवार
धामधनी श्री कृष्ण हमारे, परम निधान परम रूप प्यारे ॥१॥
महाराजा मंगल रूप राजे, श्याम श्यामाजी दोउ अनूप बिराजे ॥ २॥
पूरण अक्षर पदसे न्यारे , सोई जियावर धनीजी हमारे ॥३ ॥
प्रगटे पीया नीज अद्भुत सोई , उपमा पार पावे नहीं कोई ॥४॥
परमानन्द जोड़ी सुखकारी , अंगना पिया पर वारी वारी ॥ ५ ॥

बुधवार
परम सुभग आनन्द गुण गाइए ।
नवल किशोर निरखि सुख पाइए ॥१
धाम श्याम जीय मंगलकारी ।
संग श्यामाजी दुलहिन पिया प्यारी ॥२
कुन्ज निकुन्ज मध्य क्रिडत कोहैं ।
ललित मनोहर सुन्दर सोहैं ॥३
करत केल यमुना तट नेरे ।
परम विचित्र जियावर मेरे ॥४
निज है स्वरूप रूप पिया राजे ।
भई श्री महामति कुर्बान निरखि छबि ॥५

गुरुवार

धाम श्याम श्यामाजी संग प्यारी, ब्रह्मानन्द लील निज न्यारी ॥१॥
सात घात जमुना जल राजे, झिलत जुगल किशोर विराजे ॥२॥
सघन कुन्ज मध्य चातक बोले, क्रिडत लाल लाडिली डोले ॥३॥
ताल पाल मध्य मोहोल सुहाये, खेलन प्यारो प्यारी आये ॥ ४॥
लीला नित्य विहार स्वरूप पर, भई श्री महामति कुरवान निरखि छबि ॥५ ॥

शुक्रवार

प्रथम भोम शोभा अति भारी, बैठे सिंहासन श्री जुगल बिहारी ।१॥
सिंहासन कंचन मणि सोहे, निरखि सखियां मन मोहे ॥२ ॥
सखियां सर्वे शोभा अति सुन्दर, चौंसठ थंब तकियों के अन्दर ॥३॥
वस्तर भूषण तेज अति जोर, ता मध्य बैठे श्री जुगल किशोर ॥४॥
जुगल किशोर शोभा किन विध गाइये, श्री महमति युगल पर वारी वारी जाइये ॥५॥

शनिवार

मूल सरूप किशोर किशोरी, निरखि सखि सच्चिदानन्द जोरी ॥१॥
भोम तलेकी निरखि छबि न्यारी, सोहे सिंहासन प्यारो प्यारी ॥२॥
श्वेत सेंदूर केशर आसमानी, श्याम नीलो पीलो वस्तर जामी ॥३॥
देखत खेल सन्मुख सखि सारी, निरखि सिनगार शोभा अति भारी ॥४॥
ब्रह्मानन्द लील निज न्यारी, निरखि श्री महमति नवरंग वारी ॥५॥

પરીક્રમા
જુગલ સ્વરૂપ રૂપ છબિ છાજે | સિંહાસન કે ઊપર બિરાજે ||૧
નાચત દેત ફેર આવત ફેરી | હઁસી હઁસી લાલન મુખ તન હેરી||૨
ગાવત ગીત બજાવત બાજે | જમુના તટ બંશી ધુન ગાજે ||૩
ફૂલ ફૂલ ફૂલ લઈ આએં | ગુહી ગુહી હાર પિયાકો પહિરાવેં ||૪
દેત પરિક્રમ કર્મ સબ છૂટે | યહ સુખ પંચમ નિશદિન લૂટે ||૫

સોમવાર

પૂરણ બ્રહ્મ સચ્ચિદાનન્દ રૂપ, સંગ શ્યામાજી સોહે અનૂપ ||૧||
ચારો ચરણ સુન્દર સુખદાઈ, ભૂષણ કી શોભા વરની ન જાઈ || ૨||
ઝાંઝરી ઘુંઘરી કાંબી કડલા અલેખે, અનવટ વિછુવા શ્રી શ્યામાજી વિશેષે ||૩ ||
નીલો હૈ ચરણિયા કેશરી ઇજાર, સ્વેત દાવન ઝાંઇ કરે ઝલ્કાર ||૪||
ચોલી શ્યામ જડાવ સાડી સેંદુરિયા રંગ રાજે, હૈયડે પર હાર શોભા અધિક વિરાજે || ૫ ||
જરી જામા સ્વેત જડાવ અંગ સોહે, નીલો પીલો પટુકા દેખત મન મોહે ||૬||
જામ પર ચાદર રંગ આશ્માની,છેડલે કિનાર વેલી જાય ન વખાની ||૭||
જરી પાગ સેંદુરિયા જગમગ જોત, રાખડી કલંગી કહી જાયે ન ઉદ્યોત || ૮||
શબ્દાતીત પિયા શોભા હૈ અપાર, શ્રી મહમતિ અંગના જાય બલિહાર ||૯||

બુધવાર
પરમ સુભગ આનન્દ ગુણ ગાઇએ |
નવલ કિશોર નિરખિ સુખ પાઇએ ||૧
ધામ શ્યામ જીય મંગલકારી |
સંગ શ્યામાજી દુલહિન પિયા પ્યારી ||૨
કુન્જ નિકુન્જ મધ્ય ક્રિડત કોહૈં |
લલિત મનોહર સુન્દર સોહૈં ||૩
કરત કેલ યમુના તટ નેરે |
પરમ વિચિત્ર જિયાવર મેરે ||૪
નિજ હૈ સ્વરૂપ રૂપ પિયા રાજે |
ભઈ શ્રી મહામતિ કુર્બાન નિરખિ છબિ ||૫

ગુરુવાર

ધામ શ્યામ શ્યામાજી સંગ પ્યારી, બ્રહ્માનન્દ લીલ નિજ ન્યારી ||૧||
સાત ઘાત જમુના જલ રાજે, ઝિલત જુગલ કિશોર વિરાજે ||૨||
સઘન કુન્જ મધ્ય ચાતક બોલે, ક્રિડત લાલ લાડિલી ડોલે ||૩||
તાલ પાલ મધ્ય મોહોલ સુહાયે, ખેલન પ્યારો પ્યારી આયે || ૪||
લીલા નિત્ય વિહાર સ્વરૂપ પર, ભઈ શ્રી મહામતિ કુરવાન નિરખિ છબિ ||૫ ||

શુક્રવાર

પ્રથમ ભોમ શોભા અતિ ભારી, બૈઠે સિંહાસન શ્રી જુગલ બિહારી |૧||
સિંહાસન કંચન મણિ સોહે, નિરખિ સખિયાં મન મોહે ||૨ ||
સખિયાં સર્વે શોભા અતિ સુન્દર, ચૌંસઠ થંબ તકિયોં કે અન્દર ||૩||
વસ્તર ભૂષણ તેજ અતિ જોર, તા મધ્ય બૈઠે શ્રી જુગલ કિશોર ||૪||
જુગલ કિશોર શોભા કિન વિધ ગાઇયે, શ્રી મહમતિ યુગલ પર વારી વારી જાઇયે ||૫||

શનિવાર

મૂલ સરૂપ કિશોર કિશોરી, નિરખિ સખિ સચ્ચિદાનન્દ જોરી ||૧||
ભોમ તલેકી નિરખિ છબિ ન્યારી, સોહે સિંહાસન પ્યારો પ્યારી ||૨||
શ્વેત સેંદૂર કેશર આસમાની, શ્યામ નીલો પીલો વસ્તર જામી ||૩||
દેખત ખેલ સન્મુખ સખિ સારી, નિરખિ સિનગાર શોભા અતિ ભારી ||૪||
બ્રહ્માનન્દ લીલ નિજ ન્યારી, નિરખિ શ્રી મહમતિ નવરંગ વારી ||૫||

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बंदौ सतगुरु બન્દૌ સતગુરુ

बंदौ सतगुरु

बंदौ सतगुरु चरणको, करूँ प्रेम प्रणाम ।
अशुभ हरन मंगल करन, श्री देवचन्द्रजी नाम ॥१

श्री देवचन्द्रजीको दरश दियो, जो है पूरण रूप ।
तारतमको तत्व कह्यो, हिरदे बैठि स्वरूप ॥२

धामधनी आनंद हो, पावन पूरण नाम ।
परके परे परम पद, सो कहिये परनाम ॥३

गुरु कन्चन गुरु पारस, गुरु चंदन परमान ।
तुम सतगुरु दीपक भये, कियो जो आप समान।४

तुम स्वरूप तुममें स्वरूप, तुम स्वरूपके संग ।
भेद तुम्हारो को लखे, ब्रह्मानंद रस रंग॥५

तुम केवट भानु वा देशके, देहु चक्षु आप समान ।
दृष्टि तुम्हारी क्यों रहे, संसय तिमिर अज्ञान ॥६

जेहि पद नारायण भजे, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
महाबिष्णु वाछंत सदा, मोहिं पहुँचाओ वा देश ।७

काल करम भव दुख से, तुमही छुडवन हार ।
परमहंस पद देत हो , क्षर अक्षरके पार ॥८

क्षर अक्षरके पार है, अक्षरातीत आधार ।
बिना संबंध न पाइये, कोटिन करे आचार ।९

वेद थके, थकि गये शेष महेश ।
गीताको जहाँ गम नहीं, वह सतगुरुको देश ॥१०

चाँद सूरज्को गम नहीं, नहीं पवकको काम ।
पहुँचे सो आवे नहीं, सोइ मुकुन्द निजधाम ॥११

श्री प्राणनाथ निज मूलपति, श्री मेहेराज सुनाम ।
तेजकुँवरी श्याम युगल, पल पल करूँ परनाम ॥१२

બંદૌ સતગુરુ

બંદૌ સતગુરુ ચરણકો, કરૂઁ પ્રેમ પ્રણામ |
અશુભ હરન મંગલ કરન, શ્રી દેવચન્દ્રજી નામ ||૧

શ્રી દેવચન્દ્રજીકો દરશ દિયો, જો હૈ પૂરણ રૂપ |
તારતમકો તત્વ કહ્યો, હિરદે બૈઠિ સ્વરૂપ ||૨

ધામધની આનંદ હો, પાવન પૂરણ નામ |
પરકે પરે પરમ પદ, સો કહિયે પરનામ ||૩

ગુરુ કન્ચન ગુરુ પારસ, ગુરુ ચંદન પરમાન |
તુમ સતગુરુ દીપક ભયે, કિયો જો આપ સમાન|૪

તુમ સ્વરૂપ તુમમેં સ્વરૂપ, તુમ સ્વરૂપકે સંગ |
ભેદ તુમ્હારો કો લખે, બ્રહ્માનંદ રસ રંગ||૫

તુમ કેવટ ભાનુ વા દેશકે, દેહુ ચક્ષુ આપ સમાન |
દૃષ્ટિ તુમ્હારી ક્યોં રહે, સંસય તિમિર અજ્ઞાન ||૬

જેહિ પદ નારાયણ ભજે, બ્રહ્મા વિષ્ણુ મહેશ |
મહાબિષ્ણુ વાછંત સદા, મોહિં પહુઁચાઓ વા દેશ |૭

કાલ કરમ ભવ દુખ સે, તુમહી છુડવન હાર |
પરમહંસ પદ દેત હો , ક્ષર અક્ષરકે પાર ||૮

ક્ષર અક્ષરકે પાર હૈ, અક્ષરાતીત આધાર |
બિના સંબંધ ન પાઇયે, કોટિન કરે આચાર |૯

વેદ થકે, થકિ ગયે શેષ મહેશ |
ગીતાકો જહાઁ ગમ નહીં, વહ સતગુરુકો દેશ ||૧૦

ચાઁદ સૂરજ્કો ગમ નહીં, નહીં પવકકો કામ |
પહુઁચે સો આવે નહીં, સોઇ મુકુન્દ નિજધામ ||૧૧

શ્રી પ્રાણનાથ નિજ મૂલપતિ, શ્રી મેહેરાજ સુનામ |
તેજકુઁવરી શ્યામ યુગલ, પલ પલ કરૂઁ પરનામ ||૧૨

बंदौ सतगुरु चरणको, करूँ प्रेम प्रणाम ।
अशुभ हरन मंगल करन, श्री देवचन्द्रजी नाम ॥१

श्री देवचन्द्रजीको दरश दियो, जो है पूरण रूप ।
तारतमको तत्व कह्यो, हिरदे बैठि स्वरूप ॥२

धनी देवचन्द्रजी बुध अवतार, श्यामा अवतार, इसा, रूहल्लाह, महम्मद मेहदी , निजानंद संप्रदाय के स्वामी को अनादी अक्षरातीत धाम के धनी पूर्ण ब्रह्मस्वरूप में दर्शन दिए और निज आत्मा स्वरुप का नाम श्री कृष्ण है कहा और ब्रज रास के ब्रह्मलीला, संसार, चौदह लोक, बेहद, अक्षर, परमधाम वतन का तारतम ज्ञान प्रदान किया , ब्रह्मात्मायों को जगाने का आदेश दिया और उनके हृदये में विराजे। इसे तारतम महामंत्र को कुंजी कहा है।इस कुंजी से आप कुरान, पुराण, वेद, भागवत, तोरेत, एंजेल और जबूर सभी खोले।
यह आनंद स्वरूप श्यामा के वर सुन्दर श्याम सत्य हैं।

धामधनी आनंद हो, पावन पूरण नाम ।
परके परे परम पद, सो कहिये परनाम ॥३

धाम धनी आनंद हैं और श्री कृष्ण नाम अत्यंत पावन है। पार के पार के परम पद को सभी प्रणाम करे। श्री कृष्ण के चरण में प्रणाम।
इनके चरण में शरण पड़ने वालों को अखंड सदा सुख प्राप्त होगा।

गुरु कन्चन गुरु पारस, गुरु चंदन परमान ।
तुम सतगुरु दीपक भये, कियो जो आप समान।४
तुम स्वरूप तुममें स्वरूप, तुम स्वरूपके संग ।
भेद तुम्हारो को लखे, ब्रह्मानंद रस रंग॥५

यह कुंजी ब्रह्मात्मा इन्द्रावती ने प्राप्त किया और श्याम श्यामा, सुंदरी सखी से उसका समागम हुआ और महामति प्राणनाथ हुई। हमारे सतगुरु धनी देव चन्द्र और महामति प्राणनाथ का एकाकार हो गया। धाम धनी श्री कृष्ण इन्द्रावती के हृदये में बैठ, इसीलिए साक्षात् परमधाम कृष्ण के स्वरुप हुए, इनके हृदये में अक्षरातीत श्री कृष्ण का स्वरुप विराजे हैं और परमधाम में इन्द्रावती तो श्री कृष्ण के साथ ही है। ब्रह्मानंद का यह भेद कौन जान सकता है ऐसा ब्रह्मात्मा मुकुंद दस जी कह रहें हैं। अब महामति प्राणनाथ और धाम के धनी श्री कृष्ण में कोई अंतर ही नहीं रहा। तब हमारे धनी श्यामा श्याम इन्द्रावती के हृदये में बैठ कर सभी ब्रह्मात्मा सुन्दरसाथ की जागनी की। अब यह सतगुरु दीपक भये और सभी सुन्दरसाथ को अपने सामान बना दिया। यह जो सुन्दरसाथ जागे वे प्राणनाथ पर समर्पित होकर घर बार छोड़ कर जागनी में लगे। यह ब्रह्मात्माओं के ह्रदय धाम में धनी श्यामा श्याम विराजे, इन्होने ने निजानंद अनुभव किया और इन्होने भी तारतम सागर बीतक लिखे।

तुम केवट भानु वा देशके, देहु चक्षु आप समान ।
दृष्टि तुम्हारी क्यों रहे, संसय तिमिर अज्ञान ॥६
जेहि पद नारायण भजे, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
महाबिष्णु वाछंत सदा, मोहिं पहुँचाओ वा देश ।७
काल करम भव दुख से, तुमही छुडवन हार ।
परमहंस पद देत हो , क्षर अक्षरके पार ॥८
क्षर अक्षरके पार है, अक्षरातीत आधार ।
बिना संबंध न पाइये, कोटिन करे आचार ।९
अब सतगुरु तो अखंड धाम के केवट हैं, उनके देह और नैन परमधाम की आत्मा स्वरुप हैं तब ऐसे स्वरुप के नजर में असत्य, शंसय, अन्धकार, अज्ञान कैसे टिक सकता है। जिस अक्षरातीत श्री कृष्ण के चरण नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, महेश भजते हैं, जहाँ पर अक्षर सदा रहते हैं उस देश में आपने पंहुचा दिया। यह कालमाया ब्रह्माण्ड के कर्म के बंधन के कारण भूत, वर्त्तमान और भविष्य में बार बार जनम और मृत्यु के कालचक्र से निकाल दिया और परम हंस के चरण दे दिए जो क्षर और अक्षर से पार हैं। क्षर और अक्षर से पार अक्षरातीत आधार बीना संबंध, करोडों आचार करने पर भी प्राप्त नहीं हैं। अक्षरातीत श्री कृष्ण की अंगना ही इस धाम में जागती हैं।

वेद थके, थकि गये शेष महेश ।
गीताको जहाँ गम नहीं, वह सतगुरुको देश ॥१०

चाँद सूरज्को गम नहीं, नहीं पवकको काम ।
पहुँचे सो आवे नहीं, सोइ मुकुन्द निजधाम ॥११

श्री प्राणनाथ निज मूलपति, श्री मेहेराज सुनाम ।
तेजकुँवरी श्याम युगल, पल पल करूँ परनाम ॥१२

वेद ने ब्रह्म की बहूत खोज की और बहूत कुछ कहा लेकिन संपूर्ण कह नहीं सके, थक गए और ब्रह्मा विष्णु महेश तीनो ने भी खोजा और कहा भी पर थक गए। यह परमधाम में सूर्य, चन्द्र जो इस पृथ्वी को जीवन दान देती है उसकी पहुँच वहां नहीं है आग की कोई आवश्यकता नहीं । वहां पर पहुँच कर फिर से हद (मृत्यु लोक) में आना नहीं पड़ता यह मुकुंद जी का आत्मा का घर निजधाम है।
श्री प्राणनाथ मेरे आत्मा के मूल धनी हैं जिनका सुनाम मेहेराज है और तेज कुँवरी श्यामा जुगल स्वरुप को पल पल (हर पल) प्रणाम।

सतगुरु धनी देवचन्द्रजी और महामति प्राणनाथ जी एक ही बातें करते हैं। इसा और इमाम का इलम एक ही है। अब इसे के नुस्खे पर चलने वाले सुन्दरसाथ को न कुलजम स्वरुप में कहीं शंका उपशंका है न ही कोई भी बीतक में, ना ही भागवत में, न हीं अन्य कोई ग्रन्थ में। ब्रह्मात्मायों की रचना में भी कोई भेद नहीं होता। एक ही धाम की सखियाँ धाम धनी की गुण गान कर रहीं हैं। सभी से आत्मा को सुख ही मिलता है। कहीं कोई संशय नहीं होता। अज्ञान और तिमिर का नाश होता है। तारतम की कुंजी से ग्रन्थ में छुपे हुए धाम धनी का पत्र बिलकुल स्पस्ट होता है। महामति प्राणनाथ ने कुम्ब में हमारा मंत्र तारतम इसी को कहा है। और हम श्री प्राणनाथ निज मूलपति, श्री मेहेराज सुनाम को सत्य मानते हैं, इन्ही से हमारे धर्म का जहाज चल रहा है।

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बंदौ सतगुरु બન્દૌ સતગુરુ