हद पार बेहद है, बेहद पार अक्षर,
अक्षर पार अक्षरातीत, जागिये इन घर ॥

Beyond this perishable, timed and limited world exists indestructible, eternal and infinite, abode of Akshar Brahma. Beyond Akshar is Aksharatit, Wake up souls in this home.

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Let's go Paramdham

चलो चलो रे साथजी, आपन जैए धाम।
मूल वतन धनिएं बताया, जित ब्रह्म सृष्टि स्यामाजी स्याम ।।१

हे सुन्दरसाथजी ! चलो, हम सब साथ मिलकर परमधाम जाएँ. परमधामकी बात सद्गुरुने हमें बताई है, जहाँ ब्रह्मसृष्टि और श्यामाजी सहित श्री श्याम (अक्षरातीत श्रीकृष्णजी) विराजमान हैं.

sanandh

सनंध इमामके स्वाल जवाब की
सुनियो बानी मोमिनों, हुती जो अगम अकथ।
सो वीतक कहूं तुमको, उड जासी गफलत ।।१
All your confusion will be over
हे ब्रह्मात्माओ ! अपने प्रियतम धनीके उन दिव्य वचनोंको सुनो जो आज तक अगम और अकथ कहलाते थे. मैं वह वृत्तान्त कह रहा हूँ जिससे अज्ञाानकी झूठी नींद उड. जाएगी.

हुकम हुआ इमाम का, उदया मूल अंकूर।
कलस होत सबन का, नूर पर नूर सिर नूर।।२

धाम स्याम स्यामाजी साथ, नख सिख रहे भराई।।

मद चढयो महामत भई, देखो ए मस्ताई।
धाम स्याम स्यामाजी साथ, नख सिख रहे भराई।।११

मेरी मस्तीको तो देखो, यह प्रेममद चढ.ने पर मैं महामति कहलाया. अब परमधाम, श्याम-श्यामाजी एवं सुन्दरसाथका स्वरूप मेरे रोम-रोममें अङ्कित हो गया है.

ए लीला अखंड थई, एहनो आगल थासे विस्तार।

सदा लीला जो व्रज की, मैं कही जो याकी विध।
अब कहूं वृन्दावन की, ए तो अति बडी है निध।।६४

व्रज मण्डलमें शाश्वतरूपसे चलनेवाली अखण्ड लीलाका विवरण मैंने इस प्रकार दिया है. अब मैं वृन्दावनकी रासलीलाका संक्षिप्त वर्णन करता हूँ. इसकी शोभा ही अपरिमेय है.

नाम तत्व कह्युं श्रीकृस्नजी, जे रमे अखंड लीला रास

तमे वाणी विचारी न चाल्या रे वैस्नवो, तमे वाणी विचारी नव चाल्या ।
अक्षर एकनो अर्थ न लाध्यो, मद मस्त थईने हाल्या ।।१

हे वैष्णवजन ! तुम वल्लभाचार्यजीकी वाणी-श्रीमद्बागवतकी सुबोधिनी टीकाके गूढ. रहस्योंको समझकर उन पर आचरण नहीं करते. उनके शब्दोंके एक भी अक्षरका अर्थ तुम नहीं समझ पाए, इसलिए झूठी मायामें मस्त होकर चल रहे हो.

सतवाणी वैस्नवने समझावुं, जेसूं मूल डाल प्रकासी।
श्री मुख आचारज जे ओचरया, तेणे जाए भरमणा नासी ।।२

दुनियां देख तूं आप संभार ! Mahamati

रे मन सृष्टि सकल सुपनकी, तूं करे तामें पुकार।
असत सतको ना मिले, तूं छोड आप विकार।।३

हे मन ! संसारकी सम्पूर्ण रचना स्वप्नवत् है, इसमें तू क्यों व्यर्थ पुकार रहा है. (मिथ्या संसारके लोग अखण्ड-सत्य वस्तुको समझ नहीं सकेंगे क्योंकि) असत्य कभी भी सत्यको प्राप्त नहीं कर सकता. इसलिए तू अपने ही विकारोंको त्याग दे.

O mind, do not lose yourself in the world. The people follow wierd rituals and they have very less understanding. They are running after the pleasures that can never be quenched. One cannot be satisfied with the reflection of the happiness. This whole creation is of dream and everything over here is false. The false can never attain the truth so do not go behind this false world but try to free yourself from vikar(false perception, sense pleasure, attachment, anger, greed etc).

Braj and Raas

धन गोकल जमुना त्रट, धन धन ब्रजवासी।
अग्यारे बरस लीला करी, करी अविनासी।।३२

ना जप तप ना ध्यान कछू, ना जोगारंभ कष्ट।
सो देखाई व्रज रास में, एही वतन चाल ब्रह्मसृष्ट।।


ए लीला अखंड थई, एहनो आगल थासे विस्तार।
ए प्रगटया पूरण पार ब्रह्म, महामति तणो आधार।।१०


सतगरु मेरा स्याम जी, मैं अहेनिस चरणें रहूं।
सनमंध मेरा याहीसों, मैं ताथें सदा सुख लहूं ।।


खोजी खोजें बाहेर भीतर, ओ अंतर बैठा आप।
सत सुपने को पारथें पेखे, पर सुपना न देखे साख्यात ।।५

hai nijnaam Shri Krishna

We must first believe this chaupai as truth must have complete faith on it and then one can understand the Nijanand Sampraday.
पिया जो पार के पार हैं, तिन खुद खोले द्वार।
पार दरवाजे तब देखे, जब खोल देखाया पार।।३

जो अक्षरसे भी परे अक्षरातीत परमात्मा हैं उन्होंने ही स्वयं आकर परमधामके द्वार खोल दिए. पारके द्वार मुझे तब प्रत्यक्ष हुए जब उन्होंने इस प्रकार खोलकर दिखाए.
The beloved Lord who is beyond of beyond(Akshar), he Himself (Khud) opened the door. I could see the door of beyond when he opened and showed the door!

खोजी खोजें बाहेर भीतर, ओ अंतर बैठा आप। Lord and the abode is within!

नूर रोसन बल धाम को, सो कोई न जाने हम बिन।
अंदर रोसनी सो जानहीं, जिन सिर धाम वतन।।

परमधामके दिव्य ज्ञानके प्रकाशके सामर्थ्यकी जानकारी हम ब्रह्मात्माओंके अतिरिक्त किसीको नहीं है. जिनको परमधामका दायित्व प्राप्त है, वे ही उसके अन्दरके प्रकाशको जान सकतीं हैं.

No one but the divine celestial souls know the splendour, illumination and power of the supreme abode paramdham. Those who are acquainted with light within, only those can experience the original abode of the supreme and bear the responsibility of Paramdham.

स्वाद चढया स्वाम द्रोही संग्रामे ! Mahamati

Do you know the written book that Mahamati Prannathji compiled for Aurangazeb? How can Prannathji explain the brute Aurangazeb a religious bigot who killed his own siblings(one of them was eldest son Darah Sikoh who spent his time seeking truth and has requested Aurangazeb to spare him as he does not want the throne but he did not listen), imprisoned his father and sister for life, cruel to the core and intolerant for other's beliefs?

गोकल सरूप पधारियो, तेहने न कहीए अवतार। Krishna is not in Avtaar

Image: 

--------------- How can celestial souls continue to be in confusion?
व्रज रास ए सोई लीला, सोई पिया सोई दिन।
सोई घडी ने सोई पल, वैराट होसी धन धन।।२२
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सोई पिया सोई पिया सोई पिया सोई पिया सोई पिया सोई पिया !!!!
व्रज और रासकी भाँति यह जागनी लीला भी अखण्ड है. इसमें भी वही धामधनी सद्गुरुके रूपमें हैं, वही लीला भरे दिन, वही आनन्दकी घड.ी, वही पल है. इसी जागनी लीलाके कारण समग्र सृष्टि धन्य (अखण्ड) हो जाएगी.

बुरा चाहें तिनका, जिन देखाया मूल वतन! How can one go against Devachandraji!

मिनो मिने गुझ करें, निस दिन एही चितवन।
बुरा चाहें तिनका, जिन देखाया मूल वतन।।९

कुछ लोग परस्पर छिपकर बातें करते हैं और निरन्तर (रात-दिन) दूसरोंके गुण-दोषोंका ही चिन्तन (छिद्रान्वेषण) करते रहते हैं. वे उनका भी बुरा चाहते हैं, जिन्होंने उन्हें परमधामका ज्ञाान दिया है.

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चरचा सुने वतन की, जित साथ स्यामाजी स्याम।
सो फल चरचा को छोडके, जाए लेवत हैं हराम।।१३
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चर्चा तो परमधामकी सुनती हैं जहाँ श्याम-श्यामाजी तथा सुन्दरसाथ आनन्दमें रहते हैं, परन्तु ऐसी दिव्य चर्चाके फलको छोड.कर त्याज्य वस्तुको ग्रहण करते हैं.

बाहेर देखावें बंदगी, माहें करें कुकरम काम।
महामत पूछे ब्रह्मसृष्ट को, ए वैकुंठ जासी के धाम।।१४

जो बाहरसे तो भक्तिभाव दिखाते हैं और अन्दर छिपकर दुष्कर्म करते हैं. ऐसी तथाकथित ब्रह्मसृष्टियोंसे महामति पूछते हैं कि वे वैकुण्ठ जाएँगे अथवा परमधाम ? अर्थात् उनकी कौन-सी गति होगी ?

निज बुध जागृत लेय के, साहेब पेहेचाने सोए।। Know your Master with your awakened mind.

सुनो साथजी सिरदारो, ए कीजो वचन विचार।
देखो बाहेर माहें अंतर, लीजो सार को सार जो सार ।।१

हे शिरोमणि सुन्दरसाथजी ! सुनो तथा इन वचनों पर विचार करो. इन वचनोंको बाहरसे श्रवण कर अन्दरसे मनन भी करो एवं इनके सारके भी सारतत्त्वको अन्तर आत्मामें धारण करो.


सुंदरबाई कहे धाम से, मैं साथ बुलावन आई।
धाम से ल्याई तारतम, करी ब्रह्मांड में रोसनाई।।२

सद्गुरु श्री देवचन्द्रजी महाराज (सुन्दरबाई) ने कहा था कि मैं परमधामसे सुन्दरसाथको बुलानेके लिए आया हूँ. उन्हीं सद्गुरुने परमधामसे तारतम ज्ञाान लाकर पूरे विश्वको प्रकाशित कर दिया है.

कहे सुन्दरबाई अक्षरातीत से, आया खेल में साथ।
दोए सुपन ए तीसरा, देखाया प्राननाथ।।९

सद्गुरुने यह भी कहा कि अक्षरातीत धामसे ब्रह्मात्माएँ इस नश्वर खेलमें सुरता रूपसे आई हैं. धामधनीने इस स्वप्न जगतमें व्रज और रास तथा यह तीसरी जागनी लीला दिखाई है.

धनी फुरमान साख लेय के, देखाय दई असल।
सो फुरमाया छोड के, करें चाह्या अपने दिल।।१२

सद्गुरुने कतेब ग्रन्थोंकी साक्षी देकर पूर्णब्रह्म परमात्मा एवं ब्रह्मात्माओंके वास्तविक स्वरूपका दर्शन करवा दिया. कतेब ग्रन्थोंको माननेवाले लोग उनके ऐसे वचनोंको छोड.कर अपने मनोनुकूल अर्थघटन करते हैं.

तोडत सरूप सिंघासन, अपनी दौडाए अकल।
इन बातों मारे जात हैं, देखो उनकी असल।।१३

ऐसे लोग परमात्माके स्वरूप तथा उनके स्थान (सिंहासन-परमधाम) की अवगणना करते हैं और अपनी बुद्धिको परमात्माके प्रति दौड.ाते हैं. वे इन्हीं रहस्यों पर धोखा खा जाते हैं. यही उनकी वास्तविकता है.

दरदी जाने दिलकी, जाहेरी जाने भेख।
अन्तर मुस्किल पोहोंचना, रंग लाग्या उपला देख।।१५

धामधनीके विरहका अनुभव करनेवाली विरही आत्मा ही सद्गुरुके दिलकी बात समझ सकती है, बाह्य दृष्टिवाले लोग मात्र उनकी वेश-भूषाको ही महत्त्व देते हैं. जिन्होंने मात्र बाह्य रूप पर ही विश्वास किया है, उनको अन्तर्हृदय तक पहुँचना कठिन होता है.


इन विध सेवें स्याम को, कहे जो मुनाफक।
कहावें बराबर बुजरक, पर गई न आखर लों सक।।१६

इस प्रकार बाह्यदृष्टिसे परमात्माकी उपासना करनेवाले लोग मिथ्याचारी कहलाते हैं. स्वयंको तो वे ज्ञाानी कहलवाते हैं, किन्तु अन्त तक उनके हृदयसे दुविधा नहीं मिटती.

पेहेले तौले बुध जागृत, पीछे तौले धनी आवेस।
और तौले इसक तारतम, तब पलटे उपलो भेस।।३

वे सर्वप्रथम जागृत बुद्धिका और धनीके आवेशका मूल्याङ्कन करेंगी. पश्चात् प्रेम और तारतमका भी मूल्याङ्कन करेंगी. तब उनकी बाह्य (लौकिक) मान्यताएँ बदल जाएगी.
जो सैयां हम धाम की, सो जानें सब को तौल।
स्याम स्यामाजी साथ को, सब सैयोंपे मोल।।६

परमधामकी हम ब्रह्मात्माएँ ही सबका मूल्याङ्कन कर सकतीं हैं. श्याम-श्यामाजी एवं ब्रह्मसृष्टिका मूल्याङ्कन (महत्त्व) भी हम ब्रह्मात्माओंको ही ज्ञाात है.

जो कोई उलटी करे, साथी साहेब की तरफ।
तो क्यों कहिए तिन को, सिरदार जो असरफ।।१४

जो व्यक्ति धामधनीकी ओर उन्मुख आत्माओंको उनसे विमुख करनेका प्रयत्न करता है, तो ऐसे व्यक्तिको प्रतिष्ठित अथवा अग्रणी कैसे माना जाए?


भी लिख्या कुरान में गिरो की, सोहोबत करसी जोए ।
निज बुध जागृत लेय के, साहेब पेहेचाने सोए।।१८
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कुरानमें और भी लिखा है कि जो ऐसी आत्माओंका सङ्ग करेंगे, वे भी उनसे जागृत बुद्धि प्राप्त कर अपने धनीको पहचानेंगे.

ले साख धनी फुरमान की, महामत कहें पुकार।
समझ सको सो समझियो, या यार या सिरदार ।।२३

धामधनी सद्गुरु तथा धर्मग्रन्थोंकी साक्षीके आधारपर महामति पुकार कर कह रहे हैं. ब्रह्मआत्माएँ अथवा शिरोमणि सखियाँ इस रहस्यको जितना समझ सकें, उतना समझ लें.

The last will of Mahamati


सोई झरोखे धाम के, जित झांकत हम तुम।
सो क्यों ना देखो नजरों, बुलाइयां खसम।।९


सोई खेलना सोई हंसना, सोई रस रंग के मिलाप।
जो होवे इन साथ का, सो याद करो अपना आप।।१०


सोई चाल गत अपनी, जो करते माहें धाम।
हंसना खेलना बोलना, संग स्यामाजी स्याम।।११

Save the Hindu dharma! Mahamati

छूटत है रे खडग छत्रियों से, धरम जात हिन्दुआन।
सत न छोडो रे सत बादियों, जोर बढयो तुरकान।।२

हे क्षत्रिय वंशके शूरो ! तुम्हारे हाथोंसे तलवार छूट रही है और हिन्दू धर्मका नाश हो रहा है. मुगलोंके अत्याचारोंका जोर बढ. रहा है इसलिए हे सत्यवादियो ! तुम अपना सत्य कर्तव्य मत छोड.ो.

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